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डेली न्यूज़

  • 05 May, 2023
  • 53 min read
इन्फोग्राफिक्स

WTO एग्रीमेंट ऑन एग्रीकल्चर (AoA)


भारतीय राजनीति

दया याचिका

प्रिलिम्स के लिये:

दया याचिका, सर्वोच्च न्यायालय, अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 72, अनुच्छेद 161, क्षमा करने की शक्तियाँ

मेन्स के लिये:

दया याचिका

चर्चा में क्यों?

हाल के एक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने बलवंत सिंह राजोआना की मौत की सज़ा को कम करने के लिये सरकार को निर्देश देने से इनकार कर दिया है, इसके बजाय इसने सरकार को आवश्यकता पड़ने पर दया याचिका पर निर्णय लेने की अनुमति दी है।

  • बलवंत सिंह राजोआना को वर्ष 1995 में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या का दोषी ठहराया गया था।
  • याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि चूँकि राज्य और भारत संघ 10 वर्ष से अधिक समय से लंबित दया याचिका पर निर्णय नहीं ले पाए हैं, इसलिये मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया जाना चाहिये।

न्यायालय का अवलोकन:

  • न्यायालय ने गृह मंत्रालय के इस निष्कर्ष का हवाला दिया कि अब दया याचिका पर फैसला राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता होगा।
  • न्यायालय ने कहा है कि दया याचिका पर फैसला टालने के मंत्रालय के फैसले की "जाँच" करना न्यायालय के ऊपर नहीं है।
  • न्यायालय ने कहा कि दया याचिका पर फैसला टालने का मंत्रालय का आह्वान वास्तव में याचिका को फिलहाल के लिये खारिज करने जैसा है।

दया याचिका:

  • परिचय:
    • दया याचिका एक औपचारिक अनुरोध है, यह अनुरोध किसी ऐसे व्यक्ति, जिसे मृत्युदंड या कारावास की सज़ा दी गई हो, द्वारा राष्ट्रपति या राज्यपाल से दया की मांग करते हुए किया जाता है।
      • संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा और भारत जैसे कई देशों में दया याचिका के विचार का पालन किया जाता है।
      • सभी को जीने का मूल अधिकार प्राप्त है। इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार के रूप में भी वर्णित किया गया है।
  • संवैधानिक ढाँचा:
    • भारत में संवैधानिक ढाँचे के अनुसार, दया याचिका के लिये राष्ट्रपति से अनुरोध करना अंतिम संवैधानिक सहारा है। जब एक दोषी को कानून की अदालत द्वारा सज़ा सुनाई जाती है तो दोषी भारत के संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत भारत के राष्ट्रपति को दया याचिका पेश कर सकता है।
    • इसी प्रकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यों के राज्यपालों को क्षमा प्रदान करने की शक्ति दी गई है।
      • अनुच्छेद 72:
        • राष्ट्रपति के पास किसी भी अपराध के लिये दोषी ठहराए गए किसी भी व्यक्ति की सज़ा को क्षमा करने, उसे रोकने, विराम देने या कम करने या सज़ा को निलंबित करने, परिहार करने की शक्ति होगी।
          • उन सभी मामलों में जहाँ सज़ा या सज़ा कोर्ट मार्शल द्वारा दी गई हो;
          • उन सभी मामलों में जहाँ सज़ा या किसी ऐसे मामले से संबंधित किसी कानून के खिलाफ अपराध के लिये है, जिस पर संघ की कार्यकारी शक्ति का विस्तार होता है;
          • सभी मामलों में जहाँ मौत की सज़ा दी गई है।
      • अनुच्छेद 161:
        • इसके तहत किसी राज्य के राज्यपाल के पास किसी मामले से संबंधित किसी भी कानून के खिलाफ किसी भी अपराध के लिये दोषी ठहराए गए किसी भी व्यक्ति की सज़ा को क्षमा, राहत देने, विराम या छूट देने या निलंबित करने, परिहार करने या कम करने की शक्ति होगी जिससे राज्य की शक्ति का विस्तार होता है।
  • दया याचिका दायर करने की प्रक्रिया:
    • दया याचिकाओं से निपटने के लिये कोई वैधानिक लिखित प्रक्रिया नहीं है, लेकिन व्यवहार में कानून की अदालत में सभी राहतों को समाप्त करने के बाद दोषी व्यक्ति या उसकी ओर से उसका रिश्तेदार राष्ट्रपति को लिखित याचिका प्रस्तुत कर सकता है। राष्ट्रपति की ओर से राष्ट्रपति सचिवालय द्वारा याचिकाएँ प्राप्त की जाती हैं, जिन्हें बाद में गृह मंत्रालय को उनकी टिप्पणियों और सिफारिशों के लिये भेज दिया जाता है।
  • दया याचिका दायर करने का आधार:
    • दया का कार्य कैदी का अधिकार नहीं है। वह इसका दावा नहीं कर सकता।
    • दया या क्षमादान उसके स्वास्थ्य, शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य, उसकी पारिवारिक वित्तीय स्थितियों के आधार पर दी जाती है क्योंकि वह रोजी रोटी का एकमात्र अर्जक है या नहीं।
  • न्यायिक समीक्षा:
    • एपुरु सुधाकर और आंध्र प्रदेश सरकार (2006) एवं अन्य के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 72 और अनुच्छेद 161 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल की क्षमादान शक्ति न्यायिक समीक्षा के अधीन है।
    • न्यायालय ने कुछ आधार निर्धारित किये जिन पर याचिकाकर्त्ता द्वाराbहै:
      • यदि आदेश बेबुनियादी तरीके से पारित किया जाता है।
      • यदि पारित आदेश दुर्भावनापूर्ण है।
      • यदि आदेश पूरी तरह से अप्रासंगिक विचारों के प्रभाव में पारित किया गया है।
      • अगर आदेश में मनमानी की भावना व्याप्त है।

दया याचिका से जुड़े कुछ अहम फैसले:

