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भारत के कृषि विकास मॉडल पर पुनर्विचार

  • 18 Apr 2026
  • 198 min read

यह लेख 16/04/2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित ‘For agri growth in volatile world, look beyond farm gate’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख डिजिटल अवसंरचना, संबद्ध क्षेत्रों और मूल्यवर्द्धित निर्यात का लाभ उठाते हुए भारत के 1 ट्रिलियन डॉलर की कृषि-अर्थव्यवस्था की ओर रणनीतिक परिवर्तन का विश्लेषण करता है। यह भूजल स्तर में कमी तथा नीतिगत अस्थिरता जैसी महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक बाधाओं की पहचान करते हुए अनुकूलित ग्रामीण परिवर्तन हेतु व्यावहारिक, प्रौद्योगिकी-आधारित मार्ग प्रस्तुत करता है।

प्रिलिम्स के लिये: भारत-विस्तार, राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI)

मेन्स के लिये: भारत में कृषि विकास, भारत में कृषि से संबंधित प्रमुख मुद्दे, आवश्यक उपाय

पश्चिमी एशिया में जारी संघर्षों तथा माल ढुलाई की अस्थिरता के कारण वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ बार-बार व्यवधानों का सामना कर रही हैं; ऐसे परिदृश्य में लगभग 600 बिलियन डॉलर मूल्य की भारत की कृषि अर्थव्यवस्था एक महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक मोड़ पर खड़ी है। मूल्यवर्द्धन, प्रसंस्करण, निर्यात तथा सुदृढ़ कृषि-से-बाज़ार अवसंरचना के माध्यम से आगामी दशक में इसके 1 ट्रिलियन डॉलर से अधिक होने की प्रबल संभावना है। भारत का लगभग 46% कार्यबल कृषि पर निर्भर है। अतः कृषि विकास को गति प्रदान करना केवल एक आर्थिक प्राथमिकता ही नहीं, बल्कि रोज़गार सृजन, खाद्य सुरक्षा एवं ग्रामीण परिवर्तन के लिये एक रणनीतिक अनिवार्यता भी है।

भारत के कृषि विकास को गति देने वाले प्रमुख कारक क्या हैं?

  • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना एवं AI-संचालित परामर्श: भारत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का उपयोग करते हुए कृषि शासन का मौलिक पुनर्गठन कर रहा है, जिससे विशेषज्ञ ज्ञान का लोकतंत्रीकरण सुनिश्चित हो सके तथा लक्षित कल्याणकारी वितरण को सुदृढ़ किया जा सके।
    • यह परिवर्तन किसानों को जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूल तथा आँकड़ों पर आधारित निर्णय लेने में सक्षम बनाता है, साथ ही विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में इनपुट के उपयोग के अनुकूलन को प्रोत्साहित करता है। 
      • उदाहरण के लिये, केंद्रीय बजट 2026-27 में भारत-विस्तार की शुरुआत की गई, जो डिजिटल कृषि मिशन के आवंटन द्वारा समर्थित एक AI-संचालित बहुभाषी परामर्श उपकरण है। 
    • भारत ने डिजिटल कृषि मिशन के अंतर्गत 7.63 करोड़ से अधिक किसान ID तथा 23.5 करोड़ फसल भूखंडों के सर्वेक्षण के माध्यम से कृषि हेतु एक वृहद डिजिटल आधार निर्मित किया है। 
    • YES-TECH, CROPIC तथा PMFBY व्हाट्सएप चैटबॉट जैसे उपकरण PMFBY (प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना) के अंतर्गत फसल बीमा को किसानों के लिये अधिक नवोन्मेषी, तीव्र एवं पारदर्शी बनाने हेतु AI-सक्षम प्रौद्योगिकी का उपयोग कर रहे हैं।
  • प्राकृतिक खेती के माध्यम से पारिस्थितिकी स्थिरता: मृदा क्षरण तथा इनपुट अस्थिरता का सामना करने हेतु भारत प्राकृतिक खेती को संस्थागत रूप प्रदान कर रहा है, जिससे पारिस्थितिकी संतुलन तथा सतत, जलवायु-अनुकूलित उत्पादन को बढ़ावा मिल सके। 
    • यह परिवर्तन संरचनात्मक रूप से लघु किसानों को वैश्विक उर्वरक मूल्य झटकों से संरक्षण प्रदान करता है, साथ ही मृदा में जैविक कार्बन तथा सूक्ष्मजीवों की जैव विविधता में उल्लेखनीय वृद्धि सुनिश्चित करता है। 
    • राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन ने वर्ष 2026 के प्रारंभ तक 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को आच्छादित करते हुए 18,786 क्लस्टरों में 18.19 लाख किसानों का सफलतापूर्वक नामांकन किया है। 
    • नीति आयोग के आँकड़ों के अनुसार, इनमें से 90.1% किसानों ने उत्पादन लागत में कमी आने की जानकारी दी है, जबकि हिमालयी परीक्षणों में मृदा के जैविक कार्बन का स्तर बढ़कर 1.15% तक पहुँच गया है।
  • प्राथमिक वस्तुओं के अधिशेष से आगे बढ़ते हुए भारत प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादन तथा निर्यात अवसंरचना का विस्तार कर वैश्विक कृषि-मूल्य शृंखलाओं में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर रहा है। 
    • मूल्यवर्द्धन पर यह रणनीतिक ज़ोर उच्च बाज़ार मार्जिन सुनिश्चित करता है तथा घरेलू आपूर्ति शृंखला की अस्थिरता एवं लॉजिस्टिक्स व्यवधानों के विरुद्ध एक संरचनात्मक सुरक्षा कवच निर्मित करता है। 
    • वित्त वर्ष 2024-25 में कुल कृषि निर्यात बढ़कर 51 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जिसमें प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़कर 20.4% हो गई।
      • परिणामस्वरूप, उच्च मूल्य वाले बागवानी उत्पादों का निर्यात तीव्र गति से बढ़ा, जहाँ फल एवं सब्ज़ियों के निर्यात ने विनियमित विदेशी बाज़ारों में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
  • सामूहिकीकरण एवं संस्थागत सौदेबाज़ी की शक्ति: लघु किसानों के विखंडन की पारंपरिक कमज़ोरी का समाधान करने हेतु भारत सामूहिकीकरण को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित कर रहा है, जिससे किसान निष्क्रिय मूल्य-स्वीकारकर्त्ता से परिवर्तित होकर सशक्त मूल्य-निर्धारक (price-makers) बन सकें। 
    • संस्थागत शासन को सुदृढ़ करते हुए तथा उत्प्रेरक पूंजी उपलब्ध कराकर  किसान उत्पादक संगठन (FPO) अब क्रय एवं विपणन में तत्काल वृहद स्तर की अर्थव्यवस्था प्राप्त करने हेतु संसाधनों का एकीकरण कर सकते हैं। 
