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डेली न्यूज़

  • 20 May, 2020
  • 71 min read
भूगोल

उष्ण महासागर और सुपर साइक्लोन

प्रीलिम्स के लिये:

सुपर साइक्लोन, उष्ण कटिबंधीय चक्रवात 

मेन्स के लिये:

समुद्री तापन और जलवायु 

चर्चा में क्यों?

भारत मौसम विज्ञान विभाग’ (India Meteorological Department- IMD) के अनुसार, चक्रवाती तूफान ‘अम्फान’ (Amphan) बंगाल की खाड़ी का सामान्य से अधिक तापमान के कारण ‘अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफान’ (Extremely Severe Cyclonic Storm) का रूप ले सकता है।

प्रमुख बिंदु:

  • वैज्ञानिकों के अनुसार, सुपर साइक्लोन के निर्माण में बंगाल की खाड़ी का सामान्य से अधिक तापमान रहने में ‘लॉकडाउन’ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • 'सुपर साइक्लोन अम्फान' जो पश्चिम बंगाल की ओर बढ़ रहा है, वर्ष 1999 के सुपर साइक्लोन के बाद से बंगाल की खाड़ी में आया सबसे तेज़ चक्रवात है।

सुपर साइक्लोन:

  • तूफान जिनका निर्माण बहुत तेज़ी से होता है और जिनकी वायु की गति 'अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफान' की वायु गति से बहुत अधिक हो जाती है, वे सुपर साइक्लोन माने  जाते हैं।

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात:

  • उष्ण कटिबंधीय चक्रवात आक्रामक तूफान होते हैं जिनकी उत्पत्ति उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों के महासागरों पर होती है और ये तटीय क्षेत्रों की तरफ गतिमान होते हैं।

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात निर्माण की अनुकूल स्थितियाँ:

  • इनकी उत्पत्ति व विकास के लिये निम्नलिखित अनुकूल स्थितियाँ हैं:
    • बृहत् समुद्री सतह; 
    • समुद्री सतह का तापमान 27° सेल्सियस से अधिक हो;
    • कोरिआलिस बल का उपस्थित होना;
    • लंबवत पवनों की गति में अंतर कम होना; 
    • कमज़ोर निम्न दाब क्षेत्र या निम्न स्तर का चक्रवातीय परिसंचरण  होना; 
    • समुद्री तल तंत्र पर उपरी अपसरण।

Undisturbed-Winds

चक्रवात में ऊर्जा की आपूर्ति:

  • चक्रवातों को और अधिक विध्वंसक करने वाली ऊर्जा संघनन प्रक्रिया द्वारा ऊँचे कपासी स्तरी मेघों से प्राप्त होती है जो इस तूफान के केंद्र को घेरे होती है। समुद्रों से लगातार आर्द्रता की आपूर्ति चक्रवातों को अधिक प्रबल करती हैं।

महासागरीय तापमान में वृद्धि:

  • महासागर वातावरण में उत्सर्जित अतिरिक्त ऊष्मा के लगभग 90% से अधिक भाग को अवशोषित करते हैं।
  • महासागरीय तापन और वायुमंडल से उत्सर्जित गैस की मात्रा के बीच मज़बूत संबंध पाया जाता है। जैसे-जैसे महासागर गर्म होता है, इससे चक्रवात निर्माण की संभावना भी उतनी ही अधिक होती है।

बंगाल की खाड़ी के तापमान में वृद्धि:

  • चक्रवात ऊष्ण महासागरों तथा इससे उत्पन्न ऊष्ण नमी से ऊर्जा प्राप्त करते हैं।
  • वर्ष  2020 के ग्रीष्मकाल में बंगाल की खाड़ी का रिकॉर्ड तापमान दर्ज किया गया है क्योंकि जीवाश्म ईंधन के लगातार उत्सर्जन के कारण महासागरों के तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है।
  • मई माह के प्रथम दो सप्ताह में यहाँ समुद्री सतह का तापमान 32-34°C दर्ज किया है। इसने चक्रवात निर्माण के लिये आदर्श स्थितियों का निर्माण किया है। 

लॉकडाउन का प्रभाव (Lockdown Impact):

  • महासागरों के तापमान में देखी गई वृद्धि, लॉकडाउन से भी संबंधित हो सकती है। लॉकडाउन के दौरान 'कणकीय पदार्थों' (Particulate Matter) के उत्सर्जन में कमी देखी गई है, जिससे ‘एरोसॉल’ को मात्रा में भी कमी आई है। 'ब्लैक कार्बन' सूर्य के प्रकाश को प्रतिबिंबित करते है तथा सतही तापमान में कमी करते हैं। अर्थात प्रदूषकों के उत्सर्जन में कमी के कारण महासागरों के तापमान में वृद्धि हुई है। 
  • इंडो-गंगेटिक मैदानों से ये प्रदूषक 'बंगाल की खाड़ी' में पहुँचते है तथा बंगाल की खाड़ी में बादल निर्माण प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार बंगाल की खाड़ी में कम बादल निर्माण तथा अधिक तापमान ने चक्रवात निर्माण को प्रभावित किया है। 

आगे की राह:

  • 'जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल' (Intergovernmental Panel on Climate Change- IPCC) रिपोर्ट के अनुसार, 1.5°C से 2°C के बीच के बढ़ते ग्लोबल वार्मिंग के स्तर के परिणामस्वरूप अधिकांश भूमि और महासागरों के औसत तापमान में वृद्धि हो सकती है, कई क्षेत्रों में भारी वर्षा तथा कुछ क्षेत्रों में सूखे जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। 
  • महासागरों के तापमान में वृद्धि होने से संपूर्ण जलवायु तंत्र प्रभावित होता है, अत: सभी देशों को महासागरों के संरक्षण तथा आपदा प्रबंधन पर विशेष पहल करने की आवश्यकता है। 

स्रोत: द हिंदू


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

फिलिस्तीनी शरणार्थी संकट

प्रीलिम्स के लिये

फिलिस्तीनी शरणार्थी संकट, इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद

मेन्स के लिये

इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष से संबंधित विभिन्न पहलू 

चर्चा में क्यों?

फिलिस्तीन शरणार्थियों के कल्याण हेतु कार्य करने वाली ‘संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी’ (United Nations Relief and Works Agency-UNRWA) ने COVID-19 संकट से उत्पन्न परिस्थितियों में अपनी बुनियादी सेवाओं को संचालित करने के लिये भारत द्वारा दी जा रही वित्तीय सहायता की सराहना की है।

प्रमुख बिंदु

  • ध्यातव्य है कि हाल ही में भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (UNRWA) को शिक्षा एवं स्वास्थ्य समेत उसके विभिन्न कार्यक्रमों और सेवाओं में समर्थन देने हेतु 2 मिलियन डॉलर प्रदान किये थे।
  • भारत के इस योगदान से UNRWA को अपनी नकदी प्रवाह संबंधी चुनौतियों का समाधान करने में मदद मिलेगी।
  • उल्लेखनीय है कि भारत ने UNRWA को दिये जाने वाले अपने वार्षिक योगदान को वर्ष 2016 में 1.25 मिलियन डॉलर से बढ़ाकर वर्ष 2019 में 5 मिलियन डॉलर तक कर दिया है।
  • इसके अतिरिक्त भारत ने UNRWA को वर्ष 2020 के दौरान 5 मिलियन डॉलर देने का वचन दिया है, इस पूरे योगदान से भारत का UNRWA के सलाहकार आयोग का सदस्य बनने का मार्ग काफी आसान हो गया है।
  • भारत का यह योगदान संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (UNRWA) को फंडिंग की कमी के कारण उत्पन्न हुए वित्तीय संकट से निपटने में मदद करेगा, जिसके कारण एजेंसी फिलिस्तीनी शरणार्थियों को स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएँ प्रदान करने में भी असमर्थ है।
    • इस अवसर पर भारतीय प्रतिनिधि ने UNRWA द्वारा किये गए सराहनीय कार्य और प्रयासों के प्रति प्रशंसा व्यक्त की। 
  • ध्यातव्य है कि विश्व में लगभग 5 मिलियन फिलिस्तीनी शरणार्थी UNRWA द्वारा प्रदान की जाने वाली स्वास्थ्य सेवाओं पर निर्भर हैं।
  • वहीं, एजेंसी द्वारा चलाए जा रहे स्कूलों में प्रत्येक वर्ष 526,000 छात्रों को शिक्षित किया जाता हैं, जिनमें से आधी महिलाएँ होती हैं।
  • इसी बीच, भारत फिलिस्तीनियों के लिये मेडिकल आपूर्ति की भी तैयारी कर रहा है ताकि उन्हें कोरोनोवायरस से लड़ने में मदद प्रदान की जा सके।

कौन हैं फिलिस्तीनी शरणार्थी?

  • संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (UNRWA) द्वारा फिलिस्तीनी शरणार्थियों को ‘उन व्यक्तियों के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिनका निवास स्थान 1 जून, 1946 से 15 मई, 1948 की अवधि के दौरान फिलिस्तीन था और जिन्होंने वर्ष 1948 के संघर्ष के परिणामस्वरूप घर और आजीविका दोनों को खो दिया था।’
  • UNRWA अपनी सेवाएँ मुख्यतः उन्ही लोगों को प्रदान करता है, जो फिलिस्तीनी शरणार्थी की इस परिभाषा के अंतर्गत आते हैं और जो संस्था के साथ पंजीकृत हैं तथा जिन्हें सहायता की आवश्यकता है।
  • इस परिभाषा के तहत पंजीकरण के लिये फिलिस्तीन शरणार्थियों के वंशज भी पात्र हैं, जिसमें गोद लिये बच्चे भी शामिल हैं।
  • UNRWA के आधिकारिक आँकड़े के अनुसार, पंजीकृत फिलिस्तीनी शरणार्थियों में से लगभग एक-तिहाई से अधिक लोग पूर्वी येरुशलम सहित जॉर्डन, लेबनान, सीरिया, गाजा पट्टी और वेस्ट बैंक में लगभग 58 मान्यता प्राप्त फिलिस्तीन शरणार्थी शिविरों में रहते हैं।

फिलिस्तीनी शरणार्थी संकट

  • उल्लेखनीय है कि फिलिस्तीनी शरणार्थी संकट को समझने के लिये हमें सर्वप्रथम इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष को समझना होगा।
  • अरब और यहूदियों के बीच संघर्ष को समाप्त करने में असफल रहे ब्रिटेन ने वर्ष 1948 में फिलिस्तीन से अपने सुरक्षा बलों को हटा लिया और अरब तथा यहूदियों के दावों का समाधान करने के लिये इस मुद्दे को नवनिर्मित संगठन संयुक्त राष्ट्र (UN) के विचारार्थ प्रस्तुत किया।
  • संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन में स्वतंत्र यहूदी और अरब राज्यों की स्थापना करने के लिये एक विभाजन योजना (Partition Plan) प्रस्तुत की जिसे फिलिस्तीन में रह रहे अधिकांश यहूदियों ने स्वीकार कर लिया किंतु अरबों ने इस पर अपनी सहमति प्रकट नहीं की।
  • वर्ष 1948 में यहूदियों ने स्वतंत्र इज़राइल की घोषणा कर दी और इज़राइल एक देश बन गया, इसके परिणामस्वरूप आस-पास के अरब राज्यों (इजिप्ट, जॉर्डन, इराक और सीरिया) ने इज़राइल पर आक्रमण कर दिया। युद्ध के अंत में इज़राइल ने संयुक्त राष्ट्र की विभाजन योजना के आदेशानुसार प्राप्त भूमि से भी अधिक भूमि पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
  • युद्ध के परिणामस्वरूप, फिलिस्तीनियों की एक बड़ी संख्या या तो पलायन कर गई या उन्हें इज़राइल से बाहर जाने और इज़राइल की सीमा के पास शरणार्थी शिविरों में बसने के लिये विवश किया गया और अंततः फिलिस्तीनी शरणार्थी संकट का उदय हुआ। 

इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद के वर्तमान कारण:

  • येरूशलम पर अधिकार को लेकर दोनों देशों में संघर्ष होता रहा है। इज़राइल के द्वारा वर्तमान में तेल अवीब से अपनी राजधानी येरुशलम स्थानांतरित करने का भी फिलिस्तीन द्वारा विरोध किया गया।
  • शरणार्थियों के पुनर्वास को लेकर भी दोनों देशों में मतभिन्नता की स्थिति है। इज़राइल इन्हें फिलिस्तीन में पुनर्स्थापित करना चाहता है और फिलिस्तीन इन्हें वास्तविक स्थानों पर पुनर्स्थापित करने की बात कहता है।
  • फिलिस्तीन, इज़राइल की प्रसारकारी नीतिओं का भी लगातार विरोध कर रहा है।

आगे की राह

  • फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिये चलाए जा रहे कार्यक्रमों हेतु वित्त की कमी सर्वविदित है। संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (UNRWA) वित्तपोषण की कमी का सामना कर रही है, जिसके कारण संस्था के परिचालन समेत विभिन्न कार्यक्रम प्रभावित हुए हैं।
  • भारत द्वारा इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र राहत एवं कार्य एजेंसी (UNRWA) को दी गई फंडिंग, एक स्वागत योग्य कदम है, जिससे एजेंसी अपने कार्यक्रमों का सुचारु संचालन सुनिश्चित कर सकेगी।
  • आवश्यक है कि वर्तमान परिदृश्य को ध्यान में देखते हुए फिलिस्तीनी शरणार्थियों के लिये बेहतर नीतियों और कार्यक्रमों का निर्माण किया जाए और साथ ही इस विषय से संबंधित विभिन्न हितधारकों को भी नीति निर्माण में शामिल किया जाए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

COVID-19 वैक्सीन के विकास हेतु भारत और अमेरिका की संयुक्त पहल

प्रीलिम्स के लिये 

‘वैक्सीन एक्शन प्रोग्राम’, COVID-19

मेन्स के लिये:

COVID-19 और वैश्विक सहयोग, भारत-अमेरिका संबंध

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत में स्थित अमेरिकी दूतावास के अधिकारियों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, भारत और अमेरिका द्वारा COVID-19 के परीक्षण और इस बीमारी की वैक्सीन के विकास पर शोध के लिये मिलकर कार्य करने की योजना पर विचार किया जा रहा है।

प्रमुख बिंदु:  

  • अमेरिकी दूतावास के अनुसार, भारत और अमेरिका के वैज्ञानिक अनेक संक्रामक बीमारियों पर शोध, वैक्सीन के निर्माण और कम लागत में वैक्सीन की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिये मिलकर कार्य करते रहे हैं।  
  • COVID-19 की महामारी को देखते हुए ‘वैक्सीन एक्शन प्रोग्राम’ (Vaccine Action Programme) के तहत भारत और अमेरिका COVID-19 संक्रमण की पहचान करने और इसकी वैक्सीन के निर्माण हेतु मिलकर कार्य करने पर विचार कर रहे हैं।     

इंडो-यूएस वैक्सीन एक्शन प्लान

(Indo-US Vaccine Action Programme-VAP):

  • VAP एक द्विपक्षीय स्वास्थ्य कार्यक्रम है, इसके तहत नई और उन्नत वैक्सीन के विकास से जुड़ी अनेक गतिविधियों को सहयोग प्रदान किया जाता है।
  • इस कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 1987 में की गई थी।
  • VAP में यू.एस. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (U.S. National Institutes of Health), भारतीय जैव प्रौद्योगिकी विभाग (Indian Department of Biotechnology-DBT) और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (Indian Council of Medical Research-ICMR) आदि के अधिकारी शामिल होते हैं। 
  • इस कार्यक्रम के तहत अमेरिका और भारत के वैज्ञानिकों द्वारा वैक्सीन, प्रतिरक्षाविज्ञानी अभिकर्मकों (Immunodiagnostic Reagents) आदि के विकास की दिशा में सहयोगात्मक अनुसंधान परियोजनाओं का संचालन किया जाता है।  
  • VAP के कार्यक्रमों और योजनाओं के कार्यान्वयन के लिये एक ‘संयुक्त कार्य समूह’ (Joint Working Group- JWG) की स्थापना की गई है। JWG में दोनों देशों के वैज्ञानिक और अन्य अधिकारी शामिल होते हैं। 
  • JWG के भारतीय सदस्य भारतीय प्रधान मंत्री द्वारा नियुक्त एक 'सर्वोच्च समिति' (Apex Committee) के सदस्य होते हैं, यह समिति VAP के तहत प्रस्तावित भारतीय कार्यक्रमों की समीक्षा और उन्हें अनुमति प्रदान करने का कार्य करती है। 