  • मारू राम बनाम भारत संघ (1981): सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि अनुच्छेद 72 के तहत क्षमा देने की शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर किया जाना चाहिये।
  • धनंजय चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1994): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि "संविधान के अनुच्छेद 72 और 161 के तहत शक्ति का प्रयोग केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा किया जा सकता है, न कि राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा।
  • केहर सिंह बनाम भारत संघ (1989): सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति के दायरे की विस्तार पूर्वक जाँच की थी।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 की न्यायिक शक्ति के तहत अपराध के लिये दोषी करार दिये गए व्यक्ति को राष्ट्रपति क्षमा अर्थात् दंडादेश का निलंबन, प्राणदंड स्थगन, राहत और माफी प्रदान कर सकता है।

क्षमादान की शक्ति से संबंधित कुछ कीवर्ड:

  • क्षमा (Pardon): इसमें दंड और बंदीकरण दोनों को हटा दिया जाता है तथा दोषी की सज़ा को दंड, दंडादेशों एवं निरर्हताओं से पूर्णतः मुक्त कर दिया जाता है।
  • लघुकरण (Commutation): इसमें दंड के स्वरूप में परिवर्तन करना शामिल है, उदाहरण के लिये मृत्युदंड को आजीवन कारावास और कठोर कारावास को साधारण कारावास में बदलना।
  • परिहार (Remission): इसमें दंड कीअवधि को कम करना शामिल है, उदाहरण के लिये दो वर्ष के कारावास को एक वर्ष के कारावास में परिवर्तित करना।
  • विराम (Respite): इसके अंतर्गत किसी दोषी को प्राप्त मूल सज़ा के प्रावधान को किन्हीं विशेष परिस्थितियों में बदलना शामिल है। उदाहरण के लिये महिला की गर्भावस्था की अवधि के कारण सज़ा को परिवर्तित करना।
  • प्रविलंबन (Reprieve): इसका अर्थ है अस्थायी समय के लिये किसी सज़ा (विशेषकर मृत्युदंड) के निष्पादन पर रोक लगाना। इसका उद्देश्य दोषी को राष्ट्रपति से क्षमा या लघुकरण प्राप्त करने के लिये समय देना है।

अन्य देशों के प्रावधान:

  • संयुक्त राज्य अमेरिका:
    • अमेरिका का संविधान महाभियोग के मामलों को छोड़कर राष्ट्रपति को संघीय कानून के तहत अपराधों के लिये प्रविलंबन अथवा क्षमादान करने की समान शक्तियाँ प्रदान करता है। हालाँकि राज्य कानून के उल्लंघन के मामलों में यह शक्ति राज्य के संबंधित राज्यपाल को दी गई है।
  • यूनाइटेड किंगडम:
    • यूनाइटेड किंगडम में संवैधानिक राजा मंत्रिस्तरीय की सलाह द्वारा अपराधों हेतु क्षमा या दंडविराम कर सकता है।
  • कनाडा:
    • आपराधिक रिकॉर्ड अधिनियम के तहत राष्ट्रीय पैरोल बोर्ड ऐसी राहत देने हेतु अधिकृत है।

निष्कर्ष:

  • दया याचिका एक दोधारी तलवार के रूप में कार्य करती है जो स्थिति और परिस्थितियों के आधार पर वरदान या अभिशाप दोनों हो सकती है। दया याचिका को मंज़ूरी देने में अनावश्यक बाधाएँ एवं देरी से दोषियों तथा पीड़ितों दोनों को गंभीर असुविधा हो सकती है।
  • यह अनजाने/अनायास न्याय में देरी कर सकता है जिससे पीड़ितों को कभी भी उचित एवं निष्पक्ष न्याय नहीं मिल पाता है।
  • यह पीड़ित के दर्द और पीड़ा को और बढ़ाएगा। भारतीय न्यायपालिका की उचित सुविधा एवं सुचारु कामकाज़ हेतु दया याचिका दायर करने तथा क्षमा देने में अनावश्यक देरी को रोकने के लिये उचित सीमा अवधि व उचित नीतियों की आवश्यकता है।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न: 

प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन-सी किसी राज्य के राज्यपाल को दी गई विवेकाधीन शक्तियाँ हैं? (2014)

  1. भारत के राष्ट्रपति को राष्ट्रपति शासन अधिरोपित करने के लिये रिपोर्ट भेजना
  2. मंत्रियों की नियुक्ति करना
  3. राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कतिपय विधेयकों को भारत के राष्ट्रपति के विचार के लिये आरक्षित करना
  4. राज्य सरकार के कार्य संचालन के लिये नियम बनाना

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2, 3 और 4
(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (b)


प्रश्न. राज्यपाल द्वारा विधायी शक्तियों के प्रयोग की आवश्यक शर्तों का विवेचन कीजिये। विधायिका के समक्ष रखे बिना राज्यपाल द्वारा अध्यादेशों के पुनः प्रख्यापन की वैधता की विवेचना कीजिये। (मुख्य परीक्षा, 2022)

स्रोत: द हिंदू


अंतर्राष्ट्रीय संबंध

WTO को कृषि सब्सिडी पर पुनः विचार करने की आवश्यकता

प्रिलिम्स के लिये:

WTO, GATT, सब्सिडी बॉक्स, पीस क्लॉज़, डी मिनिमस क्लॉज़

मेन्स के लिये:

WTO सुधार, सब्सिडी बॉक्स के मुद्दे, WTO सुधारों पर भारत के सुझाव

चर्चा में क्यों?

