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ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    IHR (भारतीय हिमालय क्षेत्र) में प्लास्टिक प्रदूषण की वृद्धि में योगदान देने वाले कारकों का परीक्षण कीजिये। इस क्षेत्र में इस समस्या के समाधान हेतु कौन से कदम उठाए जाने की आवश्यकता है? (250 शब्द)

    06 Mar, 2024 सामान्य अध्ययन पेपर 3 पर्यावरण

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • प्रश्न के संदर्भ को ध्यान में रखते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये।
    • IHR (भारतीय हिमालय क्षेत्र) में प्लास्टिक प्रदूषण की वृद्धि में योगदान देने वाले कारकों का विश्लेषण कीजिये।
    • इस क्षेत्र में इस संकट को कम करने के लिये उठाए जाने वाले कदमों का सुझाव दीजिये।
    • उचित निष्कर्ष लिखिये।

    परिचय:

    भारतीय हिमालय क्षेत्र (Indian Himalayan Region- IHR), उपमहाद्वीप में जल का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है, जो भारत की कई प्रमुख नदियों को जल प्रदान करता है। इसमें सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी प्रणालियाँ शामिल हैं। अवैज्ञानिक प्लास्टिक निपटान से IHR में मृदा एवं जल प्रदूषण हो रहा है और क्षेत्र की जैवविविधता पर असर पड़ रहा है। इसका ताज़े जल के स्रोतों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, जिन पर अनुप्रवाह क्षेत्र के समुदाय निर्भर हैं।

    मुख्य भाग:

    IHR में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण के पीछे के विभिन्न कारण

    • अपशिष्ट संग्रहण की अकुशल अवसंरचना: नीति आयोग और विश्व बैंक की विभिन्न रिपोर्ट का अनुमान है कि IHR वर्तमान में प्रतिवर्ष पाँच से आठ मिलियन मीट्रिक टन से अधिक अपशिष्ट उत्पन्न करता है। वर्ष 2010 के बाद से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में 400 मिलियन से अधिक पर्यटकों का आगमन हुआ तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के मामले में ये सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले राज्यों में शामिल हैं।
      • अकुशल अपशिष्ट संग्रहण और अवसंरचना के कारण 60% से अधिक अपशिष्ट गंगा, यमुना एवं सतलुज जैसी प्रमुख नदियों में फेंक दिये जाते हैं, उन्हें जला दिया जाता है या नदी अनुप्रवाह में बहा दिया जाता है।
    • पर्यटकों की भारी आमद और एकल-उपयोग उत्पाद: सड़क, ट्रेन और हवाई मार्ग से यात्रा के विकल्पों की वृद्धि के साथ हिमालयी राज्यों में पर्यटकों का आगमन तेज़ी से बढ़ रहा है। इसके अतिरिक्त, वे अधिक सुदूर ग्रामीण स्थलों और ट्रैकिंग मार्गों पर जाने लगे हैं।
      • उनके शहरी उपभोग पैटर्न स्थानीय निवासियों को प्रेरित करते हैं कि वे पर्यटन, खाद्य एवं आतिथ्य क्षेत्रों द्वारा उत्पन्न बड़ी मांग को पूरा करने के लिये पैकेज्ड FMCGs, पॉलीइथाइलीन टेरेफ्थेलेट (PET) बोतलें और एकल-उपयोग प्लास्टिक की खरीद-बिक्री से संलग्न हों। इससे पर्यटन क्षेत्रों में और उसके आस-पास बड़े पैमाने पर कूड़ा-कचरा फैलाने, उनकी डंपिंग तथा उनके दहन की स्थिति बनी है।
    • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) की पहुँच का अभाव: भले ही पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 के तहत EPR अधिदेश के एक हिस्से के रूप में FMCG ब्रांडों के लिये अपने प्लास्टिक अपशिष्ट के लिये रिवर्स लॉजिस्टिक्स (reverse logistics) की स्थापना एवं समर्थन को अनिवार्य बनाया है, लेकिन अधिकांश ब्रांड संग्रह की उच्च लागत के कारण पहाड़ी क्षेत्र में रिवर्स लॉजिस्टिक्स में निवेश नहीं करते हैं।
      • इसके अलावा, इन ग्रामों में उपलब्ध कई उत्पाद स्थानीय ब्रांडों द्वारा उत्पादित किये जाते हैं, जिनके पास रिवर्स लॉजिस्टिक्स में निवेश करने की क्षमता नहीं है। पर्यटक अपने साथ अधिक लोकप्रिय ब्रांडों के उत्पाद लेकर आते हैं और जो अपशिष्ट वे छोड़ जाते हैं, उसका संग्रहण या पुनर्चक्रण नहीं किया जाता है।
    • नीति प्रवर्तन और अभिसरण का अभाव: IHR में अपशिष्ट संग्रह व्यवस्थित नहीं है और अपशिष्ट को तुरंत या तो निर्दिष्ट स्थलों पर फेंक दिया जाता है (जहाँ पर्यावरणीय मंज़ूरी नहीं होती है) या सीधे नदी अनुप्रवाह में बहा दिया जाता है। अनौपचारिक कचरा बीनने वाले और स्क्रैप डीलर सामग्री पुनर्प्राप्ति में प्रमुख भूमिका निभाते हैं, लेकिन वे केवल पीईटी प्लास्टिक, धातु, कार्ड-बोर्ड एवं काँच जैसी उच्च मूल्य वाली सामग्री में ही रुचि रखते हैं।
      • इसके अतिरिक्त, इस तरह का कचरा उठाव शहरी एवं पर्यटन क्षेत्रों तक ही सीमित है। स्थानीय और अस्थायी आबादी द्वारा तेज़ी से बढ़ते अपशिष्ट उत्पादन का प्रबंधन कर सकने के लिये अधिकांश ग्राम पंचायतें एवं ग्राम या प्रखंड विकास पदाधिकारी पर्याप्त साधनों का अभाव रखते हैं।
    • अपर्याप्त वित्तपोषण क्षमता: ध्यान देने योग्य एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारक यह है कि ‘स्वच्छ भारत मिशन- ग्रामीण’ के दिशा-निर्देशों के तहत केंद्र सरकार द्वारा ग्राम पंचायतों को प्रदान की जाने वाली प्रति व्यक्ति राशि अधिक जनसंख्या घनत्व वाले मैदानी क्षेत्र के गाँवों की तुलना में पहाड़ी क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैली आबादी और दुर्गम इलाके के खर्च को पूरा करने के लिये अपर्याप्त है।
    • सामाजिक कलंक और अनौपचारिक आजीविका: आजीविका के साधन के रूप में कचरा बीनने से एक सामाजिक कलंक जुड़ा हुआ है। अधिकांश शहरी क्षेत्रों में अनौपचारिक प्रवासी श्रमिक अपशिष्ट संग्रहण एवं पृथक्करण के कार्य में संलग्न होते हैं। हालाँकि ग्रामीण क्षेत्र इन प्रवासी श्रमिकों को आकर्षित नहीं करते हैं, जिससे संकट और बढ़ जाता है जो युद्ध स्तर पर तत्काल निवारण की आवश्यकता रखता है।

