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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न: “निष्क्रिय इच्छामृत्यु विधि, नैतिकता तथा चिकित्सीय निर्णय-निर्माण के जटिल अंतर्संबंधों को उद्घाटित करती है।” विश्लेषण कीजिये कि भारतीय न्यायालयों ने विकसित होती न्यायिक व्याख्याओं के माध्यम से इन आयामों के मध्य संतुलन स्थापित करने का किस प्रकार प्रयास किया है। (250 शब्द)

    17 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत हालिया निर्णय को रेखांकित करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में यह तर्क प्रस्तुत कीजिये कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु विधि, नैतिकता और चिकित्सीय निर्णय-निर्माण के बीच जटिल अंतर्संबंध उत्पन्न करती है।
    • इसके बाद, भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के विकास को स्पष्ट कीजिये।
    • आगे, इसकी विधि, नैतिकता और चिकित्सीय निर्णय-निर्माण पर प्रभाव का विश्लेषण कीजिये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) जीवन-निर्वाह करने वाले चिकित्सीय हस्तक्षेपों को वापस लेने को संदर्भित करती है और यह शासन के लिये एक गहन चुनौती प्रस्तुत करती है। इसमें उस संवेदनशील क्षेत्र में संतुलन स्थापित करना आवश्यक होता है, जहाँ संवैधानिक अधिकार, नैतिक दर्शन और चिकित्सीय व्यवहार आपस में टकराते हैं।

    हरीश राणा बनाम भारत संघ (2026) मामले में सर्वोच्च न्यायालय का हालिया निर्णय  एक ऐतिहासिक मोड़ है, क्योंकि यह भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु के ढाँचे का पहला व्यावहारिक अनुप्रयोग है।

    मुख्य भाग: 

    अंतर्संबंध: विधि, नैतिकता और चिकित्सीय निर्णय-निर्माण

    • विधिक आयाम
      • अनुच्छेद 21 और स्वायत्तता: विधि को जीवन की रक्षा करने के राज्य के कर्त्तव्य और व्यक्ति के उपचार को अस्वीकार करने के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करना होता है, अर्थात ‘संरक्षण’ बनाम ‘आत्म-निर्णय’ के बीच संतुलन।
      • सूचित सहमति का सिद्धांत (Doctrine of Informed Consent): विधिक रूप से किसी रोगी का उपचार बंद करने का अधिकार इस सिद्धांत पर आधारित है कि बिना सहमति के कोई भी चिकित्सीय हस्तक्षेप तकनीकी रूप से ‘हमला’ माना जा सकता है, इसलिये ‘लिविंग विल’ के लिये स्पष्ट कानूनी ढाँचे की आवश्यकता होती है।
      • ‘इरादा’ बनाम ‘उपेक्षा’ की समस्या: कानून के लिये ‘मारना’ (सक्रिय) और ‘मरने देना’ (निष्क्रिय) के बीच अंतर करना कठिन होता है। इसमें यह देखा जाता है कि उपचार न देना एक करुणामूलक निर्णय है या आपराधिक लापरवाही।
    • नैतिक आयाम
      • पवित्रता बनाम गरिमा: यह नैतिक द्वंद्व एक ओर उस धार्मिक/नैतिक दृष्टिकोण के बीच है जो हर परिस्थिति में जीवन को पवित्र मानता है तथा दूसरी ओर उस धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के बीच है जो मानती है कि गरिमा या चेतना के अभाव में जीवन व्यक्ति के अधिकारों का हनन करता है।
      • अहानिकारिता का सिद्धांत (Non-Maleficence): ‘किसी को हानि न पहुँचाना’ चिकित्सा नैतिकता का मूल सिद्धांत है, लेकिन यह तब अस्पष्ट हो जाता है जब किसी रोगी को वेंटिलेटर पर अचेतन अवस्था (Vegetative state) में बनाए रखना लंबे समय तक पीड़ा के रूप में ‘हानि’ माना जाने लगता है।
      • विकृत परिणामों की ओर बढ़ाव: नैतिक विचारकों को यह चिंता रहती है कि इच्छामृत्यु के किसी भी रूप को वैध बनाने से दिव्यांग या वृद्ध लोगों के जीवन का अवमूल्यन हो सकता है और इसका दुरुपयोग परिवारों द्वारा देखभाल के बोझ से बचने के लिये किया जा सकता है।
    • चिकित्सीय आयाम
      • नैदानिक अनिश्चितता: यह निर्धारित करना कि कोई स्थिति वास्तव में ‘अपरिवर्तनीय’ है या नहीं, एक बड़ी चिकित्सीय चुनौती है; चिकित्सकों को जीवन-समर्थन हटाने के लिये आवश्यक ‘निश्चितता’ प्राप्त करने में प्राय: कठिनाई होती है।
      • पितृसत्तात्मक अंतर: पारंपरिक ‘डॉक्टर ही सबसे बेहतर जानते हैं’ मॉडल से हटकर ‘रोगी-केंद्रित’ मॉडल की ओर संक्रमण, जिसमें चिकित्सक रोगी की इच्छाओं को पूरा करने में एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है।
      • संसाधन आवंटन: भारत जैसे देश में डॉक्टरों को ‘ट्रायेज (Triage)’ की दुविधा का सामना करना पड़ता है कि एक अंतिम अवस्था के रोगी को वेंटिलेटर पर रखा जाए या उसे ऐसे व्यक्ति के लिये उपलब्ध कराया जाए, जिसकी ठीक होने की संभावना अधिक हो।

