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डेली न्यूज़

  • 19 May, 2020
  • 57 min read
भूगोल

‘उत्तराखंड एक स्वर्ग’ वेबिनार

प्रीलिम्स के लिये:

‘उत्तराखंड एक स्वर्ग’ वेबिनार, देखो अपना देश वेबिनार, नंदा देवी, फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान, ऊपरी गंगा नदी तंत्र 

मेन्स के लिये:

देखो अपना देश वेबिनार

चर्चा में क्यों?

16 अप्रैल, 2020 को  ‘वेबिनार’ (Webinar) श्रृंखला 'देखो अपना देश' (Dekho Apna Desh) के तहत 20वें वेबिनार 'उत्तराखंड एक स्वर्ग' (Uttarakhand Simply Heaven) का आयोजन किया गया।

प्रमुख बिंदु:

  • इस वेबिनार में ‘उत्तराखंड’ के 2 क्षेत्रों केदारखंड (गढ़वाल क्षेत्र) और मनु खंड (कुमाऊँ क्षेत्र) में पर्यटन की संभावनाओं को उजागर किया गया।
  • इसके साथ ही वेबिनार में गंगोत्री, यमुनोत्री, बद्रीनाथ, केदारनाथ, हेमकुंड साहिब और फूलों की घाटी जैसे लोकप्रिय पर्यटक स्थलों को भी विशेष तौर पर दर्शाया गया।
  • वेबिनार में देश के सबसे पुराने राष्ट्रीय पार्क जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, राजाजी टाइगर रिज़र्व,  नंदा देवी राष्ट्रीय पार्क आदि के महत्त्व को भी उजागर किया गया।

वेबिनार (WEBINAR): 

  • वेब कॉन्फ्रेंसिंग शब्द का उपयोग विभिन्न ऑनलाइन सेवाओं के लिये किया जाता है। इसमें वेब कास्ट, वेबिनार (वेब ​​सेमिनार) एवं पीयर-लेवल वेब मीटिंग शामिल हैं। इसे इंटरनेट प्रौद्योगिकियों द्वारा संभव बनाया गया है और इसमें एक प्रेषक से कई रिसीवरों तक संचार एवं बहु स्तरीय संचार के लिये वास्तविक समय बिंदु की अनुमति प्रदान की गई है।

‘देखो अपना देश’ वेबिनार श्रृंखला:

  • भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने 14 अप्रैल, 2020 से ‘देखो अपना देश’ वेबिनार श्रृंखला (‘DEKHO APNA DESH’ WEBINAR SERIES) शुरू की है।
  • वेबिनार का उद्देश्य भारत के गंतव्य स्थलों की जानकारी देना है।
  • ‘देखो अपना देश’ श्रृंखला सत्रों का संचालन इलेक्ट्रॉनिक एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस विभाग की सक्रिय मदद से किया जाता है।
  • इस वेबिनार श्रृंखला के अगले सत्र का शीर्षक ‘फोटोवाल्किंग भोपाल’ (Photowalking Bhopal) है।

वेबिनार (WEBINAR) का आयोजन क्यों?

  • COVID-19 महामारी के कारण पर्यटन क्षेत्र बहुत ज्यादा प्रभावित हुआ है क्योंकि घरेलू स्तर पर या सीमा पार से कोई आवागमन नहीं हो पा रहा है।

 वेबिनार (WEBINAR) का महत्त्व:

  • प्रौद्योगिकी के कारण, स्थानों और गंतव्यों तक आभासी रूप से पहुँचना और बाद के दिनों के लिये अपनी यात्रा की योजना बनाना संभव है। 
  • वर्तमान COVID-19 महामारी के समय में मानव संपर्क को बनाए रखने में प्रौद्योगिकी काम आ रही है।

नंदा देवी और फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान:

  • नंदा देवी और फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान उच्च-तुगंता वाले पश्चिम हिमालयी क्षेत्र में अवस्थित है।
  • नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान भारत के दूसरे सबसे ऊंचे पर्वत नंदा देवी के 7,817 मीटर शिखर क्षेत्र में विस्तृत है।
  • फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान क्षेत्र में अल्पाइन फूलों तथा सुंदर घास के मैदान पाए जाते हैं।
  • दोनों पार्कों में वनस्पतियों एवं जीवों की उच्च विविधता और घनत्व पाया जाता है, जिनमें हिम तेंदुए, हिमालयी कस्तूरी मृग तथा पौधों की प्रजातियों सहित अनेक संकटापन्न प्रजातियाँ पाई जाती हैं।

ऊपरी गंगा नदी तंत्र में संगम:

  • अलकनंदा और भागीरथ:
    • गंगा नदी उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी ज़िले में गोमुख के निकट गंगोत्राी हिमनद से निकलती है। यहाँ यह भागीरथी के नाम से जानी जाती है। यह मध्य व लघु हिमालय श्रेणियों में महाखड्डों का निर्माण करते हुए गुजरती है। अलकनंदा नदी का स्रोत बद्रीनाथ के ऊपर सतोपथ हिमनद है। 
  • देवप्रयाग:
    • देवप्रयाग में भागीरथी, अलकनंदा से मिलती है और इसके बाद गंगा कहलाती है।  
  • विष्णुप्रयाग:
    • अलकनंदा नदी धौली और विष्णु गंगा धाराओं से मिलकर बनती है, जो जोशीमठ या विष्णुप्रयाग में मिलती है।
  • कर्णप्रयाग:
    • अलकनंदा की अन्य सहायक नदी पिंडार है, जो इससे कर्ण प्रयाग में मिलती है।
  • रूद्रप्रयाग: 
    • जबकि मंदाकिनी या काली गंगा अलकनंदा से रूद्रप्रयाग में मिलती है।
    • गंगा नदी हरिद्वार में मैदान में प्रवेश करती है।

Rivers

स्रोत: पीआईबी


भारतीय राजनीति

जम्मू-कश्मीर ग्रांट ऑफ डोमिसाइल सर्टिफिकेट (प्रोसीजर) रूल्स 2020

प्रीलिम्स के लिये

जम्मू-कश्मीर ग्रांट ऑफ डोमिसाइल सर्टिफिकेट (प्रोसीजर) रूल्स, 2020

मेन्स के लिये

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन आदेश  

चर्चा में क्यों?