    • सरकार के व्यापक प्रयासों के अंतर्गत वर्ष 2025 के अंत तक 6,500 से अधिक FPO को ₹430.77 करोड़ रुपये की आनुपातिक इक्विटी अनुदान राशि वितरित की जा चुकी है। 
      • इसके अतिरिक्त, 2,600 से अधिक FPO को ₹662.71 करोड़ रुपये के ऋण गारंटी कवर प्रदान किये गए हैं, जिससे ज़मीनी स्तर पर कृषि उद्यमशीलता के जोखिम में उल्लेखनीय कमी आई है।
  • संबद्ध क्षेत्रों के माध्यम से संरचनात्मक परिवर्तन: पारंपरिक फसलों में स्थिर आय-वृद्धि को ध्यान में रखते हुए, भारत पशुपालन, डेयरी तथा मत्स्य जैसे संबद्ध क्षेत्रों की ओर निर्णायक संरचनात्मक बदलाव को प्रोत्साहित कर रहा है, जिससे ग्रामीण आय स्रोतों का विविधीकरण हो सके।
    • ये क्षेत्र स्वभावतः मानसून पर कम निर्भर होते हैं, तीव्र विकास दर प्रदर्शित करते हैं तथा ग्रामीण परिवारों एवं महिला सूक्ष्म उद्यमियों के लिये वर्षभर स्थिर तरलता प्रदान करते हैं।
    • केंद्रीय बजट 2026-27 में इस दिशा को और गति देते हुए मत्स्य क्षेत्र के लिये 2,700 करोड़ रुपये से अधिक का रिकॉर्ड आवंटन किया गया है।
      • इसी क्रम में 15वें वित्त आयोग चक्र (2021-22 से 2025-26) के दौरान संशोधित राष्ट्रीय गोकुल मिशन को 3,400 करोड़ रुपये का आवंटन प्राप्त हुआ।
  • रणनीतिक फसल विविधीकरण और आत्मनिर्भरता: फसल पद्धतियों में असंतुलन को दूर करने और आयात-निर्भरता से उत्पन्न संवेदनशीलताओं को कम करने हेतु, भारत जलवायु परिवर्तन के अनुकूल मोटे अनाज तथा दालों की ओर व्यापक स्तर पर संरचनात्मक बदलाव को प्रोत्साहित कर रहा है।
    • यह रणनीतिक विविधीकरण राष्ट्रीय पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करता है, जल-संकटग्रस्त क्षेत्रों में भूजल उपयोग का अनुकूलन सुनिश्चित करता है तथा खाद्य तेल आयात से उत्पन्न राजकोषीय हानि को कम करता है। 
    • दलहन में आत्मनिर्भरता हेतु मिशन (2025-31) का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य वर्तमान आयात निर्भरता को पूर्णतः समाप्त करना है। 
    • इस प्रगति को सुदृढ़ करते हुए भारत ने वर्ष 2024-25 में 25.68 मिलियन टन दालों एवं 18.59 मिलियन टन बाजरा का रिकॉर्ड उत्पादन कर वैश्विक स्तर पर अपनी अग्रणी स्थिति बनाए रखी है।
  • सटीक कृषि और संसाधन अनुकूलन: ड्रोन तथा AI सेंसर जैसे उन्नत प्रौद्योगिकीय उपकरणों का उपयोग स्थान-विशिष्ट संसाधन प्रबंधन तथा लक्षित कृषि-रसायन अनुप्रयोग के माध्यम से कृषि कार्यों में क्रांतिकारी परिवर्तन ला रहा है।
    • यह दृष्टिकोण इनपुट अपव्यय को निर्णायक रूप से कम करता है, पर्यावरणीय अवनयन को नियंत्रित करता है तथा घटती जोत (औसतन 1.08 हेक्टेयर) पर बढ़ती उत्पादन लागत के प्रभाव को संतुलित करता है।
    • इसका व्यापक क्रियान्वयन दर्शाते हुए, सरकार की 1,261 करोड़ रुपये की पहल, जो कार्यान्वयन की क्षमता को दर्शाती है, के तहत ग्रामीण महिला स्वयं सहायता समूहों (नमो ड्रोन दीदी) को 15,000 ड्रोन उपलब्ध कराए गए हैं।
  • वैश्विक अस्थिरता के बीच सुदृढ़ खाद्य सुरक्षा: गंभीर भूराजनीतिक अस्थिरता तथा ENSO जैसे जलवायु व्यवधानों के बावजूद, भारत ने उन्नत इनपुट प्रबंधन के माध्यम से अपनी खाद्य सुरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ किया है।
    • यह आधारभूत स्थिरता बफर स्टॉक की विश्वसनीयता सुनिश्चित करती है, घरेलू खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करती है तथा नीति-निर्माताओं को क्षतिपूर्ति के बजाय अनुकूलन-आधारित अवसंरचना पर व्यय करने की राजकोषीय क्षमता प्रदान करती है।
    • इस प्रणालीगत अनुकूलन को रेखांकित करते हुए भारत ने कृषि वर्ष 2024-25 में 357.73 मिलियन मीट्रिक टन का रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन प्राप्त किया।
      • इसके अतिरिक्त, बाज़ार में उतार-चढ़ाव के दौरान संस्थागत समर्थन दृढ़ बना रहा, जिसके परिणामस्वरूप 266 लाख मीट्रिक टन से अधिक गेहूँ की प्रभावी खरीद हुई, जिससे 22 लाख से अधिक किसानों को प्रत्यक्ष लाभ मिला।

