भारतीय अर्थव्यवस्था
भारत का विनिर्माण केंद्र
- 16 Apr 2026
- 207 min read
यह लेख 14/04/2026 को द बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित ‘End of easy globalisation: India must rethink its manufacturing playbook’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख भारत के वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में रणनीतिक परिवर्तन का विश्लेषण करता है, जिसमें भू-राजनीतिक पुनर्गठन और घरेलू संरचनात्मक सुधारों के बीच परस्पर संबंध पर प्रकाश डाला गया है। यह हरित व्यापार करों से लेकर कौशल अंतराल जैसी प्रमुख चुनौतियों का मूल्यांकन करता है तथा औद्योगिक अनुकूलन सुनिश्चित करने हेतु एक बहुआयामी रोडमैप प्रस्तुत करता है।
प्रिलिम्स के लिये: उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI), इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन, कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM), डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI)।
मेन्स के लिये: भारत के वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में सहायक संरचनात्मक सुधार, भारत के विनिर्माण क्षेत्र से संबंधित प्रमुख मुद्दे।
वैश्वीकरण के वर्तमान दौर में दक्षता-आधारित मॉडल से हटकर भू-राजनीति-प्रेरित आपूर्ति शृंखलाओं की ओर बढ़ती प्रवृत्तियों के बीच, भारत का विनिर्माण क्षेत्र एक महत्त्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। यह क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 16-17% का योगदान देता है, जो 'मेक इन इंडिया' के अंतर्गत निर्धारित 25% लक्ष्य से काफी कम है, जबकि यह 27 मिलियन से अधिक श्रमिकों को रोज़गार प्रदान करता है। फिर भी भारत का वैश्विक विनिर्माण उत्पादन में योगदान मात्र लगभग 3% है, जबकि चीन का योगदान लगभग 28% है। आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन तथा 'मित्र-देशीय सहयोग' (Friend-shoring) से परिलक्षित इस परिवर्तित वैश्विक परिदृश्य में भारत के समक्ष एक विश्वसनीय विनिर्माण केंद्र के रूप में उभरने का रणनीतिक अवसर उपलब्ध है।
भारत के वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में प्रमुख कारक कौन-कौन से हैं?
- उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना ने विकास के उत्प्रेरक के रूप में उभरकर, संरचनात्मक तथा लागत-संबंधी कमियों को दूर कर भारत को एक आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था से निर्यात-उन्मुख अर्थव्यवस्था में क्रमिक रूप से रूपांतरित किया है।
- यह योजना वैश्विक मूल्य शृंखलाओं को आकर्षित करने तथा महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहित करने हेतु आवश्यक राजकोषीय प्रोत्साहन प्रदान करती है।
- इस योजना के अंतर्गत संचयी इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन वित्त वर्ष 2025 तक 146% की वृद्धि के साथ ₹5.45 लाख करोड़ तक पहुँच गया, जिसे लगभग 4 अरब डॉलर के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का समर्थन प्राप्त हुआ।
- सभी 14 क्षेत्रों में इस योजना ने 14.39 लाख से अधिक रोज़गार सृजित किये हैं तथा वर्ष 2025 के अंत तक संचयी निवेश में ₹2.16 लाख करोड़ का आँकड़ा पार कर लिया है।
- वैश्विक आपूर्ति शृंखला का विविधीकरण: प्रमुख बहुराष्ट्रीय निगम (MNC) चीन में भू-राजनीतिक अस्थिरता से अपनी आपूर्ति शृंखलाओं के जोखिम को कम करने के लिये सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं, क्योंकि वे भारत को एक अत्यधिक व्यवहार्य, उच्च मात्रा वाले विकल्प के रूप में देख रहे हैं।
- यह रणनीतिक पुनर्गठन रेखांकित करता है कि भारत का विनिर्माण तंत्र अब बुनियादी असेंबली से आगे बढ़कर जटिल एवं गहन आपूर्ति-शृंखला एकीकरण की दिशा में परिपक्व हो रहा है।
- वर्ष 2025 में एप्पल (Apple) ने भारत में आईफोन (iPhone) के उत्पादन में 53% की वृद्धि करते हुए 55 मिलियन यूनिट्स का निर्माण किया।
- परिणामस्वरूप, आईफोन भारत का सर्वाधिक निर्यात करने वाला उत्पाद बन गया, जिससे 23 अरब डॉलर से अधिक के डिवाइस शिपमेंट हुए और स्मार्टफोन देश का शीर्ष निर्यात बन गया।
