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प्रश्न :
प्रश्न. लोक सेवा में नैतिक निर्णय लेने को सुदृढ़ करने और पारस्परिक संबंधों को बेहतर बनाने में सहानुभूति एवं करुणा की भूमिका स्पष्ट कीजिये। (150 शब्द)
01 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्नउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत मुख्य शब्दों की परिभाषा देकर कीजिये।
- मुख्य भाग में नैतिक निर्णय लेने और पारस्परिक संबंधों को बेहतर बनाने में उनकी भूमिका को स्पष्ट कीजिये।
- सहानुभूति और करुणा को विकसित करने के उपाय सुझाएँ।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
सहानुभूति से आशय दूसरों की भावनाओं, दृष्टिकोण और अनुभवों को समझने तथा महसूस करने की क्षमता से है, जबकि करुणा इससे एक कदम आगे बढ़कर उनके कष्ट को कम करने हेतु प्रेरित करती है।
लोक सेवा में जहाँ निर्णय सीधे नागरिकों के जीवन को प्रभावित करते हैं, ये मूल्य मानवीय, न्यायसंगत और जन-केंद्रित शासन की नैतिक आधारशिला बनते हैं।
मुख्य भाग:
नैतिक निर्णय-निर्माण को सुदृढ़ करने में सहानुभूति और करुणा की भूमिका:
- सहानुभूति की भूमिका
- जन-केंद्रित नीति निर्माण: सहानुभूति प्रशासकों की नीतियों को केवल प्रक्रियात्मक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि नागरिकों के वास्तविक जीवन-अनुभवों के आधार पर समझने में सक्षम बनाती है।
- कोविड-19 महामारी के समय, सहानुभूति पर आधारित शासन का परिचय PM-GKAY के तहत मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराने और प्रवासी श्रमिकों के लिये दस्तावेज़ीकरण मानदंडों को सरल बनाकर दिया गया, जिससे पहचान पत्र तथा आजीविका के नुकसान के बावजूद कल्याणकारी सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित हुई।
- न्यायपूर्ण और संदर्भ-संवेदी प्रशासन: सहानुभूति अधिकारियों को नियमों के कार्यान्वयन के दौरान सामाजिक-आर्थिक कमज़ोरियों को समझने में सहायता करती है, जिससे अधिक संतुलित और मानवीय निर्णय लिये जा सकते हैं।
- उदाहरण के लिये, फील्ड अधिकारियों द्वारा छोटे विक्रेताओं के लिये मामूली दंड को माफ करना या स्थानीय प्रशासन द्वारा बाढ़ या हीटवेव के दौरान स्कूल और परीक्षा समय-सारिणी में बदलाव करना—ये सभी संदर्भगत कठिनाइयों के प्रति नैतिक संवेदनशीलता दर्शाते हैं।
- विश्वास-निर्माण और राज्य की वैधता: जब प्रशासक संवेदनशील सुनवाई, शिकायत निवारण और सम्मानजनक व्यवहार के माध्यम से सहानुभूति प्रदर्शित करते हैं तो नागरिक राज्य को दमनकारी के बजाय देखभाल करने वाला मानते हैं।
- आपदाओं के दौरान उत्तरदायी ज़िला हेल्पलाइन और विरोध प्रदर्शनों में सहानुभूतिपूर्ण पुलिसिंग लोकतांत्रिक विश्वास को मज़बूत करती हैं तथा कानून के प्रति स्वैच्छिक अनुपालन को बढ़ावा देती हैं।
- जन-केंद्रित नीति निर्माण: सहानुभूति प्रशासकों की नीतियों को केवल प्रक्रियात्मक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि नागरिकों के वास्तविक जीवन-अनुभवों के आधार पर समझने में सक्षम बनाती है।
- करुणा की भूमिका
