दृष्टि के NCERT कोर्स के साथ करें UPSC की तैयारी और जानें
ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न: गैर-राज्यीय तत्त्वों द्वारा मानवरहित हवाई वाहनों (ड्रोन) के बढ़ते उपयोग के संदर्भ में, सीमा प्रबंधन और आंतरिक सुरक्षा के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों का परीक्षण कीजिये तथा भारत की संस्थागत तैयारियों की पर्याप्तता का आकलन कीजिये। (250 शब्द)

    25 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 आंतरिक सुरक्षा

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत UAV की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में, सीमा प्रबंधन और आंतरिक सुरक्षा में UAV द्वारा उत्पन्न चुनौतियों की व्याख्या कीजिये।
    • इसके बाद, भारत की संस्थागत तैयारियों की पर्याप्तता का आकलन कीजिये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    गैर-राज्य तत्त्वों द्वारा मानव रहित हवाई वाहनों (UAVs) अथवा ड्रोन के प्रसार ने भारत की सुरक्षा चुनौतियों में एक ‘तीसरा आयाम’ जोड़ दिया है। कम लागत वाले, वाणिज्यिक रूप से उपलब्ध (COTS) ड्रोन का तस्करी, निगरानी तथा ‘कामिकाज़े’ हमलों के लिये दुरुपयोग अब एक परिधीय चिंता से बढ़कर सीमा प्रबंधन और आंतरिक सुरक्षा के लिये एक प्रमुख खतरा बन चुका है।

    मुख्य भाग: 

    सीमा प्रबंधन हेतु चुनौतियाँ

    • असममित तस्करी (नशीले पदार्थ एवं हथियार): पश्चिमी सीमा (पंजाब/जम्मू-कश्मीर) पर गैर-सरकारी तत्त्व ड्रोन का प्रयोग करके हेरोइन, सिंथेटिक ड्रग्स और छोटे हथियारों जैसे कीमती, लेकिन कम मात्रा वाले सामान गिराते हैं।
      • पिछले पाँच वर्षों में 4,000 से अधिक ड्रोन देखे जाने की घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें 967 घुसपैठ प्रयासों को रोका या निष्क्रिय किया गया, जिससे गोला-बारूद, हथियार और नशीले पदार्थ बरामद हुए।
    • भौगोलिक बाधाओं का निष्प्रभावीकरण: ड्रोन पारंपरिक भौतिक अवरोधों जैसे समग्र एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (CIBMS) और स्मार्ट फेंसिंग को पार कर जाते हैं। वे नदीय क्षेत्रों, घने वनों और पर्वतीय इलाकों (जैसे भारत-म्याँमार सीमा) से होकर गुजरते हैं, जहाँ मानव गश्त सीमित होती है।
    • निगरानी एवं खुफिया जानकारी एकत्रण: आतंकवादी समूह सीमा चौकियों (BOPs) और सैनिक गतिविधियों की वास्तविक समय में निगरानी के लिये छोटे UAV का उपयोग करते हैं, जिससे भारतीय सुरक्षा बलों की रणनीतिक गोपनीयता कमज़ोर होती है।
    • सैचुरेशन/स्वार्म रणनीति: ‘ड्रोन स्वार्म’ का खतरा पारंपरिक वायु रक्षा रडार को अभिभूत करने का प्रयास करता है, जो सामान्यतः बड़े विमानों के लिये अनुकूलित होते हैं और ‘कम ऊँचाई, धीमी गति और छोटे आकार’ (LSS) वाले लक्ष्यों को ट्रैक करने में कठिनाई अनुभव करते हैं।

    आंतरिक सुरक्षा के लिये खतरे

    • महत्त्वपूर्ण अवसंरचना की संवेदनशीलता: ड्रोन ‘सॉफ्ट’ और ‘हार्ड’ दोनों प्रकार के लक्ष्यों जैसे तेल रिफाइनरी, परमाणु संयंत्र और हवाई अड्डों के लिये प्रत्यक्ष खतरा उत्पन्न करते हैं।
      • वैश्विक स्तर पर हवाई अड्डों में व्यवधान की बढ़ती घटनाओं के बाद, भारत नागरिक हवाई अड्डों पर एंटी-ड्रोन प्रणालियाँ तैनात कर रहा है।
    • हत्या एवं शहरी आतंक: वर्ष 2021 का जम्मू वायुसेना स्टेशन हमला ड्रोन-आधारित ‘काइनेटिक स्ट्राइक’ का संकेतक था।
      • छोटे ड्रोन को IED से लैस कर लक्षित हत्याओं के लिये या भीड़-भाड़ वाले सार्वजनिक स्थानों एवं राजनीतिक रैलियों में दहशत फैलाने हेतु उपयोग किया जा सकता है।
    • साइबर-भौतिक उल्लंघन: ड्रोन का उपयोग सुरक्षित परिसरों के पास मंडराकर वाई-फाई संकेतों को पकड़ने या बिना एंक्रिप्शन वाले संचार को अवरोधित करने के लिये किया जा सकता है, जिससे भौतिक और साइबर वारफेयर के बीच की दूरी समाप्त हो जाती है।

