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भारत के ‘एक्ट ईस्ट’ दृष्टिकोण का पुनर्संयोजन

  • 10 Feb 2026
  • 197 min read

यह लेख 09/02/2026 को द इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित " PM Modi in Malaysia: Future-proofing an ‘Act East’ partnership” शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। इस लेख में विश्लेषण किया गया है कि पीएम मोदी की मलेशिया यात्रा किस प्रकार भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के विकास को प्रौद्योगिकी, व्यापार लचीलापन और समुद्री सुरक्षा पर आधारित, परिणाम-उन्मुख इंडो-पैसिफिक रणनीति में परिवर्तित होने का संकेत देती है।

प्रिलिम्स के लिये: भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी, AITIGA, बिम्सटेक मास्टर प्लान, मेकांग-गंगा सहयोग, कलादान मल्टी-मोडल प्रोजेक्ट

मेन्स के लिये: एक्ट ईस्ट पॉलिसी के क्रमिक विकास, पूर्वी आसियान देशों के साथ संबंधों को सुदृढ़ करने हेतु किये गए प्रयास, परिणाम प्राप्त करने में विद्यमान बाधाएँ तथा इन बाधाओं को दूर करने के लिये आवश्यक उपाय। 

दक्षिण–पूर्व एशिया के साथ भारत की सहभागिता अब केवल कूटनीतिक प्रतीकवाद तक सीमित न रहकर ठोस रणनीतिक उपलब्धियों पर केंद्रित हो गई है। भारतीय प्रधानमंत्री की मलेशिया यात्रा ‘एक्ट ईस्ट’ से ‘ग्रो ईस्ट’ की दिशा में एक निर्णायक परिवर्तन को रेखांकित करती है, जिसमें सेमीकंडक्टर, डिजिटल भुगतान और समुद्री सुरक्षा को सहयोग के प्रमुख स्तंभ बनाया गया है। आर्थिक मज़बूती, वित्तीय संप्रभुता तथा हिंद–प्रशांत की स्थिरता को समेकित करते हुए यह साझेदारी भारत के एक विश्वसनीय क्षेत्रीय नेतृत्वकर्त्ता के रूप में उभरने का संकेत देती है। साथ ही, आपूर्ति–शृंखला सुदृढ़ीकरण, महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों और सुरक्षा सहयोग के माध्यम से व्यापक पूर्वी रणनीतिक तंत्र में अपनी भूमिका को संस्थागत करने की भारत की मंशा को भी प्रकट करती है।

समय के साथ भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी का विकास कैसे हुआ?

  • चरण I (1991–2000) — “पूर्व की ओर देखना”:
    • पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ की शुरुआत वर्ष 1991 के बाद के आर्थिक उदारीकरण और आसियान–नेतृत्व वाले विकास ढाँचे से जुड़ने की आवश्यकता से हुई। 
    • इसका मुख्य ध्यान व्यापार, निवेश और बाज़ार पहुँच पर रहा, न कि सुरक्षा पर। भारत वर्ष 1992 में आसियान का क्षेत्रीय संवाद साझेदार तथा वर्ष 1996 में पूर्ण संवाद साझेदार बना।
  • चरण II (2000–2013) — संस्थागतकरण का दौर:
    • यह नीति आसियान-भारत मुक्त व्यापार समझौते जैसे संस्थागत तंत्रों के माध्यम से परिपक्व हुई, जिससे भारत क्षेत्रीय मूल्य शृंखलाओं में समाहित हो गया, जबकि इसका अभिविन्यास काफी हद तक गैर-रणनीतिक बना रहा।
  • चरण III (2014–वर्तमान) — “लुक” से “एक्ट” की ओर:
    • वर्ष 2014 में, पॉलिसी को "एक्ट ईस्ट" के रूप में उन्नत किया गया। इसने "निष्क्रिय अवलोकन" से "सक्रिय भागीदारी" की ओर एक संक्रमण को चिह्नित किया।
    • समय के साथ इसका दायरा आसियान से आगे बढ़कर व्यापक हिंद–प्रशांत पर केंद्रित हो गया, जिसमें जापान, दक्षिण कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के साथ बढ़ते रणनीतिक संबंध भी शामिल हैं।
    • भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के चार आधार स्तंभ हैं (4C) हैं: संस्कृति (Culture), कनेक्टिविटी (Connectivity), वाणिज्य (Commerce) और क्षमता निर्माण (Capacity Building)
    • भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा आधिकारिक तौर पर वर्ष 2026 को आसियान-भारत समुद्री सहयोग वर्ष घोषित किया गया है।
      • फरवरी 2026 में मलेशिया यात्रा के उपरांत, दोनों देशों ने डॉलर पर निर्भरता घटाने के उद्देश्य से द्विपक्षीय व्यापार में रुपये और रिंगिट के उपयोग को तीव्रता से आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है।

भारत के प्रधानमंत्री की हालिया मलेशिया यात्रा की प्रमुख उपलब्धियाँ क्या रहीं?