- घरेलू सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का विकास: यह स्वीकार करते हुए कि आधुनिक औद्योगिक आत्मनिर्भरता के लिये सिलिकॉन पर निर्भरता से मुक्ति सर्वोपरि है, भारत विनिर्माण, संयोजन और परीक्षण को शामिल करते हुए एक व्यापक घरेलू सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम का निर्माण कर रहा है।
- यह रणनीतिक संरचनात्मक परिवर्तन न केवल देश को वैश्विक चिप संकट के प्रभावों से संरक्षित करता है, बल्कि उच्च-स्तरीय वैश्विक तकनीकी साझेदारियों को आकर्षित करने में भी सहायक सिद्ध होता है।
- इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) के अंतर्गत टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स (Tata Electronics) की गुजरात में लगभग 91,000 करोड़ रुपये की लागत वाली फैब सुविधा जैसी वृहद परियोजनाएँ क्रियान्वित हो रही हैं, जो प्रति माह लगभग 50,000 वेफर्स के उत्पादन में सक्षम हैं।
- इसी प्रकार सानंद (Sanand) में माइक्रोन (Micron) की लगभग 22,000 करोड़ रुपये की लागत वाली सुविधा भी संचालन में आ रही है, जो भारत की सेमीकंडक्टर महत्त्वाकांक्षाओं में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि का द्योतक है तथा इसके उच्च-प्रौद्योगिकी विनिर्माण परिदृश्य को व्यापक रूप से परिवर्तित कर रही है।
- रक्षा विनिर्माण का स्वदेशीकरण: भारत ने आत्मनिर्भरता पर अत्यधिक ज़ोर देकर तथा निजी क्षेत्र की गहन भागीदारी को प्रोत्साहित करके अपने रक्षा ढाँचे में संरचनात्मक परिवर्तन किया है, जिससे वह एक वैश्विक आयातक से उभरते हुए शुद्ध निर्यातक के रूप में परिवर्तित हुआ है।
- यह परिवर्तन न केवल रणनीतिक कमज़ोरियों को कम करता है, बल्कि वैश्विक आयुध बाज़ार में तीव्रता से बढ़ती हिस्सेदारी अर्जित करने में भी सहायक है।
- वित्त वर्ष 2025-26 में रक्षा निर्यात में उल्लेखनीय 62% की वृद्धि दर्ज की गई, जिससे यह ₹38,424 करोड़ के सर्वकालिक उच्च स्तर तक पहुँच गया।
- सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों (PSU) के निर्यात में 151% की वृद्धि हुई, जबकि निजी फर्मों ने कुल निर्यात में लगभग 45% का प्रभावशाली योगदान दिया, जो स्थानीयकृत रक्षा नीतियों की सफलता को प्रमाणित करता है।
- बहु-माध्यमीय लॉजिस्टिक्स तथा अवसंरचना एकीकरण: दीर्घकालिक भौतिक बाधाओं को दूर करने के लिये, सरकार ने एक समन्वित अवसंरचना रणनीति अपनाई है, जो बहु-माध्यमीय कनेक्टिविटी में काफी सुधार करती है और टर्नअराउंड समय को कम करती है।
- राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स लागत में यह संरचनात्मक कमी भारतीय विनिर्माण क्षेत्र को स्वाभाविक रूप से अधिक प्रतिस्पर्द्धी तथा वैश्विक मांग चक्रों के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाती है।
- इस उन्नत लॉजिस्टिकल दक्षता के परिणामस्वरूप, प्रमुख प्रौद्योगिकी निर्यातकों ने कुछ ही दिनों में लगभग 600 टन इलेक्ट्रॉनिक्स को सीधे अमेरिकी बाज़ारों तक हवाई मार्ग से पहुँचाने में सफलता प्राप्त की है।
- इन सुधारों की निरंतरता सुनिश्चित करने हेतु, सरकार पूर्णतः स्वचालित ‘कस्टम्स 2.0’ प्रणाली की दिशा में अग्रसर है, जिसे वर्ष 2026 तक अंतिम रूप दिये जाने की संभावना है।
- इस प्रणाली का उद्देश्य कागज़ी कार्रवाई रहित, जोखिम-आधारित जाँच करना है जिससे ‘आउट ऑफ चार्ज’ (OOC) प्रक्रिया में उल्लेखनीय तीव्रता आएगी।
- हरित विनिर्माण और नवीकरणीय ग्रिड संक्रमण: जैसे-जैसे वैश्विक व्यापार ढाँचे कार्बन-गहन वस्तुओं पर दंडात्मक प्रावधान लागू कर रहे हैं, भारत द्वारा अपने औद्योगिक ग्रिड में नवीकरणीय ऊर्जा का संरचनात्मक एकीकरण एक विशिष्ट भू-राजनीतिक तथा आर्थिक लाभ प्रदान कर रहा है।
- नए विनिर्माण क्लस्टरों को स्वच्छ ऊर्जा पर संचालित करना, सख्त पर्यावरणीय मानकों वाले पश्चिमी बाज़ारों तक दीर्घकालिक एवं सुरक्षित पहुँच सुनिश्चित करता है।
- भारत के हरित विनिर्माण को प्रोत्साहित करने के प्रयास धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र (Dholera SIR) जैसी परियोजनाओं में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं, जिसे मुख्यतः नवीकरणीय ऊर्जा पर संचालित करने की परिकल्पना की गई है, जो निम्न-कार्बन निर्यात मानकों के अनुरूप है।
- अप्रैल 2026 तक भारत की स्थापित नवीकरणीय क्षमता 274.68 GW से अधिक हो चुकी है, जिससे हरित ऊर्जा का उपयोग करने वाली कंपनियों को यूरोपीय संघ जैसे कार्बन-नियंत्रित बाज़ारों में वरीयता प्राप्त होती है।