भारत के वित्त मंत्री ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) से कृषि सब्सिडी के मुद्दे पर पुनः विचार करने का आग्रह किया है क्योंकि यह कोविड-19 महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध की पृष्ठभूमि में उभरती अर्थव्यवस्थाओं की खाद्य सुरक्षा आवश्यकताओं को प्रभावित कर रही है।

  • वित्त मंत्री ने एशियाई विकास बैंक (ADB) के गवर्नर्स द्वारा आयोजित संगोष्ठी 'एशिया को समर्थन देने वाली नीतियाँ’ विषय पर यह बात कही।

नोट:

  • एशियाई विकास बैंक (ADB) के गवर्नर्स की संगोष्ठी एक वार्षिक कार्यक्रम है जो एशिया-प्रशांत क्षेत्र में विकासात्मक मुद्दों पर चर्चा करने के लिये ADB के सदस्य देशों के सभी गवर्नर, प्रमुख नीति निर्माता, विकास विशेषज्ञ आदि को एक साथ लाती है।
    • इसका मुख्यालय मनीला (फिलीपींस) में स्थित है। ADB एशिया और प्रशांत क्षेत्र में आर्थिक एवं सामाजिक विकास को बढ़ावा देने के लिये वर्ष 1966 में स्थापित एक क्षेत्रीय विकास बैंक है।
  • बोर्ड ऑफ गवर्नर्स ADB का सर्वोच्च नीति-निर्माण निकाय है जिसमें प्रत्येक सदस्य राष्ट्र से एक प्रतिनिधि शामिल होता है।

WTO के तहत सब्सिडी

  • एम्बर बॉक्स:
    • एम्बर बॉक्स सब्सिडी वह है जो अन्य देशों की तुलना में किसी देश के उत्पादों को सस्ता बनाकर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को विकृत कर सकती है।
    • विश्व व्यापार संगठन के अनुसार, कृषि के एम्बर बॉक्स का उपयोग उन सभी घरेलू समर्थन उपायों के लिये किया जाता है जो उत्पादन और व्यापार को विकृत करने वाले माने जाते हैं।
      • परिणामस्वरूप व्यापार समझौते पर हस्ताक्षरकर्त्ताओं को एम्बर बॉक्स में आने वाले व्यापार-विकृत घरेलू समर्थन को कम करने के लिये प्रतिबद्ध होने की आवश्यकता होती है।
    • सदस्य जो इन प्रतिबद्धताओं को पूरा नहीं करते हैं, उन्हें अपने उत्पादन मूल्य के 5-10% के अंदर अपना एम्बर बॉक्स समर्थन रखना चाहिये। (डि मिनिमस क्लॉज़)
      • विकासशील देशों के लिये 10%
      • विकसित देशों के लिये 5%
  • ब्लू बॉक्स:
    • यह "शर्तों के साथ एम्बर बॉक्स" है जो विकृति को कम करने के लिये डिज़ाइन की गई स्थितियाँ हैं।
    • कोई भी समर्थन जो आमतौर पर एम्बर बॉक्स में मौजूद होता है, उसे ब्लू बॉक्स में रखा जाता है, यद्यपि इसके लिये किसानों को उत्पादन सीमित करने की आवश्यकता होती है।
      • इस सब्सिडी का उद्देश्य उत्पादन सीमा निर्धारित कर अथवा किसानों को अपनी भूमि का एक हिस्सा आरक्षित करने के लिये बाध्य कर उत्पादन को सीमित करना है।
    • वर्तमान में ब्लू बॉक्स सब्सिडी पर खर्च करने की कोई सीमा नहीं है।
  • ग्रीन बॉक्स:
    • घरेलू सहायता के वे उपाय जो व्यापार को न के बराबर अथवा न्यूनतम रूप से बाधित करते हैं, उन्हें ग्रीन बॉक्स कहा जाता है।
    • ग्रीन बॉक्स सब्सिडी के लिये सरकारी वित्त का उपयोग किया जाता है; फसलों हेतु कोई मूल्य समर्थन नहीं होता है।
      • इनमें पर्यावरण संरक्षण और क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम भी शामिल हैं।
    • इसलिये "ग्रीन बॉक्स" सब्सिडी की अनुमति बिना किसी सीमा के दी जाती है (कुछ परिस्थितियों को छोड़कर)।

सब्सिडी मानदंडों पर फिर से विचार करने के प्रमुख कारण:

  • ग्लोबल साउथ के लिये असमान अवसर:
    • विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के बाद से कृषि वस्तुओं के निर्यात के संबंध में सामान्य तौर पर एक शिकायत रही है कि वैश्विक दक्षिण/ग्लोबल साउथ और उभरते बाज़ारों के दृष्टिकोण को व्यापार चर्चाओं में विकसित देशों के समान महत्त्व नहीं दिया गया है।
    • 'ग्लोबल साउथ' व्यापक रूप से एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के देशों को संदर्भित करता है।
  • खाद्य सब्सिडी सीमा के मुद्दे: विश्व व्यापार संगठन के सदस्य देशों का खाद्य सब्सिडी बिल वर्ष 1986-88 के संदर्भ मूल्य के आधार पर उत्पादन मूल्य के 10% से अधिक नहीं होना चाहिये, यह सीमा निर्धारण अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विनियमों के तहत अपनाए गए संदर्भ मूल्य के लिये एक समस्या है।
    • विकासशील देशों में कृषि और गरीब किसानों के लिये सब्सिडी की गणना नहीं की जाती थी तथा विश्व व्यापार संगठन द्वारा सब्सिडी पर रोक लगा दी जाती थी।
    • व्यापार समझौतों की असंतुलित प्रकृति के कारण विकासशील देशों की तुलना में विकसित देशों में खाद्य सुरक्षा दृढ़ है।
  • बढ़ती खाद्य असुरक्षा: कोविड-19 महामारी और रूस-यूक्रेन संघर्ष के कारण खाद्य सुरक्षा के लिये उत्पन्न चुनौतियों की वजह से सब्सिडी मानदंडों पर फिर से विचार करना आवश्यक हो गया है क्योंकि खाद्य और उर्वरक सुरक्षा अब अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है।
  • भारत की मांग: स्थायी समाधान के तहत भारत ने खाद्य सब्सिडी सीमा की गणना के फार्मूले में संशोधन और वर्ष 2013 के बाद लागू कार्यक्रमों को 'पीस क्लॉज़' के दायरे में शामिल करने की मांग की है।

