अंतर्राष्ट्रीय संबंध
पश्चिम एशिया में बढ़ता संकट
यह एडिटोरियल 04/03/2026 को द फाइनेंशियल एक्सप्रेस में प्रकाशित ‘Full-blown conflict in West Asia’ शीर्षक वाले लेख पर आधारित है। यह लेख ईरान पर अमेरिकी-इज़रायली हमलों और तेहरान द्वारा पूरे क्षेत्र में किये गए जवाबी हमलों के बाद पश्चिम एशिया में तेज़ी से बढ़ते संघर्ष पर प्रकाश डालता है, जिसने वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों को बाधित करना शुरू कर दिया है।
प्रिलिम्स के लिये: पश्चिम एशिया, ईरान पर अमेरिकी-इज़रायली हवाई हमले, साइक्स-पिकोट एग्रीमेंट, बाल्फोर घोषणा-पत्र, अमेरिका द्वारा ऑपरेशन एपिक फ्यूरी, इज़रायल द्वारा ऑपरेशन लॉयन्स रोर, भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा
मेन्स के लिये: पश्चिम एशियाई संकट की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, वर्तमान पश्चिम एशियाई संकट को बढ़ावा देने वाले कारक, पश्चिम एशियाई संघर्ष का भारत पर प्रभाव।
अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान पर किये गए हवाई हमलों के बाद पूरे क्षेत्र में मिसाइल तथा ड्रोन हमलों के रूप में प्रतिशोधात्मक कार्रवाइयाँ शुरू हो गई हैं, जिससे पश्चिम एशिया में भीषण संघर्ष छिड़ गया है। ईरान कतर, बहरीन और कुवैत में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बना रहा है, वहीं इज़रायल लेबनान में हिज़्बुल्लाह पर हमले कर रहा है। इस संघर्ष के प्रभाव से वैश्विक ऊर्जा बाज़ार पहले ही अस्थिर होने लगे हैं। ईरानी ड्रोन हमलों ने सऊदी अरब और कतर के तेल उत्पादन को बाधित कर दिया है, जिससे महत्त्वपूर्ण होर्मुज़़ जलडमरूमध्य के माध्यम से होने वाली तेल आपूर्ति पर भी खतरा बढ़ गया है। भारत, जो इस क्षेत्र में गहरे संबंध रखने वाला एक प्रमुख तेल आयातक देश है, के लिये इस संघर्ष के दाँव-पेंच अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। यदि यह संघर्ष लंबे समय तक चलता है तो यह सीधे भारत की ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों से आने वाली प्रेषण (Remittances) तथा समग्र आर्थिक स्थिरता के लिये गंभीर चुनौती बन सकता है।
पश्चिम एशियाई संकट की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या है?
- औपनिवेशिक विरासत: साइक्स-पिकोट और बाल्फोर (1916-1917): पश्चिमी एशिया का आधुनिक मानचित्र काफी हद तक प्रथम विश्व युद्ध के दौरान यूरोपीय शक्तियों द्वारा ओटोमन साम्राज्य के पतन के बाद तैयार किया गया था।
- ब्रिटेन और फ्राँस के बीच हुए गुप्त साइक्स-पिकोट एग्रीमेंट (1916) ने 'कृत्रिम सीमाएँ' बनाईं, जिन्होंने जातीय और धार्मिक वास्तविकताओं को नज़रअंदाज़ किया, जबकि बाल्फोर घोषणा-पत्र (1917) ने फिलिस्तीन में एक यहूदी राष्ट्रीय घर के लिये ब्रिटिश समर्थन व्यक्त किया।