- नियमों की मानवीय व्याख्या और नैतिक विवेक: करुणा अधिकारियों को कठोर कानूनी प्रावधानों से आगे बढ़कर मानवीय दृष्टिकोण से नियम लागू करने में सक्षम बनाती है।
- किसानों को सूखे या चक्रवात के दौरान ऋण चुकौती की समय सीमा बढ़ाने का निर्णय, नैतिक निर्णय में निहित सहानुभूतिपूर्ण विवेक का एक उदाहरण है।
- कमज़ोर एवं वंचित वर्गों की सुरक्षा: करुणा उन लोगों के लिये सक्रिय हस्तक्षेप को प्रेरित करती है, जो अपने कष्टों को स्वयं व्यक्त नहीं कर पाते।
- उदाहरण के लिये, सर्दियों के दौरान बेघर लोगों के लिये रात्रि आश्रय, आपदाओं के समय महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिये विशेष राहत शिविर तथा पहली बार के छोटे अपराधियों के प्रति दया –जिसमें दंड की बजाय सुधार को प्राथमिकता दी जाती है।
- भ्रष्टाचार और शक्ति के दुरुपयोग में कमी: करुणामूलक अधिकारी प्रशासनिक निर्णयों के मानव प्रभाव को समझते हैं, जिससे उत्पीड़न, मनमानी या अवैध लाभ लेने जैसी प्रवृत्तियाँ कम होती हैं।
- नैतिक करुणा सत्ता के दुरुपयोग को हतोत्साहित करती है जैसा कि तब दिखाई देता है जब फील्ड अधिकारी प्रक्रियात्मक कमियों का लाभ उठाने के बजाय नागरिकों को लाभ योजनाओं तक पहुँचने में सहायता करते हैं। इससे लोक सेवा में ईमानदारी और सुशासन मज़बूत होता है।
- नियमों की मानवीय व्याख्या और नैतिक विवेक: करुणा अधिकारियों को कठोर कानूनी प्रावधानों से आगे बढ़कर मानवीय दृष्टिकोण से नियम लागू करने में सक्षम बनाती है।
पारस्परिक संबंधों को सुदृढ़ करने में सहानुभूति और करुणा की भूमिका
- सहानुभूति की भूमिका:
- नागरिकों और राज्य के बीच विश्वास निर्माण: धैर्यपूर्वक सुनने और सम्मानपूर्ण प्रतिक्रिया देने के माध्यम से व्यक्त की गई सहानुभूति शासन को अधिक मानवीय बनाती है तथा नागरिक-राज्य के बीच दिखने वाली दूरी को कम करती है।
- शिकायत निवारण शिविर, जन सुनवाई और सार्वजनिक सुनवाई, जहाँ अधिकारी पीड़ा को स्वीकार करते हैं तथा पारदर्शी रूप से सीमाओं को स्पष्ट करते हैं, संस्थागत विश्वसनीयता एवं लोकतांत्रिक वैधता को सुदृढ़ करते हैं।
- प्रभावी विवाद समाधान: सहानुभूतिपूर्ण संवाद प्रशासकों को विवादों के पीछे छुपी भावनात्मक और आजीविका-संबंधी चिंताओं को समझने में सक्षम बनाता है।
- भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास या कल्याण वितरण में देरी के मामलों में, शिकायतों को स्वीकार करना तथा चरणबद्ध मुआवज़ा, वैकल्पिक आजीविका या संवाद आधारित समाधान प्रदान करना तनाव को कम करने और बढ़ने से रोकने में सहायता करता है।
- कार्यस्थल संबंधों में सुधार: नौकरशाही के भीतर सहानुभूति सहकर्मियों के दबावों और चुनौतियों को समझने में सहायता करती है।
- समर्थक वरिष्ठ अधिकारी, संकट के दौरान अनुकूल कार्य व्यवस्था और खुली संवाद-व्यवस्था मनोबल, टीम वर्क तथा प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाते हैं जबकि बर्नआउट एवं कार्यस्थल के तनाव को कम करते हैं।
- नागरिकों और राज्य के बीच विश्वास निर्माण: धैर्यपूर्वक सुनने और सम्मानपूर्ण प्रतिक्रिया देने के माध्यम से व्यक्त की गई सहानुभूति शासन को अधिक मानवीय बनाती है तथा नागरिक-राज्य के बीच दिखने वाली दूरी को कम करती है।