हाल ही में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने केंद्र शासित प्रदेश में अधिवास प्रमाणपत्र (Domicile Certificates) जारी करने संबंधी नियम अधिसूचित किये हैं। 

प्रमुख बिंदु

  • ध्यातव्य है कि अब प्रदेश में ‘जम्मू-कश्मीर ग्रांट ऑफ डोमिसाइल सर्टिफिकेट (प्रोसीजर) रूल्स 2020’ {J&K Grant of Domicile Certificate (Procedure) Rules 2020} के आधार पर ही अधिवास प्रमाणपत्र जारी किये जाएंगे।
  • नियमों के तहत, अधिवास प्रमाणपत्र जारी करने के लिये अधिकतम 15 दिनों की अवधि निर्धारित की गई है, जिसके पश्चात् यदि प्रमाणपत्र जारी नहीं किया जाता है तो आवेदक को इस संबंध में अपीलीय प्राधिकरण से संपर्क करने के अधिकार दिये गए हैं।
  • इस संदर्भ में अपीलीय प्राधिकरण का निर्णय प्रमाणपत्र जारी करने वाले प्राधिकरण के लिये बाध्यकारी होगा और अपीलीय प्राधिकरण के आदेशों को सात दिनों के भीतर लागू करना अनिवार्य होगा।
    • यदि ऐसा नहीं होता है तो संबंधित अधिकारी को दंड के रूप में 50,000 रुपए का जुर्माना देना होगा, जो कि उसके वेतन से लिया जाएगा।
  • साथ ही अपीलीय प्राधिकरण के पास पुनरीक्षणीय शक्तियाँ (Revisional Powers) होंगी।
  • अपीलीय प्राधिकरण या तो स्वतः संज्ञान लेकर अथवा किसी व्यक्ति द्वारा किये गए आवेदन के माध्यम से किसी भी कार्यवाही की वैधता की जाँच कर सकते हैं और संदर्भ में उचित आदेश पारित कर सकते हैं।
  • नियमों में एक प्रावधान है कि अधिवास प्रमाणपत्र देने के लिये आवेदन भौतिक अथवा इलेक्ट्रॉनिक रूप से जमा किये जा सकते हैं। वहीं सक्षम प्राधिकारी भी इलेक्ट्रॉनिक रूप से अधिवास प्रमाणपत्र भी जारी कर सकते हैं।
  • हालाँकि, जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासी जिनके लिये स्थायी निवासी प्रमाणपत्र (Permanent Resident Certificate-PRC) 31 अक्तूबर, 2019 से पूर्व जारी किये गए थे, वे केवल स्थायी निवासी प्रमाणपत्र के आधार पर अधिवास प्रमाणपत्र प्राप्त कर सकेंगे और उन्हें इस संबंध में किसी विशेष दस्तावेज़ की आवश्यकता नहीं होगी।
  • राज्य प्रशासन द्वारा जारी उक्त नियमों के माध्यम से अधिवास प्रमाणपत्र जारी करने के लिये एक सरल समयबद्ध और पारदर्शी प्रक्रिया स्थापित करने में मदद मिलेगी।

अधिवास प्रमाणपत्र संबंधी योग्यता

  • ध्यातव्य है कि इसी वर्ष अप्रैल माह में केंद्र सरकार ने जम्मू और कश्मीर के लिये नए अधिवास नियम और प्रदेश में रोज़गार के लिये पात्रता से संबंधित अधिसूचना जारी की थी। 
  • सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार, अधिवास (Domicile) की परिभाषा में उन लोगों को शामिल किया गया है जो जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश में 15 वर्ष की अवधि से रह रहे हैं अथवा 7 वर्ष तक वहाँ अध्ययन किया है और जम्मू-कश्मीर स्थित शैक्षणिक संस्थान में 10वीं तथा 12वीं कक्षा की परीक्षा में शामिल हुए हैं।
  • ध्यातव्य है कि 5 अगस्त से पूर्व, जब भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35A प्रचलन में थे, तब जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्य में सभी नौकरियाँ विशेष रूप से राज्य के स्थायी निवासियों के लिये आरक्षित थीं।

अनुच्छेद 370 और 35A

  • 17 अक्तूबर, 1949 को अनुच्‍छेद 370 भारतीय संव‍िधान का ह‍िस्‍सा बना तथा इसे एक 'अस्थायी प्रावधान' के रूप में जोड़ा गया था, जिसने जम्मू-कश्मीर को छूट दी थी, ताकि वह अपने संविधान का मसौदा तैयार कर सके और राज्य में भारतीय संसद की विधायी शक्तियों को प्रतिबंधित कर सके।
  • अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर की संविधान सभा को यह सिफारिश करने का अधिकार दिया गया था कि भारतीय संविधान के कौन से अनुच्छेद राज्य में लागू होने चाहिये।
  • अनुच्छेद 35A अनुच्छेद 370 से उपजा है और जम्मू-कश्मीर संविधान सभा की सिफारिश पर वर्ष 1954 में राष्ट्रपति के एक आदेश के माध्यम से लागू किया गया था।
  • संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत, जम्मू-कश्मीर का अलग संविधान था, जबकि अनुच्छेद 35A ने राज्य के बाहर के लोगों को जम्मू-कश्मीर में संपत्ति खरीदने और स्थायी निवासियों के लिये नौकरी आरक्षण सुनिश्चित करने पर रोक लगा दी थी। 

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

वेस्ट बैंक अधिग्रहण

प्रीलिम्स के लिये 

वेस्ट बैंक की भौगोलिक स्थिति 

मेन्स के लिये 

भू-रणनीतिक महत्त्व और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति पर प्रभाव

चर्चा में क्यों?

हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो (Mike Pompeo) इज़राइल की यात्रा पर गए, जहाँ उनकी प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (Benjamin Netanyahu) से वेस्ट बैंक (West Bank) के अधिग्रहण को लेकर वार्ता हुई

प्रमुख बिंदु 

  • पोम्पियो की इज़राइल यात्रा संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ गठबंधन का शक्ति प्रदर्शन थी। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के मध्य ईरान से जुड़ी साझा चिंताओं, कोरोना वायरस के विरुद्ध सामूहिक सहयोग के साथ इज़राइल और चीन की निकटता पर चर्चा की गई।
  • इज़राइल के नीति-नियंता नवंबर, 2020 में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव से पहले मध्यपूर्व के भू-भाग में भू-रणनीतिक बदलाव करना चाहते हैं। 

    संयुक्त राज्य अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार जो बिडेन (Joe Biden) वेस्ट बैंक के अधिग्रहण को लेकर इज़राइल के एकतरफा निर्णय के खिलाफ हैं। 

  • वेस्ट बैंक का इज़राइल में अधिग्रहण राष्ट्रपति ट्रंप को आने वाले चुनाव में ईसाई मतदाताओं को लुभाने में सहायता कर सकता है, क्योंकि ईसाई समुदाय का यह मानना है कि ईश्वर ने यहूदियों को उनकी भूमि पर स्थापित करने का वचन दिया था, जिसे अब पूरा किया जाना चाहिये

वेस्ट बैंक क्या है?