- अरबों और यहूदियों दोनों से किया गया यह ‘दोहरी वचनबद्धता’ एक सदी के क्षेत्रीय विवादों की नींव बन गया, क्योंकि स्थानीय अरब आबादी ने अपनी भूमि को ब्रिटिश और फ्राँसीसी शासनादेशों में विभाजित किये जाने से स्वयं को धोखा महसूस किया।
- इज़रायल का गठन और 'नकबा' (1947-1948): द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, संयुक्त राष्ट्र विभाजन योजना (1947) (एक योजना जिसे अरब नेताओं ने अस्वीकार कर दिया) ने ब्रिटिश मैंडेट ऑफ फिलिस्तीन को अलग-अलग अरब और यहूदी राज्यों में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा।
- वर्ष 1948 में इज़रायल राज्य की घोषणा ने पहले अरब-इज़रायली युद्ध को जन्म दिया, जिसके कारण इज़रायल का क्षेत्रीय विस्तार हुआ तथा 700,000 फिलिस्तीनी विस्थापित हुए, इस घटना को नक़बा (अर्थात महाविपत्ति) के नाम से जाना जाता है।
- वर्ष 1949 के अंत तक मिस्र एवं जॉर्डन ने क्रमशः गाज़ा पट्टी और वेस्ट बैंक पर नियंत्रण कर लिया था।
- वर्ष 1979 का निर्णायक मोड़— इस्लामी क्रांति: वर्ष 1979 से पूर्व, ईरान के इज़रायल के साथ अपेक्षाकृत सौहार्दपूर्ण संबंध थे, हालाँकि, इस्लामी क्रांति ने ईरान को एक संशोधनवादी शक्ति और 'प्रतिरोध की धुरी' का वैचारिक नेतृत्वकर्त्ता बना दिया।
- अयातुल्ला खामेनेई के नेतृत्व वाली नई सरकार ने औपचारिक रूप से इज़रायल से संबंध तोड़ लिये, उसे 'लिटिल सैटन' करार दिया तथा इज़रायली और अमेरिकी प्रभाव का मुकाबला करने के लिये हिज़्बुल्लाह जैसे गैर-सरकारी संगठनों का समर्थन करना शुरू कर दिया।
- इस परिवर्तन ने ईरान-इज़रायल के बीच छाया युद्ध (Shadow War) को जन्म दिया, जिसमें साइबर युद्ध, परमाणु वैज्ञानिकों की हत्याएँ तथा लेबनान और सीरिया में प्रॉक्सी वॉर (परोक्ष संघर्ष) शामिल हैं। यही प्रतिस्पर्द्धा वर्तमान वर्ष 2026 के संकट को भी प्रभावित कर रही है।.
- युद्ध के दशक (1967-वर्तमान): छह दिवसीय युद्ध ( 1967) ने क्षेत्रीय परिदृश्य को और अधिक रूपांतरित कर दिया, जिसमें इज़रायल ने गोलन हाइट्स, सिनाई, गाज़ा और वेस्ट बैंक पर कब्जा कर लिया तथा अपना सैन्य प्रभुत्व स्थापित किया।
- इसके बाद के संघर्षों, जिनमें योम किप्पुर युद्ध (1973) और लेबनान युद्ध शामिल हैं, ने संघर्ष की प्रकृति को बदल दिया। पारंपरिक ‘राज्य-विरुद्ध-राज्य’ युद्ध धीरे-धीरे ‘असममित युद्ध’ में बदल गया, जिसमें हमास एवं हूती जैसे समूह भी सक्रिय हो गए।
- मार्च वर्ष 2026 तक ये ऐतिहासिक शिकायतें एक निर्णायक चरम पर पहुँच चुकी हैं, जहाँ लंबे समय से चल रहे प्रॉक्सी तनाव अब प्रत्यक्ष एवं उच्च-तीव्रता वाले संघर्ष में परिवर्तित होते दिखाई दे रहे हैं।
वर्तमान पश्चिम एशियाई संकट के पीछे कौन से कारक ज़िम्मेदार हैं?
