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भारत में अधिकरणों में सुधार

  • 28 Feb 2026
  • 106 min read

स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स

चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने अधिकरणों के कामकाज, जवाबदेही और संरचनात्मक कमियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है तथा नियुक्तियों और संचालन में प्रणालीगत खामियों के कारण उन्हें ‘दायित्व’ (liability) और ‘अव्यवस्था’ (mess) बताते हुए उनकी कड़ी आलोचना की है।

सारांश

  • अधिकरणों को नियुक्तियों और कार्यकाल पर अत्यधिक कार्यकारी नियंत्रण का सामना करना पड़ता है, जिससे न्यायिक स्वतंत्रता कमज़ोर होती है ।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ जैसे मामलों के माध्यम से बुनियादी संरचना के हिस्से के रूप में उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र की रक्षा की है।
  • जवाबदेही सुनिश्चित करने और बाहरी हस्तक्षेप से बचाव के लिये एक स्वतंत्र राष्ट्रीय अधिकरण आयोग (NTC) की स्थापना करना महत्त्वपूर्ण है।

अधिकरणों के कामकाज में कौन-सी प्रणालीगत समस्याएँ मौजूद हैं?

  • जवाबदेही का अभाव: अधिकरणों में जवाबदेही का गंभीर अभाव है। सर्वोच्च न्यायालय ने इन अधिकरणों को 'निर्दलीय क्षेत्र (no-man's land)' बताया है, जो राष्ट्रीय हित के विरुद्ध है, क्योंकि ये किसी भी प्राधिकरण के प्रति जवाबदेह नहीं हैं। यह स्थिति निगरानी में एक बड़ा अभाव उत्पन्न करती है।
  • न्यायिक व्यवस्था में अनियमितता: न्यायिक अनुशासन में भारी कमी आई है, जिसके परिणामस्वरूप कई अभूतपूर्व समस्याएँ सामने आई हैं। एक गंभीर अनियमितता यह है कि तकनीकी सदस्य, न्यायिक सदस्यों को 'निर्णय लिखने का कार्य सौंप रहे हैं'। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि किसी और के नाम पर निर्णय लिखवाने के लिये ब्लैकमेल करने के मामले भी सामने आए हैं। ये घटनाएँ न्यायिक प्रणाली में पहले कभी नहीं देखी गईं, जो न्यायिक व्यवस्था में एक अभूतपूर्व संकट को दर्शाती हैं।
    • अधिकरणों द्वारा दोषपूर्ण ढंग से लिखे गए आदेशों के परिणामस्वरूप, सर्वोच्च न्यायालय को महत्त्वपूर्ण मामलों से हटकर त्रुटियों को सुधारने में समय व्यतीत करना पड़ता है, जिससे न्यायालय का बहुमूल्य समय प्रभावित होता है।
  • विशेषज्ञता की कमी: अधिकरणों में नियुक्त तकनीकी सदस्यों के पास अक्सर जटिल मामलों का निर्णय करने के लिये अपेक्षित विशेषज्ञता का अभाव होता है। ऐसा इसलिये है, क्योंकि वे पर्यावरण कानून, कंपनी कानून और शोधन अक्षमता संबंधी कानूनों जैसे क्षेत्रों को नहीं समझते हैं। इस कमी के कारण, विशेष अधिकरणों के गठन का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।
  • रिक्तियाँ और लंबित मामले: सरकार द्वारा रिक्तियों को समय पर न भरने के कारण, महत्त्वपूर्ण  अर्द्ध-न्यायिक निकायों के कामकाज में उत्पन्न होने वाली बाधाओं को रोकने के लिये, सर्वोच्च न्यायालय को ऐसे मामलों की समय-सीमा बढ़ाने हेतु बाध्य होना पड़ता है, जो वह सामान्यतः नहीं बढ़ाता। उदाहरण के लिये, सशस्त्र बल अधिकरणों की 11 पीठों में लगभग 38,000 मामले लंबित हैं, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाते हैं।
    • भारत के वाणिज्यिक अधिकरण एक गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं, 356,000 मामलों का बढ़ता बैकलॉग, जिनकी कुल लागत 24.7 लाख करोड़ रुपये आँकी गई है। यह राशि वर्ष 2024-25 के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 7.5% है।
  • कार्यपालिका का प्रभुत्व: अधिकरणों के सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल, वेतन, सेवा-शर्तों और पद से हटाने पर कार्यपालिका का नियंत्रण रहता है। इससे शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के साथ न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
    • सरकार अनेक अधिकरणों (जैसे- सेवा, कर और प्रशासनिक मामलों से संबंधित) में प्रमुख वादी होती है, जिससे यह चिंता उत्पन्न होती है कि जब कार्यपालिका द्वारा अधिकरणों के कार्यकरण को प्रभावित किया जाता है तो निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
  • अधिकार क्षेत्र का अतिव्यापन और अधिकरणों पर अधिक निर्भरता संबंधी चिंता: विभिन्न अधिकरणों (उदाहरणतः NCLAT और अन्य अपीलीय निकाय) के बीच अधिकार क्षेत्र का अतिव्यापन होने के साथ अधिकरणों की अत्यधिक वृद्धि से नियमित न्यायालयों के प्राधिकार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में बार-बार अपीलों से अधिकरणों के निर्णय कमज़ोर होते हैं

