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राष्ट्रीय अधिकरण आयोग

  • 18 May 2021
  • 11 min read

यह एडिटोरियल दिनाँक 17/05/2021 को 'द हिंदू' में प्रकाशित लेख “Restructuring the tribunals system” पर आधारित है। यह राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग की स्थापना से जुड़े मुद्दों से संबंधित है।

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा अधिकरण सुधार (सुव्यवस्थीकरण और सेवा शर्तें) अध्यादेश [Tribunal Reforms (Rationalisation and Conditions of Service) Ordinance] प्रख्यापित किया गया है। इस अध्यादेश के माध्यम से केंद्र ने कई अपीलीय अधिकरणों को समाप्त कर दिया है और उनके अधिकार क्षेत्र को अन्य मौज़ूदा न्यायिक निकायों में स्थानांतरित कर दिया है।

इस अध्यादेश ने न केवल सामान्य विधायी प्रक्रिया को दरकिनार किया बल्कि इसमें हितधारकों के परामर्श के बिना फिल्म प्रमाणन अपीलीय अधिकरण जैसे कई अधिकरणों को समाप्त करने के प्रावधान किये गए हैं जिससे इस अध्यादेश को तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा है।

इसके अलावा यह पहली बार नहीं है जब केंद्र सरकार ने अधिकरणों के कामकाज में हस्तक्षेप करने की कोशिश की है, अधिकरणों के क्षेत्र में कार्यपालिका द्वारा पहले भी हस्तक्षेप होते रहे हैं जिसे शक्तियों के पृथक्करण के उल्लंघन के रूप में माना जा सकता है।

अधिकरणों की स्वतंत्रता से समझौता किये बिना उनके मामलों को विनियमित करने का एक तरीका राष्ट्रीय अधिकरण आयोग (National Tribunals Commission- NTC) की स्थापना करना है।

अधिकरण

  • यह एक अर्द्ध-न्यायिक संस्था (Quasi-Judicial Institution) है जिसे प्रशासनिक या कर-संबंधी विवादों को हल करने के लिये स्थापित किया जाता है।
  • यह विवादों के अधिनिर्णयन, संघर्षरत पक्षों के बीच अधिकारों के निर्धारण, प्रशासनिक निर्णयन, किसी विद्यमान प्रशासनिक निर्णय की समीक्षा जैसे विभिन्न कार्यों का निष्पादन करती है।
    • 'ट्रिब्यूनल' (Tribunal) शब्द की व्युत्पत्ति 'ट्रिब्यून' (Tribunes) शब्द से हुई है जो रोमन राजशाही और गणराज्य के अंतर्गत कुलीन मजिस्ट्रेटों की मनमानी कार्रवाई से नागरिकों की सुरक्षा करने के लिये एक आधिकारिक पद था।
    • सामान्य रूप से ट्रिब्यूनल का आशय ऐसे व्यक्ति या संस्था से है जिसके पास दावों व विवादों पर निर्णयन, अधिनिर्णयन या निर्धारण का प्राधिकार होता है, भले इसके नामकरण में ट्रिब्यूनल शब्द शामिल हो या ना हो।

संवैधानिक प्रावधान:

  • अधिकरण संबंधी प्रावधान मूल संविधान में नहीं थे।
  • इन्हें भारतीय संविधान में स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिशों पर 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा शामिल किया गया।
  • इस संशोधन के माध्यम से संविधान में अधिकरण से संबंधित एक नया भाग XIV-A और दो अनुच्छेद जोड़े गए:
    • अनुच्छेद 323A:
      • यह अनुच्छेद प्रशासनिक अधिकरण (Administrative Tribunal) से संबंधित है। ये अधिकरण अर्द्ध-न्यायिक होते हैं जो सार्वजनिक सेवा में काम कर रहे व्यक्तियों की भर्ती और सेवा शर्तों से संबंधित विवादों को हल करते हैं।
    • अनुच्छेद 323B:
      • यह अनुच्छेद अन्य विषयों जैसे कि कराधान, विदेशी मुद्रा, आयात और निर्यात, भूमि सुधार, खाद्य, संसद तथा राज्य विधानसभाओं के चुनाव आदि के लिये अधिकरणों की स्थापना से संबंधित है।

भारत में अधिकरणों की वर्तमान स्थिति

  • स्वतंत्रता का अभाव: विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी रिपोर्ट (रिफॉर्मिंग द ट्रिब्यूनल फ्रेमवर्क इन इंडिया) के अनुसार स्वतंत्रता की कमी भारत में अधिकरणों को प्रभावित करने वाले प्रमुख मुद्दों में से एक है।
    • प्रारंभ में चयन समितियों के माध्यम से नियुक्ति की व्यवस्था अधिकरणों की स्वतंत्रता को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
    • इसके अलावा पुनर्नियुक्ति के मुद्दे और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रवृत्ति भी अधिकरणों की स्वतंत्रता को प्रभावित करती है।
  • गैर-एकरूपता की समस्या: अधिकरणों में सेवा शर्तों, सदस्यों के कार्यकाल, विभिन्न न्यायाधिकरणों के प्रभारी नोडल मंत्रालयों के संबंध में गैर-एकरूपता की समस्या है।
    • ये कारक अधिकरणों के प्रबंधन और प्रशासन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • संस्थागत मुद्दे: अधिकरण के कामकाज में कार्यकारी हस्तक्षेप प्रायः इसके दिन-प्रतिदिन के कामकाज के लिये आवश्यक वित्त, बुनियादी ढाँचे, कर्मियों और अन्य संसाधनों के प्रावधान के रूप में देखा जाता है।