- मुख्य संघर्ष: अमेरिका-इज़रायल बनाम ईरान
- वर्तमान संकट की शुरुआत अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान के खिलाफ किये गए समन्वित, उच्च-सटीकता वाले हमलों की एक शृंखला से हुई, जिसे अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी तथा इज़रायल ने ऑपरेशन लॉयन्स रोर नाम दिया था।
- ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस IV, इज़रायल और संयुक्त राज्य अमेरिका के खिलाफ ईरान के व्यापक जवाबी सैन्य अभियान का आधिकारिक कोडनेम है।
- नेतृत्व का निष्कासन: रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि हमलों में तेहरान के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया गया था, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता, अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु भी बताई गई है।
- रणनीतिक लक्ष्य: सैन्य अभियान तीन मुख्य स्तंभों पर केंद्रित रहा है:
- परमाणु अवसंरचना: नतान्ज़, फोर्डो और इस्फहान में स्थित परमाणु प्रतिष्ठान।
- प्रतिशोध क्षमता: वायु रक्षा प्रणालियों और बैलिस्टिक मिसाइल प्रक्षेपण स्थलों का विनाश।
- कमान और नियंत्रण: तेहरान में IRGC (इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर) के मुख्यालय पर हमले।
- ईरान की प्रतिक्रिया: तेहरान ने इज़रायल और क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों (जैसे कतर में अल-उदैद बेस) को निशाना बनाते हुए बैलिस्टिक मिसाइलों एवं ड्रोन हमलों की शृंखला से जवाबी कार्रवाई की है।
- वर्तमान संकट की शुरुआत अमेरिका और इज़रायल द्वारा ईरान के खिलाफ किये गए समन्वित, उच्च-सटीकता वाले हमलों की एक शृंखला से हुई, जिसे अमेरिका ने ऑपरेशन एपिक फ्यूरी तथा इज़रायल ने ऑपरेशन लॉयन्स रोर नाम दिया था।
- बहु-मोर्चीय परोक्ष युद्ध (प्रतिरोध की धुरी)
- ईरान के क्षेत्रीय सहयोगी औपचारिक रूप से इस संघर्ष में शामिल हो गए हैं, जिससे यह संघर्ष एक क्षेत्रीय महायुद्ध में परिणत हो गया है:
- लेबनान (हिज़्बुल्लाह): तेहरान पर हुए हमलों के बाद, हिज़्बुल्लाह ने उत्तरी इज़रायल में सैकड़ों रॉकेट से हमले किये।
- इसके प्रत्युत्तर में इज़रायल ने बेरूत में ‘ब्रॉड वेव ऑफ स्ट्राइक्स’ अर्थात व्यापक हवाई हमले किये।
- यमन (हूती): यमन में ईरान समर्थित हूतियों ने ईरान के समर्थन में समुद्री मार्गों और इज़रायल पर मिसाइल एवं ड्रोन हमलों को पुनः आरंभ करने का निर्णय लिया है। इससे विश्व में पेट्रोलियम के प्रवाह को सीधा खतरा उत्पन्न हो गया है।
- गाज़ा (हमास): हमास अभी भी एक महत्त्वपूर्ण कारक बना हुआ है, लेकिन अब संघर्ष का केंद्र क्षेत्रीय विस्तार की ओर स्थानांतरित हो गया है। इज़रायल ने सुरक्षा एहतियात के तौर पर गाज़ा की सभी सीमा चौकियों को अनिश्चितकाल के लिये बंद कर दिया है।
- प्रमुख पक्षों के हित
|
पक्ष |
इज़रायल/अमेरिका |
ईरान/प्रतिशोध की धुरी |
|
प्राथमिक लक्ष्य |
सत्ता परिवर्तन और ईरान की परमाणु क्षमता को कमज़ोर करना |
शासन की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्तर पर होने वाली क्षति। |
|
सामरिक बदलाव |
'स्कॉर्पियन स्ट्राइक' (स्वायत्त ड्रोन समूह) का प्रयोग |
अत्यधिक सुरक्षित ठिकानों और असममित प्रॉक्सी हमलों पर निर्भरता। |
पश्चिम एशियाई संघर्ष का भारत पर क्या प्रभाव पड़ता है?