अधिकरण

  • परिचय: अधिकरण, विशिष्ट प्रकार के विवादों के निपटारे हेतु विधि द्वारा गठित अर्द्ध-न्यायिक निकाय हैं। ये पारंपरिक न्यायायिक प्रणाली के विकल्प के रूप में भूमिका निभाते हैं।
    • इनका उद्देश्य प्रशासनिक सेवा संबंधी मामलों, कराधान, पर्यावरण, श्रम, कॉरपोरेट मामलों तथा अन्य तकनीकी या नियामक विषयों जैसे विशेष क्षेत्रों में त्वरित, किफायती तथा विशेषज्ञ समाधान प्रदान करना है।
  • संवैधानिक आधार: 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से अधिकरणों को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुई। इसके द्वारा संविधान में अनुच्छेद 323A और अनुच्छेद 323B के साथ एक नया भाग (XIV-A) जोड़ा गया।
    • अनुच्छेद 323A: इसके तहत संसद को लोक सेवकों के सेवा संबंधी मामलों हेतु प्रशासनिक अधिकरण गठित करने का अधिकार प्राप्त है।
    • अनुच्छेद 323B: इसके तहत संसद तथा राज्य विधानमंडलों को कराधान, भूमि सुधार एवं निर्वाचन जैसे विशिष्ट विषयों हेतु अधिकरण गठित करने का अधिकार प्राप्त है।
  • अधिकरणों की प्रमुख विशेषताएँ: 
    • अर्द्ध-न्यायिक स्वरूप: ये न्यायिक कार्य करते हैं, किंतु पूर्णरूप से न्यायालय नहीं होते हैं।
    • विशेषीकृत संघटन: अधिकरणों में सामान्यतः न्यायिक सदस्यों (अक्सर कार्यरत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश) के साथ विषय-विशिष्ट ज्ञान रखने वाले तकनीकी/विशेषज्ञ सदस्य शामिल होते हैं।
    • सीमित अधिकार क्षेत्र: प्रत्येक अधिकरण एक निर्धारित विषय क्षेत्र तक सीमित होता है, जबकि दीवानी या फौजदारी न्यायालयों का अधिकार क्षेत्र व्यापक होता है।
    • प्रक्रियात्मक लचीलापन: अधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 या भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 से बंधे होने की बजाय मामलों के त्वरित निपटान हेतु सरल और कम औपचारिक प्रक्रियाएँ अपनाते हैं।
    • आदेश अंतिम होने के साथ अपीलीय पर्यवेक्षण की सुविधा: इनके निर्णय सामान्यतः बाध्यकारी होते हैं, किंतु वैधानिक प्रावधानों के अधीन उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। इसके साथ ही अनुच्छेद 226/227 तथा 32/136 के अंतर्गत न्यायिक पुनरावलोकन की सुविधा उपलब्ध रहती है।
  • नियमित न्यायालयों से भिन्नता: नियमित न्यायालय अनुच्छेद 214–231 के अंतर्गत एकीकृत न्यायपालिका का हिस्सा होते हैं। इनमें अंतर्निहित न्यायिक शक्तियाँ होने के साथ ये कठोर प्रक्रियात्मक विधियों का पालन करते हैं तथा दीवानी, फौजदारी और संवैधानिक मामलों से संबंधित व्यापक मामलों का समाधान करते हैं। इसके विपरीत, अधिकरण वैधानिक निकाय होते हैं, जिनका अधिकार क्षेत्र विशेष और सीमित होने के साथ इनकी प्रक्रियाएँ लचीली होती हैं तथा इनमें न्यायिक एवं विशेषज्ञ निर्णय प्रक्रिया का समन्वय होता है।

अधिकरण पर सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय क्या हैं?