    IHR में इस संकट के शमन हेतु आवश्यक कदम :

    • डेटा अंतराल को दूर करना: भारतीय हिमालयी क्षेत्र के राज्यों में उत्पन्न अपशिष्ट की मात्रा एवं गुणवत्ता के संदर्भ में डेटा अंतराल को दूर किया जाना चाहिये।
      • SBM जैसे पहले से मौजूद कार्यक्रमों में अभिसरण, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम 2005 और वित्त आयोग के अनुदान का उपयोग बुनियादी ढाँचे के निर्माण, रखरखाव एवं परिचालन के क्रियान्वयन के लिये किया जा सकता है।
    • पर्याप्त निवेश सुनिश्चित करना: समस्या की प्रणालीगत प्रकृति का अर्थ यह है कि इसके लिये किसी एक संस्था या हितधारक को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। निश्चित रूप से, IHR में अपशिष्ट प्रबंधन समस्या को हल करने की तत्काल आवश्यकता है, लेकिन इस दिशा में मौजूदा प्रयास मुद्दे के पैमाने के अनुरूप नहीं हैं।
      • समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने में महत्त्वपूर्ण वैश्विक निवेश से प्रेरणा ग्रहण करते हुए, यह उपयुक्त समय है कि हम वृहत हिमालय की रक्षा के लिये भी आवश्यक संसाधनों का निवेश करें।
    • राज्य विशिष्ट पहलों को अपनाने की आवश्यकता: IHR के राज्य भी इस संकट के शमन के लिये विधि निर्माण सहित विभिन्न पहलें कर रहे हैं, जिन्हें अन्य राज्यों द्वारा भी अपनाये जाने की आवश्यकता है।
      • हिमाचल प्रदेश में वर्ष 2019 से गैर-पुनर्चक्रण योग्य और एकल-उपयोग प्लास्टिक अपशिष्ट के लिये एक पुनर्खरीद या ‘बाय बैक’ नीति (buy back policy) अपनाई गई है।
      • सिक्किम ने जनवरी 2022 से पैकेज्ड मिनरल वाटर के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है और इस दिशा में एक मज़बूत नियामक प्रणाली रखता है।
    • स्थानीय निकायों को शक्तियाँ हस्तांतरित करना: स्थानीय निकाय देश में अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली की धुरी हैं, लेकिन उन्हें अभी भी शक्ति का आनुपातिक हस्तांतरण नहीं किया गया है।
      • IHR में PIBO (उत्पादकों, आयातकों एवं ब्रांड मालिकों) द्वारा अर्जित EPR (विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व) प्रमाण-पत्र का मूल्य (संसाधित प्रति टन प्लास्टिक अपशिष्ट के लिये) देश के शेष हिस्सों में अर्जित प्रमाण-पत्र से अधिक हो सकता है।

    निष्कर्ष:

    भारतीय हिमालय क्षेत्र के संबंध में दृष्टिकोण केवल अपशिष्ट प्रबंधन से आगे बढ़कर एक चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर आदर्श बदलाव को अपनाना होना चाहिये जिससे संरक्षण, स्थिरता एवं अनुकूलन को महत्त्व मिलता हो। नवाचार, समावेशिता एवं पर्यावरण प्रबंधन के प्रति साझा प्रतिबद्धता को अपनाकर, भारत आने वाली पीढ़ियों के लिये हिमालय के बहुमूल्य ताज़े जल के स्रोतों के साथ जैवविविधता की रक्षा कर सकता है।

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