West-Bank

  • वेस्ट बैंक, इज़राइल के पूर्व में इज़राइल-जॉर्डन सीमा पर स्थित लगभग 6,555 वर्ग किमी. के भू-भाग में फैला है। जॉर्डन नदी के पश्चिमी तट पर स्थित होने की वजह से इसे वेस्ट बैंक कहा जाता है।
  • वर्ष 1948 में हुए प्रथम अरब-इज़राइल युद्ध में जॉर्डन ने इस क्षेत्र पर अधिकार कर लिया परंतु वर्ष 1967 में हुए तीसरे अरब-इज़राइल युद्ध (छः दिवसीय युद्ध) में अरब देशों की हार के बाद इज़राइल ने इसे पुनः प्राप्त कर लिया।
  • तभी से इस क्षेत्र के अधिकांश हिस्से पर  इज़राइल का अधिकार है तथा इजराइल ने वेस्ट बैंक में लगभग 130 स्थायी बस्तियाँ बसाई हैं। इसके अलावा इस क्षेत्र में पिछले 25 वर्षों में अनेकों छोटी-बड़ी बस्तियाँ स्थापित हुई हैं।

पृष्ठभूमि

  • इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष का स्पष्ट प्रमाण 20वीं शताब्दी के प्रारंभ से मिलता है। जब मध्य-पूर्व का क्षेत्र यहूदियों और अरब के बीच अपना वर्चस्व स्थापित करने का अखाड़ा बन गया।
  • मध्य-पूर्व युद्ध 1967: इसे छह-दिवसीय युद्ध या तीसरे अरब-इजरायल युद्ध के रूप में भी जाना जाता है । इज़राइल ने युद्ध में वेस्ट बैंक, पूर्वी यरुशलम और गाजा पट्टी पर कब्ज़ा कर लिया। इज़राइल ने वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम में कई बस्तियाँ बनाई हैं। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इन बस्तियों को अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन और शांति के लिये बाधा मानते हैं।
  • ट्रंप द्वारा जनवरी 2020 में प्रस्तुत मध्य पूर्व योजना (सीमित राज्य का दर्ज़ा) को फिलिस्तीन द्वारा नकार दिया गया और उनके द्वारा ओस्लो शांति समझौते के प्रमुख प्रावधानों से हटने की धमकी दी गई, जोकि 1990 के दशक में इज़राइल और फिलिस्तीनियों के बीच हुए समझौतों की एक श्रृंखला है। 

आलोचना 

  • इज़राइल के द्वारा किया जाने वाला विलय व्यापक रूप से अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन कर तनाव में वृद्धि करेगा क्योंकि यह मध्य-पूर्व युद्ध के बाद इज़राइल द्वारा कब्ज़ा की गई भूमि पर एक व्यवहार्य राज्य स्थापित करने की फिलिस्तीन की उम्मीदों को समाप्त कर देगा।
  • अरब लीग इस अधिग्रहण को युद्ध अपराध के रूप में देखता है। 
  • यूरोपीय संघ ने इज़राइल के इस प्रस्ताव को शांति प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करने वाला बताया है।

भारत का रुख 

  • भारत ने आज़ादी के पश्चात् लंबे समय तक इज़राइल के साथ कूटनीतिक संबंध नहीं रखे, जिससे यह स्पष्ट था कि भारत, फिलिस्तीन की मांगों का समर्थन करता है, किंतु वर्ष 1992 में इज़राइल से भारत के औपचारिक कूटनीतिक संबंध बने और अब यह रणनीतिक संबंध में परिवर्तित हो गए हैं तथा अपने उच्च स्तर पर हैं।
  • वर्ष 1947 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में फिलिस्तीन के विभाजन के विरुद्ध मतदान किया था।
  • भारत पहला गैर-अरब देश था, जिसने वर्ष 1974 में फिलिस्तीनी जनता के एकमात्र और कानूनी प्रतिनिधि के रूप में फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन को मान्यता प्रदान की थी। साथ ही भारत वर्ष 1988 में फिलिस्तीनी राज्य को मान्यता देने वाले शुरुआती देशों में शामिल था।  
  • भारत ने फिलिस्तीन से संबंधित कई प्रस्तावों का समर्थन किया है, जिनमें सितंबर 2015 में सदस्य राज्यों के ध्वज की तरह अन्य प्रेक्षक राज्यों के साथ संयुक्त राष्ट्र परिसर में फिलिस्तीनी ध्वज लगाने का भारत का समर्थन प्रमुख है।  
  • जून 2019 में भारत ने, संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (United NationsEconomic and Social Council-UN ECOSOC) में फिलिस्तीन के एक गैर-सरकारी संगठन को सलाहकार का दर्ज़ा देने के विरोध में इज़राइल के प्रस्ताव का समर्थन किया 
  • भारत ने हमेशा से दोनों देशों के मध्य अपनी संतुलन की नीति को बरकरार रखा है 

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


भारतीय राजनीति

डेटा निगरानी और गोपनीयता

प्रीलिम्स के लिये:

राष्ट्रीय सामाजिक रजिस्ट्री, आरोग्य सेतु एप

मेन्स के लिये:

निजता के अधिकार से संबंधित विभिन्न पक्ष

चर्चा में क्यों?

भारत सरकार द्वारा ‘राष्ट्रीय सामाजिक रजिस्ट्री’ (National Social Registry) का निर्माण किया जा रहा है, जिसके माध्यम से सरकार सभी नागरिकों की विस्तृत जानकारी रखने/बनाने और उनकी गतिविधियों को ट्रैक कर सकती है।

प्रमुख बिंदु:

  • उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2019 में पेश किया गया व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा हेतु डेटा संरक्षण अधिनियम- 2019 भारत का पहला कानूनी ढाँचा है।
  • कार्नेगी इंडिया (Carnegie India) द्वारा किये गए अध्ययन के अनुसार, नया डेटा संरक्षण बिल ऐसी निगरानी को पूरी तरह से रोकने में कारगर साबित नहीं होगा।
  • कानून व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और अन्य आपात स्थितियों का हवाला देते हुए सरकार किसी भी राज्य एजेंसी को इस अधिनियम के दायरे से छूट दे सकती है। 
  • हालाँकि यह अधिनियम निजी कंपनियों और राज्य दोनों पर लागू होता है, लेकिन यह सरकार को  छूट के माध्यम से  व्यापक शक्ति प्रदान करता है। कार्नेगी इंडिया का तर्क है कि मौजूदा बिल का दुरुपयोग हो सकता है।
  • इस अधिनियम की बुनियादी स्वरुप के तहत संग्रहकर्त्ता केवल उपयोगकर्त्ता की सहमति से ही डेटा को एकत्र और संसाधित कर सकता है
  • उपयोगकर्त्ता किसी भी समय सहमति समझौते को वापस ले सकता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सहमति समझौते डेटा गोपनीयता की रक्षा करते हैं?
  • कई अध्ययनों के अनुसार, अधिकांश उपयोगकर्त्ता सॉफ्टवेयर और अनुप्रयोगों के लाइसेंस संबंधी समझौतों को सहमति देने से पहले नहीं पढ़ते हैं।
  • वर्ष 2011 के आईबीएम के एक अध्ययन के अनुसार, कुछ उपयोगकर्त्ताओं ने समझौते संबंधी सहमति को पढ़ने के लिये केवल छह सेकंड व्यतीत किये हैं और मात्र 8% उपयोगकर्त्ता सॉफ्टवेयर इंस्टाल करने से पूर्व समझौते संबंधी सहमति को पढ़ते हैं।