  • व्यापक रणनीतिक साझेदारी (CSP) की पुनः पुष्टि: अगस्त 2024 में उच्च स्तर पर स्थापित CSP को और गहरा करने के लिये प्रतिबद्ध नेताओं ने सभ्यतागत संबंधों, लोकतांत्रिक मूल्यों तथा घनिष्ठ जन-संबंधों पर ज़ोर दिया।
  • व्यापार एवं आर्थिक सहयोग: MICECA और AITIGA के अंतर्गत व्यापार सुगमता बढ़ाने पर ज़ोर; तथा सेमीकंडक्टर, डिजिटल अर्थव्यवस्था, हरित प्रौद्योगिकी, फिनटेक तथा उन्नत विनिर्माण पर विशेष ध्यान दिया गया। द्विपक्षीय व्यापार में स्थानीय मुद्रा निपटान (INR–MYR) को प्रोत्साहन दिया गया।
  • संपर्क और गतिशीलता: हवाई और समुद्री संपर्क को सुदृढ़ करने पर सहमति बनी; वीज़ा उदारीकरण, नागरिक उड्डयन सहयोग तथा जन एवं पेशेवर गतिशीलता बढ़ाने का समर्थन किया गया।
  • डिजिटल और वित्तीय साझेदारी: मलेशिया–भारत डिजिटल परिषद (MIDC) का औपचारिक गठन किया गया; फिनटेक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर सुरक्षा, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना तथा NPCI–PayNet लिंक के माध्यम से सीमा-पार डिजिटल भुगतान पर सहयोग बढ़ाने पर सहमति हुई।
  • ऊर्जा एवं सेमीकंडक्टर सहयोग: नवीकरणीय ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और सौर ऊर्जा में सहयोग का विस्तार किया गया; उद्योग–शिक्षा साझेदारी तथा आपूर्ति-शृंखला अनुकूलन के माध्यम से सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला को सुदृढ़ करने पर ज़ोर दिया गया।
  • रक्षा एवं समुद्री सुरक्षा: MIDCOM के माध्यम से रक्षा सहयोग को सशक्त किया गया; संयुक्त सैन्य अभ्यास हरिमाउ शक्ति, नौसैनिक सहयोग तथा ADMM-प्लस के अंतर्गत आतंकवाद-रोधी समन्वय को बढ़ाया गया।
  • खाद्य सुरक्षा और कृषि: सुदृढ़ कृषि आपूर्ति-शृंखलाओं के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की गई; मलेशिया ने सतत पाम तेल के विश्वसनीय आपूर्तिकर्त्ता के रूप में अपनी भूमिका की पुनः पुष्टि की तथा मूल्य-वर्धित डाउनस्ट्रीम सहयोग पर ज़ोर दिया गया।
  • शिक्षा, कौशल और संस्कृति: छात्र विनिमय कार्यक्रमों, TVET सहयोग, ‘स्टडी इन इंडिया’ कार्यक्रम, थिरुवल्लुवर चेयर एवं छात्रवृत्तियों के विस्तार तथा सांस्कृतिक कूटनीति को मज़बूत करने पर सहमति बनी।
  • स्वास्थ्य सेवा एवं पारंपरिक चिकित्सा: वहनीय स्वास्थ्य सेवाओं, औषधि विनियमन, नर्सिंग सेवाओं में सहयोग तथा मलेशिया में पारंपरिक भारतीय चिकित्सा (TIM) सेवाओं की पुनः शुरुआत पर सहमति हुई।

भारत ने एक्ट ईस्ट पॉलिसी को लागू करने हेतु क्या उपाय किये हैं?  

