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प्रश्न :
प्रश्न. जलवायु परिवर्तन, समुद्र-स्तर वृद्धि और चरम मौसम घटनाओं से बढ़ते जोखिमों के संदर्भ में, आपदा जोखिम न्यूनीकरण नीतियों के साथ जलवायु अनुकूलन रणनीतियों के एकीकरण की आवश्यकता का विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)
18 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 3 आपदा प्रबंधनउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत जलवायु परिवर्तन, समुद्र-स्तर में वृद्धि और चरम मौसमीय घटनाओं से बढ़ते जोखिमों को रेखांकित करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में, आपदा जोखिम न्यूनीकरण नीतियों के साथ जलवायु अनुकूलन रणनीतियों के एकीकरण की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिये।
- इसके बाद, इस एकीकरण में आने वाली चुनौतियों का उल्लेख कीजिये।
- अंत में, इन चुनौतियों से निपटने के लिये उपयुक्त उपाय सुझाएँ।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
21वीं सदी में जल-मौसम संबंधी जोखिमों में अभूतपूर्व वृद्धि देखी जा रही है। IPCC की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट इस तर्क पर ज़ोर देती है कि जलवायु परिवर्तन चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और गंभीरता को और अधिक बढ़ा रहा है।
- समुद्र के जलस्तर में वृद्धि के कारण तटीय महानगरों में आने वाली विनाशकारी बाढ़ से लेकर ‘फ्लैश ड्राउट्स’ (अचानक पड़ने वाला सूखा) और ‘रेन बॉम्ब्स’ (अत्यधिक तीव्र वर्षा) के अनियमित पैटर्न तक—जलवायु परिवर्तन तथा आपदा प्रबंधन के बीच की पारंपरिक सीमाएँ पूरी तरह समाप्त हो गई हैं। इसके लिये अब एक एकीकृत नीतिगत प्रतिक्रिया की तत्काल आवश्यकता है।
मुख्य भाग:
जलवायु अनुकूलन (CCA) और आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) के एकीकरण की आवश्यकता:
- उद्देश्यों का अभिसरण: जहाँ DRR (आपदा जोखिम न्यूनीकरण) तत्काल जोखिमों की पहचान और उनके शमन पर ध्यान केंद्रित करता है, वहीं CCA (जलवायु परिवर्तन अनुकूलन) दीर्घकालिक अनुकूलन पर ज़ोर देता है।
- इनका एकीकरण यह सुनिश्चित करता है कि अल्पकालिक आपदा प्रतिक्रियाएँ 'कु-अनुकूलन' का कारण न बनें (उदाहरण के लिये: ऐसी समुद्री दीवार बनाना जो प्राकृतिक मैंग्रोव को नष्ट कर दे, जबकि मैंग्रोव दीर्घकालिक जलवायु सुरक्षा के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं)।
- संसाधन अनुकूलन और तालमेल: ये दोनों क्षेत्र एक ही वित्तीय और मानव पूंजी के लिये प्रतिस्पर्द्धा करते हैं।
- एक एकीकृत ढाँचा 'संस्थागत अलगाव' को रोकता है, जिससे एक एकल 'अनुकूलन बजट' बनाना संभव होता है। यह बजट चक्रवातों जैसी अचानक आने वाली आपदाओं और मरुस्थलीकरण जैसी धीमी गति से आने वाली आपदाओं, दोनों का समाधान कर सकता है।
- बेहतर पूर्वानुमान सटीकता: भविष्योन्मुखी 'जलवायु मॉडलिंग' को ऐतिहासिक 'आपदा डेटा' के साथ जोड़ने से एक अधिक सुदृढ़ 'जोखिम प्रोफाइल' तैयार होती है।
- इससे 'जलवायु-अनुकूल पावर ग्रिड' जैसे बुनियादी ढाँचे का निर्माण संभव होता है, जो आज के तूफानों और भविष्य की हीटवेव, दोनों को सहन कर सके।
- भेद्यता कम करने पर ध्यान: दोनों रणनीतियाँ उन्हीं हाशिये पर रहने वाली आबादी को लक्षित करती हैं।
- इन्हें मिलाकर, राज्य 'प्रतिक्रियात्मक राहत' से 'सक्रिय भेद्यता मानचित्रण' की ओर बढ़ सकता है। यह सुनिश्चित करता है कि MGNREGA जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का उपयोग ऐसी संपत्ति बनाने के लिये किया जाए जो बाढ़ सुरक्षा और 'कार्बन सिंक' दोनों के रूप में कार्य करें।