भारत के सतत कृषि विकास में कौन-कौन सी चुनौतियाँ विद्यमान हैं?

  • गंभीर भूजल क्षरण और संदूषण: मुफ्त बिजली तथा जल-गहन फसल प्रतिरूपों द्वारा प्रेरित अनियंत्रित दोहन ने जलभृतों (aquifers) को संकट की स्थिति में पहुँचा दिया है, जिससे दीर्घकालिक खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया है।
  • साथ ही कृषि अपवाह (run-off) महत्त्वपूर्ण कृषि क्षेत्रों में भारी धातु प्रदूषण के मौन संकट को तीव्र कर रहा है।
    • उदाहरण के लिये, हाल ही में जारी 'स्टेट ऑफ इंडियाज़ एनवायरनमेंट 2025' रिपोर्ट के अनुसार पंजाब अपने वार्षिक पुनर्भरण का 156.36% भूजल दोहन कर रहा है।
    • इसके अतिरिक्त, पंजाब के मानसून-उपरांत भूजल नमूनों में से 62.5% में यूरेनियम की मात्रा सुरक्षित 30 ppb सीमा से अधिक पाई गई।
  • नीतिगत अस्थिरता तथा निर्यात अस्थिरता: घरेलू मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने हेतु अक्सर लागू किये जाने वाले व्यापार नीति परिवर्तन भारत की वैश्विक कृषि मूल्य शृंखला में एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्त्ता के रूप में प्रतिष्ठा को कमज़ोर करते हैं।
    • ये अल्पकालिक प्रतिबंध दीर्घकालिक अंतर्राष्ट्रीय अनुबंधों को बाधित करते हैं तथा अंततः स्थानीय किसानों को उच्च निर्यात प्रीमियम से वंचित कर देते हैं।
    • उदाहरणस्वरूप, भारत द्वारा लगाए गए गेहूँ निर्यात प्रतिबंध को हाल ही में फरवरी 2026 में सीमित 2.5 मिलियन टन कोटा के साथ हटाया गया।
    • इसी प्रकार गैर-बासमती चावल के निर्यात पर अचानक लगाए गए प्रतिबंध के परिणामस्वरूप वैश्विक स्तर पर नकारात्मक शुद्ध कल्याण प्रभाव (net welfare impact) उत्पन्न हुआ।
  • जलवायु परिवर्तन की भेद्यता: अनियमित मानसून तथा स्थानीय लू सहित तीव्र जलवायु विसंगतियाँ निरंतर फसल चक्रों को बाधित कर रही हैं तथा कीट प्रकोप को बढ़ा रही हैं। 
    • यह पर्यावरणीय अनिश्चितता लघु किसानों को प्रतिक्रियात्मक रणनीति अपनाने हेतु बाध्य करती है, जिससे अनुकूलित प्रयासों के बावजूद राष्ट्रीय उपज की स्थिरता निरंतर जोखिम में बनी रहती है। 
    • वर्ष 2025 में भारत ने 334 दिनों में से 331 दिनों में चरम मौसमी घटनाओं का अनुभव किया, जिससे लगभग 17.4 मिलियन हेक्टेयर फसल क्षेत्र प्रभावित हुआ। 
    • अनुमान है कि शताब्दी के अंत तक जलवायु परिवर्तन के कारण गेहूँ उत्पादन में 6–25% तक की कमी आ सकती है, जिसमें महत्त्वपूर्ण स्थानिक एवं कालिक विविधताएँ देखी जाएंगी।
  • विखंडित भूमि जोत और डिजिटल विभाजन: कृषि भूमि के निरंतर उपविभाजन के परिणामस्वरूप अधिकांश किसानों के लिये पूंजी-गहन मशीनीकरण तथा आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकी का विस्तार आर्थिक रूप से अव्यवहार्य हो जाता है। 
    • इसके फलस्वरूप एक गंभीर डिजिटल विभाजन बना हुआ है, जहाँ छोटे किसान सटीक खेती तथा AI-संचालित बाज़ार खोज प्लेटफॉर्मों से व्यापक रूप से वंचित रहते हैं। 
    • देशभर में औसत भूमि स्वामित्व घटकर लगभग 1.08 हेक्टेयर रह गया है, जिससे उत्पादकता पर संरचनात्मक बाधाएँ उत्पन्न हो रही हैं। 
    • जहाँ लगभग 42.5 करोड़ ग्रामीण भारतीय स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं  (WEF, 2023), वहीं ग्रामीण वयस्कों में से केवल 24% के पास बुनियादी डिजिटल कौशल हैं (NSS, 2022), जो कृषि में डिजिटल उपकरणों के प्रभावी उपयोग को सीमित करता है।
  • कटाई-पश्चात हानियाँ तथा अवसंरचनात्मक कमी: रिकॉर्ड उत्पादन प्राप्त करने के बावजूद, एकीकृत कोल्ड-चेन अवसंरचना की कमी तथा विखंडित लॉजिस्टिक्स व्यवस्था के कारण व्यापक स्तर पर मूल्य हानि हो रही है।
    • यह संरचनात्मक आपूर्ति शृंखला अवरोध किसानों को उच्च-मूल्य नाशवान उत्पादों से लाभ अर्जित करने से वंचित करता है, जिससे एक ओर उपभोक्ता कीमतें कृत्रिम रूप से बढ़ती हैं तथा दूसरी ओर कृषि आय कम हो जाती है।
    • वर्ष 2024-25 में 362.08 मिलियन टन का रिकॉर्ड बागवानी उत्पादन प्राप्त होने के बावजूद, कटाई-पश्चात हानियाँ 20% से 30% के उच्च स्तर पर बनी हुई हैं।
    • यह स्पष्ट अवसंरचनात्मक कमी 1,818 मिलियन डॉलर के फल एवं सब्ज़ी निर्यात क्षेत्र की लाभप्रदता को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
  • मृदा क्षरण और एकल कृषि पद्धतियाँ: रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता तथा धान-गेहूँ की निरंतर एकल कृषि के संयुक्त प्रभाव से मृदा स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है। 
    • यह पोषक तत्त्वों का असंतुलन प्राकृतिक सूक्ष्मजीवों की जैव विविधता को नष्ट कर देता है, जिसके परिणामस्वरूप अधिक उर्वरक उपयोग के बावजूद फसलों की प्रतिक्रिया स्थिर हो जाती है। 
    • वर्तमान में भारत की कृषि योग्य मृदा का लगभग 52% भाग खराब श्रेणी में आता है, जिससे कृषि क्षमता में उल्लेखनीय कमी आती है। 
    • परिणामस्वरूप, देश की औसत उपज उन्नत कृषि अर्थव्यवस्थाओं की वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं की तुलना में कम बनी हुई है।
  • विकृत प्रोत्साहन संरचना तथा फसल असंतुलन: न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का अत्यधिक झुकाव कुछ विशेष अनाजों की ओर होने से जलवायु-स्मार्ट तथा पोषणयुक्त वैकल्पिक फसलों की खेती हतोत्साहित होती है।
    • यह नीतिगत विकृति फसल विविधीकरण को बाधित करती है, शुष्क क्षेत्रों में पारिस्थितिकी दबाव को बढ़ाती है तथा खाद्य तेलों के आयात व्यय को बढ़ावा देती है।
    • इस असंतुलन को दर्शाते हुए, पिछले 50 वर्षों में पंजाब में मक्का के अंतर्गत क्षेत्रफल में 82% की गिरावट दर्ज की गई है।
    • इसी बीच, सरकार ने RMS 2025-26 में 300 लाख मीट्रिक टन से अधिक गेहूँ की खरीद की, जो लगातार जारी अनाज-केंद्रित नीति झुकाव को दर्शाता है।
  • किसान सामूहिक संगठनों में संस्थागत कमज़ोरियाँ: यद्यपि सरकार FPO को व्यापक रूप से प्रोत्साहित कर रही है, फिर भी अनेक संगठन शासन संबंधी कमियों, अपर्याप्त कार्यशील पूंजी तथा कमज़ोर बाज़ार संपर्कों से ग्रस्त हैं। 
    • पेशेवर प्रबंधन एवं मज़बूत कॉर्पोरेट साझेदारियों के अभाव में ये इकाइयाँ साधारण एकत्रीकरण से आगे बढ़कर लाभप्रद मूल्यवर्द्धक उद्यम बनने में संघर्ष कर रही हैं।
    • महत्त्वाकांक्षी लक्ष्यों एवं हाल ही में 6,500 से अधिक FPO को वितरित ₹430 करोड़ रुपये के इक्विटी अनुदान के बावजूद, एक बड़ा हिस्सा कार्यात्मक रूप से निष्क्रिय बना हुआ है।
      • परिणामस्वरूप, खंडित विपणन तंत्र बना रहता है, जो लघु किसानों को पारंपरिक, शोषणकारी APMC मध्यस्थों को प्रभावी रूप से दरकिनार करने से रोकता है। 