अन्य सहयोग:

  • 200 वेंटिलेटर का सहयोग:  
    • अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा पिछले सप्ताह भारत को 200 वेंटिलेटर (Ventilator) दान किये जाने की घोषणा की गई थी, इसके तहत पहले चरण में 50 वेंटिलेटर शीघ्र ही भारत पहुँचने की उम्मीद है।  

    • इन वेंटिलेटरों का खर्च वर्तमान में भारत के लिये घोषित 5.9 मिलियन अमेरिकी डॉलर की सहायता के तहत यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (United States Agency for International Development-USAID) द्वारा वहन किया जाएगा।
  • आर्थिक सहायता: 
    • अमेरिका के रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (Centers for Disease Control and Prevention-CDC) द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, भारत सरकार की सहमति और सहयोग से COVID-19 की रोकथाम, तैयारी और प्रतिक्रिया गतिविधियों के लिये 3.6 मिलियन अमेरिकी डॉलर की अतिरिक्त सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।
    • इसके तहत भारत सरकार की अनुमति के आधार पर प्रयोगशालाओं और शोध संस्थानों को सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।

चुनौतियाँ:  

  • CDC द्वारा भारतीय प्रयोगशालाओं और शोध संस्थानों को सहायता उपलब्ध कराने की योजना विलंबित हो सकती है क्योंकि दिसंबर 2019 में केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा CDC को एक ‘वाॅच लिस्ट’ (Watch List) में रखा गया है।
    •  ध्यातव्य है कि CDC द्वारा ‘मणिपाल इंस्टिट्यूट ऑफ वायरस रिसर्च’ (Manipal Centre for Virus Research-MCVR) के साथ निपाह वायरस (Nipah Virus) पर एक शोध शुरू करने से पहले भारत सरकार की अनुमति न लेने के कारण यह कार्रवाई की गई थी।  
  • भारत में स्थित कोई भी गैर सरकारी संगठन (Non Governmental Organization-NGO) ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010’ {Foreign Contribution Regulation Act (FCRA), 2010} के तहत पंजीकरण करा कर विदेशी अनुदान प्राप्त कर सकता है। 
  • परंतु यदि किसी विदेशी दाता (Foreign Donor) को  ‘वाॅच लिस्ट’ या ‘पूर्व अनुमति’ की सूची में रखा गया हो तो ऐसी स्थिति में केंद्रीय गृह मंत्रालय की अनुमति के बगैर विदेशी दाता द्वारा सीधे धनराशि नहीं भेजी जा सकती है।    
  • हालाँकि CDC ने स्पष्ट किया है कि वह इस योजना के लिये भारत सरकार द्वारा अनुमति प्राप्त संस्थानों के साथ ही कार्य करेगी। 

स्रोत: द हिंदू  


सामाजिक न्याय

राजीव गांधी किसान न्याय योजना

प्रीलिम्स के लिये

राजीव गांधी किसान न्याय योजना

मेन्स के लिये

कमज़ोर और संवेदनशील वर्ग के संरक्षण हेतु राज्य सरकारों के प्रयास

चर्चा में क्यों?

छत्तीसगढ़ सरकार राज्य में किसानों को अधिक फसल उत्पादन हेतु प्रोत्साहित करने और फसल की सही कीमत प्राप्त करने में मदद करने के लिये ‘राजीव गांधी किसान न्याय’ (Rajiv Gandhi Kisan Nyay) योजना शुरू करने की योजना बना रही है।

योजना संबंधी प्रमुख बिंदु

  • इस योजना के तहत राज्य के लगभग 19 लाख किसानों को शामिल किया जाएगा।
  • औपचारिक तौर पर इस योजना का शुभारंभ 21 मई, 2020 को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पुण्यतिथि के अवसर पर किया जाएगा।
  • किसानों को फसलों की खेती के लिये प्रोत्साहित करने के लिये इस योजना के अंतर्गत धान, मक्का और गन्ना आदि की फसल के लिये 10 हज़ार रुपए प्रति एकड़ की दर से प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से अनुदान राशि सीधे किसानों के खाते में दी जाएगी।
  • इस योजना के तहत 18,34,834 किसानों को धान की फसल के लिये पहली किस्त के रूप में 1,500 करोड़ रुपये प्रदान किए जाएंगे।
  • राज्य सरकार ने इस योजना के लिये बजट में राज्य सरकार द्वारा कुल 5,700 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है।

उद्देश्य 

  • इस योजना का उद्देश्य प्रत्यक्ष बैंक हस्तांतरण के माध्यम से राज्य के किसानों के लिये ‘न्यूनतम आय उपलब्धता’ सुनिश्चित करना है।
  • इस योजना का कार्यान्वयन मुख्य तौर पर फसल उत्पादन को प्रोत्साहित करने तथा किसानों को कृषि सहायता प्रदान करने हेतु किया जाएगा।

छत्तीसगढ़ सरकार के अन्य प्रयास

  • ध्यातव्य है कि इससे पूर्व छत्तीसगढ़ सरकार ने लगभग 18 लाख किसानों के लिये 8,800 करोड़ रुपए का ऋण माफ किया था। 
  • इसके अतिरिक्त राज्य में किसानों के लिये कृषि भूमि अधिग्रहण के मूल्य का चार गुना मुआवज़ा और सिंचाई कर में माफी जैसे विभिन्न कदम उठाए गए हैं।
  • लॉकडाउन अवधि के दौरान, छत्तीसगढ़ सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत काफी मात्रा में रोज़गार का सृजन किया है, जिससे राज्य के 23 लाख ग्रामीणों को प्रत्यक्ष लाभ हुआ।
  • वहीं राज्य सरकार ने वनोपज पर निर्भर लोगों के लिये भी कई कार्यक्रमों का आयोजन किया है। विदित हो कि पूरे भारत में छत्तीसगढ़ की कुल वन उपज का 98 प्रतिशत हिस्सा है।
    • इसी तथ्य के मद्देनज़र राज्य सरकार ने वनोपज पर निर्भर लोगों को 649 करोड़ रुपए का भुगतान करने के लिये प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
  • आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ का लगभग 44 प्रतिशत क्षेत्र जंगलों से घिरा हुआ है और राज्य की तकरीबन 31 प्रतिशत आबादी आदिवासी समुदायों की है।
    • राज्य में लाखों परिवारों के लिये वन उपज आय का प्रमुख स्रोत है।
  • आदिवासियों की आय बढ़ाने के लिये छत्तीसगढ़ सरकार ने सही कीमत पर वन उपज की खरीद सुनिश्चित की है, जिससे आदिवासियों को काफी लाभ प्राप्त हुआ है, इसके साथ ही सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर खरीदी जाने वाली वन उपज की संख्या 7 से बढ़ाकर 25 कर दी गई है।

आगे की राह

  • मौजूदा समय में छत्तीसगढ़ समेत भारत के सभी राज्यों में कोरोनावायरस का संक्रमण तेज़ी से फैलता जा रहा है। नवीनतम आँकड़ों के अनुसार, छत्तीसगढ़ में कोरोना वायरस (COVID-19) संक्रमण के कुल 93 मामले सामने आए हैं।
  • ध्यातव्य है कि छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा COVID-19 से सर्वाधिक प्रभावित और संवेदनशील वर्ग के लिये विभिन्न सराहनीय प्रयास किये जा रहे हैं।
  • आवश्यक है कि देश के अन्य हिस्सों में भी छत्तीसगढ़ सरकार की नीतियों का अनुसरण करते हुए कमज़ोर और संवेदनशील वर्ग को ध्यान में रखकर नीति निर्माण के कार्य को संपन्न किया जाए।

स्रोत: बिज़नेस लाइन


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

श्रीलंका ऋण संकट

प्रीलिम्स के लिये 

‘मित्र शक्ति’, ‘स्लिनेक्स’

मेन्स के लिये 

भारत-श्रीलंका संबंध, हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता  

चर्चा में क्यों?