- ऊर्जा सुरक्षा और 'वॉर प्रीमियम': हाइड्रोकार्बन आयात के लिये फारस की खाड़ी पर भारत की भारी निर्भरता इसे होर्मुज़ जलडमरूमध्य की मौजूदा नौसैनिक नाकाबंदी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाती है।
- इस संघर्ष से भारत के लगभग 40-50% कच्चे तेल के पारगमन में बाधा उत्पन्न होने का खतरा है, जिससे बीमा और माल ढुलाई के लिये 'वॉर प्रीमियम' में भारी वृद्धि हो सकती है।
- बढ़ते तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँच गई हैं, जबकि कतर एनर्जी द्वारा अपने LNG संयंत्रों पर ईरान के हमलों के बाद उत्पादन निलंबित करने के कारण एशियाई स्पॉट मार्किट में द्रवीकृत प्राकृतिक गैस की कीमतें तीन वर्षों में उच्चतम स्तर पर पहुँच गई हैं।
- यदि तेल की कीमतों में दीर्घकालिक वृद्धि होती है तो इससे भारत के चालू खाता घाटे (CAD) में वृद्धि हो सकती है तथा रुपये पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे मुद्रास्फीति प्रबंधन तथा राजकोषीय स्थिरता जटिल हो सकती है।
- साथ ही यह भारत के स्वच्छ ऊर्जा की ओर क्रमिक संक्रमण को भी अस्थायी रूप से बाधित कर सकता है क्योंकि महँगे जीवाश्म ईंधन आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है।
- प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा तथा प्रेषण प्रवाह: खाड़ी देशों में रहने वाले 90 लाख से अधिक भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा सरकार की प्राथमिक मानवीय और आर्थिक चिंता बनी हुई है, क्योंकि शत्रुता नागरिक हवाई क्षेत्रों तक बढ़ गई है।
- किसी भी बड़े पैमाने पर विस्थापन से न केवल बड़े पैमाने पर निकासी (ऑपरेशन राहत जैसी कार्रवाई के स्तर का) की आवश्यकता होगी, बल्कि भारत के कुल प्रेषण प्रवाह का 38% भी खतरे में पड़ जाएगा।
- लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष से निर्माण, सेवा और ऊर्जा क्षेत्रों में नौकरियों का नुकसान हो सकता है, जहाँ भारतीय बड़ी संख्या में कार्यरत हैं।
- इससे केरल, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में लाखों परिवारों को सहारा देने वाले प्रेषण प्रवाह में कमी आएगी।
- रणनीतिक संपर्क (IMEC बनाम चाबहार): भारत की दीर्घकालिक 'लुक वेस्ट' संपर्क परियोजनाएँ, जिनका उद्देश्य पारंपरिक मार्गों को दरकिनार करना है, पूर्ण परिचालन और अस्तित्वगत गतिरोध का सामना कर रही हैं।
- भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) वर्तमान में अव्यवहार्य है, जबकि चाबहार बंदरगाह को द्वितीयक प्रतिबंधों और सैन्य जोखिमों का सामना करना पड़ रहा है।
- भारत के विदेश मंत्री ने म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (फरवरी 2026) में कहा कि यद्यपि इस परियोजना में रुचि बनी हुई है, परंतु 'बड़े संघर्ष' के कारण IMEC की प्रगति रुक गई है क्योंकि क्षेत्रीय प्राथमिकताएँ अब अस्तित्व की चुनौतियों पर केंद्रित हो गई हैं।
- इन व्यवधानों से एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ने वाले कनेक्टिविटी हब के रूप में उभरने की भारत की महत्त्वाकांक्षा कमज़ोर होती है।
- वे व्यापार मार्गों के विविधीकरण में भी विलंब करते हैं, जो भीड़भाड़ वाले समुद्री मार्गों पर निर्भरता को कम करने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
- कृषि और औद्योगिक इनपुट पर प्रभाव: इस संघर्ष ने महत्त्वपूर्ण उर्वरकों के आयात और उच्च मूल्य वाले कृषि उत्पादों के निर्यात को बाधित करके भारत की 'खाद्य और सामग्री' सुरक्षा को प्रभावित किया है।
- यूरिया और NPK उर्वरकों (जिनमें से 40% पश्चिम एशिया से आते हैं) की आपूर्ति में व्यवधान से सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ने तथा घरेलू खाद्य मुद्रास्फीति होने का खतरा है।
- वहीं दूसरी ओर, भारत के निर्यात-उन्मुख कृषि क्षेत्रों को लॉजिस्टिक्स संबंधी गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है।
- भारत, जो प्रीमियम सुगंधित बासमती का सबसे बड़ा वैश्विक निर्यातक है, पश्चिमी एशियाई बाज़ारों पर बहुत हद तक निर्भर है, जिसमें सऊदी अरब, ईरान एवं संयुक्त अरब अमीरात के खरीदार कुल शिपमेंट के आधे से अधिक हिस्से के लिये उत्तरदायी हैं।
- हालाँकि, क्षेत्र में चल रहे संघर्ष के कारण, 400,000 टन से अधिक बासमती चावल वर्तमान में बंदरगाहों पर अटका हुआ है।
- सामरिक स्वायत्तता के मुद्दे: भारत को एक गंभीर 'राजनयिक दुविधा' का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि जहाँ एक ओर इज़रायल के साथ उसकी अपनी विशेष सामरिक साझेदारी है, तो दूसरी ओर ईरान के साथ ऐतिहासिक तथा ऊर्जा संबंध भी महत्त्वपूर्ण हैं।
- अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा हिंद महासागर में ईरानी युद्धपोत IRIS देना को डुबोए जाने की खबरों ने इस संघर्ष को भारत के निकट क्षेत्र में ला खड़ा किया है, जिससे उसकी तटस्थ नीति की परीक्षा हो रही है।
- फरवरी 2026 के भारत-इज़रायल संयुक्त वक्तव्य ने दोनों देशों के संबंधों को 'विशेष रणनीतिक साझेदारी' के स्तर तक उन्नत किया, फिर भी भारत उन प्रमुख शक्तियों में से है जो तेहरान के साथ संवाद बनाये हुए हैं।
- यह तनाव भारत की आर्थिक और सुरक्षा हितों की रक्षा करते हुए तटस्थता बनाए रखने की क्षमता की परीक्षा लेता है।
- यह तेज़ी से ध्रुवीकृत हो रहे भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत की बहुसंरेखण रणनीति के महत्त्व को भी रेखांकित करता है।
पश्चिम एशियाई संघर्ष के बीच भारत अपने रणनीतिक हितों को किस प्रकार सुरक्षित कर सकता है?