  • स्ट्रैटेजिक "कनेक्टिविटी आर्किटेक्चर" द्वारा संकुचन बिंदुओं को कम करना: भारत सक्रिय रूप से "मल्टी-मॉडल इकोनॉमिक कॉरिडोर" को लागू कर रहा है ताकि सिलिगुड़ी के संकुचन बिंदु को पार किया जा सके, और पूर्वोत्तर को आसियान के साथ निर्बाध एकीकरण तथा लॉजिस्टिक प्रभुत्व के लिये एक "स्ट्रैटेजिक गेटवे" में बदला जा सके।
    • इससे ध्यान केवल स्थलीय संपर्क से हटकर “महाद्वीपीय–समुद्री संयोजन” पर स्थानांतरित हो जाता है और अस्थिर “चिकन नेक” गलियारे पर निर्भरता कम होती है।
    • म्यांमार के सितवे बंदरगाह का परिचालन (मई 2023) तथा भारत–म्यांमार–थाईलैंड (IMT) राजमार्ग को वियतनाम तक विस्तारित करने के तीव्र प्रयास इसी परिवर्तन को रेखांकित करते हैं।
  • “लड़ाकू कूटनीति” और रक्षा निर्यात का संस्थानीकरण: निष्क्रिय “लुक ईस्ट” दृष्टिकोण से आगे बढ़कर “नेट सुरक्षा प्रदाता” की भूमिका अपनाते हुए, भारत दक्षिण चीन सागर में वर्चस्ववादी दबाव का प्रतिकार करने हेतु हथियार आपूर्ति तथा उन्नत समुद्री अभ्यास कर रहा है।
    • यह रणनीति केवल राजनयिक समर्थन तक सीमित न रहकर साझेदार देशों को सैन्य क्षमता प्रदान कर एक प्रभावी “निवारक तंत्र” विकसित करती है।
    • फिलीपींस को 375 मिलियन डॉलर की ब्रह्मोस मिसाइल बैटरियों की आपूर्ति (अप्रैल 2024) तथा वियतनाम को सक्रिय युद्धपोत INS कृपाण का हस्तांतरण (जून 2023) इस रणनीतिक बदलाव को और सुदृढ़ करते हैं।
  • "डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर" (DPI) स्टेटक्राफ्ट: "तकनीकी संप्रभुता" का लाभ उठाते हुए, नई दिल्ली कम लागत वाली, संप्रभु वित्तीय रेल बनाने के लिये अपने फिनटेक स्टैक का निर्यात कर रही है, जो पश्चिमी मध्यस्थों को कम करती है और दक्षिण पूर्व एशिया के साथ आर्थिक अंतरसंचालनीयता को गहरा करती है। 
    • यह "UPI कूटनीति" मुद्रा रूपांतरण लागत को कम करती है और प्रेषण पर अधिक निर्भर अर्थव्यवस्थाओं के लिये  SWIFT के अलावा एक वित्तीय विकल्प प्रदान करती है।
    • सिंगापुर के साथ UPI -PayNow का लिंक (फरवरी 2023) वास्तविक समय में सीमा पार धन प्रेषण को सक्षम बनाता है और इसी तरह की लोकल करेंसी सेटलमेंट वार्ता इंडोनेशिया तथा मलेशिया के साथ प्रगति पर है।
  • “AITIGA आधुनिकीकरण” के माध्यम से व्यापार का पुनर्मूल्यांकन: पूर्व समझौतों की "असामान्य खुलापन" को संबोधित करते हुए, भारत ने व्यापार समझौतों का कठोर आधुनिकीकरण शुरू किया है ताकि उल्टी शुल्क संरचनाओं को ठीक किया जा सके और "चीन-प्लस-वन" लचीली आपूर्ति शृंखलाओं में एकीकृत किया जा सके।
    • इसका उद्देश्य घरेलू विनिर्माण को संरक्षित करना है, साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि भारतीय लघु एवं मध्यम उद्यमों को संरक्षणवादी आसियान क्षेत्रों में पारस्परिक बाज़ार पहुँच प्राप्त हो।
    • आसियान-भारत वस्तु व्यापार समझौते (AITIGA) की त्वरित समीक्षा का उद्देश्य बढ़ते व्यापार घाटे से निपटना है, जो वर्ष 2023 में चौंका देने वाले 44 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया था।