श्रीलंका अपनी आर्थिक और सैन्य शक्ति के माध्यम से COVID-19 महामारी से जूझते हुए चीन द्वारा दिये गए ऋण को पूरा करने की तैयारी कर रहा है, जिसमें से 2.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि का भुगतान इसी वर्ष किया जाना है। 

प्रमुख बिंदु: 

  • श्रीलंका में COVID-19 महामारी के कारण स्वास्थ्य तंत्र पर बढ़े दबाव के साथ ही देश के विदेशी मुद्रा भंडार में भारी गिरावट देखने को मिली है।
  • श्रीलंका की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से निर्यात, पर्यटन और प्रवासी कामगारों द्वारा प्रेषित धन पर आधारित है।
  • हाल ही में श्रीलंका के केंद्रीय बैंक ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को मज़बूती प्रदान करने के लिये भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India-RBI) से 400 मिलियन अमेरिकी डॉलर की मुद्रा हस्तांतरण का प्रस्ताव किया था।
  • श्रीलंका ने इससे पहले भी RBI से मुद्रा हस्तांतरण किया है परंतु इस वर्ष श्रीलंका को अपने ऋण को चुकाने के लिये विदेशी मुद्रा भंडार से बड़ी धनराशि खर्च करनी होगी, जो वर्ष 2019 में देश की जीडीपी का लगभग 42.6% है।

श्रीलंका ऋण संकट: 

  • COVID-19 महामारी से पहले ही श्रीलंका का बढ़ता ऋण देश के लिये एक बड़ी चुनौती बन गया था, इस महामारी से पहले ही श्रीलंका ने चीन और भारत से ऋण भुगतान पर अस्थायी स्थगन (Moratorium) की अपील की थी।
  • श्रीलंका के पास वर्तमान में भारत का लगभग 960 मिलियन अमेरिकी डॉलर का ऋण बकाया है जबकि वर्ष 2018 तक श्रीलंका द्वारा चीन से लिया गया ऋण 5 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया था।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, श्रीलंका का ऋण संकट मूल रूप से चीन से ही संबंधित नहीं है बल्कि श्रीलंका द्वारा अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार से लिया गया भारी ऋण भी देश के लिये एक बड़ी समस्या है।
  • वर्ष 2018 के आँकड़ों के अनुसार, श्रीलंका द्वारा वित्तीय बाज़ार से लिया गया ऋण बहुपक्षीय करदाताओं {विश्व बैंक, अंतर्राराष्ट्रीय मुद्रा कोष’ (International Monetary Fund-IMF) आदि} और द्विपक्षीय करदाताओं (चीन, जापान और भारत जैसे देश) से प्राप्त ऋण से बहुत अधिक था। 
  • विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रीस और अर्जेंटीना जैसे देशों की तुलना में श्रीलंका की आर्थिक स्थिति अभी ठीक है क्योंकि यह अपने मुद्रा भंडार, स्थानीय ऋण और नई मुद्रा छाप कर अपने स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय दायित्त्वों को पूरा करने में सफल रहा है।
  • हालाँकि श्रीलंका द्वारा संप्रभु बॉण्ड (Sovereign Bond) के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार से लिया गया ऋण एक बड़ी चिंता का विषय है।  
    • श्रीलंका द्वारा अंतर्राष्ट्रीय संप्रभु बॉण्ड के माध्यम से लिये गए 1 बिलियन डॉलर के ऋण की अवधि अक्तूबर माह में पूरी हो जाएगी जो श्रीलंका के संकट को बढ़ा सकता है।

श्रीलंका द्वारा ऋण संकट से उबरने के प्रयास:

  • हाल ही में श्रीलंका के पूर्व प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे के आर्थिक दबाव को स्वीकार करते हुए यह प्रस्ताव रखा कि इस संकट की स्थिति में ‘दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन’ यानी सार्क को लंदन क्लब (अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाज़ार में निजी करदाताओं का एक अनौपचारिक समूह) से बातचीत कर समाधान का प्रयास करना चाहिये।
  • श्रीलंका के केंद्रीय बैंक के अनुसार, वर्तमान ऋण के भुगतान के लिये कुछ दीर्घकालिक वित्तीय प्रबंध किये गए हैं, इन प्रयासों के माध्यम से श्रीलंका को मार्च 2020 में 500 मिलियन डॉलर प्राप्त हुए थे और जल्दी ही 300 मिलियन डॉलर का अतिरिक्त सहयोग प्राप्त होने की उम्मीद है।
  • श्रीलंका के केंद्रीय बैंक द्वारा RBI के अलावा अन्य प्रमुख केंद्रीय बैंकों के साथ भी मुद्रा हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी होने के अंतिम चरण में है, साथ ही IMF और अन्य अंतर्राष्ट्रीय करदाताओं के साथ समझौते के प्रयास किये जा रहे हैं।

भारत और श्रीलंका:   

  •  ऐतिहासिक रूप से भारत और श्रीलंका के बीच सकारात्मक संबंध रहे हैं और भारत ने पूर्व में कई अन्य मौकों पर श्रीलंका को आर्थिक मदद उपलब्ध कराई है।
  • वर्ष 2000 की मुक्त व्यापार संधि के बाद दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में काफी वृद्धि हुई है।     
  • इस दौरान श्रीलंका को होने वाला भारतीय निर्यात 600 मिलियन अमेरिकी डॉलर (वर्ष 2001) से बढ़कर 4495 मिलियन अमेरिकी डॉलर (वर्ष 2018) तक पहुँच गया।
  • हाल के वर्षों में रक्षा के क्षेत्र में भारत और श्रीलंका के बीच सहयोग में वृद्धि हुई है, दोनों देशों के बीच सैन्य अभ्यास ‘मित्र शक्ति’ और नौसैनिक अभ्यास ‘स्लिनेक्स’ (SLINEX) का आयोजन किया जाता है। साथ ही श्रीलंका की सेना के 60% से अधिक सदस्य अपने ‘यंग ऑफिसर्स कोर्स’ (Young Officers’ Course), जूनियर और सीनियर कमांड कोर्स का प्रशिक्षण भारत से प्राप्त करते हैं। 
  • हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता की दृष्टि से भी भारत-श्रीलंका संबंधों का मज़बूत होना बहुत ही आवश्यक है।    
  • हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में श्रीलंका में बढ़ते चीनी निवेश और वर्ष 2019 में भारत द्वारा ‘मताला एयरपोर्ट’ संचालन के प्रस्ताव के रद्द होने से कुछ चिंताएँ बढ़ी हैं।

आगे की राह:    

  • हाल ही में विश्व बैंक और IMF द्वारा जारी अनुमानों के अनुसार, COVID-19 महामारी के कारण श्रीलंका की अर्थव्यवस्था में 3% की गिरावट आने की संभावना है, अतः विदेशी ऋण को पूरा करने के साथ ही श्रीलंका सरकार को स्थानीय ज़रूरतों पर भी ध्यान देना होगा।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में देश के ऋण में वृद्धि के साथ ही सरकार की आर्थिक नीतियों पर प्रश्न उठने लगे हैं, ऐसे में वर्तमान आर्थिक संकट से निपटने के साथ ही अब समय है कि सरकार अपनी आर्थिक नीतियों में कुछ मूलभूत बदलाव लाए और ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा कृषि पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये।
  • हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती सक्रियता भारत के लिये एक चिंता का विषय है साथ ही हाल के वर्षों में श्रीलंका की राजनीतिक अस्थिरता से भारत-श्रीलंका संबंधों में कुछ अनिश्चितताएँ दिखने लगी हैं , अतः भारत द्वारा श्रीलंका के वर्तमान आर्थिक संकट में संभावित सहायता के साथ ही दोनों देशों के संबंधों में मज़बूती के लिये समन्वय और अन्य प्रयासों में वृद्धि की जानी चाहिये।