ऐतिहासिक निर्णयों की एक शृंखला के माध्यम से, सर्वोच्च न्यायालय ने भारत में अधिकरण प्रणाली को महत्त्वपूर्ण रूप से आकार दिया है।

  • एस.पी. संपत कुमार मामला (1986): न्यायालय ने कहा कि अधिकरण उच्च न्यायालयों के संवैधानिक रूप से मान्य विकल्प के रूप में कार्य कर सकते हैं, बशर्ते उनमें उच्च न्यायालय के समान प्रभावकारिता हो। इसने यह भी अनिवार्य किया कि नियुक्तियाँ या तो भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के परामर्श से केंद्र सरकार द्वारा या उच्चतम न्यायालय/उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली उच्च-स्तरीय समिति द्वारा की जाएँ।
  • एल. चंद्र कुमार केस (1997): इसने घोषित किया कि उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद 226/227 के तहत) और सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32 के तहत) के अधिकार क्षेत्र को बाहर करने वाले खंड असंवैधानिक हैं, क्योंकि वे बुनियादी ढाँचे का उल्लंघन करते हैं। महत्त्वपूर्ण रूप से, इसने कहा कि उच्च न्यायालयों के स्थान पर कार्य करने वाले अधिकरणों में केवल न्यायिक अनुभव वाले व्यक्तियों को नियुक्त किया जाना चाहिये।
  • आर. गांधी मामला (2010): न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी भी पीठ में तकनीकी सदस्यों की संख्या न्यायिक सदस्यों से अधिक नहीं होनी चाहिये। इसने यह भी निर्दिष्ट किया कि यदि कोई अधिकरण केवल शीघ्र निपटान के लिये है, तो तकनीकी सदस्य की आवश्यकता नहीं हो सकती है और कोई भी नियुक्त तकनीकी सदस्य विशिष्ट ज्ञान के साथ सचिव-स्तर का होना चाहिये।
  • रोज़र मैथ्यू मामला (2019): इसने कार्यपालिका के नेतृत्व वाले निष्कासन संबंधी प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित किया और सभी अधिकरण सदस्यों के लिये एक समान सेवानिवृत्ति की आयु का आह्वान किया। इसने यह भी नोट किया कि छोटा कार्यकाल कार्यपालिका के नियंत्रण को बढ़ाता है और न्यायिक स्वतंत्रता को कमज़ोर करता है।
  • मद्रास बार एसोसिएशन मामला (2020): उच्चतम न्यायालय ने अधिकरणों में नियुक्तियों और प्रशासन के केंद्रीकृत पर्यवेक्षण के लिये एक राष्ट्रीय अधिकरण आयोग (NTC) स्थापित करने की आवश्यकता दोहराई। इसने सदस्यों के कार्यकाल को पाँच वर्ष तक बढ़ाने (वर्तमान 4-वर्षीय कार्यकाल को 2025 में सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था) और सेवानिवृत्ति की आयु 67 वर्ष करने का भी समर्थन किया।
  • मद्रास बार एसोसिएशन मामला (2025): सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 की कई धाराओं को रद्द कर दिया, जिसमें एक निश्चित 4-वर्षीय कार्यकाल और 50 वर्ष की न्यूनतम आयु शामिल है।
    • कार्यपालिका के विवेक को नियंत्रित करने के लिये, न्यायालय ने खोज-सह-चयन समिति को प्रति पद हेतु  केवल एक नाम की सिफारिश करने का निर्देश दिया।

अधिकरणों में सुधार के लिये आवश्यक कदम क्या हैं?