राष्ट्रीय अधिकरण आयोग और इसका प्रभाव

  • NTC का विचार सबसे पहले एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ मामले(1997) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रस्तुत किया गया था।
  • उद्देश्य: NTC की कल्पना अधिकरणों के कामकाज, सदस्यों की नियुक्ति और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही की निगरानी तथा ट्रिब्यूनल की प्रशासनिक एवं ढाँचागत जरूरतों का ध्यान रखने के लिये एक स्वतंत्र निकाय के रूप में की गई है।
  • एकरूपता: NTC सभी न्यायाधिकरणों में समान प्रशासन का समर्थन करेगा। यह ट्रिब्यूनल की दक्षता और उनकी अपनी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के लिये प्रदर्शन मानक निर्धारित कर सकता है।
  • शक्तियों का पृथक्करण सुनिश्चित करना: NTC को नियमों के अधीन सदस्यों के वेतन, भत्ते और अन्य सेवा शर्तों को निर्धारित करने का अधिकार देने से न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता बनाए रखने में मदद मिलेगी।
    • NTC विभिन्न न्यायाधिकरणों द्वारा किये गए प्रशासनिक और न्यायिक कार्यों को अलग करने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
  • सेवाओं का विस्तार: एक बोर्ड, एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) और एक सचिवालय से युक्त NTC की एक 'निगमीकृत' संरचना इसे अपनी सेवाओं को बढ़ाने और देश भर के सभी न्यायाधिकरणों को आवश्यक प्रशासनिक सहायता प्रदान करने की अनुमति देगी।
  • स्वायत्त निरीक्षण: NTC अनुशासनात्मक कार्यवाही और अधिकरण के सदस्यों की नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया को विकसित और संचालित करने के लिये एक स्वतंत्र भर्ती निकाय के रूप में कार्य कर सकता है।
    • एक NTC प्रभावी रूप से नियुक्ति प्रणाली में एकरूपता लाने में सक्षम होगा और यह सुनिश्चित करेगा कि यह स्वतंत्र तथा पारदर्शी हो।

आगे की राह:

  • कानूनी समर्थन: जवाबदेही शासन के लिये एक स्वतंत्र निरीक्षण निकाय विकसित करने हेतु एक कानूनी ढाँचे की आवश्यकता होती है जो इसकी स्वतंत्रता और निष्पक्षता की रक्षा करता है।
    • इसलिये NTC को एक संवैधानिक संशोधन के माध्यम से स्थापित किया जाना चाहिये या एक ऐसे क़ानून द्वारा समर्थित होना चाहिये जो इसे कार्यात्मक, परिचालन और वित्तीय स्वतंत्रता की गारंटी देता है।
  • राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) मुद्दे से सीख: NTC को अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने के लिये न्यायपालिका द्वारा निर्धारित मानकों का पालन करना होगा।
    • अत्यधिक कार्यकारी हस्तक्षेप के कारण, राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को न्यायपालिका की स्वतंत्रता बाधा उत्पन्न करने वाले निर्णय के रूप में देखा गया।
    • इस प्रकार कार्यपालिका के साथ-साथ बार (Bar) को भी प्रासंगिक हितधारक होने के नाते किसी भी NTC का एक हिस्सा बनना चाहिये लेकिन इस प्रक्रिया में न्यायिक सदस्यों को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।
  • पुनर्नियुक्ति की प्रक्रिया से दूरी बनाना: NTC को ट्रिब्यूनल की स्वतंत्रता पर इसके प्रभाव के कारण ट्रिब्यूनल सदस्यों की पुनर्नियुक्ति की प्रणाली को भी दूर करना चाहिये।

निष्कर्ष

  • यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि न्यायालयों से बढ़ते मामलों के बोझ को कम करने के लिये ट्रिब्यूनल की स्थापना की गई थी। भारत में न्यायाधिकरण प्रणाली में सुधार भी सदियों पुरानी समस्या का समाधान करने की कुंजी हो सकती है जो अभी भी भारतीय न्यायिक प्रणाली को न्यायिक देरी और बैकलॉग जैसी समस्याओं द्वारा पंगु बना देती है ।
  • इस संदर्भ में NTC की स्थापना निश्चित रूप से वर्तमान ट्रिब्यूनल सिस्टम के एक मौलिक पुनर्गठन को लागू करेगी।

अभ्यास प्रश्न- NTC की स्थापना निश्चित रूप से वर्तमान ट्रिब्यूनल सिस्टम के एक मौलिक पुनर्गठन को लागू करेगी। चर्चा कीजिये।

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