भारत के कृषि विकास को गति देने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • कृषि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का सार्वभौमीकरण: विकास को तीव्र करने हेतु कृषि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (AgriStack) का सार्वभौमीकरण आवश्यक है, जिससे छोटे किसानों को अति-स्थानीय, AI-संचालित परामर्श एवं ऋण प्रणालियों से निर्बाध रूप से जोड़ा जा सके।
    • भूमि अभिलेखों को भविष्यसूचक कृषि मॉडलों के साथ एकीकृत कर नीति-निर्माता सामान्य सलाहों से आगे बढ़कर अत्यधिक व्यक्तिगत, भूखंड-स्तरीय संसाधन अनुकूलन की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं। 
    • यह डिजिटल इकोसिस्टम इंटरऑपरेबिलिटी को प्राथमिकता देता हुआ निजी एग्री-टेक नवप्रवर्तकों को सार्वजनिक डेटा ग्रिड पर स्केलेबल समाधान विकसित करने की अनुमति प्रदान करता है। 
      • अंततः यह सूचना विषमता का लोकतंत्रीकरण सुनिश्चित करते हुए सटीक कृषि निर्णयों को हाशिये पर स्थित समुदायों तक सुलभ बनाता है।
  • जलवायु-अनुकूलित खेती का संस्थागतकरण: जलवायु विसंगतियों से उत्पादन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये प्राकृतिक खेती एवं स्थानीय फसल विविधीकरण जैसे कृषि-पारिस्थितिकी ढाँचों की ओर एक संरचनात्मक नीतिगत बदलाव अनिवार्य है। 
    • इसके अंतर्गत पायलट परियोजनाओं से आगे बढ़कर विकेंद्रीकृत प्रमाणन बोर्डों की स्थापना की जानी चाहिये, जो मृदा जैविक कार्बन संवर्द्धन को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित कर प्रोत्साहित करें। 
    • अल नीनो जैसी घटनाओं के लिये क्षेत्र-विशिष्ट शमन रणनीतियों के प्रभावी प्रसार तथा प्रणालीगत उत्पादन व्यवधानों को कम करने हेतु विस्तार सेवाओं का पुनर्संरचना अनिवार्य है।
    • साथ ही, सब्सिडी संरचना में पारिस्थितिकी तंत्र सेवा भुगतान को समाहित कर किसानों को सतत, जल-संरक्षण एवं जैव विविधता संवर्द्धन करने वाली कृषि पद्धतियों को अपनाने हेतु आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान किया जाना चाहिये।
  • किसान उत्पादक संगठनों (FPO) का व्यवसायीकरण: खंडित भूमि जोतों को लाभदायक उद्यमों में रूपांतरित करने हेतु FPO के प्रशासन में आमूलचूल सुधार आवश्यक है, जिसमें पेशेवर कॉर्पोरेट प्रबंधन का अनिवार्य समावेश किया जाए। 
    • क्षमता निर्माण को केवल प्रशासनिक गठन तक सीमित न रखकर बाज़ार-उन्मुखता की ओर परिवर्तित करना होगा, जिससे ये संगठन वाणिज्यिक ऋण एवं इक्विटी प्राप्त करने हेतु आवश्यक वित्तीय साक्षरता से सुसज्जित हो सकें। 
    • FPO और कृषि व्यवसाय समूहों के बीच कानूनी रूप से बाध्यकारी अग्रिम-अनुबंध ढाँचा स्थापित करने से लघु किसानों के लिये क्रय गारंटी सुनिश्चित होगी तथा मूल्य अस्थिरता को नियंत्रित किया जा सकेगा। 
      • साथ ही इन संगठनों को सीधे वैश्विक मूल्य शृंखलाओं से जोड़ने से मध्यस्थों की भूमिका सीमित होगी, जिससे ज़मीनी स्तर पर लाभ में वृद्धि होगी।
  • निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता हेतु विनियामक सामंजस्य: उच्च आय वाले अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में बेहतर मूल्य प्राप्ति के लिये उन्नत पादप स्वच्छता परीक्षण तथा गुणवत्ता आश्वासन अवसंरचना का ज़िला स्तर पर विकेंद्रीकरण करना अनिवार्य है। 
    • व्यापार नीति को प्रतिक्रियात्मक, मुद्रास्फीति-आधारित तदर्थता से हटाकर निर्यात नीति की स्थिरता सुनिश्चित करनी होगी, जिससे वैश्विक आपूर्ति शृंखला भागीदारों के साथ दीर्घकालिक संस्थागत विश्वास का निर्माण हो सके। 
    • कृषि व्यवसायों को ब्लॉकचेन-सक्षम ट्रेसबिलिटी प्रोटोकॉल अपनाने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिये, जिससे खेत से खुदरा स्तर तक पारदर्शिता सुनिश्चित हो तथा गैर-टैरिफ बाधाओं का प्रभावी समाधान हो सके। 
      • साथ ही, घरेलू कृषि प्रसंस्करण मानकों को उन्नत द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के अनुरूप संरेखित करने से यह क्षेत्र थोक निर्यातक से विकसित होकर प्रीमियम ब्रांडेड आपूर्तिकर्त्ता के रूप में स्थापित हो सकेगा।