विश्व व्यापार संगठन का शांति समझौता:

  • एक अंतरिम उपाय के रूप में विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों ने दिसंबर 2013 में 'पीस क्लॉज़/शांति समझौता' नामक एक तंत्र पर सहमति जताई और स्थायी समाधान के लिये बातचीत करने का संकल्प लिया।
  • शांति उपबंध के तहत विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों ने विश्व व्यापार संगठन के विवाद समाधान फोरम में विकासशील राष्ट्रों द्वारा निर्धारित सीमा में किसी भी उल्लंघन को चुनौती देने से बचने पर सहमति व्यक्त की।
  • यह उपबंध तब तक बना रहेगा जब तक कि खाद्य भंडारण के मुद्दे का स्थायी समाधान नहीं हो जाता।

विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation- WTO)

  • परिचय:
    • विश्व व्यापार संगठन एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है जो वैश्विक व्यापार को नियंत्रित एवं बढ़ावा देने का कार्य करता है।
    • इसे वर्ष 1995 में स्थापित किया गया था और वर्तमान में 164 देश (यूरोपीय संघ सहित) इसके सदस्य हैं।
    • यह सदस्य देशों को संवाद करने और व्यापार समझौतों को लागू करने, विवादों को सुलझाने एवं आर्थिक विकास तथा विकास को बढ़ावा देने हेतु एक मंच प्रदान करता है।
    • इसका मुख्यालय जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड में है।
  • विश्व व्यापार संगठन की उत्पत्ति:
    • WTO को वर्ष 1947 में संपन्न हुए प्रशुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौते (General Agreement on Tariffs and Trade- GATT) के स्थान पर अपनाया गया।
    • WTO के निर्माण की पृष्ठभूमि GATT के उरुग्वे दौर (वर्ष1986-94) की वार्ता में तैयार हुई।
      • विश्व व्यापार संगठन ने 1 जनवरी, 1995 को परिचालन शुरू किया।
    • जिस समझौते के तहत WTO की स्थापना की गई उसे "मराकेश समझौते" के रूप में जाना जाता है। इस पर वर्ष 1994 में मोरक्को के मराकेश में हस्ताक्षर किये गए।
  • भारत वर्ष 1947 में GATT तथा WTO का संस्थापक सदस्य देश बना।
    • GATT और WTO में मुख्य अंतर यह है कि GATT जहाँ ज़्यादातर वस्तुओं के व्यापार को विनियमित करता था, वहीं WTO और इसके समझौतों में न केवल वस्तुओं को बल्कि सेवाओं एवं अन्य बौद्धिक संपदाओं जैसे- व्यापार चिह्न, डिज़ाइन व आविष्कारों से संबंधित व्यापार को भी शामिल किया जाता है।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न: 

प्रश्न: भारत ने वस्तुओं के भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 को किसके दायित्त्वों का पालन करने के लिये अधिनियमित किया? (2018)

(a) अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन
(b) अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष
(c) व्यापार एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन
(d) विश्व व्यापार संगठन

उत्तर: (d)


प्रश्न. 'एग्रीमेंट ओन एग्रीकल्चर', 'एग्रीमेंट ओन द एप्लीकेशन ऑफ सेनेटरी एंड फाइटोसेनेटरी मेज़र्स और 'पीस क्लाज़' शब्द प्रायः समाचारों में किसके मामलों के संदर्भ में आते हैं; (2015)

(a) खाद्य और कृषि संगठन
(b) जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का रुपरेखा सम्मेलन
(c) विश्व व्यापार संगठन
(d) संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम

उत्तर: (c)


प्रश्न. निम्नलिखित में से किस संदर्भ में कभी-कभी समाचारों में 'एम्बर बॉक्स, ब्लू बॉक्स और ग्रीन बॉक्स' शब्द देखने को मिलते हैं? (2016)

(a) WTO मामला
(b) SAARC मामला
(c) UNFCCC मामला
(d) FTA पर भारत-EU वार्ता

उत्तर: (a)


प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2017)

  1. भारत ने विश्व व्यापार संगठन के व्यापार सुविधा समझौते (TFA) की पुष्टि की है।
  2. TFA 2013 के WTO के बाली मंत्रिस्तरीय पैकेज का एक हिस्सा है।
  3. TFA जनवरी 2016 में लागू हुआ।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 1 और 3
(C) केवल 2 और 3
(D) 1, 2 और 3

उत्तर: (A)


प्रश्न. व्यापार-संबंधित निवेश उपाय (TRIMS) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं? (2020)

  1. विदेशी निवेशकों द्वारा आयात पर मात्रात्मक प्रतिबंध निषिद्ध हैं।
  2. वे वस्तुओं और सेवाओं दोनों में व्यापार से संबंधित निवेश उपायों पर लागू होते हैं।
  3. उन्हें विदेशी निवेश के नियमन से कोई सरोकार नहीं है।

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)


मेन्स:

प्रश्न. विश्व व्यापार संगठन एक महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्था है जहाँ लिये गए निर्णय देशों को गहराई से प्रभावित करते हैं। विश्व व्यापार संगठन का जनादेश क्या है और उसके निर्णय कितने बाध्यकारी हैं? खाद्य सुरक्षा पर वार्ता के नवीनतम दौर पर भारत के रुख का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। (2014)

प्रश्न. “विश्व व्यापार संगठन के अधिक व्यापक लक्ष्य और उद्देश्य वैश्वीकरण के युग में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का प्रबंधन एवं प्रोन्नति करना है। लेकिन वार्ताओं की दोहा परिधि मृत्योन्मुखी प्रतीत होती है, जिसका कारण विकसित तथा विकासशील देशों के बीच मतभेद है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस पर चर्चा कीजिये। (2016)

प्रश्न. यदि 'व्यापार युद्ध' के वर्तमान परिदृश्य में विश्व व्यापार संगठन को जिंदा बने रहना है, तो उसके सुधार के कौन-कौन से प्रमुख क्षेत्र हैं विशेष रूप से भारत के हित को ध्यान में रखते हुए? (2018)