एकीकरण में बाधा डालने वाली चुनौतियाँ
- संस्थागत विखंडन: पर्यावरण मंत्रालय (जो CCA सॅंभालता है) और गृह मंत्रालय (जो DRR सॅंभालता है) अलग-अलग कार्य करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग प्रणाली अलग है और उनके शासनादेश अक्सर एक-दूसरे के विपरीत होते हैं।
- समय सीमा में अंतर: DRR प्राय: ‘अल्पकालिक राजनीतिक दृष्टिकोण’ (तत्काल राहत और 5-वर्षीय योजना) से प्रेरित होता है, जबकि CCA के लिये 20 से 50 वर्षों के अनुमानों की आवश्यकता होती है, जिससे वित्तपोषण चक्रों का मिलान करना कठिन हो जाता है।
- डेटा की असंगति: ‘इंटरऑपरेबल डेटा मानकों’ का अभाव है; आपदा डेटाबेस में प्राय: जलवायु चरों की कमी होती है और जलवायु मॉडल अक्सर स्थानीय आपदा निकासी योजना के लिये बहुत व्यापक होते हैं।
- वित्तीय अंतराल: अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय और घरेलू वित्तपोषण ‘निवारण एवं अनुकूलन’ के बजाय ‘प्रतिक्रिया व पुनर्बहाली’ पर केंद्रित रहता है।
- ‘एकीकृत अनुकूलन कोष’ की कमी समग्र योजना बनाने में बाधक है।
- स्थानीय स्तर पर क्षमता की कमी: शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) और पंचायतों के पास अक्सर जटिल जलवायु डेटा को समझने तथा उसे कार्रवाई योग्य आपदा प्रोटोकॉल में बदलने के लिये तकनीकी विशेषज्ञता की कमी होती है।
चुनौतियों से निपटने के उपाय
- शासन में अनुकूलन का समावेशन: 'राष्ट्रीय अनुकूलन परिषद' की स्थापना करना, जो जलवायु वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधकों को एक साथ लाकर एकल 'अनुकूलन हेतु राष्ट्रीय रणनीतिक योजना' तैयार कर सके।
- एकीकृत जोखिम मूल्यांकन: 'बहु-खतरा प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली' (MHEWS) की ओर बढ़ना, जो किसानों और तटीय निवासियों के लिये दैनिक मौसम अलर्ट में जलवायु अनुमानों को भी शामिल करे।
- हरित-धूसर बुनियादी ढाँचे का मिश्रण: प्राथमिक आपदा बचाव के रूप में 'प्रकृति-आधारित समाधानों' (NbS) (जैसे आर्द्रभूमि और शहरी वनों का पुनरुद्धार) को बढ़ावा देना, जो साथ-साथ दीर्घकालिक जलवायु अनुकूलन उपायों के रूप में भी कार्य करते हैं।
- जलवायु-संवेदी वित्तपोषण: 'पूर्व-व्यवस्थित वित्तपोषण' और 'कैटास्ट्रोफी बॉण्ड' की ओर रुख करना, जो आपदा आने का इंतज़ार करने के बजाय जलवायु-जोखिम की सीमाओं के आधार पर फंड जारी करते हैं।
- अनुकूलन के लिये डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: संवेदनशील ज़िलों के 'डिजिटल ट्विन्स' बनाने के लिये AI और बिग डेटा का उपयोग करना, जिससे नीति निर्माता वर्तमान आपदा निकासी मार्गों पर समुद्र के बढ़ते जलस्तर के प्रभाव का अनुकरण कर सकें।
निष्कर्ष
जलवायु परिवर्तन अनुकूलन (CCA) और आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) का एकीकरण अब केवल एक नीतिगत विकल्प नहीं, बल्कि अस्तित्व की अनिवार्यता है। जैसे-जैसे वैश्विक तापमान 1.5°C की सीमा को पार कर रहा है, ‘प्राकृतिक आपदाओं’ और ‘जलवायु-प्रेरित घटनाओं’ के बीच की रेखा धुंधली हो गई है। यह स्थिति SDG 11 (संवहनीय शहर और समुदाय) और SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) जैसे लक्ष्यों के अनुरूप एक एकीकृत दृष्टिकोण की मांग करती है।
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