- इलेक्ट्रॉनिक्स तथा हेवी इंजीनियरिंग क्षेत्रों में स्थापित नई मेगा-फैक्ट्रियाँ न केवल वैश्विक पर्यावरण, सामाजिक एवं शासन (ESG) के कठोर मानकों का अनुपालन कर रही हैं, बल्कि नवीकरणीय ऊर्जा के व्यापक उपयोग के माध्यम से अपनी दीर्घकालिक ऊर्जा लागत को भी स्थिर बना रही हैं।
- इलेक्ट्रिक वाहन (EV) मूल्य शृंखलाओं का विस्तार: भारत पारंपरिक दहन ईंधन नेटवर्क पर निर्भर रहने के स्थान पर इलेक्ट्रिक वाहन आपूर्ति शृंखलाओं के तीव्र स्थानीयकरण के माध्यम से वैश्विक गतिशीलता परिवर्तन में अपनी संरचनात्मक स्थिति को सुदृढ़ कर रहा है।
- स्वदेशी उन्नत रसायन विज्ञान सेल (ACC) क्षमताओं का विकास, भविष्य में आयातित लिथियम-आयन प्रौद्योगिकी पर निर्भरता समाप्त करने हेतु अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- ₹18,100 करोड़ की ACC-PLI योजना के अंतर्गत, भारत लगभग 50 गीगावॉट की घरेलू बैटरी क्षमता स्थापित कर रहा है, जिसमें ओला इलेक्ट्रिक (Ola Electric) तथा रिलायंस पावर (Reliance Power) जैसी कंपनियाँ अग्रणी भूमिका निभा रही हैं।
- वर्तमान में बैटरी घटकों में व्यापक समानांतर पूंजी निवेश हो रहा है, जिससे देशभर में पारंपरिक ऑटो-सहायक उपकरण निर्माताओं के लिये एक आकर्षक संरचनात्मक परिवर्तन उत्पन्न हो रहा है।
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) एकीकरण: भारत की वैश्विक स्तर पर विशेष DPI संरचना एक सशक्त संरचनात्मक प्रवर्तक के रूप में कार्य करते हुए अर्थव्यवस्था को औपचारिक रूप प्रदान करती है तथा जटिल व्यावसायिक प्रक्रियाओं को उल्लेखनीय रूप से सरल बनाती है।
- यह निर्बाध डिजिटल आधार लालफीताशाही को कम करता है, उद्यम अनुपालन को तीव्र बनाता है तथा वैश्विक निर्माताओं के लिये वित्तीय प्रवाह को सुगम करता है।
- इंडिया स्टैक (India Stack) पर आधारित प्लेटफार्मों ने लाखों सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के लिये विक्रेता भुगतान तथा त्वरित ऋण पहुँच में क्रांतिकारी परिवर्तन किया है, जो वृहद औद्योगिक आपूर्ति शृंखलाओं में योगदान देते हैं।
- वस्तु एवं सेवा कर (GST) जैसे कर नेटवर्क के पूर्ण डिजिटलीकरण ने राष्ट्रीय बाज़ार को एकीकृत करते हुए परिचालन पारदर्शिता तथा दक्षता को सुदृढ़ किया है, जिसकी अपेक्षा बड़े विदेशी निवेशकों द्वारा की जाती है।
- उदाहरणार्थ, जनवरी 2026 तक GSTN प्लेटफॉर्म ने ₹102.91 लाख करोड़ से अधिक के लेन-देन संसाधित किये, जबकि राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (NSWS) ने 32 केंद्रीय विभागों में 8.29 लाख से अधिक अनुमोदन प्रदान किये।
- रणनीतिक मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) का विस्तार: भारत ने अपनी व्यापार नीति का पुनर्संतुलन करते हुए संरक्षणवादी दृष्टिकोण से आगे बढ़कर ‘न्यू एज FTA’ रणनीति अपनाई है, जो उच्च उपभोग वाले पश्चिमी बाज़ारों के साथ गहन एकीकरण को प्राथमिकता देती है।
- यह संरचनात्मक परिवर्तन दीर्घकालिक शुल्क-मुक्त पहुँच सुनिश्चित करता है, जिससे 'मेक इन इंडिया’ उत्पाद क्षेत्रीय उत्पादों की तुलना में मूल्य की दृष्टि से अधिक प्रतिस्पर्द्धी बने रहते हैं तथा वैश्विक निवेश के लिये प्रतिस्पर्द्धी विकल्प के रूप में बड़े निवेश को आकर्षित करते हैं।
- उदाहरण के लिये, जनवरी 2026 में, भारत ने यूरोपीय संघ के साथ ‘सभी सौदों की जननी’ कहे जाने वाले मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर हस्ताक्षर किये, जिससे व्यापार मूल्य के आधार पर भारत के 99% से अधिक निर्यात को अभूतपूर्व बाज़ार पहुँच प्राप्त हुई।
- साथ ही भारत-यूके व्यापक आर्थिक तथा व्यापार समझौता (CETA) का लक्ष्य वर्ष 2030 तक दोनों अर्थव्यवस्थाओं के बीच 56 अरब अमेरिकी डॉलर के व्यापार को दोगुना करना है।
भारत के विनिर्माण क्षेत्र से जुड़े प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- आपूर्ति शृंखला और अपस्ट्रीम निर्भरता: आयातित महत्त्वपूर्ण कच्चे माल और मध्यवर्ती घटकों पर संरचनात्मक अत्यधिक निर्भरता के कारण घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र मौलिक रूप से कमज़ोर बना हुआ है।