स्रोत: द हिंदू


भारतीय अर्थव्यवस्था

मुद्रा एवं वित्त पर रिपोर्ट 2022-23

प्रिलिम्स के लिये:

आरबीआई की मुद्रा एवं वित्त पर रिपोर्ट, शुद्ध शून्य उत्सर्जन लक्ष्य

मेन्स के लिये:

वृद्धि और विकास, भारत के नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य एवं वित्तीय क्षेत्र की भूमिका

चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा मुद्रा एवं वित्त पर अपनी रिपोर्ट 2022-23 में किये गए एक अध्ययन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन हेतु भारत के अनुकूलन के लिये कुल संचयी व्यय वर्ष 2030 तक 85.6 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच सकता है।

मुद्रा एवं वित्त पर रिपोर्ट:

  • परिचय:
    • यह RBI का वार्षिक प्रकाशन है।
    • रिपोर्ट में भारतीय अर्थव्यवस्था और वित्तीय प्रणाली के विभिन्न पहलुओं को शामिल किया गया है।
  • थीम:
    • मुद्रा और वित्त पर रिपोर्ट 2022-23 का विषय 'टुवर्ड्स ए ग्रीनर क्लीनर इंडिया' है।
      • यह भारत के लिये जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों और अवसरों एवं कम कार्बन तथा जलवायु-लचीले विकास पथ को प्राप्त करने में वित्तीय क्षेत्र की भूमिका पर केंद्रित है।
  • लक्ष्य:
    • इसका उद्देश्य भारत में व्यापक आर्थिक और वित्तीय विकास तथा उनके नीतिगत प्रभावों पर विश्लेषणात्मक अंतर्दृष्टि प्रदान करना है।
  • आकलन:
    • रिपोर्ट में भारत में टिकाऊ उच्च विकास के लिये भविष्य की चुनौतियों का आकलन करने हेतु जलवायु परिवर्तन के चार प्रमुख आयाम- जलवायु परिवर्तन के अभूतपूर्व पैमाने और गति, इसके व्यापक आर्थिक प्रभाव, वित्तीय स्थिरता के निहितार्थ एवं जलवायु जोखिमों को कम करने के लिये नीतिगत विकल्प शामिल हैं।

रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएँ:

  • अक्षय ऊर्जा लक्ष्य:
    • भारत को वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग में उल्लेखनीय वृद्धि करने की आवश्यकता है। रिपोर्ट का सुझाव है कि वर्ष 2070-71 तक भारत के कुल ऊर्जा उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की भागीदारी 80 प्रतिशत तक होनी चाहिये।
    • इसके लिये ऊर्जा उत्सर्जन में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग 5 प्रतिशत सालाना की त्त्वरित कमी की आवश्यकता होगी।
  • हरित वित्तपोषण की आवश्यकता:
    • जलवायु घटनाओं के कारण होने वाले बुनियादी ढाँचे के अंतर को दूर करने के लिये भारत का सकल घरेलू उत्पाद वर्ष 2030 तक हरित वित्तपोषण आवश्यकता हेतु सालाना कम-से-कम 2.5 प्रतिशत होने का अनुमान है।
      • वित्तीय प्रणाली को भारत के शुद्ध शून्य लक्ष्य में प्रभावी ढंग से योगदान करने के लिये पर्याप्त संसाधन जुटाने और मौजूदा संसाधनों को पुनः आवंटित करने की आवश्यकता हो सकती है।
  • नीतिगत हस्तक्षेप:
    • इस रिपोर्ट में सभी नीति लीवर्स (सार्वजनिक सेवाओं में परिवर्तनों को निर्देशित, प्रबंधित करने और आकार देने के लिये सरकार एवं उसके अभिकरणों द्वारा उपयोग में लाया जाना वाला उपकरण) में प्रगति सुनिश्चित करने के लिये एक संतुलित नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता पर भी प्रकाश डाला गया है जो भारत को वर्ष 2030 तक अपने हरित संक्रमण लक्ष्यों को प्राप्त करने और वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन लक्ष्य प्राप्त करने में सक्षम बनाएगा।
  • जलवायु परिवर्तन के कारण वित्तीय जोखिम:
    • भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक (PSB) निजी क्षेत्र के बैंकों की तुलना में जलवायु संबंधी वित्तीय जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।
  • नीति उपकरण:
    • केंद्रीय बैंकों के पास निवेश के निर्णयों को प्रभावित करने और स्थिरता लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये संसाधनों एवं ऋण के आवंटन के लिये कई नीतिगत साधन हैं।
    • इसमें विभिन्न नियमों के माध्यम से बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों को जलवायु एवं पर्यावरणीय जोखिमों पर विचार करना शामिल है।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न: 

प्रश्न. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिये: (2021)

  1. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के गवर्नर की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है।
  2. भारत के संविधान में कुछ प्रावधान केंद्र सरकार को जनहित में RBI को निर्देश जारी करने का अधिकार देते हैं।
  3. RBI का गवर्नर भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम से अपनी शक्ति प्राप्त करता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (c)

व्याख्या:

  • भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के प्रावधानों के अनुसार 1 अप्रैल, 1935 को भारतीय रिज़र्व बैंक की स्थापना हुई थी।
  • मूलतः रिज़र्व बैंक निजी स्वामित्त्व में था, लेकिन वर्ष 1949 में राष्ट्रीयकृत होने के बाद से यह भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्त्व में है।
  • RBI के मामले एक केंद्रीय निदेशक मंडल द्वारा शासित होते हैं। बोर्ड की नियुक्ति भारत सरकार द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम के अनुसार की जाती है।

स्रोत : द हिंदू


शासन व्यवस्था

कृत्रिम बुद्धिमता का विनियमन

प्रिलिम्स के लिये:

कृत्रिम बुद्धिमता का विनियमन, OpenAI का ChatGPT, ब्लैक बॉक्स, कृत्रिम बुद्धिमता अधिनियम, रिस्पॉन्सिबल AI फॉर ऑल रिपोर्ट

मेन्स के लिये:

कृत्रिम बुद्धिमता का विनियमन और आगे की राह

चर्चा में क्यों?