  • राष्ट्रीय अधिकरण आयोग (NTC) की स्थापना: सभी अधिकरणों के लिये एक स्वतंत्र और केंद्रीकृत निगरानी निकाय स्थापित किया जाए, जो नियुक्तियों, प्रशासन, प्रदर्शन मूल्यांकन, अवसंरचना तथा वित्तपोषण के लिये उत्तरदायी हो। यह व्यवस्था मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ के निर्णय के अनुरूप होगी। इससे पारदर्शिता, एकरूपता सुनिश्चित होगी तथा अधिकरणों को कार्यपालिका के नियंत्रण से पर्याप्त रूप से मुक्त रखा जा सकेगा।
  • संरचना में न्यायिक स्वतंत्रता: न्यायिक सदस्यों के रूप में केवल ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति की जाए, जिनके पास न्यायिक अनुभव या उपयुक्त विधिक विशेषज्ञता हो। साथ ही, उनकी पद से हटाने की प्रक्रिया कार्यपालिका के विवेक पर आधारित न होकर, न्यायिक पर्यवेक्षण के साथ विधि-सम्मत प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिये।
  • न्यायालय के बाध्यकारी निर्देशों का कार्यान्वयन: सरकार को पूर्ववर्ती न्यायिक निर्णयों में निर्धारित सिद्धांतों का कठोरता से पालन करना चाहिये और ऐसे नए कानून पारित नहीं करने चाहियें, जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पहले ही निरस्त किये जा चुके नियमों को पुनः लागू करने का प्रयास करें।
    • जब तक राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग की स्थापना नहीं हो जाती, तब तक न्यायाधिकरण के सदस्यों की सभी नियुक्तियाँ और सेवा-शर्तें संबंधित मूल अधिनियमों तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों के अनुसार ही संचालित होंगी।
  • रिक्तियों, लंबित मामलों और अवसंरचना से संबंधित चुनौतियों का समाधान: न्यायाधिकरणों के प्रभावी संचालन हेतु दीर्घकालिक रिक्तियों को पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से शीघ्र भरा जाना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने के लिये भारत की संचित निधि पर आरोपित पर्याप्त और समर्पित वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहियें, ताकि आधुनिक अवसंरचना, डिजिटलीकरण, इलेक्ट्रॉनिक केस प्रबंधन तथा क्षेत्रीय पीठों की स्थापना को सुदृढ़ किया जा सके।

निष्कर्ष

त्वरित न्याय प्रदान करने के उद्देश्य से स्थापित न्यायाधिकरण प्रणाली आज कार्यपालिका के अतिक्रमण, न्यायिक कदाचार और जवाबदेही की कमी जैसी समस्याओं से ग्रस्त है। यद्यपि सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक पुनरावलोकन को संविधान की मूल संरचना के रूप में निरंतर संरक्षित किया है, किंतु वास्तविक सुधार के लिये एक स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग (NTC) की स्थापना आवश्यक है, ताकि कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त रहते हुए न्यायाधिकरणों की प्रभावशीलता और कार्यकुशलता सुनिश्चित की जा सके।

दृष्टि मेन्स प्रश्न:

प्रश्न. "भारत में न्यायाधिकरणों की स्थापना त्वरित और विशेषज्ञ न्याय प्रदान करने के लिये की गई थी, किंतु कार्यपालिका के अतिक्रमण के कारण वे एक ‘दायित्व’ बन गए हैं।" हाल के सर्वोच्च न्यायालय के अवलोकनों के आलोक में इस कथन का परीक्षण कीजिये।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. भारत में अधिकरण का संवैधानिक आधार क्या है?
अधिकरण को संवैधानिक दर्जा 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 से मिला है, जिसमें भाग XIV-A के तहत अनुच्छेद 323A और 323B जोड़े गए हैं।

2. प्रस्तावित 'राष्ट्रीय अधिकरण आयोग' (NTC) क्या है?
राष्ट्रीय अधिकरण आयोग (NTC) एक स्वतंत्र केंद्रीय संस्थान है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने प्रस्तावित किया है। इसका उद्देश्य सभी अधिकरणों की नियुक्ति, प्रशासन और संचालन की देखरेख करना है, ताकि उन्हें सरकारी कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त रखा जा सके तथा उनकी निष्पक्षता एवं प्रभावशीलता सुनिश्चित हो।

3. अधिकरण और नियमित न्यायालयों में अंतर क्या है?
अधिकरण वे वैधानिक, अर्द्ध-न्यायिक निकाय हैं, जिनका सीमित विषय-विशेषाधिकार होता है, प्रक्रियाएँ लचीली होती हैं और इनका गठन न्यायिक एवं तकनीकी विशेषज्ञों का मिश्रण होता है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स

प्रश्न. राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 भारत के संविधान के निम्नलिखित में से किस प्रावधान के अनुरूप बनाया गया था? (2012)

  1. स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक हिस्सा माना जाता है।
  2. अनुच्छेद 275(1) के अंतर्गत अनुसूचित जनजातियों के कल्याण हेतु अनुसूचित क्षेत्रों में प्रशासन का स्तर बढ़ाने हेतु अनुदान का प्रावधान। 
  3. अनुच्छेद 243(A) के तहत उल्लिखित ग्रामसभा की शक्तियाँ और कार्य।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1

(b) केवल 2 और 3 

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a)


मेन्स

प्रश्न. आप इस मत से कहाँ तक सहमत हैं कि अधिकरण सामान्य न्यायालयों की अधिकारिता को कम करते हैं? उपर्युक्त को दृष्टिगत रखते हुए भारत में अधिकरणों की संवैधानिक वैधता तथा सक्षमता की विवेचना कीजिये। (2018)

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