  • भू-राजनीतिक बंधन के रूप में "उप-क्षेत्रीय ऊर्जा ग्रिड": भारत महत्त्वपूर्ण ऊर्जा निर्भरता के माध्यम से पड़ोसियों को जोड़ने, दीर्घकालिक भू-राजनीतिक लाभ सुनिश्चित करने और एक एकीकृत दक्षिण एशियाई ऊर्जा बाज़ार बनाने के लिये  एक "हाइड्रो-कार्बन वेब" का निर्माण कर रहा है।
    • यह संबंध लेन-देन पर आधारित राजनीति को “बुनियादी ढाँचे के बंधन” में बदल देता है, जिससे साझेदार देशों के लिये अलगाव आर्थिक रूप से असंभव हो जाता है।
    • भारत-बांग्लादेश मैत्री पाइपलाइन का चालू होना (मार्च 2023) और अगले दशक में नेपाल से 10,000 मेगावाट बिजली आयात करने का ऐतिहासिक समझौता इस एकीकरण का उदाहरण है।
  • "ब्लू इकोनॉमी" और समुद्री क्षेत्र जागरूकता का संस्थागतकरण: भारत पारंपरिक नौसैनिक गश्ती से एक व्यापक "महासागर शासन" ढाँचे की ओर अग्रसर है, जिसका उद्देश्य गैर-पारंपरिक खतरों और आक्रामक क्षेत्रीय एजेंसियों के खिलाफ महत्त्वपूर्ण समुद्री संचार मार्गों (SLOC) को सुरक्षित करना है।
    • आसियान के साथ समुद्री सहयोग के लिये वर्ष 2026 को एक समर्पित वर्ष के रूप में निर्धारित करके, नई दिल्ली साझा निगरानी और सतत संसाधन प्रबंधन के माध्यम से क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना में अपनी स्थिति मज़बूत कर रही है।
    • इसके अतिरिक्त, भारत ने नौसैनिक इंटरऑपरेबिलिटी को संस्थागत किया है, तदर्थ अभ्यासों से जटिल युद्ध-लड़ने के अभ्यासों की ओर बढ़ते हुए, “सागर” दृष्टिकोण (क्षेत्र में सभी के लिये सुरक्षा और विकास) को सफलतापूर्वक लागू किया, जो ग्रे-ज़ोन दबाव के खिलाफ एक एकीकृत मोर्चे का संकेत देता है।
  • हरित ऊर्जा सुरक्षा के लिये "महत्त्वपूर्ण खनिज सहयोग": केंद्रित आपूर्ति शृंखलाओं की भेद्यता को पहचानते हुए, भारत अपनी इलेक्ट्रिक वाहन और सेमीकंडक्टर महत्त्वाकांक्षाओं के लिये आवश्यक कच्चे माल को सुरक्षित करने के लिये दक्षिण पूर्व एशिया में "संसाधन कूटनीति" को बढ़ावा दे रहा है।
    • यह कदम एक्ट ईस्ट को "परिवर्तनकारी गतिशीलता पर राष्ट्रीय मिशन" के साथ एकीकृत करता है, जिससे भारत को दुर्लभ-पृथ्वी क्षेत्र में मौजूदा एकाधिकार के विकल्प के रूप में स्थापित किया जा सके। 
    • KABIL ने ऑस्ट्रेलिया के क्रिटिकल मिनरल्स ऑफिस (CMO) के साथ लिथियम और कोबाल्ट खनन संपत्तियों का संयुक्त रूप से मूल्यांकन तथा निवेश करने के लिये एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये हैं।
  • प्रशांत द्वीप समूह सहभागिता (FIPIC) : भारत छोटे द्वीप विकासशील राज्यों के लिये “वैश्विक दक्षिण की आवाज” के रूप में खुद को स्थापित करके मलक्का जलडमरूमध्य से परे “दूसरी द्वीप शृंखला” तक रणनीतिक क्षितिज का विस्तार कर रहा है।
    • यह दृष्टिकोण मांग-आधारित विकासात्मक सहायता और जलवायु अनुकूलन परियोजनाओं के माध्यम से एक ऐसे क्षेत्र में राजनीतिक पूंजी का निर्माण करता है, जिस पर पारंपरिक रूप से प्रमुख शक्तियों द्वारा विवाद किया जाता रहा है।
    • अगस्त 2025 में, भारत ने फिजी में 100 बिस्तरों वाले सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के समझौते पर हस्ताक्षर कर इस रणनीति को और सुदृढ़ किया, जो एक क्षेत्रीय केंद्र के रूप में कार्य करेगा।