यूरोपीय संसद कृत्रिम बुद्धिमता अधिनियम के एक नए मसौदे पर प्रारंभिक समझौते पर पहुँच गई है, जिसका उद्देश्य OpenAI के ChatGPT जैसी प्रणालियों को विनियमित करना है।

  • वर्ष 2021 में Al में पारदर्शिता, विश्वास और जवाबदेही तथा यूरोपीय संघ की सुरक्षा, स्वास्थ्य, मौलिक अधिकारों एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के जोखिमों को कम करने हेतु एक रूपरेखा तैयार करने के उद्देश्य से कानून का मसौदा तैयार किया गया था।

EU का कृत्रिम बुद्धिमता अधिनियम:

  • परिचय:
    • यह AI को सॉफ्टवेयर के रूप में परिभाषित करता है जो सामग्री, पूर्व-सूचनाएँ, सिफारिशों या निर्णयों जैसे आउटपुट उत्पन्न करता है।
    • यह उच्चतम जोखिम वाली श्रेणी में AI तकनीकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाता है, जिसमें सार्वजनिक स्थानों पर रीयल-टाइम फेशियल और बायोमेट्रिक पहचान प्रणाली, नागरिकों का सामाजिक स्कोरिंग, व्यवहार को प्रभावित करने वाले तकनीक और कमज़ोर लोगों का शोषण करने वाली तकनीक शामिल है।
  • केंद्र बिंदु:
    • यह AI सिस्टम पर केंद्रित है जिसमें लोगों के स्वास्थ्य, सुरक्षा या मौलिक अधिकारों को नुकसान पहुँचाने की क्षमता है।
      • इनमें स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, रोज़गार, कानून प्रवर्तन और आवश्यक सेवाओं तक पहुँच में AI शामिल हैं।
    • इससे पहले कि उच्च जोखिम वाले AI सिस्टम को बेचा जाए, ये पारदर्शी, व्याख्या करने योग्य और मानव निरीक्षण की अनुमति देने के लिये सख्त परीक्षण से गुजरेंगे।
    • कम जोखिम वाले AI सिस्टम की आवश्यकताएँ कम हैं जैसे स्पैम फिल्टर या वीडियो गेम।
  • उद्देश्य:
    • इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा से लेकर वित्त तथा ऊर्जा तक विभिन्न क्षेत्रों में नैतिक प्रश्नों एवं कार्यान्वयन चुनौतियों का समाधान करना है।
    • कानून "प्रौद्योगिकी के उपयोग से संबंधित नुकसान को कम करने या रोकने और AI की व्यापकता को बढ़ावा देने" के बीच संतुलन बनाना चाहता है।
      • यूरोपीय संघ के जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन (GDPR), 2018 ने वैश्विक डेटा संरक्षण शासन में इसे उद्योग के नेतृत्त्वकर्त्ता के रूप में स्थापित किया। AI कानून का उद्देश्य "प्रयोगशाला से बाज़ार तक AI में उत्कृष्टता के वैश्विक केंद्र के रूप में यूरोप की स्थिति को मज़बूत करना" और यह सुनिश्चित करना कि यूरोप में AI 27 देशों के ब्लॉक के मूल्यों और नियमों का सम्मान करता है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को विनियमित करने की आवश्यकता:

  • शामिल जोखिमों को लेकर अनिश्चितता:
    • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग बढ़ रहा है और जैसे-जैसे तकनीक अधिक उन्नत होती जा रही है वैसे-वैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) कार चलाने, कैंसर का पता लगाने आदि जैसे विभिन्न कार्यों में सक्षम हो रही है, जिसके कारण इससे जुड़े जोखिम भी बढ़ रहे हैं।
  • ब्लैक बॉक्स:
    • कुछ AI उपकरण इतने जटिल हैं कि वे "ब्लैक बॉक्स" की तरह हैं। इसका अर्थ यह है कि उन्हें बनाने वाले भी पूरी तरह से नहीं समझ सकते कि वे कैसे काम करते हैं और कुछ निश्चित उत्तरों या निर्णयों के साथ कैसे प्रस्तुत होते हैं।
    • यह एक गुप्त बॉक्स की तरह है जो एक आउटपुट उत्पन्न करता है, लेकिन इसकी कार्यात्मक प्रक्रिया की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
  • अशुद्ध और पूर्वाग्रही:
    • AI उपकरण पहले से ही फेशियल रिकॉग्निशन सॉफ्टवेयर के कारण गलत व्यक्ति की गिरफ्तारी, AI प्रणाली में निर्मित पूर्वाग्रहों के कारण अनुचित व्यवहार और हाल ही में GPT-3 एवं 4 जैसे बड़े भाषा मॉडल पर आधारित चैटबॉट के साथ गलत कंटेंट का उत्पादन जैसी समस्याएँ उत्पन्न कर चुके हैं।
    • ये चैटबॉट उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री/कंटेंट का उत्पादन करने में सक्षम हैं, इनमें और मानव द्वारा लिखित सामग्री में भिन्नता बता पाना मुश्किल है परंतु यह हमेशा सटीक अथवा कानूनी रूप से अनुमत नहीं हो सकता है।
  • भविष्य में इसके बर्ताव को लेकर संशय:
    • AI कई अनूठी चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करता है, क्योंकि पारंपरिक इंजीनियरिंग प्रणालियों के विपरीत, डिज़ाइनर यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि AI प्रणाली किस प्रकार व्यवहार करेगी। उदहारण के लिये जब किसी कारखाने से एक पारंपरिक ऑटोमोबाइल को बाहर भेजा जाता है तो इंजीनियरों को पता होता है कि यह किस प्रकार काम करेगा। परंतु सेल्फ-ड्राइविंग कारों के साथ इंजीनियर यह सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं कि नई स्थितियों में यह कैसा प्रदर्शन करेंगी।

