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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. भावात्मक बुद्धिमत्ता को प्राय: 'नेतृत्व के नैतिक दिशा-सूचक' के रूप में वर्णित किया जाता है। उपयुक्त उदाहरणों के साथ इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। (150 शब्द)

    15 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • उत्तर की शुरुआत भावनात्मक बुद्धिमत्ता की परिभाषा से कीजिये।
    • मुख्य भाग में बताएँ कि यह नेतृत्व के लिये नैतिक दिशा-सूचक की तरह कैसे कार्य करती है।
    • इसके बाद नैतिक मार्गदर्शक के रूप में EI की सीमाओं की व्याख्या कीजिये।
    • अंत में नैतिक नेतृत्व के लिये EI को एकीकृत करने के उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय 

    भावनात्मक बुद्धिमत्ता (EI) से आशय व्यक्ति की अपनी तथा दूसरों की भावनाओं को समझने, नियंत्रित करने और निर्णय-निर्माण एवं पारस्परिक संबंधों में उनका विवेकपूर्ण उपयोग करने की क्षमता से है।

    • इसे प्रायः 'नेतृत्व के नैतिक दिशा-सूचक' के रूप में वर्णित किया जाता है, क्योंकि यह अभिकर्त्ताओं को शक्ति और अधिकार के प्रयोग को सहानुभूति, नैतिकता तथा उत्तरदायित्व के साथ संतुलित करने में मार्गदर्शन करती है।

    मुख्य भाग:

    नेतृत्व के नैतिक दिशा-सूचक के रूप में भावनात्मक बुद्धिमत्ता

    • सहानुभूति के साथ अधिकार का समन्वय: भावनात्मक बुद्धिमत्ता अभिकर्त्ताओं को निर्णयों के मानवीय प्रभाव को समझने में सक्षम बनाती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि अधिकार का प्रयोग करुणा के साथ किया जाए। सहानुभूति से युक्त अभिकर्त्ता नियमों को मानवीय दृष्टिकोण के साथ संतुलित कर सकते हैं।
      • उदाहरण के लिये, कोई सार्वजनिक अधिकारी कड़े सुरक्षा नियम लागू करता है, परंतु प्रभावित लोगों से सहानुभूतिपूर्वक संवाद करता है, कारणों को स्पष्ट करता है और आवश्यक सहयोग भी प्रदान करता है।
      • इस प्रकार, जहाँ अधिकार व्यापक जनहित की रक्षा करता है, वहीं भावनात्मक बुद्धिमत्ता यह सुनिश्चित करती है कि निर्णय मानवीय और न्यायसंगत बने रहें।
    • नैतिक निर्णय-निर्माण को सुदृढ़ करना: आत्म-जागरूकता और भावनाओं का नियमन अभिकर्त्ताओं को विशेषकर दबाव की स्थिति में आवेगपूर्ण या स्वार्थ-प्रेरित निर्णय लेने से रोकता है। भावनात्मक बुद्धिमत्ता चिंतनशील विवेक को प्रोत्साहित करती है, जिससे शक्ति के दुरुपयोग का जोखिम कम होता है।
      • उदाहरण के लिये, मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में टी. एन. शेषन ने चुनावी कदाचार का सामना करते समय तात्कालिक राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण को अपनाने के बजाय अडिग पारदर्शिता और नियम-आधारित कार्रवाई को चुना। यह संस्थागत अखंडता को अल्पकालिक सुविधा या दबाव से ऊपर रखने वाले भावनात्मक रूप से बुद्धिमान नैतिक संयम का उदाहरण है।
    • विश्वास और नैतिक वैधता का निर्माण: भावनात्मक बुद्धिमत्ता से युक्त अभिकर्त्ता सम्मानजनक संवाद, निष्पक्षता और भावनात्मक संवेदनशीलता के माध्यम से विश्वास उत्पन्न करते हैं। यह विश्वास औपचारिक अधिकार से परे नेतृत्व की नैतिक वैधता को सुदृढ़ करता है।
      • उदाहरण के लिये, शासन प्रक्रिया में असहमति व्यक्त करने वाले मतों को ध्यानपूर्वक सुनने वाली समावेशी नेतृत्व पद्धतियाँ लोकतांत्रिक मूल्यों और नैतिकता को सुदृढ़ बनाती हैं।
    • संघर्ष समाधान और नैतिक मध्यस्थता: भावनात्मक बुद्धिमत्ता अभिकर्त्ताओं को तनाव बढ़ाने के बजाय अंतर्निहित भावनाओं को समझकर संघर्षों का प्रबंधन करने में सक्षम बनाती है। इससे न्याय, मेल-मिलाप और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा मिलता है।
      • उदाहरण के लिये, श्रम या सामुदायिक विवादों में भावनात्मक शिकायतों को संबोधित करने वाले वार्ताकार प्रायः अधिक नैतिक और सतत समाधान प्राप्त करते हैं।

