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नया भस्मासुर

  • 21 Nov, 2018

कनाट प्लेस, राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 7 के बाहर चाय की चुस्कियाँ लेते हुए देश-दुनिया के तमाम ज्वलंत मुद्दों पर हम दोनों दोस्तों के बीच गरमा-गरम बहस जारी थी। मसलन, मिडिल ईस्ट में गाज़ा पट्टी पर फिलिस्तीन और इज़राइल के बीच सालों से चल रहे खूनी संघर्ष से लेकर दक्षिणी एशिया में कश्मीर की समस्या तक, यूरोपियन यूनियन से ब्रिटेन के बाहर होने से लेकर चीन तथा अमेरिका के बीच चल रहे व्यापार युद्ध तक। ऐसे मुद्दों पर बहस-मुबाहिसा करते हुए हम दोनों जलवायु परिवर्तन की समस्या पर कब आ गए पता ही नहीं चला! लेकिन सुकून की बात यह थी कि जलवायु परिवर्तन से होने वाले विनाशक खतरों पर हम दोनों की राय लगभग एक जैसी ही थी।

उसने कहा, “देखो! सीमा विवाद और दो देशों के बीच आपसी होड़ जैसी समस्याएँ तो जलवायु परिवर्तन की समस्या के आगे कुछ भी नहीं हैं।”

मैं उसकी बात से सहमत था।

गुस्से से अपनी शर्ट की स्लीव ऊपर करते हुए उसने कहा, “अरे! सबसे पहले दुनिया को तबाही से तो बचा लो, फिर आराम से पूरी दुनिया के भू-खंड तथा संसाधनों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लेना और इसका बँटवारा भी कर लेना। विश्व के खलीफाओं यानी अमेरिका जैसी वैश्विक शक्तियों को चाहिये कि जलवायु परिवर्तन पर गंभीरता से सोचें और अपनी विकसित तकनीकों का इस्तेमाल करते हुए इस विकराल समस्या के खिलाफ संघर्ष करें।”

कुछ देर सोचने के बाद मैं बोल पड़ा, “देखो, जिन लोगों का हाथ धरती को तबाही की तरफ ले जाने में रहा है, उन लोगों के भरोसे इसे छोड़ना मेरे हिसाब से ठीक नहीं है। तुम खुद ही सोचो, अपनी अर्थव्यवस्था और ‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति का हवाला देते हुए पेरिस समझौते से अमेरिका कैसे भाग खड़ा हुआ था। उनके लिये एकमात्र नारा- ‘विकास, विकास, विकास, सतत् विकास’ ही मायने रखता है। इस विकास के लिये उन्हें जंगलों को उजाड़ डालने, नदियों को सूखा देने, पहाड़ों के सीने में डाइनामाईट लगाकर उड़ा देने में भी कोई अफ़सोस नहीं होता है और शायद ही कभी हो।”

इसी बीच फर्राटे भरती हुई, काले धुएँ का गुबार छोड़ती हुई एक कार हमारे ठीक आगे से गुज़री।

मेरा दोस्त फिर गुस्से से लाल-पीला होते हुए बोल पड़ा, “लुक एट दिस मोरोन! सर्दियाँ आते ही दिल्ली में साँस लेना भी मुश्किल हो जाता है लेकिन फिर भी ऐसे लोगों को समझ नहीं आता है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है मानो कारों का उत्पादन आवागमन आसान बनाने के लिये नहीं बल्कि दिल्ली की हवा को ज़हरीली तथा खाली जगहों को कारों से पाट देने के लिये किया जा रहा है।”

मैंने कहा, “बिलकुल सही बात है! ऐसा लगता है, मानो दिल्ली के ठीक ऊपर नाइट्रोजन ऑक्साइड, बेंजीन, कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फ़र डाईऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर के ज़हरीले कॉकटेल के रूप में कोई भस्मासुर बैठा हो और यह धुआँ उगलती कारों तथा फैक्टरियों से आशीर्वाद लेकर ऊपर आसमान में ठिठोली करते हुए दिल्ली वासियों के फेफड़े में अपना ज़हर भरने के लिये बेताबी से मंडरा रहा हो।”

हम दोनों ही इस बात पर सहमत थे कि निजी वाहनों की जगह पब्लिक ट्रांसपोर्ट का ज़्यादा-से-ज़्यादा इस्तेमाल किया जाना चाहिये। धीरे-धीरे यह विमर्श निष्कर्ष की ओर बढ़ते हुए मात्र विमर्श तक सीमित न होकर सत्यनिष्ठा यानी ज्ञान और व्यवहार की सुसंगता हासिल करने की तरफ बढ़ने लगा, जो कहीं-न-कहीं हमें खुद के लिये भी संतोषजनक प्रतीत हो रहा था।

विमर्श के अंत तक आते-आते हम दोनों ने यह तय कर लिया कि अब से पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल ज़्यादा से ज़्यादा करेंगे और छोटी-मोटी दूरियों के लिये साइकिल का इस्तेमाल किया जाएगा। हमने अगले कुछ-एक दिनों में साइकिल खरीदने की योजना भी बना ली, जिसे कुछ ही दिनों के भीतर सुपरफ़ास्ट मोड में कार्यान्वित भी करना था। क्योंकि हमने यह विमर्श सिर्फ अपना ज्ञान बढ़ाने के उदेश्य से नहीं बल्कि अंग्रेजी की कहावत ‘वाक द टॉक’ माने ‘जैसी कथनी, वैसी करनी’ को चरितार्थ करने के लिये शुरू किया था।

चाय के तीसरे कप की आखिरी चुस्की के साथ ही बहस से विमर्श तक का यह सफ़र समाप्त हो गया। हैंडशेक करके हमने एक-दूसरे को विदा किया।

(To Be Continued...)

Mr. Kavindra Kabir

कवीन्द्र कबीर एक स्वतंत्र लेखक, ब्लॉगर और अनुवादक होने के साथ-साथ यायावर प्रकृति के है, इन्हें पढ़ने के साथ-साथ दुनिया घूमने का भी शौक है।

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