वैश्विक स्तर पर AI का विनियमन:

  • भारत:
    • नीति आयोग ने AI के लिये राष्ट्रीय रणनीति और रिस्पॉन्सिबल AI फॉर ऑल रिपोर्ट जैसे मुद्दों पर कुछ मार्गदर्शक दस्तावेज़ जारी किये हैं।
    • भारत सामाजिक और आर्थिक समावेशन, नवाचार और भरोसे को प्रोत्साहित करता है।
  • ब्रिटेन:
    • ब्रिटेन ने AI के लिये मौजूदा नियमों को लागू करने के लिये विभिन्न क्षेत्रों में नियामकों से जानकारी एकत्रित करने के लिये सरल दृष्टिकोण को अपनाया है।
    • कंपनियों द्वारा पालन किये जाने वाले पाँच सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए एक श्वेतपत्र प्रकाशित किया गया जिसमें सुरक्षा और मज़बूती; पारदर्शिता और व्याख्यात्मकता; निष्पक्षता; जवाबदेही तथा शासन; प्रतिस्पर्द्धात्मकता एवं निवारण की व्याख्या की गई है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका:
    • अमेरिका ने AI बिल ऑफ राइट्स (AIBoR) हेतु एक ब्लूप्रिंट जारी किया, जिसमें आर्थिक एवं नागरिक अधिकारों के लिये AI के नकारात्मक प्रभाव को रेखांकित किया गया है तथा इन प्रभावों को कम करने हेतु पाँच सिद्धांत दिये गए हैं।
    • यह ब्लूप्रिंट स्वास्थ्य, श्रम और शिक्षा जैसे कुछ क्षेत्रों हेतु नीतिगत हस्तक्षेप के साथ यूरोपीय संघ की तरह क्षैतिज रणनीति के बजाय AI शासन के लिये क्षेत्रीय विशेष दृष्टिकोण का समर्थन करता है, जिससे क्षेत्रीय संघीय एजेंसियों को अपनी योजनाओं को तैयार करने की अनुमति मिलती है।
  • चीन:
    • वर्ष 2022 में चीन ने विशिष्ट प्रकार के एल्गोरिदम और AI को लक्षित करने वाले दुनिया के कुछ पहले राष्ट्रीय बाध्यकारी नियम बनाए हैं।
    • इसने अनुशंसा एल्गोरिदम को विनियमित करने हेतु कानून बनाया, जिसमें इस बात पर ध्यान दिया गया कि वे सूचना का प्रसार कैसे करते हैं।

आगे की राह

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता को विनियमित करने में एक सरल नियामक ढाँचे का निर्माण शामिल है जो AI की क्षमताओं को परिभाषित करता है एवं दुरुपयोग हेतु अतिसंवेदनशील लोगों की पहचान करता है।
  • व्यवसायों की डेटा तक पहुँच सुनिश्चित करते हुए सरकार को डेटा गोपनीयता, अखंडता और सुरक्षा को प्राथमिकता देनी चाहिये।
  • ब्लैक-बॉक्स के दृष्टिकोण को समाप्त करने के लिये एक अनिवार्य स्पष्टीकरण लागू किया जाना चाहिये, जो व्यवसाय हेतु लिये गए प्रत्येक निर्णय के पीछे के तर्क को समझने में मदद करेगा।
  • इसके प्रभावी नियमों को तैयार करने के लिये नीति निर्माताओं को विनियमन के दायरे और इस्तेमाल की जाने वाली शब्दावली के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करनी चाहिये, उन्हें उद्योग के विशेषज्ञों एवं व्यवसायों सहित विभिन्न हितधारकों से इनपुट लेना चाहिये।

 UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न: 

प्रश्न 1. विकास की वर्तमान स्थिति में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), निम्नलिखित में से किस कार्य को प्रभावी रूप से कर सकती है? (2020)

  1. औद्योगिक इकाइयों में विद्युत की खपत कम करना
  2. सार्थक लघु कहानियों और गीतों की रचना
  3. रोगों का निदान
  4. टेक्स्ट-से-स्पीच (Text-to-Speech) में परिवर्तन
  5. विद्युत ऊर्जा का बेतार संचरण

नीचे दिये गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिये:

(a) केवल 1, 2, 3 और 5
(b) केवल 1, 3 और 4
(c) केवल 2, 4 और 5
(d) 1, 2, 3, 4 और 5

उत्तर: (b)


प्रश्न. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिये: (2018)

कभी-कभी समाचारों में आने वाले शब्द संदर्भ/विषय
1. बेल II प्रयोग कृत्रिम बुद्धि
2. ब्लॉकचेन प्रौद्योगिकी डिजिटल/क्रिप्टोकरेंसी
3. CRISPR–Cas9 कण भौतिकी


उपर्युक्त युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?

(a) केवल 1 और 3
(b) केवल 2
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

स्रोत: द हिंदू


जैव विविधता और पर्यावरण

डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप

प्रिलिम्स के लिये:

डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप, पेरिस समझौता, विकासशील छोटे द्वीपीय राज्य

मेन्स के लिये:

जलवायु वित्त का महत्त्व, जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने के लिये डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप का महत्त्व

चर्चा में क्यों?