    भारत की संस्थागत तैयारियाँ: आकलन

    • तैयारियाँ
      • D4 प्रणाली का समावेशन: DRDO द्वारा विकसित ‘ड्रोन डिटेक्ट, डिटर और डिस्ट्रॉय’ (D4) प्रणाली को औपचारिक रूप से भारत की सशस्त्र सेनाओं में शामिल किया गया है।
        • इसके अतिरिक्त, भारत ने ‘भार्गवास्त्र’ भी विकसित किया है, जो विशेष रूप से स्वार्म (झुंड) में कार्य करने वाले दुश्मन ड्रोन को निष्क्रिय करने के लिये डिज़ाइन किया गया है।
      • स्वदेशी समाधान: निजी क्षेत्र की कंपनियाँ जैसे ज़ेन टेक्नोलॉजीज़ और VEM टेक्नोलॉजीज़ (स्लिंगशॉट प्रणाली) ने बहु-स्तरीय एंटी-ड्रोन संरचनाएँ विकसित की हैं।
        • ‘इंद्रजाल’ स्वायत्त ड्रोन डोम भी स्वार्म हमलों के विरुद्ध व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदान करता है।
      • प्रोजेक्ट सुदर्शन चक्र: वर्ष 2025 में घोषित यह भविष्यवादी मिशन 2035 तक एक व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा कवच तैयार करने का लक्ष्य रखता है, जिसमें AI-आधारित पूर्वानुमान तकनीकों को शामिल कर खतरों को भारतीय वायु-क्षेत्र में प्रवेश से पहले ही रोकने का प्रयास किया जाएगा।
      • मानक संचालन प्रक्रियाएँ (SOPs): गृह मंत्रालय (MHA) ने संदिग्ध/अनियंत्रित ड्रोन से निपटने के लिये राज्य पुलिस बलों हेतु व्यापक दिशानिर्देश जारी किये हैं।
    • कमियाँ और पर्याप्तता का आकलन
      • ‘लागत-विनिमय’ अनुपात: जहाँ एक ड्रोन की लागत कुछ हजार रुपये होती है, वहीं उसे निष्क्रिय करने वाली इंटरसेप्टर मिसाइल की लागत लाखों में होती है। रक्षा को आर्थिक रूप से सतत बनाने के लिये भारत को अधिक निर्देशित ऊर्जा हथियार (DEWs) और उच्च-शक्ति लेजर प्रणालियों की आवश्यकता है।
      • घटक निर्भरता: ‘आत्मनिर्भर’ पहल के बावजूद, महत्त्वपूर्ण सेंसर और उच्च-घनत्व बैटरियाँ अभी भी बड़े पैमाने पर आयातित हैं, जिससे ‘डिज़ाइन-से-सुरक्षित’ ढाँचे में एक संवेदनशीलता बनी रहती है।
      • कानूनी ‘ग्रे क्षेत्र’: वर्तमान कानून अभी भी विकसित हो रहे हैं, विशेषकर निजी संपत्ति या शहरी क्षेत्रों में ड्रोन को मार गिराने के अधिकार (Right to Shoot Down) को लेकर, जहाँ गिरने वाले मलबे से सहायक क्षति हो सकती है।

    निष्कर्ष

    ऑपरेशन सिंदूर (2025) जैसी घटनाओं के बाद ड्रोन खतरों के विरुद्ध भारत की तैयारियाँ उल्लेखनीय रूप से परिपक्व हुई हैं। AI-संयुक्त, बहु-स्तरीय रक्षा प्रणालियों की ओर बढ़ना तथा ‘डिज़ाइन-से-सुरक्षित’ खरीद नीति अपनाना संस्थागत जागरूकता के उच्च स्तर को दर्शाता है। हालाँकि, गैर-राज्य तत्त्वों द्वारा उपयोग की जाने वाली ‘डिस्पोज़ेबल तकनीक’ के कारण नवाचार की तीव्र गति भारत से निरंतर तकनीकी उन्नयन बनाए रखने और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर के क्षेत्र में अधिक गहन सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देने की अपेक्षा करती है।

    To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.

    Print
close
Share Page
images-2
images-2