    भारत में न्यायशास्त्र का विकास

    • पी. रतिनम बनाम भारत संघ (1994): सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'जीवन के अधिकार' में 'मरने का अधिकार' भी शामिल है। न्यायालय ने अन्य मौलिक अधिकारों के साथ इसकी समानता बताते हुए यह तर्क दिया।
    • ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996): सर्वोच्च न्यायालय ने पी. रतिनम के निर्णय को पलट दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 21 में मरने का अधिकार शामिल नहीं है; आत्महत्या जीवन का एक अप्राकृतिक अंत है।
    • अरुणा शानबाग बनाम भारत संघ (2011): इस मामले में कड़े सुरक्षा उपायों के साथ 'निष्क्रिय इच्छामृत्यु' की अनुमति दी गई। इसके लिये 'पेरेंट्स पैट्रिये (Parens patriae)' सिद्धांत के तहत उच्च न्यायालय की मंज़ूरी, विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड की राय और रिश्तेदारों के साथ परामर्श को अनिवार्य बनाया गया।
    • कॉमन कॉज बनाम भारत संघ (2018 और 2023): न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के तहत 'गरिमा के साथ मरने के अधिकार' को मान्यता दी। निष्क्रिय इच्छामृत्यु को वैध बनाया गया और 'लिविंग विल्स' (इच्छा-पत्र) को कानूनी मान्यता प्रदान की।
      • इसमें प्राथमिक एवं माध्यमिक मेडिकल बोर्ड और ‘रोगी के सर्वोत्तम हित’ जैसे सुरक्षा उपाय पेश किये गए।
    • हरीश राणा बनाम भारत संघ (2026): इस हालिया निर्णय में 'नैदानिक रूप से सहायता प्राप्त पोषण और जलयोजन' (CANH) को वापस लेने की अनुमति दी गई और इसे एक चिकित्सा उपचार के रूप में माना गया। न्यायालय ने अनिवार्य उपशामक देखभाल के साथ ‘सम्मान के साथ प्रस्थान’ पर ज़ोर दिया।

    प्रभाव विश्लेषण: परिदृश्य का पुनर्गठन

    • विधिक प्रणाली पर प्रभाव
      • संवैधानिक विस्तार: इसने अनुच्छेद 21 के दायरे का विस्तार किया है, जो ‘केवल पशुवत अस्तित्व (Mere Animal Existence)’ से आगे बढ़कर ‘अस्तित्वगत स्वायत्तता (Existential Autonomy)’ तक पहुँच गया है।
      • चिकित्सकों के लिये संरक्षण: यह चिकित्सकों को एक ‘कानूनी सुरक्षा कवच (Legal Shield)’ प्रदान करता है, जिससे वे सद्भावना में जीवन-समर्थन हटाने पर आपराधिक मुकदमों से सुरक्षित रहते हैं।
      • निजता के अधिकार का उदाहरण: इसने 'निजता के अधिकार' (पुट्टास्वामी निर्णय) को और मज़बूती प्रदान की, क्योंकि इसमें यह स्वीकार किया गया कि चिकित्सा संबंधी विकल्प अत्यंत व्यक्तिगत और निजी होते हैं।
    • सामाजिक नैतिकता पर
      • मृत्यु का कलंक मिटाना: मृत्यु को अब चिकित्सा की विफलता के रूप में नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक परिणति के रूप में फिर से परिभाषित किया जा रहा है, जिसे गरिमा के साथ सॅंभाला जा सकता है।
      • उपशामक देखभाल को मान्यता: इस विमर्श ने केवल ‘दिल की धड़कन को बढ़ाते रहने’ के बजाय जीवन के अंतिम समय में बेहतर देखभाल की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है।
    • चिकित्सा निर्णय-प्रक्रिया पर
      • प्रोटोकॉल का मानकीकरण: अस्पतालों के पास अब गंभीर रूप से बीमार मामलों को सॅंभालने के लिये एक व्यवस्थित ढाँचा (प्राथमिक और माध्यमिक बोर्ड) मौजूद है।
      • साझा निर्णय-प्रक्रिया की ओर झुकाव: यह डॉक्टरों, परिवार के सदस्यों और कानूनी प्रतिनिधियों के बीच संवाद को अनिवार्य बनाता है, जिससे किसी एक डॉक्टर पर पड़ने वाले भावनात्मक बोझ को कम किया जा सकता है।
      • 'आरामदायक मृत्यु' पर ध्यान: यह चिकित्सा जगत को आक्रामक और निरर्थक हस्तक्षेपों के बजाय आरामदायक देखभाल और दर्द प्रबंधन को प्राथमिकता देने के लिये प्रोत्साहित करता है।

    निष्कर्ष

    भारत में 'निष्क्रिय इच्छामृत्यु' का विकास एक परिपक्व कानूनी प्रणाली को दर्शाता है, जो व्यक्तिगत स्वायत्तता को मानवीय गरिमा के आधार स्तंभ के रूप में मान्यता देती है। 'लिविंग विल' (इच्छा-पत्र) की प्रक्रिया को सरल बनाकर, न्यायपालिका ने सुरक्षा उपायों की आवश्यकता और गंभीर देखभाल में करुणा की तत्काल आवश्यकता के बीच एक संतुलन स्थापित किया है।

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