- आपूर्ति शृंखलाओं में स्थानीयकरण की कमी के परिणामस्वरूप निर्माता वैश्विक भू-राजनीतिक झटकों तथा अचानक मूल्य अस्थिरता के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाते हैं।
- उदाहरण के लिये, भारतीय औषधि तथा इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र अभी भी अपने सक्रिय औषधीय संघटक (लगभग 70%) तथा सेमीकंडक्टर घटकों का अधिकांश भाग चीन से आयात करते हैं।
- यद्यपि हाल ही में उत्पादन-आधारित प्रोत्साहनों के माध्यम से इन केंद्रों को स्वदेशी बनाने का प्रयास किया गया है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अचानक आने वाली बाधाओं के कारण घरेलू असेंबलरों के लिये इनपुट लागत को अत्यधिक बढ़ा देते हैं।
- लॉजिस्टिक्स तथा अंतिम चरण (Last-Mile) अक्षमताएँ: राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स अवसंरचना में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद, स्थानीय स्तर पर स्थायी बाधाएँ तथा विखंडित अंतिम-संपर्क अब भी परिचालन दक्षता को गंभीर रूप से बाधित करते हैं।
- स्थानीय स्तर पर होने वाला ये परिवहन विलंब आपूर्ति शृंखला की समय-सीमा को बढ़ाते हैं और वैश्विक बाज़ारों में भारत की कम श्रम लागत से मिलने वाले प्रतिस्पर्द्धात्मक लाभ को कम कर देते हैं।
- आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार पीएम गतिशक्ति पहल ने राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स लागत को GDP के 8% से नीचे लाने में सफलता प्राप्त की है, फिर भी स्थानीय बाधाएँ बनी हुई हैं।
- निर्माताओं को अभी भी राज्य सीमाओं तथा क्षेत्रीय बंदरगाहों पर अनिश्चित विलंब का सामना करना पड़ता है, जिससे निर्यात पूर्ति की तीव्रता प्रभावित होती है।
- हरित संक्रमण और एकतरफा व्यापार बाधाएँ: अनिवार्य हरित विनिर्माण की ओर वैश्विक बदलाव भारत के पारंपरिक रूप से कार्बन-गहन भारी उद्योगों पर महत्त्वपूर्ण अनुपालन और वित्तीय दबाव उत्पन्न कर रहा है।
- यद्यपि भारत ने वर्ष 2026 में यूरोपीय संघ के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते में CBAM के संदर्भ में ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN)’ प्रावधान प्राप्त किया, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि उसके साथ अन्य साझेदारों की तुलना में कम अनुकूल व्यवहार न किया जाए, फिर भी वास्तविक लाभ अनिश्चित बने हुए हैं, क्योंकि कार्बन-सम्बंधित विशिष्ट छूट प्रदान नहीं की गई हैं।
- परिणामस्वरूप, भारतीय निर्यातक ठोस कानूनी संरक्षण उपायों के स्थान पर निरंतर चल रहे 'तकनीकी संवादों' पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं, जिससे पश्चिमी बाज़ारों में पारंपरिक उत्पादन की प्रतिस्पर्द्धात्मता प्रभावित हो सकती है।
- यद्यपि भारत कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (CCUS) तथा ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों की ओर अग्रसर है, फिर भी इस हरित संक्रमण की लागत सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) तथा भारी उद्योगों दोनों के लिये एक महत्त्वपूर्ण संरचनात्मक अवरोध बनी हुई है।
- यद्यपि भारत ने वर्ष 2026 में यूरोपीय संघ के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते में CBAM के संदर्भ में ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन (MFN)’ प्रावधान प्राप्त किया, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि उसके साथ अन्य साझेदारों की तुलना में कम अनुकूल व्यवहार न किया जाए, फिर भी वास्तविक लाभ अनिश्चित बने हुए हैं, क्योंकि कार्बन-सम्बंधित विशिष्ट छूट प्रदान नहीं की गई हैं।
- MSME ऋण की कमी तथा पूंजीगत बाधाएँ: सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) विनिर्माण आपूर्ति शृंखला की आधारशिला हैं, किंतु वे निरंतर औपचारिक ऋण की कमी से जूझ रहे हैं।
- परंपरागत बैंकिंग प्रणाली का अत्यधिक उधार-आधारित ऋणों पर निर्भर होना, अनौपचारिक निर्माताओं के व्यापक वर्ग को अपने परिचालन विस्तार से वंचित करता है।
- भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत का MSME क्षेत्र अभी भी एक बड़े ऋण अंतराल से ग्रस्त है, जिसका अनुमान लगभग 24% अथवा ₹30 लाख करोड़ है।
- यद्यपि बिना गारंटी ऋण सीमा को बढ़ाकर ₹20 लाख कर दिया गया है, फिर भी लाखों इकाइयाँ अनौपचारिक ऋणदाताओं पर निर्भर हैं, जो अत्यधिक वार्षिक ब्याज दरें आरोपित करते हैं।