- विकेंद्रीकृत रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार: भारत को केवल केंद्रीकृत भूमिगत भंडारण पर निर्भर रहने के बजाय एक विकेंद्रीकृत एवं वितरित भंडारण तंत्र विकसित करना चाहिये, जिसमें निजी क्षेत्र के भंडार को भी राष्ट्रीय आपातकालीन भंडार के साथ एकीकृत किया जाये।
- तेल विपणन कंपनियों को 'फ्लोटिंग बफर' तथा उच्च क्षमता वाले तटीय टैंकों को बनाये रखने के लिये प्रोत्साहन देकर भारत 'होर्मुज़ जलडमरूमध्य' के बंद होने से उत्पन्न तात्कालिक आघात को कम कर सकता है।
- यह 'बफर-एज़-ए-सर्विस' मॉडल स्मार्ट-ग्रिड लॉजिस्टिक्स का उपयोग करते हुए ईंधन को महत्त्वपूर्ण औद्योगिक केंद्रों की ओर पुनर्निर्देशित करेगा, जिससे समुद्री नाकेबंदी परिवहन और विद्युत क्षेत्रों के लिये घरेलू ठहराव में परिवर्तित न हो।
- 'ब्लू-वॉटर ट्रांज़िट कॉरिडोर' को संस्थागत रूप देना: भारतीय नौसेना को आवधिक रूप से संचालित 'ऑपरेशन संकल्प' गश्त से आगे बढ़ते हुए भारतीय ध्वज वाले जहाज़ों के लिये स्थायी और संस्थागत 'मैरीटाइम सिक्योरिटी एस्कॉर्ट आर्किटेक्चर' (MSEA) स्थापित करना चाहिये।
- इसमें अरब सागर और अदन की खाड़ी में उच्च जोखिम वाले तटीय क्षेत्रों के साथ 'सॉवरेन ट्रांज़िट बबल्स' स्थापित करने के लिये एकीकृत वाहक युद्ध समूहों को तैनात करना शामिल है।
- उन्नत निगरानी तंत्र और समुद्री ड्रोन समूहों के माध्यम से भारत अपने व्यापारिक जहाज़ों को रीयल-टाइम सुरक्षा उपलब्ध करा सकता है, जिससे वह 'नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर' के रूप में कार्य करते हुए भी अमेरिका-नेतृत्व वाले आक्रामक गठबंधनों से रणनीतिक दूरी बनाए रख सकेगा।
- डिजिटल वित्तीय शोधन और 'रुपये-स्वैप' हब: उच्च तीव्रता वाले संघर्ष के दौरान SWIFT जैसी वैश्विक वित्तीय संदेश प्रणालियों के दुरुपयोग को रोकने के लिये, भारत को तटस्थ अधिकार क्षेत्रों में ऑफशोर रुपये-निपटान केंद्रों के निर्माण में तीव्रता लानी चाहिये।
- खाड़ी देशों के साथ एक समर्पित केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) सेतु लागू करने से ऊर्जा आयात के लिये 'डायरेक्ट-टू-सॉवरेन' भुगतान संभव होगा, जिससे द्वितीयक प्रतिबंधों की तीव्रता से बचा जा सकेगा।
- यह 'फाइनेंशियल ऑटोनॉमी सर्किट' यह सुनिश्चित करेगा कि यूरिया तथा बासमती जैसे आवश्यक वस्तुओं का व्यापार निर्बाध रूप से चलता रहे तथा भारतीय समष्टि अर्थव्यवस्था पेट्रोडॉलर की अस्थिरता एवं पश्चिमी बैंकिंग प्रतिबंधों से सुरक्षित रहे।
- होर्मुज़-बाईपास की लॉजिस्टिक्स व्यवस्था का संचालन: भारत को तत्काल एक आकस्मिक लॉजिस्टिक्स फ्रेमवर्क तैयार करना चाहिये जो फारस की खाड़ी में व्याप्त यातायात के व्यवहार्य विकल्प के रूप में अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) को प्राथमिकता दे।
- मध्य एशियाई देशों के साथ भूमि आधारित पारगमन के लिये 'सॉवरेन एक्सेस' समझौते हासिल करके, भारत उच्च मूल्य वाले वस्तु और दवा निर्यात के लिये एक स्थायी बाईपास बना सकता है।
- यह 'अंतर-महाद्वीपीय धुरी' मध्य पूर्व के रणनीतिक 'चोकपॉइंट-रिस्क' को कम करेगी, जिससे भारत का व्यापार मार्ग विशुद्ध रूप से समुद्री निर्भरता से एक समुत्थानशील, बहुआयामी यूरेशियन प्रवेश द्वार में परिवर्तित हो जाएगा।