जलवायु परिवर्तन एक वैश्विक समस्या है जो सभी को प्रभावित करती है, लेकिन यह कुछ देशों को दूसरों की तुलना में अधिक प्रभावित करती है। दुर्भाग्य से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति सबसे संवेदनशील देश अकसर अपने लचीलेपन को दृढ़ करने के लिये आवश्यक निवेश को वहन करने में सबसे कम सक्षम होते हैं।

  • यह इन देशों को लंबे समय तक वित्तीय संकट का सामना करने के खतरे में डालता है, जिससे उन्हें अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की सहायता पर विश्वास करने के लिये मजबूर होना पड़ता है।
  • डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप एक नवाचारी वित्तीय लिखत है जिसका उद्देश्य जलवायु निवेश के लिये राजकोषीय विस्तार के साथ इस मुद्दे को संबोधित करना है।

डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप:

  • परिचय:
    • डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप ऋणी देशों को अपने ऋण बोझ को कम करते हुए जलवायु पर सार्थक कार्रवाई करने के लिये प्रोत्साहित कर सकते हैं।
    • इन स्वैपों में नीतिगत प्रतिबद्धताओं या कर्ज़दार देशों द्वारा किये गए व्यय के बदले ऋण को कम करना शामिल है।
      • आधिकारिक द्विपक्षीय देश और वाणिज्यिक ऋण दोनों डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप में शामिल हो सकते हैं।
      • द्विपक्षीय डेब्ट स्वैप में जलवायु कार्रवाई जैसे क्षेत्रों में पारस्परिक रूप से सहमत परियोजनाओं के वित्तपोषण के लिये आधिकारिक द्विपक्षीय लेनदारों को पहले से प्रतिबद्ध ऋण सेवा भुगतानों को पुनर्निर्देशित करना शामिल है।
      • पिछले एक दशक में निम्न और मध्यम आय वाले देशों के बीच डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप अपेक्षाकृत लोकप्रिय हुआ है।
      • बहुपक्षीय विकास बैंक और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) जैसे बहुपक्षीय संगठन ऋण-राहत उपाय के रूप में इस साधन की वकालत करते रहे हैं।
  • इतिहास:
    • डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप नेचर-फॉर-डेब्ट स्वैप का एक रूप है, जिसे पहली बार वर्ष 1980 के दशक में जैवविविधता के संरक्षण और ऋण राहत के बदले में उष्णकटिबंधीय वनों की रक्षा के लिये प्रस्तावित किया गया था।
    • पहली नेचर-फॉर-डेब्ट स्वैप वर्ष 1987 में बोलिविया और एक गैर-सरकारी संगठन कंज़र्वेशन इंटरनेशनल के बीच की गई थी।
    • 2000 के दशक में डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप एक व्यापक अवधारणा के रूप में उभरा, जिसमें न केवल प्रकृति संरक्षण बल्कि जलवायु शमन और अनुकूलन भी शामिल है।
    • जलवायु के बदले पहला ऋण वर्ष 2006 में जर्मनी और इंडोनेशिया के बीच लागू किया गया था, बाद में ऋण राहत के बदले में इसे वनों की कटाई और वन क्षरण से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने (Reduce Greenhouse gas Emissions from Deforestation and Forest Degradation (REDD+) हेतु प्रतिबद्ध किया गया था।
  • लाभ:
    • लेनदारों हेतु:
      • जलवायु के बदले ऋण का आदान-प्रदान उनके विकास सहयोग और जलवायु वित्त उद्देश्यों को बढ़ा सकता है, उनकी ऋण वसूली की संभावनाओं में सुधार कर सकता है एवं ऋणी देशों के साथ उनके राजनयिक संबंधों को मज़बूत कर सकता है।
    • देनदारों हेतु:
      • जलवायु हेतु ऋण का आदान-प्रदान उनके बाहरी ऋण स्टॉक और सेवा को कम कर सकता है, अन्य विकास आवश्यकताओं हेतु वित्तीय संसाधनों को मुक्त कर सकता है, जलवायु कार्रवाई में उनके घरेलू निवेश को बढ़ा सकता है, साथ ही उनके पर्यावरण तथा सामाजिक परिणामों में सुधार कर सकता है।
    • दोनों पक्षों हेतु:
      • जलवायु के बदले ऋण का आदान-प्रदान आपसी विश्वास एवं सहयोग को बढ़ावा दे सकता है, जो समाधान के साथ-साथ पेरिस समझौते और सतत् विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के वैश्विक प्रयासों में योगदान कर सकता है।
  • चुनौतियाँ:
    • लेनदार देश मुख्यतः जलवायु के लिये ऋण का आदान-प्रदान करने से हिचकिचाते हैं जब तक कि उन्हें यह सुनिश्चित करने के लिये तैयार नहीं किया जाता है कि जलवायु कार्रवाई के प्रति सार्वजनिक व्यय प्रतिबद्धता शेष ऋण सेवा के मूल्य से बेहतर है।
      • हालाँकि सशर्त जलवायु अनुदानों को तैयार और संरचित किया जाता है ताकि उन्हें डायवर्ट करना असंभव हो जो केवल जलवायु निवेश के उद्देश्य हेतु लक्षित हैं।

ऋणदाता देशों की डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप में संलग्नता:

  • लेनदार देशों को जलवायु हेतु डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप में संलग्न होना चाहिये क्योंकि पेरिस समझौते और ग्लासगो फाइनेंशियल एलायंस फॉर नेट ज़ीरो (GFANZ), वित्तीय संस्थानों के एक वैश्विक गठबंधन के हस्ताक्षरकर्त्ताओं की प्रतिबद्धता स्वच्छ, जलवायु-लचीला भविष्य बनाने के लिये विकासशील देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करना है।
    • डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने का एक तरीका है।

डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप छोटे द्वीपीय देशों हेतु सहायक:

  • छोटे द्वीप विकासशील राज्य (SIDS) दो चुनौतियों का सामना करने हेतु डेब्ट-फॉर-क्लाइमेट स्वैप पर नज़र रख रहे हैं: बढ़ते जलवायु जोखिम के अनुकूल होना एवं वित्तीय संकट से उबरना।
    • जलवायु के लिये ऋण के आदान-प्रदान में भाग लेकर SIDS अपने बाहरी कर्ज़ को कम कर सकता है और जलवायु कार्रवाई सहित अन्य विकासात्मक ज़रूरतों के लिये वित्तीय संसाधनों को मुक्त कर सकता है। इससे उन्हें जलवायु कार्रवाई में अपने घरेलू निवेश को बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

स्रोत: डाउन टू अर्थ


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