  • चक्रीय कृषि-जैव अर्थव्यवस्था का विकास: कृषि राजस्व में वृद्धि हेतु द्वितीयक कृषि एवं स्थानीय चक्रीय जैव-अर्थव्यवस्थाओं को सुदृढ़ करते हुए कृषि अपशिष्ट के व्यवस्थित आर्थिक दोहन को नीतिगत प्राथमिकता प्रदान किया जाना आवश्यक है।
    • नीतिगत स्तर पर विकेंद्रीकृत जैव-शोधन संयंत्रों की स्थापना को बढ़ावा दिया जाना चाहिये, जो फसल अवशेषों एवं अतिरिक्त बायोमास को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य जैव ईंधन, जैव-प्लास्टिक तथा जैविक उर्वरकों में परिवर्तित कर सकें। 
    • यह रणनीतिक मूल्यवर्द्धन न केवल फसल अवशेष दहन से उत्पन्न पर्यावरणीय क्षरण को कम करता है, बल्कि प्राथमिक कटाई से स्वतंत्र एक स्थायी वैकल्पिक आय स्रोत भी सृजित करता है। 
      • साथ ही इन जैव-प्रसंस्करण इकाइयों के आसपास ग्रामीण सूक्ष्म उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करने से अतिरिक्त श्रम का संरचनात्मक उपयोग संभव होगा तथा राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्यों को भी बल मिलेगा।
  • फसल समानता हेतु प्रोत्साहन संरचना का युक्तिकरण: गंभीर पारिस्थितिकी असंतुलनों को दूर करने के लिये कृषि मूल्य निर्धारण प्रणाली को जल-गहन खाद्यान्नों से अलग कर पोषण सुरक्षा उन्मुख फसलों की ओर पुनर्संरेखित करना आवश्यक है।
    • न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ढाँचे का विस्तार कर उसे जलवायु-स्मार्ट फसलों जैसे दालों, तिलहनों तथा मोटे खाद्यान्नों पर प्रभावी रूप से लागू किया जाना चाहिये, ताकि सुनिश्चित खरीद की गारंटी दी जा सके।
    • विकृत इनपुट सब्सिडियों से हटकर प्रत्यक्ष लक्षित आय अंतरण की ओर परिवर्तन किसानों को महत्त्वपूर्ण भूजल भंडार को समाप्त किये बिना संसाधनों का इष्टतम उपयोग करने में सक्षम बनाएगा।
    • यह समग्र बाज़ार संकेतों का पुनर्संयोजन स्वाभाविक रूप से फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करेगा, आयात निर्भरता को कम करेगा तथा भूमि की अंतर्निहित कृषि वहन क्षमता को पुनर्स्थापित करेगा।
  • विकेंद्रीकृत नवीकरणीय कोल्ड-चेन का विस्तार: कटाई-पश्चात होने वाली व्यापक मूल्य हानि को रोकने हेतु उत्पादन केंद्रों के समीप विकेंद्रीकृत, सौर-ऊर्जा संचालित कोल्ड-स्टोरेज नेटवर्क का तीव्र विस्तार करना चाहिये।
    • पूंजीगत सब्सिडी को ऐसे मॉड्यूलर, ऑफ-ग्रिड शीतलन प्रौद्योगिकियों के विकास की ओर पुनर्निर्देशित किया जाना चाहिये, जो विशेष रूप से लघु किसानों की कम मात्रा वाली उपज के अनुरूप हों।
    • इन स्थानीय भंडारण केंद्रों को पूर्वानुमानात्मक लॉजिस्टिक्स सॉफ्टवेयर के साथ एकीकृत कर परिवहन की दक्षता को अनुकूलित किया जा सकता है, जिससे अत्यधिक नाशवान उत्पादों को अधिक स्थायी, समय-अप्रतिबंधित परिसंपत्तियों में परिवर्तित किया जा सके।
    • किसानों को भंडारण क्षमता प्रदान कर उन्हें उत्पादन अधिकता के समय मजबूरी में बिक्री (distress sales) से बचाया जा सकता है, जिससे खुले बाज़ार में उनकी सौदेबाज़ी शक्ति पुनर्स्थापित होती है।
  • डीप-टेक यंत्रीकरण की सुलभता का लोकतंत्रीकरण: खंडित भूमि जोतों पर पूंजी-गहन मशीनीकरण की आर्थिक अव्यवहार्यता को दूर करने हेतु तकनीक-सक्षम ‘FaaS (फार्मिंग-एज़-ए-सर्विस)’ मॉडल का वृहद स्तर पर क्रियान्वयन आवश्यक है। 
    • कृषि ड्रोन एवं सेंसर-आधारित एप्लीकेटर जैसे सटीक हार्डवेयर से युक्त उन्नत कस्टम हायरिंग केंद्रों की स्थापना के लिये सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) का प्रभावी उपयोग किया जाना चाहिये। 
      • साथ ही, ग्रामीण युवाओं को प्रमाणित संचालक के रूप में प्रशिक्षित करने हेतु मज़बूत कौशल-विकास ढाँचा विकसित करना आवश्यक है, जिससे विशेषीकृत रोज़गार अवसर सृजित हो सकें। 
      • यह साझा अर्थव्यवस्था मॉडल सुनिश्चित करता है कि उन्नत कृषि प्रौद्योगिकी से प्राप्त उत्पादकता लाभ समान रूप से वितरित हों, जिससे आधुनिक संसाधन अनुकूलन के लिये प्रवेश बाधाएँ मूलतः कम हो जाती हैं।