- रणनीतिक मानव पूंजी प्रत्यावर्तन और 'स्किल-मैपिंग': प्रवासी संकट को केवल एक मानवीय बोझ के रूप में देखने के बजाय, भारत को 'नेशनल एक्सपैट्रिएट इंटीग्रेशन एंड स्किल-मैपिंग' (NEIS) ढाँचा लागू करना चाहिये, ताकि स्वदेश वापसी करने वाली प्रतिभा का उपयोग किया जा सके।
- खाड़ी देशों से लौटे 'संघर्ष पीड़ितों' की पेशेवर विशेषज्ञता का एक डिजिटल भंडार बनाकर, सरकार सेमीकंडक्टर और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे घरेलू उच्च-विकास वाले क्षेत्रों में उनके तेज़ी से समायोजन को सुविधाजनक बना सकती है।
- यह 'रिवर्स-ब्रेन-गेन' रणनीति अल्पकालिक प्रत्यावर्तन संकट को दीर्घकालिक विकासात्मक संपत्ति में बदल सकती है, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि घरेलू अर्थव्यवस्था लचीली बनी रहे, भले ही प्रेषण प्रवाह में अस्थायी संरचनात्मक संकुचन हो।
- समुद्री संपत्तियों के लिये काइनेटिक साइबर-शील्ड: भारत को असममित तोड़-फोड़ से समुद्री फाइबर-ऑप्टिक केबलों की सुरक्षा के लिये रक्षा साइबर एजेंसी के भीतर एक समर्पित सब-सरफेस क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोटेक्शन (S-CIP) इकाई तैनात करनी चाहिये।
- इसमें निरंतर 'केबल-स्वास्थ्य' निगरानी के लिये स्वायत्त जलमग्न वाहनों (एयूवी) का उपयोग करना और पूर्ण डिजिटल अलगाव को रोकने के लिये उपग्रह-आधारित इंटरनेट नक्षत्रों के माध्यम से 'अतिरिक्त डेटा-ब्रिज' स्थापित करना शामिल है। इसके अंतर्गत स्वायत्त जल-रोबोट (AUVs) द्वारा निरंतर 'केबल-हेल्थ' निगरानी तथा उपग्रह आधारित इंटरनेट तंत्रों के माध्यम से 'रेडंडेंट डेटा-ब्रिज' स्थापित किये जायेंगे, जिससे पूर्ण डिजिटल डीकपलिंग से बचा जा सके।
- समुद्र-तल के नीचे बिछे फाइबर-ऑप्टिक संचार केबलों को 'सॉवरेन डिजिटल टेरिटरी' का दर्जा प्रदान कर भारत क्षेत्रीय शक्तियों की ‘ग्रे-ज़ोन’ समुद्री रणनीतियों से उत्पन्न उन खतरों को कम कर सकता है, जो वर्ष 2026 के संकट के दौरान देश के IT सेवा निर्यात तंत्र को प्रभावित कर सकते हैं।
निष्कर्ष:
पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष क्षेत्रीय भू-राजनीति और भारत की आर्थिक एवं रणनीतिक सुरक्षा के बीच गहन अंतर्संबंधों को उजागर करता है। भारत के लिये ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की रक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना इस अस्थिर परिदृश्य में महत्त्वपूर्ण होगा। यह संकट ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने, वैकल्पिक संपर्क मार्गों को सुदृढ़ करने और समुद्री एवं वित्तीय मज़बूती बढ़ाने की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। अंततः कूटनीति और रणनीतिक तैयारियों के बीच संतुलन बनाने की भारत की क्षमता ही यह निर्धारित करेगी कि वह अपने दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की कितनी प्रभावी ढंग से रक्षा करता है।
|