    नैतिक दिशा-सूचक के रूप में भावनात्मक बुद्धिमत्ता की सीमाएँ

    • नैतिक मूल्यों के बिना EI से हेरफेर संभव: भावनात्मक बुद्धिमत्ता भावनात्मक जागरूकता बढ़ाती है, किंतु यदि उसमें नैतिक आधार न हो तो इसका दुरुपयोग दूसरों को प्रभावित या नियंत्रित करने के लिये किया जा सकता है।
      • करिश्माई लेकिन अनैतिक अभिकर्त्ता भावनात्मक समझ का प्रयोग व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ के लिये कर सकते हैं।
      • उदाहरण के लिये, ऐसे अभिकर्त्ता जो बहिष्करणवादी या सत्तावादी नीतियों को उचित ठहराने के लिये जनभावनाओं को भावनात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।
    • भावनाओं से परे मानकात्मक सिद्धांतों की आवश्यकता: नैतिक शासन केवल भावनाओं पर निर्भर नहीं करता, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, कानूनों और संस्थागत मानदंडों पर आधारित होता है।
      • भावनात्मक बुद्धिमत्ता न्याय, उत्तरदायित्व और विधि के शासन जैसे नैतिक ढाँचों की पूरक हो सकती है, किंतु उनका स्थान नहीं ले सकती।
      • उदाहरण के लिये, सार्वजनिक संसाधनों के आवंटन से जुड़े निर्णय समानता और आवश्यकता-आधारित मानदंडों के अनुरूप होने चाहिये, न कि भावनात्मक अपील या लोकप्रिय भावना के आधार पर।
    • अत्यधिक सहानुभूति निष्पक्षता को कमज़ोर कर सकती है: अत्यधिक भावनात्मक संलग्नता तटस्थता को प्रभावित कर सकती है, जिससे पक्षपात या नियमों के असंगत अनुप्रयोग की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। नैतिक नेतृत्व में करुणा और वस्तुनिष्ठता के बीच संतुलन आवश्यक है।
      • उदाहरण के लिये, भावनात्मक रूप से प्रभावशाली व्यक्तियों के प्रति चयनात्मक उदारता संस्थागत निष्पक्षता को कमज़ोर कर सकती है।
    • सांस्कृतिक और भावनात्मक पूर्वाग्रह निर्णय को विकृत कर सकते हैं: भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ व्यक्तिगत पृष्ठभूमि, सामाजिक संस्कार और सांस्कृतिक पक्षपात से प्रभावित होती हैं। समालोचनात्मक आत्ममंथन के बिना EI पर निर्भरता अवचेतन पूर्वाग्रहों को सुदृढ़ कर सकती है।
      • उदाहरण के लिये, अभिकर्त्ता सामाजिक रूप से समान समूहों के प्रति अधिक सहानुभूति दिखा सकते हैं, जिससे अनजाने में अल्पसंख्यक वर्ग हाशिये पर चले जाते हैं।
    • EI स्वतः नैतिक साहस सुनिश्चित नहीं करती: कोई अभिकर्त्ता भावनाओं और परिणामों को समझते हुए भी दबाव या व्यक्तिगत हानि के भय से नैतिक रूप से कार्य करने का साहस नहीं दिखा पाता। नैतिक आचरण के लिये भावनात्मक समझ से आगे बढ़कर ईमानदारी और दृढ़ विश्वास आवश्यक होते हैं।
      • उदाहरण के लिये, अपने करियर के हित में गलत कृत्यों पर मौन रहने वाला भावनात्मक रूप से बुद्धिमान अधिकारी।
    • अल्पकालिक भावनात्मक सामंजस्य दीर्घकालिक न्याय पर हावी हो सकता है: EI-प्रेरित निर्णय तत्काल भावनात्मक संतोष को प्राथमिकता दे सकते हैं, जिससे दीर्घकालिक नैतिक परिणाम प्रभावित हो सकते हैं। नैतिक नेतृत्व में कभी-कभी अलोकप्रिय किंतु सिद्धांतपरक निर्णय लेना आवश्यक होता है।
      • उदाहरण के लिये, तात्कालिक जनअसंतोष से बचने के लिये कानून को सख्ती से लागू न करना दीर्घकाल में विधि के शासन को कमज़ोर कर सकता है।