निष्कर्ष: 

भारत को 600 बिलियन डॉलर की कृषि अर्थव्यवस्था से 1 ट्रिलियन डॉलर की कृषि अर्थव्यवस्था में परिवर्तित होने के लिये तकनीकी सटीकता, पारिस्थितिकी अनुकूलन और संस्थागत व्यवसायीकरण का प्रभावी समन्वय करना होगा। डिजिटल विभाजन को पाटकर, व्यापार नीतियों को स्थिर करके तथा मूल्य शृंखला एकीकरण के माध्यम से लघु किसानों को सशक्त करते हुए, यह क्षेत्र जीवन निर्वाह स्तर से आगे बढ़कर वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर हो सकता है। अंततः इस परिवर्तन की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि खेत-सीमा से परे सृजित मूल्य की प्रत्येक इकाई में किसान को प्राथमिक हितधारक के रूप में संस्थागत रूप से सुनिश्चित किया जाए।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

“किसानों की आय दोगुनी करने के लिये 'उत्पादन-केंद्रित' कृषि से आगे बढ़कर 'मूल्य-शृंखला-केंद्रित' कृषि की ओर परिवर्तन अनिवार्य है।” भारत के 1 ट्रिलियन डॉलर की कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य के संदर्भ में इस कथन का मूल्यांकन कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. भारत-विस्तार क्या है?
यह डिजिटल कृषि मिशन के अंतर्गत शुरू किया एक AI-संचालित, बहुभाषी परामर्श उपकरण है, जो किसानों को भूखंड स्तर पर (plot-level) कृषि संबंधी अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