दृष्टि मेन्स का प्रश्न: पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्षों के दूरगामी परिणाम इस क्षेत्र से परे हैं। पश्चिम एशिया में चल रहे संकट का भारत के रणनीतिक एवं आर्थिक हितों पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण कीजिये। |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न:
प्रश्न 1. वर्तमान पश्चिम एशियाई संघर्ष भारत के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है?
यह संघर्ष भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार मार्गों और क्षेत्र में रहने वाले 90 लाख से अधिक भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा के लिये खतरा है। इससे प्रेषण प्रवाह में बाधा आने और वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि होने का भी जोखिम है, जिससे भारत की आर्थिक स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
प्रश्न 2. भारत के लिये होर्मुज़ जलडमरूमध्य इतना महत्त्वपूर्ण क्यों है?
भारत के कच्चे तेल आयात का लगभग 40-50% हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जिससे यह एक महत्त्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्ति केंद्र बन जाता है। किसी भी संघर्ष के कारण होने वाली रुकावट भारत की तेल आपूर्ति और ईंधन की कीमतों पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।
प्रश्न 3. यह संघर्ष भारत के प्रवासी भारतीयों और प्रेषणों को किस प्रकार प्रभावित करता है?
खाड़ी क्षेत्र में 90 लाख से अधिक भारतीय रहते हैं, जो भारत को मिलने वाली धन-संपत्ति में एक बड़ा योगदान देते हैं। संघर्ष बढ़ने से उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है और लाखों भारतीय परिवारों को सहारा देने वाली धन-संपत्ति बाधित हो सकती है।
प्रश्न 4. इस संकट से भारत की कौन-सी रणनीतिक परियोजनाएँ प्रभावित हुई हैं?
क्षेत्रीय अस्थिरता भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे और चाबहार बंदरगाह में भारत के निवेश जैसी प्रमुख कनेक्टिविटी पहलों के लिये खतरा उत्पन्न करती है, जो भारत की व्यापार एवं कनेक्टिविटी रणनीति के केंद्र में हैं।
प्रश्न 5. संकट के दौरान भारत अपने हितों की रक्षा के लिये क्या कदम उठा सकता है?
भारत ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला सकता है, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मज़बूत कर सकता है, व्यापार मार्गों के लिये समुद्री सुरक्षा बढ़ा सकता है और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा के लिये सभी क्षेत्रीय पक्षों के साथ राजनयिक संबंध बनाए रख सकता है।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न 1. दक्षिण-पश्चिमी एशिया का निम्नलिखित में से कौन-सा एक देश भूमध्यसागर तक फैला नहीं है? (2015)
(a) सीरिया
(b) जॉर्डन
(c) लेबनान
(d) इज़रायल
उत्तर: (b)
प्रश्न 2. कभी-कभी समाचारों में ‘टू स्टेट सॉल्यूशन’ शब्द का उल्लेख किस संदर्भ में किया जाता है? (2018)
(a) चीन
(b) इज़रायल
(c) इराक
(d) यमन
उत्तर: (b)
मेन्स
प्रश्न 1. “भारत के इज़रायल के साथ संबंधों ने हाल में एक ऐसी गहराई एवं विविधता प्राप्त कर ली है, जिसकी पुनर्वापसी नहीं की जा सकती है।" विवेचना कीजिये। (2018)
