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अज्ञान का स्वीकार ही ज्ञान की दिशा में पहला कदम है

  • 04 Dec, 2019

बचपन में किसी को कहते सुना था या शायद कहीं पढ़ा था कि 'आप वही जानते हैं जो आपको पता है, आप वह नहीं जानते जिसके बारे में आपको नहीं पता है'। बचपन की यह बात मन में ऐसा घर कर गयी है कि 'सच सामने आ ही जाता है' या 'झूठ के पांव नही होते' जैसी बातों से भरोसा ही उठ गया है। हर बात पर शक होता है।

मसलन अगर कोई कहता है कि पोटैशियम सायनाइड दुनिया का सबसे खतरनाक ज़हर है और मुँह में रखते ही मौत हो जाती है, तो मन में प्रश्न उठता है कि फिर यह दुनिया का सबसे खतरनाक ज़हर कैसे हुआ? यह तो सबसे लक्ज़रियस ज़हर हुआ। कोई कहे कि स्विट्ज़रलैंड दुनिया का सबसे खूबसूरत देश है, तो मैं बोल दूँगा कि स्विट्ज़रलैंड दुनिया का सबसे खूबसूरत देश इसलिये है क्योंकि उनके कैमरे और फोटोग्राफी तकनीक बहुत ज़्यादा उन्नत हैं, वरना हमारा कश्मीर भी किसी से कम सुंदर नहीं है, बस हमारे लड़कों ने कैमरे की जगह बंदूकें पकड़ ली हैं।

अपनी इस आदत की वजह से मैंने तमाम लोगों की नाराज़गी झेली है। हालत यह है कि आप पूरे विश्वास से प्रमाणों के साथ कोई स्थापित सत्य बोल कर देख लीजिये, मैं आपको संशय करने के तमाम बिंदु मुहैया करा दूँगा। आप कहकर देख लीजिये कि सबसे खूबसूरत प्रेमपत्र अमृता और इमरोज़ के दरम्यान लिखे गए, मैं बोल ही दूँगा कि सबसे खूबसूरत प्रेमपत्रों को दीमकों ने भले ही चाटा हो या आग ने भले जलाया हो पर वे कभी किसी प्रकाशक के हाथ नही लग सकते। प्रेमपत्र पंचतत्त्व में विलीन होते हैं। वे जीवित और अजर होते हैं। या मैं बोल दूँगा कि सबसे खूबसूरत प्रेमपत्र शायद अप्रेषित और अज्ञात ही रह गए हों। क्या यह संभव नहीं है कि सबसे खूबसूरत प्रेमपत्र एक कविता हो या क्या यह असंभव है कि सबसे खूबसूरत प्रेमकथाओं में ताउम्र प्रेम की अभिव्यक्ति से ही बचा गया हो और हम अब तक उनसे अनभिज्ञ हों।

मैं क्यों किसी अमृता-इमरोज़, रोमियो-जूलियट या लैला-मजनूं को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ प्रेमी युगल मान लूँ ? क्या यह संभव नहीं है कि सबसे अच्छा प्रेमी युगल कहीं किसी रेगिस्तान की रेत में दफ़न हो, जिसे उनके परिवारों ने आपसी सहमति से मिलकर 'ऑनर किलिंग' के नाम पर मार दिया हो।

हालाँकि कॉस्ट बेनिफिट एनालिसिस में मैने पाया है कि मेरा यह स्वभाव मुझे ठीक-ठाक नुकसान पहुँचा चुका है, ऐसे में मेरे पास दो विकल्प हैं, या तो चुपचाप हर बात पर हामी भर दिया करूँ और सबका प्रिय बन जाऊँ या अपनी असहमति ज़ाहिर कर के लोगो की त्योरियाँ देखूं। ऐसे में मैं दूसरे विकल्प का चुनाव करता हूँ और करूँ भी क्यों न। मैं माली के बताने भर से ही क्यों मान लूँ की पेड़ का सबसे मीठा फल मैं ही खा रहा हूँ। आखिर क्यों सभंव नही है कि पेड़ के सबसे मीठे फल को चींटियों और सुग्गों ने पहले ही खा डाला हो या माली ही तोड़कर खा गया हो और हम उसकी छूटन और जूठन को ही सबसे अच्छा समझकर खुश हुए जा रहे हों। लेकिन बात बस इतनी ही नहीं है।