एक्ट ईस्ट के दृष्टिकोण को परिणामों में बदलने में क्या-क्या बाधाएँ हैं? 

  • कार्यान्वयन की कमी: "बड़े-बड़े वादे करना, उन्हें पूरा न कर पाना" की समस्या स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। नौकरशाही की सुस्ती और केंद्रीय एजेंसियों व राज्य सरकारों के बीच समन्वय की कमी ने भारत को गंभीर विश्वसनीयता संकट में डाल दिया है।
    • घोषणाएँ भले ही आकर्षक हों, लेकिन क्रियान्वयन की कमी के कारण जापान और चीन जैसे प्रतिस्पर्द्धी बुनियादी ढाँचे के बाज़ार पर प्रभुत्व स्थापित कर लेते हैं। इसके परिणामस्वरूप, आसियान देशों को भारत को विकास में “सक्रिय भागीदार” के बजाय “चर्चा करने वाले भागीदार” के रूप में देखना पड़ता है।
      • उदाहरण के लिये, IMT त्रिपक्षीय राजमार्ग की परिकल्पना वर्ष 2002 में की गई थी, लेकिन यह अभी भी अधूरा है। 
      • इसके विपरीत, चीन ने चीन-लाओस रेलवे (1,035 किमी) को केवल 5 वर्षों (2016-2021) में पूरा कर लिया, जिससे क्षेत्रीय लॉजिस्टिक्स में क्रांतिकारी बदलाव आया।
  • “गेटवे” नाकाबंदी – म्यांमार की अशांति: वर्ष 2021 के तख्तापलट और उसके बाद गृहयुद्ध की तेज़ी से म्यांमार एक भूमि पुल से रणनीतिक गतिरोध (एक छोर से बंद मार्ग) में बदल गया है।
    • सीमावर्ती कस्बों पर सैन्य शासन का नियंत्रण जातीय सशस्त्र समूहों के हाथों जाने से द्विपक्षीय समझौते निरर्थक हो गए, जिससे आसियान तक भारत की भौतिक पहुँच प्रभावी रूप से ठप हो गई और कनेक्टिविटी के लिये सुरक्षा का महंगा पुनर्मूल्यांकन करना पड़ा।
      • उदाहरण के लिये: वर्ष 2024 की शुरुआत में अराकान सेना द्वारा पलेतवा टाउनशिप पर कब्ज़ा करने के कारण कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट अनिश्चितकालीन रूप से रुका हुआ है, इसके अलावा त्रिपक्षीय हाईवे अपनी निर्धारित समय सीमा में पूरा नहीं हो सका और इसके सम्पन्न होने की कोई नई तारीख स्पष्ट नहीं है।
  • व्यापार असंतुलन बढ़ता घाटा: आसियान के साथ भारत के व्यापारिक संबंध अक्सर “कम मूल्य का निर्यात, उच्च मूल्य का आयात” मॉडल द्वारा परिभाषित होते हैं, जिसमें भारत कच्चा माल निर्यात करता है जबकि तैयार माल आयात करता है।
    • क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP) में शामिल न होने की अनिच्छा ने भारत को क्षेत्रीय निर्बाध विनिर्माण आपूर्ति शृंखलाओं से और अलग कर दिया, जिससे भारतीय निर्यात चीनी विकल्पों के सामने गैर-प्रतिस्पर्द्धी बन गए।
      • वित्त वर्ष 2023 में भारत का आसियान के साथ व्यापार घाटा बढ़कर 44 अरब डॉलर हो गया, जो वर्ष 2010 में केवल 7.5 अरब डॉलर था।
  • आंतरिक अस्थिरता – मणिपुर संकट: मई 2023 से मणिपुर में चल रहे जातीय संघर्ष ने पूर्वोत्तर को एक्ट ईस्ट के लॉन्चपैड के रूप में प्रयोग करने हेतु आवश्यक “शांति लाभांश” को चकनाचूर कर दिया।
    • इस अस्थिरता ने केंद्र को मुक्त आवागमन व्यवस्था (FMR) पर पुनर्विचार के लिये मजबूर किया, जिससे नीति की एकीकरणवादी भावना के विपरीत, “व्यापार के लिये खुली सीमाएँ” से “सुरक्षा के लिये कठोर सीमाएँ” की ओर बदलाव हुआ।
