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अजन्मे बच्चों पर ब्लैक कार्बन के दुष्प्रभाव

  • 24 Sep 2019
  • 3 min read

चर्चा में क्यों

हाल ही में नेचर कम्युनिकेशन्स (Nature Communications) में प्रकाशित एक शोध में वायु प्रदूषकों के प्लेसेंटा अर्थात् गर्भनाल में जमाव के कारण गर्भस्थ शिशुओं के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभावों के बारे में प्रकाश डाला गया है।

प्रमुख बिंदु

  • शोध के अनुसार ब्लैक कार्बन की उच्च सांद्रता के संपर्क में आने वाली महिलाओं के प्लेसेंटा (Placenta) में 2.42 माइक्रोग्राम प्रति सेंटीमीटर क्यूब के औसतन आकार के ब्लैक कार्बन का उच्च स्तर पाया गया।
  • ब्लैक कार्बन जैसे वायु प्रदूषक में माता के फेफड़ों से प्लेसेंटा में स्थापित होने की क्षमता होती है जिसके शिशु पर गंभीर स्वास्थ्य परिणाम प्रदर्शित होते हैं।
  • जन्म के समय कम वज़न इनमें से प्रमुख समस्या है जिसके कारण बच्चे की मधुमेह, अस्थमा और हार्ट स्ट्रोक सहित हृदय संबंधी अन्य बीमारियों के प्रति सुभेद्यता बढ़ जाती है।
  • शोध के अनुसार, गर्भस्थ शिशु के प्रत्यक्ष संपर्क में रहने वाली प्लेसेंटा की भीतरी सतह पर ब्लैक कार्बन के अवशेष पाए गए हैं।
  • हालाँकि भ्रूण में ब्लैक कार्बन की उपस्थिति के साक्ष्य नहीं मिले हैं जिससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि प्लेसेंटा प्रदूषकों के आगे बढ़ने में एक बाधा के रूप में कार्य करता है।
  • लेकिन शोधकर्त्ताओं के अनुसार, यदि प्लेसेंटा ब्लैक कार्बन से प्रभावित होता है तो भ्रूण पर भी इसके दुष्प्रभाव सामने आ सकते हैं।

क्या है प्लेसेंटा?

  • प्लेसेंटा अथवा गर्भनाल महिला के शरीर का अस्थायी अंग होता है, जो संपूर्ण गर्भावस्था के दौरान माता और भ्रूण के बीच प्राकृतिक संपर्क बिंदु की तरह कार्य करता है।
  • प्लेसेंटा के द्वारा ही भ्रूण को सुरक्षा और पोषण मिलता है और वह मां के गर्भ में जीवित रहता है। प्लेसेंटा विषैले पदार्थों को भ्रूण तक नहीं पहुँचने देता है।
  • इसके अलावा प्लेसेंटा माता के शरीर में दूध बनने के लिये आवश्यक लैक्टोजन के निर्माण में भी सहायता करता है।

ब्लैक कार्बन

Black Carbon

  • ब्लैक कार्बन जीवाश्म एवं अन्य जैव ईंधनों के अपूर्ण दहन, ऑटोमोबाइल तथा कोयला आधारित ऊर्जा सयंत्रों से निकलने वाला एक पार्टिकुलेट मैटर है।
  • यह एक अल्पकालिक जलवायु प्रदूषक है जो उत्सर्जन के बाद कुछ दिनों से लेकर कई सप्ताह तक वायुमंडल में बना रहता है।
  • वायुमंडल में इसके अल्प स्थायित्व के बावजूद यह जलवायु, हिमनदों, कृषि, मानव स्वास्थ्य पर व्यापक प्रभाव डालता है।

स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया

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