हालिया घटना:

  • आरोग्य सेतु एप को लेकर कई विशेषज्ञों ने निजता संबंधी चिंता ज़ाहिर की है। हालाँकि केंद्र सरकार के अनुसार, किसी व्यक्ति की गोपनीयता सुनिश्चित करने हेतु लोगों का डेटा उनके फोन में लोकल स्टोरेज में ही सुरक्षित रखा जाएगा तथा इसका प्रयोग तभी होगा जब उपयोगकर्त्ता किसी ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आएगा जिसकी COVID-19 की जाँच पॉजिटिव/सकारात्मक रही हो।
  • विशेषज्ञों का पक्ष:
    • क्या डेटा एकत्र किया जाएगा, इसे कब तक संग्रहीत किया जाएगा और इसका उपयोग किन कार्यों में किया जाएगा, इस पर केंद्र सरकार की तरफ से पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। 
    • सरकार ऐसी कोई गारंटी नहीं दे रही कि हालात सुधरने के बाद इस डेटा को नष्ट कर दिया जाएगा।
    • इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस के जरिये एकत्रित किये जा रहे डेटा के प्रयोग में लाए जाने से निजता के अधिकार का हनन होने के साथ ही सर्वोच्च न्यायलय के आदेश का भी उल्लंघन होगा जिसमें निजता के अधिकार को संवैधानिक अधिकार बताया गया है।
    • जिस तरह आधार नंबर एक सर्विलांस सिस्टम बन गया है और उसे हर चीज़ से जोड़ा जा रहा है वैसे ही कोरोना वायरस से जुड़े एप्लिकेशन में लोगों का डेटा लिया जा रहा है, जिसमें उनका स्वास्थ्य संबंधी डेटा और निजी जानकारियाँ भी शामिल हैं। अभी यह सुनिश्चित नहीं है कि सरकार किस प्रकार और कब तक इस डेटा का उपयोग करेगी।

डेटा और उसका महत्त्व:

  • सामान्य बोलचाल की भाषा में प्रायः मैसेज, सोशल मीडिया पोस्ट, ऑनलाइन ट्रांसफर और सर्च हिस्ट्री आदि के लिये डेटा शब्द का उपयोग किया जाता है।
  • तकनीकी रूप से डेटा को किसी ऐसी जानकारी के समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है, जिसे कंप्यूटर आसानी से पढ़ सकता है।
  • गौरतलब है कि यह जानकारी दस्तावेज़, चित्र, ऑडियो क्लिप, सॉफ़्टवेयर प्रोग्राम या किसी अन्य प्रारूप में हो सकती है।
  • अपने सबसे प्राथमिक स्तर पर कोई भी डेटा 1 और 0 का एक समूह होता है, जिसे बाइनरी डेटा के रूप में जाना जाता है, उदाहरण के लिये 011010101010।
  • आज के समय में व्यक्तिगत जानकारी का यह भंडार मुनाफे का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत बन गया है और विभिन्न कंपनियाँ अपने उपयोगकर्त्ताओं के अनुभव को सुखद बनाने के उद्देश्य से इसे संग्रहीत कर इसका प्रयोग कर रही हैं।
  • सरकार एवं राजनीतिक दल भी नीति निर्माण एवं चुनावों में लाभ प्राप्त करने के लिये सूचनाओं के भंडार का उपयोग करते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में डेटा का महत्त्व और अधिक बढ़ जाता है।
  • हालाँकि यह काफी जोखिमपूर्ण भी होता है क्योंकि हमारे द्वारा दी गई सूचना एक आभासी पहचान निर्मित करती है जिसका प्रयोग हमें नुकसान पहुँचाने के लिये भी किया जा सकता है।

राष्ट्रीय सामाजिक रजिस्ट्री

(National Social Registry):

  • राष्ट्रीय सामाजिक रजिस्ट्री आधार से जुड़ा एक एकल डेटाबेस या एकीकृत डेटाबेस है। 
  • इसमें प्रत्येक नागरिक धर्म, जाति, आय, संपत्ति, शिक्षा, वैवाहिक स्थिति, रोज़गार, विकलांगता और पारिवारिक स्थिति के विवरण होंगे जिसको आधार संख्या का उपयोग करके तैयार किया जाएगा। यह वास्तविक समय में स्वतः अद्यतन हो जाएगा।

स्रोत: लाइव मिंट


जीव विज्ञान और पर्यावरण

एटालिन जलविद्युत परियोजना

प्रीलिम्स के लिये:

वन सलाहकार समिति, प्रतिपूरक वनीकरण

मेन्स के लिये:

एटालिन जलविद्युत परियोजना और विरोध से उत्पन्न चुनौतियों से संबंधित मुद्दे

चर्चा में क्यों?

अरुणाचल प्रदेश की दिबांग घाटी में प्रस्तावित 3097 मेगावाट की एटालिन जलविद्युत परियोजना की वजह से जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर पर्यावरण कार्यकर्त्ता इस परियोजना को रद्द करने की मांग कर रहे हैं।  

प्रमुख बिंदु:

  • उल्लेखनीय है कि पर्यावरण कार्यकर्त्ताओं ने वन सलाहकार समिति (Forest Advisory Committee-FAC) के अध्यक्ष और सदस्यों को एक पत्र के माध्यम से अवगत किया कि क्यों एटालिन जलविद्युत परियोजना को रद्द किया जाना चाहिये।
  • पर्यावरण कार्यकर्त्ताओं का पत्र के माध्यम से तर्क:
    • एटालिन जलविद्युत परियोजना को मंज़ूरी देते वक्त वन संरक्षण और संबंधित कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी की गई है। इस तरह किसी भी परियोजना को मंज़ूरी देने से पर्यावरण/वन/वन्यजीवों/मनुष्यों पर अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा साथ ही इस प्रभाव की क्षतिपूर्ति को कभी कम नहीं किया जा सकता है।
    • इस पत्र में पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा वन और वन्यजीवों की सुरक्षा हेतु पूर्व में उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों का भी उल्लेख किया है।
    • FAC निरंतर वन, वन्यजीवों और जैव विविधता हॉटस्पॉट में दुर्लभ पुष्प और जीव-जंतु प्रजातियों की अनदेखी कर रहा है।
    • इस पत्र में एटालिन जलविद्युत परियोजना पर पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट में भी खामियों का उल्लेख किया है
    • 23 अप्रैल को वन सलाहकार समिति (Forest Advisory Committee- FAC) ने इन क्षेत्रों में लगभग 270,000 पेड़ों की कटाई की अनुमति दी है।
  • FAC उप समिति का तर्क है कि भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India) द्वारा किये गए अध्ययन के आधार पर उपयोगकर्त्ता एजेंसी (निजी फर्म) को वन्यजीव संरक्षण योजना का वित्तीय परिव्यय को वन विभाग में जमा करने पर ही परियोजना को अनुमति दी जा सकती है।