    • वर्ष 2024 में गृह मंत्रालय ने भारत-म्यांमार की पूरी 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा पर बाड़ लगाने का निर्णय लिया, जिससे ऐतिहासिक जनजातीय आर्थिक संबंध प्रभावित हुए।
  • “बांग्लादेश शॉक”: अगस्त 2024 में बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन और भारत समर्थक शेख हसीना सरकार के निष्कासन ने पूर्वी संपर्क तंत्र को खतरे में डाल दिया।
    • सिलीगुड़ी कॉरिडोर को दरकिनार करने के लिये पारगमन (चटोग्राम और मोंगला बंदरगाहों के माध्यम से) में भारत की निर्भरता अब राजनीतिक शत्रुता के प्रति संवेदनशील हो गई, जिससे पूर्वोत्तर फिर से अलग-थलग पड़ने का खतरा बढ़ गया और BBIN (बांग्लादेश–भूटान–भारत–नेपाल) मोटर वाहन समझौते प्रभावित हो सकता है।
    • इन रणनीतिक अनिश्चितताओं को बांग्लादेश में धार्मिक और जातीय अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं की सुरक्षा से जुड़ी बढ़ती चिंताएँ, संक्रमणोत्तर हिंसा, जबरन विस्थापन तथा संस्थागत उदासीनता और जटिल बना रही हैं।
      • इस प्रकार की घटनाएँ लोगों के बीच संबंधों में तनाव उत्पन्न करती हैं, भारत में घरेलू राजनीतिक संवेदनशीलता बढ़ाती हैं और पूर्वोत्तर के गहन जुड़ाव के लिये नई दिल्ली की राजनयिक क्षमता को सीमित करती हैं।
  • चीन की सर्वव्यापी उपस्थिति - ऋण और अवसंरचना का जाल: बीजिंग ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के माध्यम से लाओस, कंबोडिया और म्यांमार की महत्त्वपूर्ण अवसंरचना में खुद को समाहित करके भारत की पूर्वी परिधि को प्रभावी ढंग से घेर लिया है। 
    • हालाँकि भारत “मांग-आधारित” विकास की पेशकश करता है, लेकिन उसकी गति, पूंजी और जोखिम लेने की क्षमता चीन की तुलना में सीमित है, जिससे आसियान मंचों में भारत का रणनीतिक प्रभाव कम होता है तथा सदस्य अपने सबसे बड़े आर्थिक संरक्षक को नाराज करने से बचते हैं।
    • कंबोडिया में चीन के रीम (Ream) नौसैनिक अड्डे का उन्नयन और म्यांमार में क्यौकप्यू (Kyaukpyu) गहरे समुद्र बंदरगाह का निर्माण उसे बेहतर पहुँच प्रदान करता है, जिससे वह सीधे भारत के  भारत के अंडमान और निकोबार कमांड तथा बंगाल की खाड़ी में समुद्री प्रभाव को चुनौती दे सकता है।
  • समुद्री असुरक्षा - दक्षिण चीन सागर की संवेदनशील स्थिति: जहाँ एक ओर भारत "नौकायन की स्वतंत्रता" का समर्थन करता है, वहीं दक्षिण चीन सागर (SCS) में कठोर सुरक्षा गठबंधन बनाने में उसकी हिचकिचाहट आसियान के दावेदारों (फिलीपींस) के लिये सुरक्षा प्रदाता के रूप में उसकी उपयोगिता को सीमित करती है। 
    • जैसे-जैसे चीन आक्रामक रूप से "ग्रे ज़ोन" रणनीति (वॉटर कैनन, लेज़र) का उपयोग कर रहा है, आसियान देशों को अमेरिकी सुरक्षा की तलाश करने के लिये मजबूर होना पड़ रहा है, जिससे भारत की “सागर” परिकल्पना उनकी तात्कालिक अस्तित्व संबंधी जरूरतों को पूरा करने में सैन्य रूप से अपर्याप्त साबित होती है।

भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी को प्रभावी करने के लिये किन उपायों की आवश्यकता है?

  • परियोजना क्रियान्वयन के लिये "विशेष प्रयोजन इकाई" (SPV) का संस्थागतकरण: त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी अवसंरचना परियोजनाओं में लगातार देरी से निपटने के लिये भारत को पारंपरिक नौकरशाही चैनलों से आगे बढ़कर एक समर्पित, स्वायत्त SPV स्थापित करनी होगी, जिसे वित्तीय स्वायत्तता और अंतर-मंत्रालयी अधिकार प्राप्त हों।
    • यह संस्था नौकरशाही बाधाओं को दरकिनार करते हुए “मेट्रो रेल” निगमों की तरह तेज़ी से निर्णय लेने में सक्षम होगी और भूमि अधिग्रहण तथा नियामक स्वीकृति में तेज़ी लाने के लिये म्यांमार या वियतनाम में मेज़बान सरकारों के साथ सीधे समन्वय करेगी।
      • इससे दृष्टिकोण “राजनयिक वार्ता” से “कॉर्पोरेट शैली के क्रियान्वयन ” की ओर स्थानांतरित होता है, समय सीमा का पालन सुनिश्चित होता है और भारत की विश्वसनीयता बहाल होती है।
  • "भूमि सेतु" से "समुद्री चाप" की ओर बदलाव: म्यांमार में अस्थिरता के कारण भूमि संपर्क बाधित होने को देखते हुए भारत को “समुद्री चाप” रणनीति अपनाने की आवश्यकता है, जो पूर्वी तट (चेन्नई, विशाखापत्तनम) और प्रमुख आसियान केंद्रों (जकार्ता) के बीच सीधे जहाजरानी मार्गों तथा बंदरगाह-से-बंदरगाह संपर्क को प्राथमिकता देती है।
    • इसमें तटीय शिपिंग लाइनों को प्रोत्साहित करना, आसियान जाने वाले माल के लिये बंदरगाहों पर “ग्रीन चैनल” बनाना और अंडमान एवं निकोबार कमांड को वाणिज्यिक ट्रांस-शिपमेंट हब में अपग्रेड करना शामिल है।
    • यह उपाय महाद्वीपीय नाकाबंदी को दरकिनार करते हुए समुद्री मार्गों के माध्यम से आर्थिक एकीकरण बनाए रखने में सक्षम है।
  • पूर्वोत्तर भारत को "क्षेत्रीय मूल्य शृंखलाओं" (RVC) में एकीकृत करना: पूर्वोत्तर को केवल "पारगमन गलियारे" के रूप में देखने की बजाय दक्षिणपूर्व एशियाई मूल्य शृंखलाओं, विशेषकर बांस, कृषि-प्रसंस्करण और फार्मास्यूटिकल्स, के साथ एकीकृत “उत्पादन केंद्र” के रूप में देखना चाहिये।
    • इसके लिये आसियान देशों के साथ गुणवत्ता मानकों में सामंजस्य स्थापित करना और सीमावर्ती राज्यों में “निर्यात-उन्मुख इकाइयाँ” (EOU) स्थापित करना आवश्यक है, जो विशेष रूप से म्यांमार और थाईलैंड की मांगों को पूरा करें।
    • “मेक इन नॉर्थईस्ट” पहल को आसियान की आयात आवश्यकताओं से जोड़कर भारत सीमावर्ती क्षेत्रों में आर्थिक हितधारक तैयार कर सकता है, जो ज़मीनी स्तर से नीति को आगे बढ़ाएँ।
  • आक्रामक “डिजिटल कूटनीति” और फिनटेक एकीकरण: भारत को डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) में अपने प्रभुत्व का लाभ उठाकर “डिजिटल एक्ट ईस्ट” ढाँचा तैयार करना चाहिये और PayNow तथा PromptPay जैसी आसियान भुगतान प्रणालियों के साथ UPI (एकीकृत भुगतान इंटरफेस) की अंतरसंचालनीयता के लिये प्रयास करने चाहिये।
    • भारत अपनी पहचान और भुगतान संबंधी ओपन-सोर्स प्रौद्योगिकी को “विकास साझेदारी” उपकरण के रूप में प्रस्तुत करके भौतिक बाधाओं को दरकिनार कर क्षेत्र की तेज़ी से बढ़ती इंटरनेट अर्थव्यवस्था के साथ वित्तीय रूप से एकीकृत हो सकता है।
      • इससे कम लागत वाला, उच्च प्रभाव वाला सॉफ्ट पावर फुटप्रिंट तैयार होता है, जिसे चीन के हार्ड इंफ्रास्ट्रक्चर द्वारा आसानी से दोहराया नहीं जा सकता।
  • बिम्सटेक को प्राथमिक वितरण तंत्र के रूप में क्रियान्वित करना: सार्क की निष्क्रियता और आसियान-भारत तंत्रों की धीमी गति को देखते हुए, भारत को बिम्सटेक को एक्ट ईस्ट पॉलिसी के कनेक्टिविटी तथा सुरक्षा स्तंभों के लिये प्राथमिक इंजन बनाना होगा।
    • इसमें बंगाल की खाड़ी समुदाय को जोड़ने वाला कानूनी ढाँचा तैयार करने के लिये बिम्सटेक मुक्त व्यापार समझौते और तटीय जहाजरानी समझौते को अंतिम रूप देना शामिल है।
    • बिम्सटेक को एक्ट ईस्ट पॉलिसी के “भीतरी घेरे” के रूप में मानकर, भारत एक अधिक सघन और प्रबंधनीय आर्थिक क्षेत्र को बढ़ावा दे सकता है, जो दक्षिण चीन सागर के व्यापक भू-राजनीतिक तनावों से कम प्रभावित हो।
  • “रक्षा कूटनीति” का विस्तार “क्षमता निर्माण” तक: भारत को छिटपुट नौसैनिक अभ्यासों से आगे बढ़कर एक स्थायी “पूर्ण सुरक्षा प्रदाता” बनने की आवश्यकता है, जिसके तहत वह पनडुब्बी संचालन, जलविज्ञान और आपदा प्रतिक्रिया में आसियान नौसेनाओं को प्रशिक्षण जैसे संस्थागत क्षमता निर्माण की पेशकश करे।
    • मित्र आसियान देशों में स्थायी “सैन्य प्रशिक्षण दल” स्थापित करना और विशेष रूप से रक्षा खरीद के लिये “क्रेडिट लाइन” (जैसे ब्रह्मोस समझौता) उपलब्ध कराना भारत को एक विश्वसनीय सुरक्षा भागीदार के रूप में स्थापित करेगा।
      • इससे क्षेत्र में गहरी रणनीतिक निर्भरताएँ उत्पन्न होती हैं, जो बाहरी दबावों के प्रतिसंतुलन के रूप में कार्य करती हैं।
  • सिस्टर-सिटी फ्रेमवर्क के साथ “उप-राष्ट्रीय कूटनीति” का लाभ उठाना: केंद्र सरकार को पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत की राज्य सरकारों को एक मज़बूत “सिस्टर-सिटी” फ्रेमवर्क के माध्यम से दक्षिणपूर्व एशिया में अपने समकक्षों के साथ “पैरा-कूटनीति” संचालित करने के लिये औपचारिक रूप से सशक्त बनाना चाहिये।
    • इसमें राज्यों को पर्यटन, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और स्थानीय सीमा व्यापार के लिये विशिष्ट समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर करने की शक्तियाँ सौंपना शामिल है, जिसके लिये उन्हें दिल्ली से लगातार स्वीकृति लेने की आवश्यकता नहीं होगी।
    • यह विकेंद्रीकरण लोगों के बीच संपर्क को बढ़ावा देता है और राज्यों को विशिष्ट सांस्कृतिक व आर्थिक तालमेल के आधार पर अपनी भागीदारी को अनुकूलित करने की अनुमति देता है, जिससे नीति अधिक लचीली तथा स्थानीय स्तर पर स्वामित्व वाली बन जाती है। 

निष्कर्ष:

एक्ट ईस्ट पॉलिसी को पुनर्जीवित करने के लिये "घोषणात्मक कूटनीति" से "परिणाम-आधारित व्यावहारिकता" की ओर निर्णायक परिवर्तन की आवश्यकता है,जिसमें स्थलीय अवरोधों को पार करने हेतु संस्थागत अनुकूलन और समुद्री उपायों को प्राथमिकता दी जाए। पूर्वोत्तर भारत को क्षेत्रीय उत्पादन नेटवर्क से जोड़कर तथा डिजिटल क्षमताओं के उपयोग से भारत ऐसी परस्पर-निर्भर आर्थिक व्यवस्था विकसित कर सकता है, जो भू-राजनीतिक अस्थिरताओं के प्रति अधिक सक्षम हो। अंततः, इस नीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत स्वयं को केवल एक बाज़ार नहीं, बल्कि क्षेत्रीय विकास और स्थिरता के विश्वसनीय प्रेरक के रूप में कितनी प्रभावी ढंग से स्थापित कर पाता है।

दृष्टि मेन्स प्रश्न

एक्ट ईस्ट फ्रेमवर्क के अंतर्गत पूर्वोत्तर भारत को पारगमन क्षेत्र से उन्नत कर मूल्य-शृंखला केंद्र के रूप में विकसित करने की संभावनाओं का मूल्यांकन कीजिये तथा विद्यमान संरचनात्मक चुनौतियों और अपेक्षित नीतिगत उपायों पर चर्चा कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1. "एक्ट ईस्ट" से "ग्रो ईस्ट" में परिवर्तन का अभिप्राय क्या है?
यह प्रौद्योगिकी, वाणिज्य और सुरक्षा के क्षेत्रों में केवल कूटनीतिक संपर्क से आगे बढ़कर ठोस, परिणाम-उन्मुख साझेदारी की दिशा में परिवर्तन को दर्शाता है।

प्रश्न 2. एक्ट ईस्ट पॉलिसी के लिये पूर्वोत्तर भारत इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है?
यह भारत के लिये आसियान देशों से संपर्क, व्यापार और क्षेत्रीय मूल्य शृंखलाओं के लिये एक रणनीतिक प्रवेश द्वार के रूप में कार्य करता है।

प्रश्न 3. कलादान मल्टी-मोडल परियोजना का रणनीतिक महत्त्व क्या है?
यह भारत के पूर्वी तट को म्यांमार तथा आसियान बाज़ारों से जोड़ते हुए सिलीगुड़ी गलियारे पर निर्भरता को कम करता है।

प्रश्न 4. UPI कूटनीति भारत–आसियान संबंधों को किस प्रकार सुदृढ़ करती है?
यह सस्ती, त्वरित और सीमा-पार डिजिटल भुगतान व्यवस्था उपलब्ध कराकर वित्तीय एकीकरण और डिजिटल सहयोग को प्रोत्साहित करती है।

प्रश्न 5. भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में समुद्री सुरक्षा इतनी महत्त्वपूर्ण क्यों है?
यह बढ़ती क्षेत्रीय प्रतिस्पर्द्धा के संदर्भ में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री संचार मार्गों की निर्बाध और सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ) 

प्रिलिम्स:

प्रश्न 1. 'रीजनल कॉम्प्रिहेन्सिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (Regional Comprehensive Economic Partnership)' पद प्रायः समाचारों में देशों के एक समूह के मामलों के संदर्भ में आता है। देशों के उस समूह को क्या कहा जाता है? (2016) 

(a) G20
(b) ASEAN
(c) SCO
(d) SAARC

उत्तर: B


प्रश्न 2. मेकांग-गंगा सहयोग जो कि छह देशों की एक पहल है, निम्नलिखित में से कौन-सा/से देश प्रतिभागी नहीं है/हैं? (2015)

  1. बांग्लादेश
  2.  कंबोडिया
  3.  चीन
  4.  म्यांँमार
  5.  थाईलैंड

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1
(b) केवल 2, 3 और 4
(c) केवल 1 और 3
(d) केवल 1, 2 और 5

उत्तर: (c)


मेन्स 

प्रश्न 1. आन्तरिक सुरक्षा ख़तरों तथा नियन्त्रण रेखा सहित म्यांमार, बांग्लादेश और पाकिस्तान सीमाओं पर सीमा-पार अपराधों का विश्लेषण कीजिये। विभिन्न सुरक्षा बलों द्वारा इस सन्दर्भ में निभाई गई भूमिका की विवेचना भी कीजिये।(2020)

प्रश्न 2. दक्षिण एशिया के अधिकतर देशों तथा म्याँमार से लगी विशेषकर लंबी छिद्रिल सीमाओं की दृष्टि से भारत की आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियाँ सीमा प्रबंधन से कैसे जुड़ी हैं? (2013)

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