- निजी क्षेत्र में R&D की कमी तथा नवाचार अंतराल: भारत का विनिर्माण आधार पहले से ही स्वदेशी डिज़ाइन के स्थान पर कम लागत वाली असेंबली तथा मूलभूत प्रौद्योगिकी को ज़्यादा प्राथमिकता देता है, जिससे प्रौद्योगिकी में लगातार रुकावट आती है।
- R&D में निजी क्षेत्र के निवेश की गंभीर कमी, घरेलू उद्योग को वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं के उच्च-मूल्य वाले केंद्रों पर अपनी स्थिति स्थापित करने से रोकती है।
- अनुसंधान एवं विकास पर सकल व्यय ऐतिहासिक रूप से GDP के लगभग 0.64% के स्तर पर स्थिर है, जिसमें निजी क्षेत्र का योगदान वैश्विक समकक्षों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से बहुत कम है।
- परिणामस्वरूप, भारतीय विनिर्माता संरचनात्मक रूप से विदेशी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर निर्भर रहते हैं, जिससे उन्नत सामग्रियों जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में स्वदेशी नवाचार गंभीर रूप से बाधित होता है।
- कौशल अंतराल और उद्योग 4.0 का संक्रमण: व्यापक जनसांख्यिकीय लाभांश के बावजूद भारत का विनिर्माण क्षेत्र गंभीर गुणात्मक कौशल असंतुलन से जूझ रहा है, क्योंकि स्वचालन के लिये हाइब्रिड तकनीकी-यांत्रिक दक्षताओं की आवश्यकता होती है।
- परंपरागत व्यावसायिक संस्थान ऐसे स्नातकों को तैयार करने में असफल रहे हैं, जो उन्नत डिजिटल फैक्ट्री परिवेश में त्वरित रूप से रोज़गार हेतु उपयुक्त हों।
- भारत में 80% से अधिक नियोक्ताओं ने कुशल पेशेवरों की उपलब्धता में गंभीर कठिनाइयों की सूचना दी है।
- उद्योग के अनुमानों के अनुसार, समग्र रोज़गार क्षमता लगभग 56% है, जिसमें B.Tech स्नातकों के लिये लगभग 70% तथा ITI अभ्यर्थियों के लिये लगभग 40% है, जो विभिन्न पाठ्यक्रमों के मध्य रोज़गार-तत्परता में अंतर को रेखांकित करता है तथा शिक्षा प्रणाली एवं उद्योग की आवश्यकताओं के बीच विद्यमान संरचनात्मक अंतर को दर्शाता है।
- परंपरागत व्यावसायिक संस्थान ऐसे स्नातकों को तैयार करने में असफल रहे हैं, जो उन्नत डिजिटल फैक्ट्री परिवेश में त्वरित रूप से रोज़गार हेतु उपयुक्त हों।
- नियामकीय जटिलता तथा अनुपालन बोझ: राज्य-स्तरीय अनुपालनों, पुरातन पर्यावरणीय स्वीकृतियों तथा कठोर परिचालन कानूनों की जटिल संरचना व्यवसाय करने की लागत को कृत्रिम रूप से बढ़ाती रहती है।
- यह नियामक बोझ विशेष रूप से मध्यम आकार के निर्माताओं को असमान रूप से प्रभावित करता है, जिससे वे अपने परिचालन के औपचारिकीकरण अथवा कार्यबल विस्तार से हतोत्साहित होते हैं।
- यद्यपि केंद्र सरकार द्वारा व्यापार में सुगमता (Ease of Doing Business) को प्रोत्साहित करने के प्रयास किये गए हैं, तथापि मध्यम आकार के औद्योगिक इकाइयों के स्वामी अभी भी प्रतिवर्ष सैकड़ों परस्पर संबंधित राज्य-स्तरीय अनुपालन दस्तावेज़ प्रस्तुत करने के लिये बाध्य हैं।
- इसके अतिरिक्त, सभी राज्यों में केंद्रीकृत श्रम संहिताओं के विलंबित क्रियान्वयन के कारण कानूनी अनिश्चितता बनी हुई है, जो श्रम-प्रधान विनिर्माण केंद्रों के तीव्र विस्तार को गंभीर रूप से बाधित कर रही है।
- भूमि अधिग्रहण तथा परियोजना विलंब: बहुआयामी परिवहन केंद्रों के समीप स्थित विवादमुक्त तथा निरंतर औद्योगिक भूमि की अनुपलब्धता, मेगा-फैक्ट्रियों की स्थापना हेतु एक प्रमुख संरचनात्मक बाधा बनी हुई है।
- दीर्घकालिक कानूनी अधिग्रहण प्रक्रियाएँ तथा भूमि स्वामित्व के अत्यधिक खंडित अभिलेख, परियोजनाओं की निर्माण अवधि को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाते हैं तथा बड़े स्तर पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को सक्रिय रूप से हतोत्साहित करते हैं।
- जटिल भूमि अधिग्रहण तंत्र के कारण, भारी विनिर्माण परियोजनाएँ प्रायः वर्षों तक चलने वाली सक्रिय मुकदमेबाज़ी तथा पूंजीगत लागत में वृद्धि का सामना करती हैं।
- आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, वृहद अवसंरचना परियोजनाओं में होने वाली लगभग 35% देरी का प्रमुख कारण भूमि अधिग्रहण से संबंधित अनसुलझे मुद्दे हैं।
भारत के विनिर्माण क्षेत्र को सशक्त बनाने हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?