यह संशयवाद मुझ पर हावी होता जा रहा है। सोचता हूँ मैं यह भी क्यों मान लूँ कि जिस गुरु ने मेरी सभी समस्याएँ दूर कीं, वही सर्वश्रेष्ठ गुरु था। मैं उस गुरु को सर्वश्रेष्ठ क्यों न मानूँ, जिसने मुझे खुद समस्याओं से जूझने की सलाह दी और मेरे आगे-आगे चलकर मेरा रास्ता घेरने, मेरी गति सीमित करने और नए रास्तों की खोज की संभावनाओ को कम करने से बचता रहा।

महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई मेरे प्रिय लेखक हैं, मेरे ऊपर उनका खूब असर है लेकिन उनकी जीवनी पढ़ने के बाद मैंने उन्हें सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यकार मानने से इनकार कर दिया।

अगस्त 1924 में जन्मे परसाई जी ने आजीवन व्यंग्य विधा में लेखन किया। 1995 में लगभग 71 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। आखिर कैसे संभव है कि सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यकार 71 वर्ष की आयु पूरी करे?

मुझे विश्वास है कि सर्वश्रेष्ठ व्यंग्यकार को व्यंग्य लिखने से पहले व्यंग्य करने के चलते किसी अंधेरी गली में चाकुओं से गोदकर मार डाला होगा और हम उसे कभी जान ही नहीं पाए।

दर्शन या ज्ञान के मामलों में किये जाने वाले दावों को भी मैं सदा नकाराता ही रहा हूँ। मेरे तर्क बड़े ही साधारण हैं। आप ही बताइये, क्या ये सच में असंभव है कि हम अब तक के महानतम दर्शन को सिर्फ इसलिये न जान पाएं हों कि उसका इलहाम करने वाले दार्शनिक को अपने दर्शन की अनुभूति के बाद उसको व्यक्त करना ही बचपना लगा हो और मंसूरी मुस्कान चेहरे पर लिये हुए वो जीवन जी कर आगे बढ़ गया हो और इसके चलते हम कुछ औसत किस्म की अनुभूतियों को ही दर्शन की चरम अवस्था और सर्वश्रेष्ठ दर्शन मान रहे हों।

मैं हर बार सोचता हूँ कि अब अपने संशयवाद पर लगाम लगाऊँ, पर तभी कोई अजीब सा दावा मेरे कानों में पड़ता है और मैं तिलमिला उठता हूँ। आप ही बताइए, मैं क्यों अखबारों की बताई किसी स्त्री को दुनिया की अब तक की सबसे खूबसूरत स्त्री मान लूँ? क्या यह बड़ी बात है कि दुनिया की सबसे खूबसूरत स्त्री को जन्म ही न लेने दिया गया हो। क्या यह असंभव है कि वह जन्म के बाद किसी गलीज़ जगह पर कैद हो और किसी को उसकी खबर तक न हो?

मैं पूछता हूँ कि हवा और पानी को दूषित करना, जंगलों को आग लगा देना धरती के सबसे बड़े अपराधों में शुमार क्यों नही है? जबकि ये पूरी मानवता और प्रकृति के लिये देशद्रोह और आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक कृत्य हैं। संभव है मेरा ऐसा सोचना गलत और अनुचित हो, पर मैं जानता हूँ कि मेरा यह सब कहना-लिखना संतुष्ट सूअर को असंतुष्ट मनुष्य से गलीज़ समझने की कृत्रिम समझदारी देख उपजी मेरी ख़िसियाहट है, जबकि हम में से अधिकांश लोग संतुष्ट सूअर बनने का ख्वाब देख रहे हैं।

[हिमांशु सिंह]

Himanshu Singh

हिमांशु दृष्टि समूह के संपादक मंडल के सदस्य हैं। हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी हैं और समसामयिक मुद्दों के साथ-साथ विविध विषयों पर स्वतंत्र लेखन करते हैं।

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