2. FPO लघु किसानों की मदद कैसे करते हैं?
ये सामूहिकीकरण को सक्षम बनाते हैं, जिससे बीज क्रय, ऋण उपलब्धता और बाज़ारों में सामूहिक सौदेबाज़ी की शक्ति के मामले में बड़े पैमाने पर लाभ प्राप्त होता है।

3. ‘नीली और सफेद क्रांति 2.0’ का क्या महत्त्व है?
इन मिशनों का लक्ष्य मत्स्य पालन और डेयरी क्षेत्रों के तीव्र विकास को बढ़ावा देना है ताकि ग्रामीण परिवारों को मानसून पर निर्भर न रहने वाली आय प्रदान की जा सके।

4. कृषि निर्यात के लिये नीतिगत स्थिरता क्यों महत्त्वपूर्ण है?
लगातार निर्यात प्रतिबंध अंतर्राष्ट्रीय विश्वसनीयता को कमज़ोर करते हैं, जिससे भारतीय कृषि व्यवसायों के लिये  दीर्घकालिक, उच्च-मूल्य वैश्विक अनुबंध प्राप्त करना कठिन हो जाता है।

5. 'फार्मिंग-एज़-ए-सर्विस' (FaaS) मॉडल क्या है?
एक ऐसा मॉडल जिसमें किसान उच्च तकनीक वाले उपकरण (जैसे ड्रोन या सेंसर) खरीदने के बजाय कस्टम हायरिंग सेंटर के माध्यम से किराए पर लेते हैं।

 

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न. जलवायु-अनुकूल कृषि (क्लाइमेट-स्मार्ट एग्रीकल्चर) के लिये भारत की तैयारी के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये-

  1. भारत में ‘जलवायु-स्मार्ट ग्राम (क्लाइमेट-स्मार्ट विलेज)’ दृष्टिकोण, अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान कार्यक्रम-जलवायु परिवर्तन, कृषि एवं खाद्य सुरक्षा (सी.सी.ए.एफ.एस.) द्वारा संचालित परियोजना का एक भाग है। 
  2.  सी.सी.ए.एफ.एस. परियोजना, अंतर्राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान हेतु परामर्शदात्री समूह (सी.जी.आई.ए.आर.) के अधीन संचालित किया जाता है, जिसका मुख्यालय फ्राँस में है।  
  3.  भारत में स्थित अंतर्राष्ट्रीय अर्धशुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (आई.सी.आर.आई.एस.ए.टी.), सी.जी.आई.ए.आर. के अनुसंधान केंद्रों में से एक है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

(a) केवल 1 और 2           
(b)  केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर:(d)


निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिये: (2014)

     कार्यक्रम/परियोजना                                               मंत्रालय

  1. सूखा-प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम                                 -  कृषि मंत्रालय
  2.  मरुस्थल विकास कार्यक्रम                                -  पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
  3.  वर्षापूरित क्षेत्रों हेतु राष्ट्रीय जल संभरण विकास परियोजना - ग्रामीण विकास मंत्रालय

उपर्युक्त में से कौन-सा/से युग्म सही सुमेलित है/हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3
(c) 1, 2 और 3
(d) उपरोक्त में से कोई नहीं

उत्तर: (d)


प्रश्न. भारत में निम्नलिखित में से किसे कृषि में सार्वजनिक निवेश माना जा सकता है? (2020) 

  1. सभी फसलों की कृषि उपज के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करना 
  2.  प्राथमिक कृषि ऋण समितियों का कंप्यूटरीकरण 
  3.  सामाजिक पूंजी का विकास 
  4.  किसानों को मुफ्त बिजली की आपूर्ति 
  5.  बैंकिंग प्रणाली द्वारा कृषि ऋण की छूट 
  6.  सरकारों द्वारा कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं की स्थापना

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये: 

(a) केवल 1, 2 और 5
(b) केवल 1, 3, 4 और 5
(c) केवल 2, 3 और 6
(d) 1, 2, 3, 4, 5 और 6 

उत्तर: (c)


मेन्स:

Q. भारतीय कृषि की प्रकृति की अनिश्चितताओं पर निर्भरता के मद्देनज़र, फसल बीमा की आवश्यकता की विवेचना कीजिये और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पी० एम० एफ० बी० वाई०) की मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिये। (2016)

Q. भारत में स्वतंत्रता के बाद कृषि क्षेत्र में हुई विभिन्न प्रकार की क्रांतियों की व्याख्या कीजिये। इन क्रांतियों ने भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सुरक्षा में किस प्रकार मदद की है?  (2017)

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