स्रोत: द हिंदू


जीव विज्ञान और पर्यावरण

अपशिष्ट मुक्त शहरों की स्टार रेटिंग

प्रीलिम्स के लिये:

अपशिष्ट मुक्त शहरों की स्टार रेटिंग

मेन्स के लिये:

अपशिष्ट मुक्त शहरों की स्टार रेटिंग तथा इसका महत्त्व 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (Ministry of Housing and Urban Affairs- MoHUA) द्वारा वर्ष 2019-20 के ‘अपशिष्ट मुक्त शहरों की स्टार रेटिंग’ परिणाम प्रकाशित किये गए।

प्रमुख बिंदु:

  • उल्लेखनीय है कि 6 शहरों को 5 स्टार, 65 शहरों को 3 स्टार और 70 शहरों को 1 स्टार दिया गया है।
  • अंबिकापुर, राजकोट, सूरत, मैसूर, इंदौर और नवी मुंबई को 5 स्टार रेटिंग दिया गया।
  • स्टार रेटिंग मूल्यांकन हेतु 1435 शहरों ने आवेदन किया था जिनका मूल्यांकन कर 141 शहरों को स्टार रेटिंग के साथ प्रमाणित किया गया है।
  • स्टार रेटिंग संबंधी नियमों को समग्र रूप से तैयार किया गया है जिसमें नालियों और जल निकायों की सफाई, प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन, निर्माण तथा विध्वंस अपशिष्ट इत्यादि जैसे घटक शामिल हैं। गौरतलब है कि ये घटक किसी शहर को अपशिष्ट मुक्त बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • COVID-19 से उत्पन्न समस्याओं से निपटने हेतु स्वच्छता और प्रभावी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को भी अत्यधिक महत्त्व दिया गया है।
  • स्टार रेटिंग को तीन चरणों की मूल्यांकन प्रक्रिया के आधार पर तैयार किया गया है।
    • प्रथम चरण- शहरी स्थानीय निकाय एक विशेष समय-सीमा के तहत स्टार रेटिंग संबंधी दस्तावेज़ों को पोर्टल पर अपलोड करते हैं।
    • द्वितीय चरण- मंत्रालय द्वारा चयनित और नियुक्त तृतीय पक्ष एजेंसी से मूल्यांकन कराया जाता है।
    • तृतीय चरण- क्षेत्र में जाकर एक स्वतंत्र पर्यवेक्षक द्वारा इन्हें सत्यापित किया जाता है।
  • अपशिष्ट मुक्त शहरों की स्टार रेटिंग हेतु एक संशोधित प्रोटोकॉल भी लॉन्च किया गया है।
  • इस नए संशोधित प्रोटोकॉल में ‘वार्ड-वाइज़ जिओ-मैपिंग’ (Ward-wise Geo-mapping), सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के माध्यम से ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की निगरानी करना तथा 50 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों को कई क्षेत्रों में विभाजित कर रेटिंग की जाएगी।
  • स्वच्छ भारत मिशन-शहरी के तहत भारत को खुले में शौच मुक्त बनाने तथा कम-से-कम प्रत्येक शहर को 3 स्टार रेटिंग में लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
  • ध्यातव्य है कि जनवरी 2018 में शहरों को अपशिष्ट मुक्त बनाने, शहरों के तंत्र को संस्थागत रूप देने और स्वच्छता के उच्च स्तर को प्राप्त करने हेतु शहरों को प्रेरित करने को ध्यान में रखते हुए स्टार रेटिंग प्रोटोकॉल लॉन्च किया गया था।

स्टार-रेटिंग प्रोटोकॉल का लक्ष्य:

  • सभी शहरों को अपशिष्ट मुक्त बनाना, ताकि किसी भी सार्वजनिक, वाणिज्यिक या आवासीय स्थानों पर (कूड़े के डिब्बे या स्थानांतरण स्टेशनों को छोड़कर) किसी भी प्रकार का कूड़ा-अपशिष्ट न मिलने पाए।
  • अपशिष्ट का 100% वैज्ञानिक रूप से प्रबंधन सुनिश्चित करना।
  • सभी प्रकार के अपशिष्ट को उपचारित करना।
  • सभी शहरों को वैज्ञानिक तरीके से ठोस अपशिष्ट, प्लास्टिक अपशिष्ट और निर्माण गतिविधियों संबंधी अपशिष्ट का प्रबंधन करने योग्य बनाना।

आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय की अन्य पहलें:

  • COVID-19 के मद्देनज़र मंत्रालय ने सभी राज्यों को सार्वजनिक स्थानों की विशेष सफाई करने के साथ ही संक्रमण को रोकने हेतु एकांतवास में रखे गए लोगो के घरों से जैव-चिकित्सा अपशिष्ट के संग्रहण और निपटान हेतु विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किये हैं।
  • बेहद लोकप्रिय नागरिक शिकायत निवारण मंच, स्वच्छता एप (Swachhata App) को भी संशोधित किया गया है। 
  • मंत्रालय ने सफाई कर्मचारियों के लिये व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण, स्वास्थ्य जाँच और नियमित मज़दूरी के भुगतान के संबंध में भी दिशा-निर्देश जारी किये हैं।
  • लगभग 50 लाख विक्रेताओं (स्ट्रीट वेंडर्स) की मदद हेतु माइक्रो-क्रेडिट की भी सुविधा शुरू की जा रही है।  
  • विनिर्माण उद्योग में काम कर रहे प्रवासी श्रमिकों को मदद हेतु ‘अफोर्डेबल रेंटल हाउसिंग कॉम्प्लेक्स’ (Affordable Rental Housing Complexes- AHRCs) लॉन्च किया जाएगा।

स्रोत: पीआईबी


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

COVID-19 और अश्वगंधा

प्रीलिम्स के लिये:

अश्वगंधा, प्रोपोलिस

मेन्स के लिये:

COVID-19 तथा अश्वगंधा और प्रोपोलिस से संबंधित विषय 

चर्चा में क्यों?

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली’ (Indian Institutes Of Technology- Delhi) और ‘नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड इंडस्ट्रियल साइंस एंड टेक्नोलॉजी’ [National Institute of Advanced Industrial Science and Technology (AIST)- Japan] द्वारा किये गए एक संयुक्त अध्ययन के अनुसार, अश्वगंधा (Ashwagandha) और ‘प्रोपोलिस’ (Propolis) COVID-19 हेतु दवा में मददगार साबित हो सकते हैं।  

प्रमुख बिंदु: 

  • इस शोधकार्य को ‘बायोमॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर एंड डायनेमिक्स’ (Biomolecular Structure and Dynamics) पत्रिका में प्रकाशित किया जाएगा। 
  • IIT दिल्ली और AIST के शोधकर्त्ताओं ने अश्वगंधा और प्रोपोलिस आधारित यौगिकों का उपयोग COVID-19 के एंजाइम को लक्षित करने के लिये किया है, जिसे ‘मेन प्रोटीज़’ (Main Protease) या ‘एम्प्रो’ (Mpro) के रूप में जाना जाता है। 
  • वायरस के प्रतिलिपि निर्माण में ‘मेन प्रोटीज़’ (Main Protease) या ‘एम्प्रो’ (Mpro) एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • शोधकर्त्ताओं के अनुसार, ‘विथानोन’ [Withanone (Wi-N)] और ‘कैफ्फेसिक एसिड फेनेथाइल एस्टर’ (Caffeic Acid Phenethyl Ester-CAPE) एम्प्रो की पुनरावृत्ति को रोकने में सक्षम है।
    • ‘विथानोन’ [Withanone (Wi-N)] अश्वगंधा से प्राप्त एक प्राकृतिक यौगिक है। 
    • ‘कैफ्फेसिक एसिड फेनेथाइल एस्टर’ (Caffeic Acid Phenethyl Ester-CAPE) न्यूज़ीलैंड प्रोपोलिस का एक सक्रिय संघटक है।