एटालिन जलविद्युत परियोजना के विरोध के कारण:

  • इस परियोजना से कुल 18 गाँवों के निवासी प्रभावित होंगे।
  • इसके तहत लगभग 2,70,000 पेड़ों की कटाई होगी और विश्व स्तर पर लुप्तप्राय 6 स्तनधारी प्रजातियों के अस्तित्त्व के लिये खतरा उत्पन्न हो सकता है।
  • इस क्षेत्र में पक्षियों की 680 प्रजातियाँ पाई जाती हैं, जो भारत में पाई जाने वाली कुल पक्षियों की प्रजातियों (Avian Species) का लगभग 56% हैं।
  • यह परियोजना हिमालय के सबसे समृद्ध जैव-भौगोलिक क्षेत्र के अंतर्गत आती है तथा यह पुरापाषाणकालीन, इंडो-चाइनीज़ और इंडो-मलयन जैव-भौगोलिक क्षेत्रों के संधि-स्थल पर स्थित होगी।
  • स्थानीय निवासियों के अनुसार, दिबांग क्षेत्र में प्रस्तावित ‘दिबांग बहुउद्देशीय परियोजना’ और ‘एटलिन जल विद्युत परियोजना’ दोनों एक साथ एक बहुत बड़े क्षेत्र को जलमग्न कर देगीं।
  • पर्यावरणविदों एवं स्थानीय निवासियों का मत है कि परियोजना की वज़ह से विकृत पारिस्थितिकी को कृत्रिम वृक्षारोपण की सहायता से यथास्थिति में नहीं लाया जा सकता है।
  • इडू मिश्मी समुदाय (Idu Mishmi Community) के लोग चारागाह भूमि, वनों और वन्यजीवों को होने वाले नुकसान को लेकर चिंतित हैं।

वन सलाहकार समिति

(Forest Advisory Committee-FAC):

  • वन सलाहकार समिति औद्योगिक गतिविधियों के लिये वनों में पेड़ों की कटाई की अनुमति पर निर्णय लेती है।
  • FAC केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (Ministry of Environment, Forest and Climate Change-MOEF&CC) के अंतर्गत कार्यरत है, जिसमें केंद्र के वानिकी विभाग के स्वतंत्र विशेषज्ञ और अधिकारी शामिल होते हैं।

प्रतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation):

  • प्रतिपूरक वनीकरण का आशय आधुनिकीकरण तथा विकास के लिये काटे गए वनों के स्थान पर नए वनों को लगाने से है। अर्थात् उद्योगों द्वारा वनों के नुकसान की प्रति पूर्ति हेतु वैकल्पिक भूमि का अधिग्रहण किया जाता है।

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

बिजली वितरण कंपनियाँ और आर्थिक पैकेज

प्रीलिम्स के लिये

आत्मनिर्भर भारत अभियान, डिस्कॉम

मेन्स के लिये

विद्युत क्षेत्र की चुनौती और संभावनाएँ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्र सरकार ने COVID-19 महामारी के बीच ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के तहत बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) के लिये 90 हजार करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की है।

प्रमुख बिंदु

  • इस संबंध में की गई आधिकारिक घोषणा के अनुसार, पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन (Power Finance Corporation) और रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉरपोरेशन (Rural Electrification Corporation) संयुक्त रूप से बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को तरलता प्रदान करने के लिये 90 हजार करोड़ रुपए की राशि प्रदान करेंगे।
  • बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) द्वारा इस राशि का प्रयोग बिजली उत्पादन कंपनियों के साथ अपना बकाया चुकाने के लिये किया जाएगा।

इस निर्णय की आवश्यकता?

  • ध्यातव्य है कि केंद्र सरकार का यह निर्णय अधिकांश राज्य डिस्कॉम की खराब वित्तीय स्थिति और राजस्व संग्रह क्षमता को देखते हुए लिया गया है।
  • वाणिज्यिक और औद्योगिक बिजली उपभोक्ताओं द्वारा भुगतान न करने के कारण बिजली वितरण कंपनियाँ (डिस्कॉम) गंभीर तनाव का सामना कर रही हैं, ऐसी स्थिति में इन कंपनियों को सहायता प्रदान करना काफी महत्त्वपूर्ण हो गया है।

विद्युत क्षेत्र की समस्याएँ

  • विद्युत क्षेत्र से संबंधित समस्याओं को समझने के लिये सर्वप्रथम हमें यह समझना होगा कि विद्युत क्षेत्र किस प्रकार कार्य करता है-
    • विद्युत क्षेत्र की कार्यप्रणाली को मुख्यतः 3 चरणों में समझा जा सकता है। पहले चरण में सर्वप्रथम बिजली थर्मल, हाइड्रो या नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों में ऊर्जा उत्पन्न की जाती है। ये ऊर्जा संयंत्र या तो NTPC लिमिटेड और NHPC लिमिटेड जैसी सार्वजनिक कंपनियों द्वारा संचालित किये जाते हैं अथवा टाटा पावर और अडानी पावर जैसी निजी कंपनियों द्वारा संचालित किये जाते हैं।
    • दूसरे चरण में उत्पन्न बिजली एक जटिल ट्रांसमिशन ग्रिड प्रणाली से गुजरती है जिसमें बिजली सबस्टेशन, ट्रांसफार्मर और बिजली की लाइनें शामिल होती हैं जो बिजली उत्पादकों और अंतिम उपभोक्ताओं को जोड़ती हैं। इस चरण में बड़े पैमाने पर राज्य के स्वामित्त्व वाली कंपनियों का वर्चस्व रहता है, जो ट्रांसमिशन ग्रिड प्रणाली का संचालन करती हैं। पूरी ट्रांसमिशन ग्रिड प्रणाली में हजारों मील लंबी हाई-वोल्टेज बिजली लाइन और लाखों मील लंबी लो-वोल्टेज बिजली लाइनें शामिल होती हैं जो पूरे देश में लाखों बिजली उपभोक्ताओं को लाखों बिजली संयंत्रों से जोड़ती हैं।
    • विद्युत क्षेत्र की कार्यप्रणाली के तीसरे चरण में बिजली को उपभोक्ताओं तक पहुँचाने का कार्य किया जाता है, जिसमें बिजली वितरण कंपनियाँ (डिस्कॉम) शामिल होती हैं, जो कि बड़े पैमाने पर राज्य सरकारों द्वारा संचालित होती हैं। हालाँकि, दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद और कोलकाता जैसे शहरों में, निजी संस्थाएँ भी वितरण व्यवसाय का कार्य करती हैं। 
  • दरअसल बिजली वितरण कंपनियाँ (डिस्कॉम) बिजली खरीद समझौतों (Power Purchase Agreements-PPAs) के माध्यम से बिजली उत्पादन कंपनियों से बिजली खरीदती हैं और फिर उपभोक्ताओं (वितरण के क्षेत्र में) को इसकी आपूर्ति करती हैं। 
  • वर्तमान में विद्युत क्षेत्र के साथ प्रमुख समस्या राज्य डिस्कॉम की निरंतर खराब वित्तीय स्थिति है, जिसके कारण बिजली वितरण कंपनियों की आपूर्ति के लिये बिजली खरीदने की उनकी क्षमता प्रभावित हो रही है। नतीजतन, यह उपभोक्ताओं को मिलने वाली बिजली की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।