    भावनात्मक बुद्धिमत्ता का नैतिक नेतृत्व के साथ एकीकरण

    • मूल नैतिक मूल्यों के साथ संरेखण: भावनात्मक बुद्धिमत्ता को ईमानदारी, न्याय और उत्तरदायित्व जैसे आधारभूत नैतिक मूल्यों से जोड़ा जाना चाहिये।
      • यह संरेखण सुनिश्चित करता है कि भावनात्मक जागरूकता अभिकर्त्ताओं को व्यक्तिगत या राजनीतिक सुविधा के बजाय नैतिक रूप से उचित कार्यों की ओर मार्गदर्शन करे।
    • संस्थागत और संवैधानिक आधार: भावनात्मक बुद्धिमत्ता को संवैधानिक सिद्धांतों, कानूनों और संस्थागत मानदंडों के भीतर कार्य करना चाहिये, ताकि मनमानी की गुंजाइश न रहे।
      • नैतिक नेतृत्व तब उभरता है जब सहानुभूति, विधि के शासन और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को प्रतिस्थापित करने के बजाय उनका पूरक बने।
    • करुणा और वस्तुनिष्ठता के बीच संतुलन: प्रभावी नैतिक नेतृत्व के लिये सहानुभूति और निष्पक्ष विवेक के बीच संतुलन आवश्यक है।
      • भावनात्मक समझ मानवीय निर्णयों को दिशा दे, परंतु साथ ही निष्पक्षता, निरंतरता और योग्यता-आधारित परिणाम भी बनाए रखे।
    • नैतिक साहस और उत्तरदायित्व: भावनात्मक बुद्धिमत्ता को दबाव की स्थिति में भी नैतिक रूप से कार्य करने के साहस से सुदृढ़ किया जाना चाहिये।
      • जो अभिकर्त्ता आत्म-जागरूकता को उत्तरदायित्व के साथ जोड़ते हैं, वे व्यक्तिगत या राजनीतिक लागत के बावजूद सार्वजनिक हित की रक्षा करने की अधिक संभावना रखते हैं।

    निष्कर्ष:

    भावनात्मक बुद्धिमत्ता अभिकर्त्ताओं को सहानुभूतिपूर्ण, नैतिक और जनोन्मुखी शासन की दिशा में मार्गदर्शन करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इसलिये इसे ‘नैतिक दिशा-सूचक’ कहा जाता है। तथापि, दृढ़ नैतिक मूल्यों और सशक्त संस्थागत नियंत्रणों के बिना केवल EI पर्याप्त नहीं है। सच्चा नैतिक नेतृत्व तभी उभरता है जब भावनात्मक बुद्धिमत्ता को नैतिक सिद्धांतों, न्याय और उत्तरदायित्व के साथ जोड़ा जाए, क्योंकि जैसा कि महात्मा गांधी ने स्मरण कराया था— ‘जब शक्ति नैतिकता से अलग हो जाती है तो वह खतरनाक बन जाती है।’

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