- उत्पादन प्रक्रिया के प्रारंभिक घटकों का स्वदेशीकरण और खनिज सुरक्षा: वास्तविक विनिर्माण आत्मनिर्भरता प्राप्त करने हेतु केवल अंतिम चरण के संयोजन से आगे बढ़कर प्रारंभिक उत्पादन घटकों एवं कच्चे माल के गहन स्वदेशीकरण की दिशा में रणनीतिक परिवर्तन आवश्यक है।
- नीति-निर्माताओं को आत्मनिर्भर संसाधन कोष की स्थापना करने तथा उच्च-प्रौद्योगिकी क्षेत्रों हेतु आवश्यक दुर्लभ मृदा तत्त्वों एवं महत्त्वपूर्ण खनिजों तक निर्बाध पहुँच सुनिश्चित करने के लिये रणनीतिक द्विपक्षीय साझेदारियाँ विकसित करनी होंगी।
- घरेलू स्तर पर धातु प्रगालन, शोधन तथा आधारभूत रसायनों के उत्पादन को प्रोत्साहन देने से संपूर्ण औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को आकस्मिक भू-राजनीतिक आपूर्ति झटकों से सुरक्षित किया जा सकेगा।
- यह गहन स्थानीयकरण रणनीति अर्थव्यवस्था को आयात-निर्भरता की संवेदनशील स्थिति से निकालकर एक मज़बूत, ऊर्ध्वाधर रूप से एकीकृत विनिर्माण शक्ति में रूपांतरित कर सकती है।
- विवाद समाधान तथा नियामक जटिलता में सुधार: एक अत्यंत अनुकूल निवेश वातावरण सुनिश्चित करने हेतु व्यवसाय की परिचालन लागत को कम करने के लिये राज्य एवं केंद्रीय स्तर के अतिव्यापी नियामक बोझ को आक्रामक रूप से कम करना अनिवार्य है।
- वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) तंत्रों से युक्त त्वरित एवं समर्पित वाणिज्यिक न्यायालयों की स्थापना से परियोजना प्रारंभिक चरण तथा अनुबंध प्रवर्तन से संबंधित अनिश्चितताओं में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
- इसके अतिरिक्त, बहु-पोर्टल आधारित जटिल अनुपालन प्रणाली से एक वास्तविक एकीकृत, एल्गोरिथम-आधारित सिंगल-विंडो क्लीयरेंस सिस्टम की ओर संक्रमण से नौकरशाही अक्षमताओं का उन्मूलन होगा तथा भूमि अधिग्रहण प्रक्रियाएँ अधिक सुव्यवस्थित होंगी।
- वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) तंत्रों से युक्त त्वरित एवं समर्पित वाणिज्यिक न्यायालयों की स्थापना से परियोजना प्रारंभिक चरण तथा अनुबंध प्रवर्तन से संबंधित अनिश्चितताओं में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।
- डीप-टेक R&D का व्यावसायीकरण तथा अकादमिक समन्वय: निम्न-मूल्य असेंबली जाल से बाहर निकलने के लिये यह आवश्यक है कि निजी क्षेत्र के अनुसंधान एवं विकास (R&D) को प्रोत्साहन देने, वित्तपोषण करने तथा अंततः उसे स्वामित्वयुक्त बौद्धिक संपदा (IP) में व्यावसायीकृत करने के तरीके में एक मौलिक प्रतिमान परिवर्तन (paradigm shift) किया जाए।
- राज्य को प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों, राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं तथा निजी विनिर्माण समूहों के बीच मज़बूत, परिणाम-आधारित (outcome-driven) कंसोर्टियम स्थापित करने की सुविधा प्रदान करनी चाहिये, ताकि वे मिलकर अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों का सह-विकास कर सकें।
- अनुप्रयुक्त अनुसंधान हेतु बढ़े हुए भारित कर कटौती (weighted tax deductions) प्रदान करना तथा साझा, ओपन-एक्सेस प्रोटोटाइपिंग सुविधाएँ विकसित करना मध्यम उद्यमों के लिये उन्नत नवाचार को लोकतांत्रिक बनाएगा।
- मौलिक अनुसंधान को व्यावसायीकृत पेटेंट्स में रूपांतरित करने हेतु सक्रिय वित्तपोषण के माध्यम से यह क्षेत्र संरचनात्मक रूप से वैश्विक मूल्य शृंखला (global value chain) में उच्च स्तर पर अग्रसर हो सकता है।
- कैश फ्लो लेंडिंग के माध्यम से MSME ऋण का लोकतंत्रीकरण: ऋण की कमी से जूझ रहे MSME क्षेत्र को रूपांतरित करने हेतु पारंपरिक संपार्श्विक-आधारित ऋण प्रणाली से हटकर गतिशील, कैश फ्लो-आधारित अंडरराइटिंग मॉडल की ओर एक मौलिक संरचनात्मक परिवर्तन आवश्यक है।