इस निर्णय का महत्त्व

  • विश्लेषकों का मत है कि बिजली वितरण कंपनियों को 90 हजार रुपए का राहत पैकेज प्रदान करने का निर्णय भारतीय विद्युत क्षेत्र में तरलता के दबाव को कम करेगा और इससे उपभोक्ताओं के लिये निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी।
  • केंद्र सरकार द्वारा दी जा रही इस राशि का उपयोग डिस्कॉम द्वारा बिजली उत्पादन कंपनियों को अपने बकाए का भुगतान करने के लिये किया जाएगा, जिससे बिजली उत्पादन कंपनियाँ अधिकाधिक उत्पादन कर सकेगी और बिजली वितरण की निरंतरता सुनिश्चित हो सकेगी।
  • केंद्र सरकार का यह वित्तपोषण डिस्कॉम को अपने बुनियादी ढाँचे तथा राजस्व संग्रह दक्षता में सुधार करने में मदद करेगा। 
  • यह विद्युत क्षेत्र में नकदी प्रवाह के चक्र को फिर से शुरू करने में मदद करेगा, जो कि वर्तमान में लगभग पूरी तरह से रुक गया है, जिसके कारण इस क्षेत्र का विकास नहीं हो पा रहा है।

निष्कर्ष

  • विद्युत क्षेत्र में नकदी प्रवाह के चक्र को पुनः शुरू करने से इस क्षेत्र का विकास संभव हो सकेगा, जिससे COVID-19 के कारण प्रभावित हुई अर्थव्यवस्था को पुनः पटरी पर लाने में मदद मिलेगी।
  • हालाँकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार द्वारा घोषित उक्त उपाय निश्चित रूप से अल्पकालिक उपाय है और बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की वित्तीय स्थिरता अभी भी चिंता का एक बड़ा विषय बनी हुई है।
  • सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था को COVID-19 जनित मंदी से बाहर निकलने के लिये तमाम प्रयास किये जा रहे हैं, आवश्यक है कि सरकार इन कार्यक्रमों के कार्यान्वयन पर भी ध्यान दे और जहाँ तक संभव हो सके नीति निर्माण में विभिन्न हितधारकों का प्रतिनिधित्त्व भी शामिल किया जाए।

स्रोत: द हिंदू


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

क्वांटम डॉट्स

प्रीलिम्स के लिये:

क्वांटम डॉट्स 

मेंस के लिये:

क्वांटम डॉट्स, उनकी विशेषताएँ, अनुप्रयोग तथा उनसे संबंधित समस्याएँ

चर्चा में क्यों?

हाल ही में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Science & Technology) के तहत स्वायत्त संस्थान, ‘अगरकर अनुसंधान संस्थान’ (Agharkar Research Institute- ARI), पुणे के शोधकर्त्ताओं ने क्वांटम कुशल तथा जैव-अनुकूल क्वांटम डॉट्स (Quantum Dots- QDs) के संश्लेषण के लिये एक नई प्रक्रिया विकसित की है।

प्रमुख बिंदु

  • शोधकर्त्ताओं द्वारा विकसित इस नई प्रक्रिया को ‘एडवांसेज इन कोलॉइड एंड इंटरफेस साइंस’ (Advances in Colloid and Interface Science) नामक जर्नल में प्रकाशित किया गया है।
  • इस प्रक्रिया का उपयोग विद्युतचुंबकीय स्पेक्ट्रम (Electromagnetic Spectrum) में दृश्य तरंगदैर्ध्य (Wavelength) का प्रयोग करते हुए कोशिकांगों (Cellular Organelles) तथा उनमें होने वाली गतिविधियों की तस्वीरें लेने में किया जाता है।
  • प्रक्रिया में एक निरंतर प्रवाह शामिल है तथा एक सक्रिय माइक्रोरिएक्टर की सहायता से इस प्रवाह की निरंतरता को बनाए रखा जाता है।
  • वर्तमान समय में जैव-प्रतिबिंबन (Bio Imaging) अनुप्रयोगों जैसे-कोशिकीय अंगों का दृश्य, कोशिकीय प्रक्रियाओं पर नज़र रखना इत्यादि पारंपरिक फ्लूरोफोर/फ्लोरोफोरे (Fluorophore) पर निर्भर है। 
    • फ्लूरोफोर/फ्लोरोफोरे प्रतिदीप्त रासायनिक यौगिक हैं जो उत्तेजित होने पर फिर से प्रकाश उत्सर्जित कर सकते हैं।
    • ये फ्लोरोफोरे फोटोब्लीचिंग से कमज़ोर या ख़राब हो जाते हैं, इनकी संकेत तीव्रता कम होती है और इनका अतिव्यापी वर्णक्रम/स्पेक्ट्रा इनके उपयोग (विशेष रूप से मल्टीस्पेक्ट्रल बायोइमेजिंग में) को सीमित करता है। 
  • क्वांटम दक्षता, प्रकाश और रासायनिक स्थिरता के संदर्भ में पारंपरिक फ्लोरोफोरे की तुलना में क्वांटम डॉट्स के विशेष लाभ हैं। साथ ही एक सरफेस कोटिंग द्वारा इनकी विषाक्तता से भी निपटा जा सकता है। 
  • यह मल्टीस्पेक्ट्रल बायोइमेजिंग के दौरान विभिन्न अंगों को लक्षित करते हुए विभिन्न जैव-सूचकों (Biomarker) के संयुग्मन की संभावना को बढ़ाता है।
    • जैवसूचक/बायोमार्कर प्रमुख आणविक या कोशिकीय घटनाएँ हैं जो किसी विशिष्ट पर्यावरणीय आवरण को स्वास्थ्य के लक्षणों से जोड़ती हैं।