अश्वगंधा (Ashwagandha):

  • अश्वगंधा (वैज्ञानिक नाम- विथानिया सोमनीफेरा) एक औषधीय जड़ी बूटी है, जिसे प्रतिरक्षा बढ़ाने हेतु उपयोग में लाया जाता है।
  • अश्वगंधा आम तौर पर एक चूर्ण के रूप में भी उपलब्ध होता है जिसे जल, घी या शहद के साथ मिश्रित किया जाता है। 
  • यह मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के कार्य में बढ़ोतरी करने के साथ ही याददाश्त में भी सुधार करता है।
  • यह स्वस्थ यौन और प्रजनन संतुलन को बढ़ावा देने हेतु प्रजनन प्रणाली में भी सुधार करता है।
  • अश्वगंधा तनाव को भी दूर करने में मदद करता है।

प्रोपोलिस (Propolis):

  • प्रोपोलिस एक प्राकृतिक राल का मिश्रण है जो मधुमक्खियों द्वारा पौधों या कलियों से एकत्रित किये गए पदार्थों से उत्पादित होता है। 
  • मधुमक्खियाँ मुख्य रूप से चिनार से प्रोपोलिस एकत्रित करती हैं।
  • मधुमक्खियाँ अपने छत्ते के निर्माण और मरम्मत में भी प्रोपोलिस का उपयोग करती हैं।

भारत सरकार की कुछ अन्य पहलें:

  • ध्यातव्य है कि भारत सरकार ने COVID-19 के मद्देनज़र कुछ आयुर्वेदिक दवाओं पर नैदानिक ​​शोध अध्ययनों को शुरू करने हेतु एक टास्क फोर्स का गठन किया है।
  • आयुष संजीवनी एप (AYUSH Sanjivani App):
    • ‘आयुष संजीवनी एप’ को आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (Ministry of Electronics and Information Technology- MEITY) द्वारा विकसित किया गया है। 
    • इस एप से लोगों के बीच आयुष से संबंधित सिफारिशों एवं विभिन्न कदमों की स्वीकार्यता तथा उपयोग के साथ COVID-19 के उन्मूलन में इनके प्रभाव से जुड़ी जानकारियाँ जुटाने में मदद मिलेगी।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


जीव विज्ञान और पर्यावरण

वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारी गिरावट

प्रीलिम्स के लिये:

वैश्विक कार्बन उत्सर्जन

मेन्स के लिये:

COVID-19 महामारी और कार्बन उत्सर्जन, भारत द्वारा जलवायु परिवर्तन की दिशा में उठाए गए कदम

चर्चा में क्यों?

‘अंतर्राष्ट्रीय जलवायु और पर्यावरण अनुसंधान केंद्र’ संगठन (Center for International Climate and Environmental Research- CICERO) नार्वे द्वारा किये गए अध्ययन के अनुसार, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वर्ष 2020 मे वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई है।

प्रमुख केंद्र:

  • CICERO द्वारा COVID-19 महामारी के कारण लगाए गए लॉकडाउन के ‘कार्बन उत्सर्जन’ पर प्रभाव का विश्लेषण किया गया है।
  • शोध के अनुसार, वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में वर्ष 2020 में 4.2-7.5% कमी होने का अनुमान है।
  • अगर कार्बन उत्सर्जन में होने वाले गिरावट का सापेक्ष रूप से अध्ययन किया जाए तो इस प्रकार की उत्सर्जन गिरावट द्वितीय विश्व युद्ध से पूर्व में हुई थी।

कार्बन उत्सर्जन में कमी के कारण: 

  • विश्व में अनेक देशों द्वारा लगाए गए लॉकडाउन के कारण वैश्विक परिवहन को काफी हद तक प्रतिबंधित कर दिया गया है। जिसके कारण वैश्विक ऊर्जा मांग में गिरावट  देखी गई है। यद्यपि घरेलू बिजली की मांग में वृद्धि हुई है परंतु वाणिज्यिक मांग में गिरावट आई है। 

वैश्विक ऊर्जा मांग में कमी:

  • वर्ष 2020 में तेल की कीमतों में औसतन 9% या इससे अधिक की गिरावट हुई है। कोयले की मांग में भी 8% तक की कमी हो सकती है, क्योंकि बिजली की मांग में लगभग 5% कमी देखी जा सकती है। बिजली और औद्योगिक कार्यों में गैस की मांग कम होने से वर्ष 2020 की पहली तिमाही की तुलना में आने वाली तिमाही में और अधिक गिरावट देखी जा सकती है।

उत्सर्जन का कमी का संचयी प्रभाव:

  • कार्बन उत्सर्जन में आई गिरावट का मतलब यह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन की दर धीमी हो गई है या यह उत्सर्जन गिरावट वैश्विक प्रयासों का परिणाम है। यदि उत्सर्जन में 5% तक की भी गिरावट आती है तो इसका जलवायु परिवर्तन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं होगा क्योंकि जलवायु परिवर्तन एक ‘संचयी समस्या’ (Cumulative Problem) है।
  • वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में 5% की गिरावट का वैश्विक तापन पर केवल 0.001°C तापमान कमी के बराबर प्रभाव रहता है।

वन्स-इन-ए-सेंचुरी क्राइसिस

(0nce-in-a-century crisis) रिपोर्ट:

  • वैश्विक ऊर्जा मांग पर महामारी के प्रभाव का पहले भी विश्लेषण किया गया है। 'अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी' ( International Energy Agency- IEA) ने 'वन्स-इन-ए-सेंचुरी क्राइसिस’ (once-in-a-century crisis) रिपोर्ट में CO2 उत्सर्जन पर महामारी के प्रभाव का विश्लेषण किया है।
  • रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 की पहली तिमाही में कार्बन-गहन ईंधन की मांग में बड़ी गिरावट हुई है। वर्ष 2019 की तुलना में वर्ष 2020 में कार्बन उत्सर्जन में 5% की कमी दर्ज की गई है।

अधिकतम कार्बन उत्सर्जन कमी वाले क्षेत्र: 

  • कार्बन उत्सर्जन में उन क्षेत्रों में सबसे अधिक गिरावट दर्ज की गई जिन क्षेत्रों में महामारी का प्रभाव सबसे अधिक रहा है। उदाहरणत: चीन और यूरोप में उत्सर्जन में 8% की गिरावट जबकि अमेरिका में 9% की गिरावट दर्ज की गई है।
  • पूर्ण लॉकडाउन वाले देशों में प्रति सप्ताह ऊर्जा की मांग में औसतन 25% की गिरावट हो रही है, जबकि आंशिक लॉकडाउन में प्रति सप्ताह लगभग 18% की गिरावट दर्ज की गई है।

भारत में कार्बन उत्सर्जन में कमी:

  • भारत में लॉकडाउन के परिणामस्वरूप ऊर्जा मांग में 30% से अधिक की कमी देखी गई तथा लॉकडाउन को आगे बढ़ाने पर प्रति सप्ताह के साथ ऊर्जा मांग में 0.6% की गिरावट हुई है।

वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र तथा कार्बन उत्सर्जन: 

  • ‘अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी’ द्वारा जारी ‘वैश्विक ऊर्जा और कार्बन डाइऑक्साइड स्थिति रिपोर्ट’ (Global Energy & CO2 Status Report) के अनुसार:
    • संयुक्त राज्य अमेरिका 14% के योगदान के साथ विश्व में सबसे अधिक कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन के लिये ज़िम्मेदार देश है।
    • हाल ही में हुई ऊर्जा मांग में वृद्धि में लगभग 70% योगदान चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और भारत का है।

OECD-Countries

भारत द्वारा उठाए गए कदम:

  • जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना’ (NAPCC) को वर्ष 2008 में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य जनता के प्रतिनिधियों, सरकार की विभिन्न एजेंसियों, वैज्ञानिकों, उद्योग और समुदायों को जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न खतरे और इससे मुकाबला करने के उपायों के बारे में जागरूक करना है। इस कार्ययोजना में मुख्यतः 8 मिशन शामिल हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन की शुरुआत भारत और फ्राँस ने वर्ष 2015 को पेरिस जलवायु सम्‍मेलन के दौरान की थी। ISA के प्रमुख उद्देश्यों में वैश्विक स्तर पर 1000 गीगावाट से अधिक सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता प्राप्त करना और 2030 तक सौर ऊर्जा में निवेश के लिये लगभग 1000 बिलियन डॉलर की राशि को जुटाना शामिल है।
  • पेरिस समझौते के अंतर्गत ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (Nationally Determined Contribution- NDC) की संकल्पना को प्रस्तावित किया गया था जिसमें प्रत्येक राष्ट्र से यह अपेक्षा की गई है कि वह ऐच्छिक तौर पर अपने लिये उत्सर्जन के लक्ष्यों का निर्धारण करे।

आगे की राह:

  • वर्तमान COVID-19 महामारी के कारण होने वाली कार्बन उत्सर्जन में कमी अल्पकालिक है। दीर्घकालिक रूप से संचयी जलवायु परिवर्तन पर इसका बहुत कम प्रभाव होगा, अत: दीर्घकालिक रणनीतियों के निर्माण की आवश्यकता है।
  • महामारी से आवश्यक सीख लेते हुए वैश्विक ऊर्जा संसाधनों के विकल्पों पर व्यापक अंतर्राष्ट्रीय सहयोग स्थापित किया जाना चाहिये। 
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तथा समाधान पर चर्चा करते हुए विश्व में विभिन्न देशों द्वारा उठाए गए कदमों की समीक्षा कीजिये।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


जीव विज्ञान और पर्यावरण

अंडमान-दुर्लभ ताड़ का संरक्षण

प्रीलिम्स के लिये:

पिनंगा अंडमानेंसिस

मेन्स के लिये:

जैव-विविधता संरक्षण की पद्धतियाँ 

चर्चा में क्यों?

दक्षिणी अंडमान द्वीप के दुर्लभ ताड़/पाम को ‘जवाहरलाल नेहरू ट्रॉपिकल बोटैनिकल गार्डन एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट’ (Jawaharlal Nehru Tropical Botanic Garden and Research Institute- JNTBGRI) की मदद से पलोदे (Palode) (केरल) में उगाया जाएगा।

प्रमुख बिंदु:

  • पिनंगा अंडमानेंसिस (Pinanga andamanensis) जिसे एक समय विलुप्त प्रजाति के रूप में दर्ज किया गया था। यह एरेका ताड़ (Areca Palm) से संबंधित है। दक्षिण अंडमान के 'माउंट हैरियट नेशनल पार्क' के एक छोटे क्षेत्र में 600 पौधे पाए जाते है।
  • भारतीय मुख्य भूमि पर ‘अंडमान द्वीप के दुर्लभ ताड़’ के जर्मप्लाज़्म का संरक्षण किया जाएगा ताकि प्राकृतिक आपदा के समय यदि अंडमान द्वीप से यह नष्ट भी हो जाए तो इसका निरंतर अस्तित्त्व सुनिश्चित हो सके।

पिनंगा अंडमानेंसिस (Pinanga andamanensis):

  • ‘पिनंगा अंडमानेंसिस’ ‘चरम लुप्तप्राय प्रजाति’ (Critically Endangered Species) है, जो अंडमान द्वीप समूह के स्थानिक लुप्तप्राय प्रजातियों में से एक है। 
  • सर्वप्रथम वर्ष 1934 में ‘इतालवी वनस्पतिशास्त्री’ ओडोराडो बेस्करी द्वारा इसे वर्णित किया गया था।
  • वर्ष 1992 में इसे विलुप्त मान लिया गया था।

ताड़ के पेड़ का नाम पिनंगा क्यों?

  • यह नाम 'पेनांग ’से लिया गया है, जो मलेशिया का एक राज्य है। पिनांग का मूल 'पुलाऊ पिनांग' (Pulau Pinang) में है, जिसका अर्थ है 'अरेका नट पाम का द्वीप' (Island of the Areca Nut Palm)।

जैव विविधता संरक्षण की विधियाँ:

स्व-स्थानिक संरक्षण (In Situ Conservation):

  • इस प्रकार के संरक्षण के अंतर्गत पौधों एवं प्राणियों को उनके प्राकृतिक वास स्थान अथवा सुरक्षित क्षेत्रों में संरक्षित किया जाता है। संरक्षित क्षेत्र भूमि या समुद्र के वे क्षेत्र होते हैं जो संरक्षण के लिये समर्पित हैं तथा जैव विविधता को बनाए रखते हैं।

गैर-स्थानिक संरक्षण (Ex Situ Conservation):

  • गैर-स्थानिक संरक्षण विधि में वनस्पति या जीन को मूल वातावरण से अलग स्थान पर संरक्षित किया जाता है।
  • इसमें चिड़ियाघर, उद्यान, नर्सरी, जीन पूल आदि में पूर्ण नियंत्रित स्थितियों में प्रजातियों का संरक्षण किया जाता है।

गैर-स्थानिक संरक्षण की विधियाँ:

  • गैर-स्थानिक संरक्षण रणनीतियों में निम्नलिखित विधियाँ शामिल हैं 
    • वनस्पति उद्यान (Botanical Garden) 
    • प्राणी उद्यान (Zoological Garden)
    • जीन, पराग, बीज आदि का संरक्षण (Conservation of Gene, Pollen, Seed etc.)
    • टिशू कल्चर (Tissue Culture)
    • डीएनए बैंक (DNA bank)

जीन बैंकः 

  • आनुवांशिक संसाधनों का गैर-स्थानिक संरक्षण जीन बैंकों एवं बीज बैंकों द्वारा किया जाता है। ‘राष्ट्रीय पादप आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो’ (The National Bureau of Plant Genetic Resources, NBPGR), नई दिल्ली फसल के पौधों के जीन पूल तथा उगाई जाने वाली किस्मों के बीजों को संरक्षित रखता है।  
  • ‘राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो’ (The National Bureau of Animal Genetic Resources) करनाल (हरियाणा), पालतू पशुओं के आनुवांशिक पदार्थ का रखरखाव करता है।  
  • राष्ट्रीय मत्स्य आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो (The National Bureau of Fish Genetic Resources), लखनऊ मत्स्यन के संरक्षण के लिये समर्पित है।

गैर-स्थानिक संरक्षण का महत्त्व:

  • यह प्रजातियों को लंबा जीवनकाल तथा प्रजनन गतिविधि के लिये स्थान प्रदान करता है।
  • संरक्षण प्रणालियों में आनुवंशिक तकनीकों का उपयोग किया जा सकता है।
  • जीवों की प्रजातियों को फिर से वन में स्थानापन्न किया जा सकता है।

जलवायु परिवर्तन और गैर-स्थानिक संरक्षण:

  • वर्तमान में सभी पारिस्थितिक तंत्र, जलवायु परिवर्तन के प्रति सुभेद्य हैं, और विशेष रूप से समुद्र तटीय वनों में गिरावट आ सकती है। जलवायु परिवर्तन मॉडलों के अनुसार, वैश्विक प्रजातियों तथा उनके आवासों के वितरण में तीव्र तथा व्यापक बदलाव हो सकता है।
  • हालांकि जलवायु परिवर्तन में वृद्धि, निवास स्थान का विखंडन कारण प्रजातियों की अनुकूलन क्षमता कम हो जाती है। अत: प्रजातियों के संरक्षण में मानव की भूमिका लगातार बढ़ रही है।

 गैर-स्थानिक प्रजातीय संरक्षण की सीमाएँ:

  • चिड़ियाघर में जानवरों का व्यवहार बड़ी संख्या में लोगों के लगातार भ्रमण पर आने से प्रभावित हो सकता है।
  • यद्यपि गैर-स्थानिक संरक्षण विधियाँ यद्यपि कुछ प्रजातियों के दीर्घकालिक अस्तित्त्व के लिये लाभदायक हो सकती हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन के दौरान जीवों को प्रजनन तथा पुनर्स्थापन के दौरान ठीक से प्रबंधित नहीं होने पर चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

निष्कर्ष:

  • जैव विविधता मानव अस्तित्त्व तथा प्राकृतिक प्रणालियों के अस्तित्त्व के लिये बेहद आवश्यक है, हालाँकि जैव-विविधता को सर्वाधिक नुकसान मानवजनित गतिविधियों के कारण हुआ है है। अत: जैव-विविधता संरक्षण की दिशा में स्व-स्थानिक और गैर-स्थानिक दोनों तरीकों से  संरक्षण की आवश्यकता होती है।

स्रोत: द हिंदू


विविध

Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 20 मई, 2020

WHO का कार्यकारी बोर्ड

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन को विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organization-WHO) के कार्यकारी बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में चुना गया है। वह 22 मई को पदभार ग्रहण करेंगे। डॉ. हर्षवर्धन WHO के कार्यकारी बोर्ड के मौजूदा अध्यक्ष जापान के डॉ. हिरोकी नकातानी (Dr. Hiroki Nakatani) का स्थान लेंगे। उल्लेखनीय है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री होने के नाते COVID-19 से मुकाबले में डॉ. हर्षवर्धन भारत के प्रयासों का नेतृत्त्व कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य के प्रति ज़िम्मेदार संयुक्त राष्ट्र (United Nations-UN) की विशिष्ट संस्था है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के कार्यकारी बोर्ड का मुख्य कार्य विश्व स्वास्थ्य सभा (World Health Assembly) की नीतियों को प्रभावी बनाने हेतु सलाह देना और सभा के कार्य को सुविधाजनक बनाना है। इस कार्यकारी बोर्ड में स्वास्थ्य क्षेत्र में तकनीकी रूप से योग्य 34 व्यक्तियों को शामिल किया जाता है। इन सभी सदस्यों को विश्व स्वास्थ्य सभा द्वारा इस कार्य के लिये चुने गए सदस्य राष्ट्रों द्वारा नामित किया जाता है। उल्लेखनीय है कि कार्यकारी बोर्ड की बैठक का आयोजन एक वर्ष में कम-से-कम दो बार किया जाता है, जिसमें पहली बैठक प्रत्येक वर्ष जनवरी माह में होती है और दूसरी बैठक विश्व स्वास्थ्य सभा की बैठक के तुरंत बाद मई माह में आयोजित की जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की स्थापना वर्ष 1948 में अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य संबंधी कार्यों पर निर्देशक एवं समन्वय प्राधिकरण के रूप में की गई थी।

खतरनाक है कीटाणुनाशक का छिड़काव: WHO

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने विभिन्न देशों को चेतावनी जारी की है कि सतह पर कीटाणुनाशक का छिड़काव करने से कोरोना वायरस (COVID-19) को समाप्त करना संभव नहीं है और यह स्वास्थ्य के लिये भी हानिकारक साबित हो सकता है। WHO ने अपने एक दस्तावेज़ में स्पष्ट तौर पर कहा है कि सड़कों पर कीटनाशक का छिड़काव अप्रभावी हो सकता है। WHO के अनुसार, COVID-19 अथवा किसी अन्य वायरस के कीटाणुओं को मारने के लिये बाहरी स्थानों जैसे- सड़कों और बाज़ारों में कीटनाशक के छिड़काव की सिफारिश नहीं की गई है, क्योंकि गंदगी या मलबे से यह छिड़काव अथवा कीटनाशक निष्क्रिय हो जाता है। WHO ने अपने दस्तावेज़ में स्पष्ट तौर पर कहा कि किसी भी परिस्थिति में किसी व्यक्ति को संक्रमणमुक्त करने के लिये कीटाणुनाशक के प्रयोग की सिफारिश नहीं की गई है। यदि ऐसा किया जाता है तो यह उस व्यक्ति के लिये शारीरिक अथवा मानसिक रूप से हानिकारक हो सकता है। दस्तावेज़ के अनुसार, यदि व्यक्ति पर क्लोरीन अथवा किसी अन्य ज़हरीले रसायनों का छिड़काव किया जाता है तो उसे आंखों और त्वचा में जलन जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। WHO के मुताबिक यदि सतह पर कीटाणुनाशक का प्रयोग किया जाना है तो यह कीटाणुनाशक में भिगोए हुए किसी कपड़े या पोंछे के साथ किया जाना चाहिये। 

विश्व मधुमक्खी दिवस

प्रत्येक वर्ष 20 मई को विश्व भर में विश्व मधुमक्खी दिवस (World Bee Day) के रूप में मनाया जाता है। इस दिवस के आयोजन का उद्देश्य मधुमक्खी और अन्य परागणकों जैसे तितलियों, चमगादड़ और हमिंग बर्ड आदि के महत्त्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना है। यह दिवस 18वीं शताब्दी में आधुनिक मधुमक्खी पालन की तकनीक के क्षेत्र में बेहतरीन कार्य करने वाले एंटोन जनसा (Antone Jansa) के जन्मदिन (20 मई, 1734) के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। प्रत्येक वर्ष 20 मई को विश्व मधुमक्खी दिवस के रूप में मनाने के प्रस्ताव को 7 जुलाई, 2017 को इटली में आयोजित खाद्य एवं कृषि संगठन (Food and Agriculture Organization-FAO) के 40वें सत्र में स्वीकृत किया गया था। वर्ष 2020 के लिये ‘Bee Engaged’ विषय को इस दिवस की थीम चुना गया है। विश्व मधुमक्खी दिवस, 2020 की थीम मधुमक्खियों और अन्य परागणकों के संरक्षण पर ज़ोर देता है। 20 मई को विश्व मधुमक्खी दिवस के अवसर पर मधुमक्खी के तमाम उत्पादों के लाभ, उत्पादन बढ़ाने में मधुमक्खियों की भूमिका और किसानों को खेती के साथ-साथ नए व्यवसाय के अवसर मुहैया कराने की संभावनाओं पर चर्चा की जाती है। 

नीलम संजीव रेड्डी

19 मई, 2020 को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन में पूर्व राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि दी है। भारत के छठे राष्ट्रपति और आंध्रप्रदेश के प्रमुख राजनेताओं में से एक नीलम संजीव रेड्डी का जन्म 19 मई, 1913 को आंध्रप्रदेश के अनंतपुर (Anantapur) ज़िले में हुआ था। नीलम संजीव रेड्डी की प्राथमिक शिक्षा अड़यार (मद्रास) से और उसके आगे की शिक्षा अनंतपुर ज़िले के आर्ट्स कॉलेज (Arts College) से हुई थी। कॉलेज के दौरान उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिये अपनी शिक्षा को बीच में ही छोड़ दिया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्होंने सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो जैसे विभिन्न आंदोलनों में बढ चढकर हिस्सा लिया। नीलम संजीव रेड्डी अपने राजनीतिक कैरियर में काॅन्ग्रेस में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहे और आंध्र प्रांतीय काॅन्ग्रेस समिति के सदस्य चुने गए। 26 मार्च, 1977 को नीलम संजीव रेड्डी को सर्वसम्मति से लोकसभा का स्पीकर चुना गया, किंतु 13 जुलाई, 1977 को पद से इस्तीफा दे दिया क्योंकि इन्हें राष्ट्रपति पद हेतु नामांकित किया जा रहा था। 21 जुलाई, 1977 को नीलम संजीव रेड्डी को निर्विरोध राष्ट्रपति के रूप में चुन लिया गया। राष्ट्रपति के रूप में अपने दायित्त्वों के निर्वाह के पश्चात् नीलम संजीव रेड्डी 25 जुलाई, 1982 को कार्यकाल से मुक्त हो गए। पद छोड़ने के लगभग 14 वर्षों बाद 1 जून, 1996 को नीलम संजीव रेड्डी की मृत्यु हो गई।


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