- ओपन-बैंकिंग फ्रेमवर्क तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का उपयोग करते हुए, वित्तीय संस्थान वास्तविक समय लेनदेन डेटा के आधार पर मांग-आधारित, बिना गारंटी कार्यशील पूंजी उपलब्ध करा सकते हैं।
- इसके अतिरिक्त, उन्नत मशीनरी उन्नयन हेतु विशेष रूप से संरचित संप्रभु ऋण गारंटी ट्रस्ट फंड का विस्तार संस्थागत जोखिम को वहन करेगा तथा उन्नत प्रौद्योगिकी अपनाने को प्रोत्साहित करेगा।
- यह वित्तीय औपचारिकीकरण सूक्ष्म उत्पादकों को अपने परिचालन का तीव्र विस्तार करने तथा जटिल, उच्च मात्रा वाले वैश्विक आपूर्ति नेटवर्क में सहज रूप से एकीकृत होने में सक्षम बनाएगा।
- ओपन-बैंकिंग फ्रेमवर्क तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का उपयोग करते हुए, वित्तीय संस्थान वास्तविक समय लेनदेन डेटा के आधार पर मांग-आधारित, बिना गारंटी कार्यशील पूंजी उपलब्ध करा सकते हैं।
- उद्योग-नेतृत्वित प्रशिक्षण तथा संज्ञानात्मक कौशल पारिस्थितिकी तंत्र: गुणात्मक कौशल की गंभीर कमी को दूर करने हेतु पारंपरिक स्थिर व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को संज्ञानात्मक एवं डिजिटल दक्षताओं पर केंद्रित, उद्योग-नेतृत्व वाले तथा अत्यधिक प्रतिक्रियाशील शिक्षुता ढाँचों से प्रतिस्थापित करना आवश्यक है।
- उद्यम-स्तरीय प्रशिक्षण कार्यक्रमों को सब्सिडी प्रदान करने से निर्माताओं को रोबोटिक्स, IoT तथा सटीक इंजीनियरिंग में दक्ष उच्च-विशिष्ट कार्यबल के सह-निर्माण में सक्रिय भागीदारी हेतु प्रोत्साहन मिलेगा।
- विशेष औद्योगिक गलियारों के अंतर्गत विकेंद्रीकृत उत्कृष्टता केंद्रों (Centers of Excellence) की स्थापना से निरंतर कौशल उन्नयन सुनिश्चित होगा तथा स्थानीय प्रतिभा को कारखानों की तात्कालिक आवश्यकताओं के साथ सीधे जोड़ा जा सकेगा।
- शैक्षणिक परिणामों एवं उद्योग 4.0 की मांगों के मध्य यह संरचनात्मक सामंजस्य जनसांख्यिकीय लाभांश के अधिकतम उपयोग तथा श्रम उत्पादकता में वृद्धि के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
- भू-रणनीतिक मुक्त व्यापार समझौते और मूल्य शृंखला एकीकरण: निर्यात क्षमता को अधिकतम करने हेतु व्यापार नीति का एक रणनीतिक पुनर्मूल्यांकन आवश्यक है, जिसमें उच्च आय वाले उपभोक्ता बाज़ारों तथा रणनीतिक साझेदारों के साथ नई पीढ़ी के मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर केंद्रित वार्ता शामिल हो।
- इन समझौतों को केवल शुल्क कटौती तक सीमित न रखते हुए, वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में गहन एकीकरण सुनिश्चित करने के लिये मानकों की पारस्परिक मान्यता, डिजिटल व्यापार प्रोटोकॉल तथा निर्बाध सीमा-पार डेटा प्रवाह जैसे आयामों को समाहित करना होगा।
- साथ ही स्वदेशी उत्पादों की गुणवत्ता, सुरक्षा एवं वैश्विक स्वीकार्यता को सुदृढ़ करने हेतु घरेलू मानकों का अंतर्राष्ट्रीय मानकों के साथ कठोर सामंजस्य आवश्यक है।
- यह बाह्य-उन्मुख, मानक-आधारित दृष्टिकोण भारतीय निर्माताओं के लिये दीर्घकालिक एवं स्थिर सोर्सिंग अनुबंधों को सुनिश्चित करेगा।
- प्लग-एंड-प्ले बहु-माध्यमीय औद्योगिक मेगाज़ोन: स्थानीय अवसंरचना बाधाओं तथा भूमि अधिग्रहण गतिरोध को दूर करने हेतु राज्य को सक्रिय रूप से संप्रभु समर्थित प्लग-एंड-प्ले मेगाज़ोन विकसित करने होंगे, जो गहरे पानी के बंदरगाहों तथा समर्पित माल ढुलाई गलियारों के निकट रणनीतिक रूप से स्थित हों।
- इन क्षेत्रों में पूर्व-स्वीकृत पर्यावरणीय अनुमोदन, निर्बाध हरित ऊर्जा आपूर्ति तथा कारखाने के द्वार से सीधे विश्वस्तरीय एकीकृत बहु-माध्यमीय लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी उपलब्ध होनी चाहिये।