क्वांटम डॉट्स (QDs)- 

  • क्वांटम डॉट्स मानव निर्मित नैनोस्केल क्रिस्टल हैं, जो इलेक्ट्रॉनों का एक स्थान से दूसरे स्थान पर संचरण करते हैं।
  • क्वांटम डॉट्स कृत्रिम नैनो संरचनाएँ हैं।
  • जब पराबैंगनी प्रकाश इन अर्द्धचालक नैनो-कणों से टकराता है, तो इनके द्वारा विभिन्न रंगों के प्रकाश का उत्सर्जन किया जाता हैं। 
  • एकल अणु के स्तर पर ये कोशिकीय प्रक्रियाओं का अध्ययन करने में सक्षम हैं तथा कैंसर जैसे रोगों के निदान और उपचार में सहायक हो सकते हैं।

संश्लेषित क्वांटम डॉट्स की विषेशता: 

  • संश्लेषित क्वांटम डॉट्स पर सिलिकॉन की कोटिंग कर उन्हें जैव-अनुकूल बनाया गया है। 
  • संश्लेषित क्वांटम डॉट्स द्वारा क्वांटम दक्षता और फोटोस्टेबिलिटी क्षमता को भी बढ़ाया गया है। साथ ही मल्टीस्पेक्ट्रल बायोइमेजिंग के लिये इनका उपयोग सफलतापूर्वक किया जा सकता है। 

क्वांटम डॉट्स के अनुप्रयोग में समस्या :

  • क्वांटम डॉट्स के संश्लेषण के दौरान इसके कुछ आवश्यक/महत्त्वपूर्ण गुणों को पुनः प्राप्त करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है।
  • वाणिज्य की दृष्टि से पारंपरिक फ्लोरोफोरे की तुलना में इसका प्रयोग उतना संभव नहीं है।

स्रोत: पीआईबी


भारतीय अर्थव्यवस्था

ब्याज दर और आर्थिक वृद्धि दर

प्रीलिम्स के लिये:

ऋण-GDP अनुपात 

मेन्स के लिये:

ब्याज दर और आर्थिक वृद्धि दर में संबंध

चर्चा में क्यों?

हाल ही में ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ (International Monetary Fund- IMF) द्वारा किये गए एक अध्ययन के अनुसार, ब्याज भुगतान तथा अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर के बीच का अंतर किसी भी देश की राजकोषीय स्थिरता का आकलन करने की एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा है।

प्रमुख बिंदु:

  • ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ के अध्ययन के अनुसार, विगत वर्षों में 24 विकसित अर्थव्यवस्थाओं और 31 उभरती अर्थव्यवस्थाओं के ब्याज और विकास दर के बीच अंतर के अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है।
  • अध्ययन में नॉमिनल ब्याज दर तथा विकास दर के मध्य संबंध स्थापित करके किसी भी देश की दीर्घकालिक ऋण-स्थिरता को दर्शाने का प्रयास किया गया है। 

ऋण-GDP अनुपात (Debt-to-GDP Ratio):

  • ऋण-GDP अनुपात किसी भी देश के सकल घरेलू उत्पाद के साथ ऋण का अनुपात होता है। इस अनुपात का उपयोग किसी देश की ऋण चुकाने की क्षमता का आकलन करने के लिये किया जाता है। दूसरे शब्दों में ऋण-से-जीडीपी अनुपात किसी देश के सार्वजनिक ऋण की तुलना उसके वार्षिक आर्थिक उत्पादन से करता है। 

अध्ययन का उद्देश्य: 

  • विकसित अर्थव्यवस्थाओं का सरकारी ऋण बहुत अधिक है। वर्ष 1980 के बाद कई देशों में जीडीपी के सापेक्ष ऋण के बाद से तेज़ी से वृद्धि हुई है। जबकि इसी समय में ब्याज दरों में गिरावट आई है, जिसमें वर्ष 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान उधार की लागत में काफी कमी देखी गई।
  • यह पत्र इन मुद्दों को संबोधित करने का प्रयास करता है तथा तर्क देता है कि देश के सतत् ऋण स्तर का निर्धारण करने वाला महत्त्वपूर्ण कारक ‘नॉमिनल ब्याज दर’ तथा विकास दर के बीच का अंतर है।

Central-Bank-Interest

IMF अध्ययन के आधार पर निम्नलिखित पाँच प्रमुख निष्कर्ष निकाले गए हैं:

  • प्रथम, लंबी अवधि के लिये ब्याज दर तथा जीडीपी में संबंध विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिये एक जैसा रहा है।
  • द्वितीय, वर्ष 1973 के तेल संकट और वर्ष 1990 के उदारीकरण के समय इन दो सेटों (ब्याज और विकास दर) का ऋण क्षमता पर कोई स्पष्ट प्रभाव नजर नहीं आया।
  • तृतीय, दोनों सेटों के बीच अंतर में कमी आती है, तो सरकारें आमतौर पर एक विस्तारवादी राजकोषीय नीति अपनाती हैं और प्राथमिक घाटा में सीमित वृद्धि देखी जाती है।
  • चतुर्थ, औसत ब्याज दरें एक संप्रभु देश के डिफ़ॉल्ट होने अथवा नई उधार लेने की भविष्यवाणी करने के लिये अपर्याप्त है। 
  • पाँचवा, सरकार के उधार में आमतौर पर वित्तीय संकट के समय वृद्धि देखने को मिलती है। वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से, दुनिया भर में सरकारी ऋणग्रस्तता बढ़ रही है।

अध्ययन का महत्त्व:

  • नवीन मॉडल ब्याज दर और आर्थिक वृद्धि दर के मध्य संबंध को बेहतर तरीके से समझने में मदद करेगा।
  • किसी भी देश की ऋण चुकाने की क्षमता की गणना करने में नवीन मॉडल का उपयोग किया जा सकेगा। 

