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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • हाल ही में संपन्न क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) समझौते से आप क्या समझतें हैं? भारत द्वारा इसमें शामिल न होने के निर्णय के पीछे निहित तर्कों की विवेचना करते हुए इससे भारत पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा करें।

    23 Nov, 2020 सामान्य अध्ययन पेपर 2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण-

    • भूमिका में RCEP का परिचय
    • भारत के शामिल न होने के पीछे के तर्क
    • भारत पर पड़ने वाले प्रभाव
    • निष्कर्ष

    क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP), आसियान के दस सदस्य देशों तथा पाँच अन्य देशों (ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और न्यूज़ीलैंड) द्वारा अपनाया गया एक मुक्त व्यापार समझौता (FTA) है। जिस पर 15 नवंबर, 2020 को हस्ताक्षर किये गए।

    RCEP देश विश्व की एक-तिहाई आबादी और वैश्विक जीडीपी के 30% हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। RCEP की अवधारणा नवंबर 2011 में आयोजित 11 वें आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान प्रस्तुत की गई और नवंबर 2012 में कंबोडिया में आयोजित 12वें आसियान शिखर सम्मेलन के दौरान इस समझौते की प्रारंभिक वार्ताओं की शुरुआत की गई।

    भारत द्वारा नवंबर 2019 में इस समझौते से स्वयं को अलग करने के निर्णय के बाद अब बाकी के 15 देशों द्वारा RCEP पर हस्ताक्षर किये गए हैं।

    समझौते से अलग होने के पीछे तर्क-

    भारत का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान आसियान और एशिया के कुछ अन्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते के परिणामस्वरूप विभिन्न देशों के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार घाटे में ही रहा है।

    केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय द्वारा जारी आँकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2018-19 में RCEP के 11 देशों के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार घाटे में रहा।

    इसके अलावा स्थानीय उत्पादकों के हितों की रक्षा भी मुख्य मुद्दा रहा क्योंकि इस समझौते में शामिल होने के पश्चात् भारत में स्थानीय और छोटे उत्पादकों को कड़ी प्रतिस्पर्द्धा का सामना करना पड़ सकता है।

    RCEP समझौते के तहत सदस्य देशों के बीच वस्तुओं के आयात पर लगने वाले टैरिफ को 92% तक कम करने की बात कही गई है। उदाहरण के लिये आयात शुल्क में कटौती होने से भारत के कृषि, डेयरी उत्पाद और अन्य ‘सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम’ (MSMEs) जैसे अन्य संवेदनशील क्षेत्रों को क्षति हो सकती है।

    गौरतलब है कि भारत में दुग्ध उत्पादन उद्योग छोटे स्तर पर परिवारों द्वारा पाले गए पशुओं के योगदान से संचालित होता है, जबकि ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड में औद्योगिक स्तर पर आधुनिक विधियों से दुग्ध उत्पादन किया जाता है।

    इसके अलावा अन्य मतभेद भी रहे जैसे-आयात की सीमा, उत्पाद की उत्पत्ति का स्थान, डेटा सुरक्षा और आधार वर्ष आदि पर भी सहमति नहीं बन सकी।

    गौरतलब है कि RCEP समझौते के तहत भारत द्वारा ‘रूल्स ऑफ ओरिजिन’ (Rules of Origin) को सख्त बनाने और ऑटो ट्रिगर तंत्र को मज़बूत करने पर ज़ोर दिया गया था, हालाँकि समझौते में इन मुद्दों पर भारत की चिंताओं को दूर करने का अधिक प्रयास नहीं किया गया।

    रूल्स ऑफ ओरिजिन, किसी उत्पाद की राष्ट्रीयता या राष्ट्रीय स्रोत के निर्धारण के लिये एक महत्त्वपूर्ण मापदंड है। कई मामलों में आयात की गई वस्तुओं पर शुल्क और प्रतिबंध का निर्धारण उनकी राष्ट्रीयता के आधार पर किया जाता है।

    ऑटो ट्रिगर तंत्र आयात शुल्क में कमी या उसे पूर्णतया समाप्त करने की दशा में आयात में होने वाली अप्रत्याशित वृद्धि को रोकने के लिये एक व्यवस्था है।

    पिछले कुछ वर्षों में चीन द्वारा दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार समझौता (SAFTA) और बांग्लादेश के ड्यूटी फ्री रूट का लाभ लेकर भारत में कपड़ों के साथ अन्य कई उत्पादों को अत्यधिक मात्रा में पहुँचाया गया है। ऐसे में रूल्स ऑफ ओरिजिन और ऑटो ट्रिगर तंत्र के माध्यम से चीनी उत्पादों के आयात पर नियंत्रण लगाया जा सकता है।

    इसके अतिरिक्त भारत द्वारा टैरिफ कटौती के लिये वर्ष 2013 की बजाय वर्ष 2019 को आधार वर्ष के रूप में स्वीकार करने की मांग की गई थी। क्योंकि वर्ष 2014-19 के बीच भारत द्वारा कई उत्पादों पर आयात शुल्क में बढ़ोतरी की गई है।

    साथ ही भारत द्वारा अपने बाज़ार को खोलने के बदले अन्य देशों को भारतीय श्रमिकों और सेवा क्षेत्र के लिये नियमों में ढील देने की मांग की गई थी।

    इस समझौते में चीन के साथ तनाव के बीच एक चीनी नेतृत्त्व वाले समझौते में शामिल होना भारत के लिये नई बाधाएँ खड़ी कर सकता है।

    RCEP से अलग होने का प्रभाव:

    विशेषज्ञों का मानना है कि RCEP से अलग होने के निर्णय के साथ भारत ने क्षेत्र के बड़े बाज़ारों तक अपनी पहुँच बढ़ाने का एक मौका खो दिया है।

    भारत के इस निर्णय के बाद RCEP सदस्यों के साथ भारत के द्विपक्षीय व्यापार संबंधों के प्रभावित होने की आशंका भी बढ़ गई है क्योंकि इस समूह में शामिल अधिकांश देश RCEP के अंदर अपने व्यापार को मज़बूत करने को अधिक प्राथमिकता देंगे।

    ऑस्ट्रेलिया और जापान द्वारा भारत को RCEP में शामिल करने के कई असफल प्रयासों से इस बात की भी चिंता बनी हुई है कि भारत का निर्णय हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत-जापान-ऑस्ट्रेलिया की साझेदारी को प्रभावित कर सकता है।

    हमारे पड़ोसी देशों द्वारा भारत पर महत्त्वपूर्ण निर्णयों और योजनाओं के कार्यान्वयन में देरी का आरोप लगाया जाता रहा है। हाल के वर्षों में भारत द्वारा ‘एक्ट ईस्ट नीति’ पर विशेष बल देने के बावजूद RCEP से बाहर रहने का निर्णय तर्कसंगत नहीं लगता।

    निष्कर्षतः वर्तमान समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था में आई गिरावट के बीच RCEP इस चुनौती से बाहर निकलने का एक मज़बूत विकल्प प्रदान करता है। किंतु वैश्वीकरण के इस दौर में अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा में टिके रहने के लिए सरकार को सर्वप्रथम स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत करते हुए विकास के संभावित क्षेत्रों की पहचान कर लक्षित योजनाओं, निवेश नीति में सुधार आदि के माध्यम से अर्थव्यवस्था को मज़बूती प्रदान करने पर ध्यान देना होगा।

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