- राज्य की भूमिका को केवल नियामक से परिवर्तित एक व्यापक अवसंरचना सेवा प्रदाता के रूप में रूपांतरित करना होगा, जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिये बाज़ार-प्रवेश समय (time-to-market) में भारी कमी आएगी।
- संबद्ध उद्योगों का यह स्थानिक संकेंद्रण स्वाभाविक रूप से उच्च दक्षता वाले विनिर्माण क्लस्टर, सहयोगी आपूर्ति नेटवर्क तथा वृहद स्तर की अर्थव्यवस्थाओं को प्रोत्साहित करेगा।
निष्कर्ष:
भारत को वैश्विक विनिर्माण शक्ति के रूप में उभरने के लिये मात्र असेंबली-आधारित उत्पादन से आगे बढ़कर उच्च-स्तरीय स्वदेशीकरण की दिशा में समन्वित परिवर्तन करना होगा। फ्रेंड-शोरिंग (विदेशी कंपनियों से सहयोग) प्रवृत्तियों का लाभ उठाते हुए तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को हरित ऊर्जा के साथ एकीकृत करके, देश अपनी दीर्घकालिक संरचनात्मक बाधाओं को दूर कर सकता है। अंततः सफलता राज्य-स्तरीय नियामक ढाँचों को वैश्विक मानकों के साथ सामंजस्य स्थापित करने पर निर्भर करेगी ताकि दीर्घकालिक औद्योगिक अनुकूलन सुनिश्चित किया जा सके।
|
दृष्टि मेन्स प्रश्न ‘दक्षता-आधारित वैश्वीकरण से भू-राजनीति-प्रेरित वैश्वीकरण की ओर हो रहा परिवर्तन भारत के विनिर्माण क्षेत्र के लिये एक विशेष अवसर प्रस्तुत करता है।’ इस परिवर्तन का लाभ उठाने के लिये आवश्यक संरचनात्मक सुधारों पर चर्चा कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. PLI योजना का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करना, वैश्विक निवेश आकर्षित करना तथा भारत को निर्यात-उन्मुख विनिर्माण केंद्र के रूप में विकसित करना।
2. ‘चीन+1’ रणनीति से भारत को क्या लाभ होता है?
यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों को चीन से परे अपनी आपूर्ति शृंखलाओं में विविधीकरण करने हेतु प्रेरित करती है, जिससे आईफोन जैसे उच्च-स्तरीय उत्पादन का भारत में आगमन संभव होता है।
3. इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन का क्या महत्त्व है?
इसका उद्देश्य तकनीकी और औद्योगिक संप्रभुता सुनिश्चित करने के लिये चिप निर्माण और परीक्षण के लिये एक घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित करना है।
4. CBAM क्या है और यह चिंता का विषय क्यों है?
कार्बन सीमा समायोजन तंत्र एक यूरोपीय संघ (EU) द्वारा लगाया गया कर है, जो इस्पात जैसे कार्बन-गहन आयातों पर लागू होता है, जिससे भारतीय निर्यात प्रभावित हो सकते हैं।
5. पीएम गति शक्ति विनिर्माण क्षेत्र को किस प्रकार सहायता प्रदान करती है?
यह लॉजिस्टिक्स लागत को कम करने और कारखानों से बंदरगाहों तक माल ढुलाई को तीव्र करने के लिये बहु-माध्यमीय परिवहन को एकीकृत करता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा विगत वर्ष के प्रश्न:(PYQ)
प्रिलिम्स:
प्रश्न. 'आठ मूल उद्योगों के सूचकांक (इंडेक्स ऑफ एट कोर इंडस्ट्रीज़)' में निम्नलिखित में से किसको सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है? (2015)
(a) कोयला उत्पादन
(b) विद्युत उत्पादन
(c) उर्वरक उत्पादन
(d) इस्पात उत्पादन
उत्तर: (b)
मेन्स:
प्रश्न. "सुधार के बाद की अवधि में औद्योगिक विकास दर सकल-घरेलू-उत्पाद (जीडीपी) की समग्र वृद्धि से पीछे रह गई है" कारण बताइये। औद्योगिक नीति में हालिया बदलाव औद्योगिक विकास दर को बढ़ाने में कहाँ तक सक्षम हैं? (2017)
प्रश्न. आम तौर पर देश कृषि से उद्योग और फिर बाद में सेवाओं की ओर स्थानांतरित हो जाते हैं, लेकिन भारत सीधे कृषि से सेवाओं की ओर स्थानांतरित हो गया। देश में उद्योग की तुलना में सेवाओं की भारी वृद्धि के क्या कारण हैं? क्या मज़बूत औद्योगिक आधार के बिना भारत एक विकसित देश बन सकता है? (2014)