Fस्रोत: लाइव मिंट


विविध

Rapid Fire (करेंट अफेयर्स): 19 मई, 2020

भारत को वेंटिलेटर देगा अमेरिका

हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को वेंटिलेटर प्रदान करने की घोषणा की है। इस संबंध में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इस महामारी के दौर में अमेरिका प्रत्येक कदम पर भारत के साथ खड़ा है और इस अदृश्य शत्रु से लड़ने में यथासंभव मदद कर रहा है। अमेरिका इससे पूर्व भी कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी से मुकाबला करने के लिये भारत को आर्थिक सहायता प्रदान कर चुका है। ध्यातव्य है कि अमेरिका न सिर्फ भारत बल्कि विश्व के कई अन्य देशों को भी इस वायरस से मुकाबला करने के लिये आर्थिक मदद प्रदान कर रहा है। वेंटिलेटर COVID-19 से संक्रमित रोगियों के उपचार हेतु आवश्यक चिकित्सा अवसंरचना का एक महत्त्वपूर्ण घटक है, जो गंभीर रूप से बीमार लोगों को श्वास लेने में सहायता प्रदान करते हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, संक्रमित होने वालों में लगभग 80 प्रतिशत केवल सामान्य रूप से बीमार होते हैं, वहीं लगभग 15 प्रतिशत संक्रमित लोगों को ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है और शेष 5 प्रतिशत लोग जिनकी स्थिति गंभीर या नाज़ुक होगी, उन्हें वेंटिलेटर की आवश्यकता होती है। विदित हो कि भारत समेत विश्व के विभिन्न देशों में कोरोना वायरस संक्रमण के मामलों में तेज़ी से वृद्धि दर्ज की जा रही है और कोरोना संक्रमण तथा मृत्यु के आँकड़े प्रति दिन नए रिकॉर्ड स्थापित कर रहे हैं। 

विश्व उच्च रक्तचाप दिवस

प्रत्येक वर्ष 17 मई को विश्व भर में विश्व उच्च रक्तचाप दिवस (World Hypertension Day) मनाया जाता है। इस दिवस के आयोजन का मुख्य उद्देश्य आम लोगों में उच्च रक्तचाप के संदर्भ में जागरूकता पैदा करना और इसकी गंभीरता को देखते हुए लोगों को इसे नियंत्रित करने के लिये प्रोत्साहित करना है। वर्ष 2020 के लिये विश्व उच्च रक्तचाप दिवस का थीम ‘अपने रक्तचाप को मापिये, इसे नियंत्रित करें, लंबे समय तक जीवित रहें’ (Measure Your Blood Pressure, Control It, Live Longer) है। विदित हो कि शरीर में ऑक्सीजन और ऊर्जा के प्रवाह के लिये रक्त शोधन करना ह्रदय का प्रमुख कार्य है और धमनियों के ज़रिये रक्त के प्रवाह के लिये दबाव की एक निश्चित मात्रा की आवश्यकता होती है। यदि रक्त प्रवाह का यह दबाव सामान्य से अधिक होता है, तो यह धमनियों की दीवार पर अतिरिक्त तनाव डालता है। इसे हाई ब्लड प्रेशर या हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप) कहते हैं। एक अनुमान के मुताबिक पूर्वी भूमध्य क्षेत्र में प्रत्येक पाँच में से दो वयस्क उच्च रक्तचाप से प्रभावित हैं। उच्च रक्तचाप दुनिया भर में असामयिक मृत्यु का एक प्रमुख कारण है। उच्च रक्तचाप की गंभीरता को देखते हुए इसे ‘साइलेंट किलर’ (Silent Killer) भी कहा जाता है।

कोरोनावायरस से निपटने में WHO की भूमिका की समीक्षा

विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation-WHO) कोरोना वायरस (COVID-19) महामारी से निपटने में संगठन की भूमिका की स्वतंत्र समीक्षा करेगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक टेड्रोस अदनोम घेबियस ने हाल ही में 73वें विश्व स्वास्थ्य सभा (World Health Assembly) को संबोधित करते हुए आश्वासन दिया कि WHO पारदर्शिता के लिये प्रतिबद्ध है और इसलिये आगामी समय में इस महामारी के प्रकोप के लिये अपनी प्रतिक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा करेगा। WHO प्रमुख का यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब भारत समेत विश्व के 116 देशों ने यूरोपीय संघ (European Union) द्वारा निर्मित एक ऐसे प्रस्ताव का समर्थन किया है, जिसमें कोरोना वायरस महामारी की स्वतंत्र जाँच की बात की गई है। इस प्रस्ताव के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कोरोना वायरस के उद्गम की जाँच की जानी चाहिये, ताकि इस वायरस के उद्गम को लेकर अन्य देशों पर दोष डालने की प्रथा को समाप्त किया जा सके। इस प्रस्ताव का उद्देश्य वायरस के लिये किसी विशिष्ट देश को ज़िम्मेदार ठहराना नहीं है, बल्कि यह जानना है कि अंततः इस वायरस का उद्गम किस प्रकार हुआ है। मौजूदा जानकारी के अनुसार, कोरोना वायरस (COVID-19) एक ज़ूनोटिक रोग (Zoonotic Disease) है, जो जानवरों से मनुष्यों में फैलता है। WHO एक अंतर-सरकारी संगठन है, जो अपने सदस्य राष्ट्रों के स्वास्थ्य मंत्रालयों के सहयोग से कार्य करता है। WHO वैश्विक स्वास्थ्य मामलों पर नेतृत्त्व प्रदान करते हुए स्वास्थ्य अनुसंधान संबंधी एजेंडा को आकार देता है तथा विभिन्न मानदंड एवं मानक निर्धारित करता है। इसकी स्थापना 7 अप्रैल, 1948 को की गई थी।

‘संग्रहालयों का पुनर्जीवन और सांस्‍कृतिक स्‍थल’ वेबिनार 

हाल ही में संस्कृति मंत्रालय (Ministry of Culture) ने अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस के अवसर पर ‘संग्रहालयों का पुनर्जीवन और सांस्‍कृतिक स्‍थल’ विषय पर एक वेबिनार का आयोजन किया। इस वेबिनार का उद्देश्य उन संभावित नीतिगत कार्यों की पहचान करना है जो संग्रहालयों, सांस्कृतिक स्थलों और व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र के संकट के लघु तथा दीर्घकालिक प्रभावों को कम करने में मदद करेंगे। इस वेबिनार के दौरान विशेषज्ञों ने संस्कृति तथा रचनात्मक उद्योग को आगे बढ़ाने के उपायों पर चर्चा की। साथ ही इस दौरान चर्चा में महामारी के बाद पारिस्थितिकी तंत्र में संग्रहालयों और सांस्कृतिक स्थानों के संदर्भ में प्रभाव, नवाचारों और बाद के संकट की योजना जैसे विषयों को छुआ गया। सामाजिक विकास में संग्रहालयों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को लेकर जागरुकता बढ़ाने के उद्देश्य से विश्व भर में 18 मई को ‘अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस’ मनाया जाता है। इस दिवस के आयोजन का मुख्य उद्देश्य आम जनमानस में संग्रहालयों के प्रति जागरुकता पैदा करना और उन्हें संग्रहालयों में जाकर अपने इतिहास को जानने के प्रति जागरुक बनाना है।


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