- करुणा की भूमिका
- समावेशी और सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण शासन: करुणा यह सुनिश्चित करती है कि शासन व्यवस्था समाज के हाशिये पर रहने वाले वर्गों को प्राथमिकता दे।
- दिव्यांग व्यक्तियों, महिलाओं, जनजातीय समुदायों, बुजुर्गों और प्रवासी मज़दूरों के प्रति नीतिगत संवेदनशीलता जैसे घर-आधारित सेवा वितरण, नियमों में ढील या लक्षित पहुँच कार्यक्रम अधिक समावेशी तथा न्यायसंगत परिणामों की ओर ले जाती है।
- मानवीय सेवा वितरण सुनिश्चित करना: करुणा अधिकारियों को न्यूनतम प्रशासनिक दायित्वों से आगे बढ़कर, सार्वजनिक सेवाओं में गरिमा सुनिश्चित करने के लिये प्रेरित करती है।
- उदाहरण के लिये, गरीबों के लिये अस्पताल की पहुँच को सुगम बनाना, बुजुर्ग लाभार्थियों की पेंशन को शीघ्रता से जारी करना या कल्याण कार्यालयों में सम्मानजनक व्यवहार सुनिश्चित करना तथा नैतिक शासन को मज़बूत करना।
- प्रशासनिक प्रेरणा और उद्देश्य को सुदृढ़ करना: करुणा सार्वजनिक सेवकों को समाज-सेवा के मूल उद्देश्य से दोबारा जोड़ती है।
- जब नेतृत्व देखभाल और कल्याण को महत्त्व देता है तो अधिकारियों में उद्देश्यबोध बढ़ता है, जिससे अधिक प्रेरणा, नैतिक आचरण और नागरिक-केंद्रित परिणाम प्राप्त होते हैं।
- समावेशी और सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण शासन: करुणा यह सुनिश्चित करती है कि शासन व्यवस्था समाज के हाशिये पर रहने वाले वर्गों को प्राथमिकता दे।
लोक सेवा में सहानुभूति और करुणा सुदृढ़ करने के उपाय
- नैतिकता एवं भावनात्मक बुद्धिमत्ता का प्रशिक्षण: सहानुभूति, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और नैतिक तर्क पर आधारित नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रमों को सिविल सेवा के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिये।
- नागरिक सहभागिता और क्षेत्रीय अनुभव: फील्ड पोस्टिंग, जन-सुनवाई और सामुदायिक संवाद प्रशासकों को स्थानीय वास्तविकताओं को समझने में सहायता करते हैं और नागरिकों की समस्याओं के प्रति संवेदनशीलता विकसित करते हैं।
- प्रतिक्रिया तंत्र का संस्थानीकरण: शिकायत निवारण प्रणाली, सामाजिक अंकेक्षण और नागरिक प्रतिक्रिया मंच अधिकारियों को उत्तरदायी तथा जन-केंद्रित बने रहने में सहायक होते हैं।
- आदर्श प्रस्तुत करना और नैतिक नेतृत्व: वरिष्ठ नेतृत्व को करुणा और ईमानदारी का उदाहरण पेश करना चाहिये, ताकि यह पूरे प्रशासन के लिये आचरण का मानक बन सके।
निष्कर्ष:
सहानुभूति और करुणा नैतिक शासन का नैतिक दिशा-निर्देश है, जो अधिकार को सेवा में और शक्ति को ज़िम्मेदारी में बदलते हैं। जैसा कि महात्मा गांधी ने सही कहा, "स्वयं को खोजने का सबसे अच्छा तरीका, स्वयं को दूसरों की सेवा में खो देना है।" इन मूल्यों को सार्वजनिक प्रशासन में एकीकृत करना विश्वास, न्याय और समावेशी विकास के निर्माण के लिये आवश्यक है।
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