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डेली न्यूज़

  • 04 Jan, 2021
  • 49 min read
भूगोल

आकाशीय बिजली पर रिपोर्ट

चर्चा में क्यों?

क्लाइमेट रेज़िलिएंट ऑब्ज़र्विंग सिस्टम प्रमोशन काउंसिल ( Climate Resilient Observing Systems Promotion Council- CROPC) द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार,  बिजली गिरने से होने वाली मौतों की संख्या में वर्ष 2019-20 में लगभग 37% की कमी आई है।

  • CROPC एक गैर-लाभकारी संगठन है जो भारत मौसम विज्ञान विभाग (India Meteorological Department- IMD) के समन्वय से कार्य करता है।

प्रमुख बिंदु:

डेटा विश्लेषण: 

  • वर्ष 2019-20 में प्राकृतिक आपदाओं की वजह से कुल मौतें 33% आकाशीय बिजली के कारण हुई थी।

जिम्मेदार कारक: 

  • पर्यावरण के तेजी से क्षरण जैसे- ग्लोबल वार्मिंग, वनों की कटाई, जल निकायों का क्षरण, कंक्रीटाइज़ेशन (Concretisation), बढ़ता प्रदूषण और एरोसोल  ने जलवायु परिवर्तन को चरम स्तर पर पहुँचा दिया है तथा आकाशीय बिजली इन जलवायु चरम सीमाओं का प्रत्यक्ष प्रभाव है।

सुझाव:

  • राज्यों को लाइटनिंग रेज़िलिएंट इंडिया कैंपेन (Lightning Resilient India Campaign) में भाग लेना चाहिये और  व्यापक रूप से अधिक लाइटनिंग जोखिम प्रबंधन सुनिश्चित करना चाहिये।
    • IMD ने CROPC के साथ-साथ लाइटनिंग रेज़िलिएंट इंडिया कैंपेन नाम से एक संयुक्त अभियान शुरू किया है और इसे भारतीय मौसम विज्ञान सोसायटी (Indian Meteorological Society- IMS), गैर-सरकारी संगठनों, IIT दिल्ली तथा अन्य संबंधित संस्थानों द्वारा विधिवत समर्थन दिया गया है।
  • किसानों, मवेशी पालकों, बच्चों और खुले इलाकों में लोगों को आकाशीय बिजली के संबंध में शुरुआती चेतावनी दी जानी चाहिये।
    • आकाशीय बिजली एक निश्चित अवधि में लगभग समान भौगोलिक स्थानों पर समान रूप से गिरती है। 
    • कालबैशाखी - नोर्वेस्टर, जोकि आकाशीय बिजली के साथ आने वाले तेज़ तूफान हैं, काफी हिंसक होते हैं - इस प्रकार के तूफ़ान साधारणत: बंगाल में आते हैं।
  • लाइटनिंग प्रोटेक्शन डिवाइसेस की तरह एक स्थानीय लाइटनिंग प्रोटेक्शन वर्क प्लान को लागू किया जाना चाहिये।
  • क्षति को रोकने के लिये आकाशीय बिजली से होने वाली मौतों को एक आपदा के रूप में अधिसूचित किया जाना चाहिये।
    • इस बात पर ध्यान दिये जाने की जरूरत है कि आकाशीय बिजली को केंद्र ने आपदा के रूप में अधिसूचित नहीं किया है।
  • यद्यपि राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority- NDMA) ने राज्यों को कार्य योजनाओं के लिये व्यापक दिशा-निर्देश जारी किये हैं परंतु बड़ी संख्या में हुए नुकसान के आँकड़े दर्शाते हैं कि योजनाओं के कार्यान्वयन के लिये विभिन्न विभागों के अभिसरण के अलावा, "वैज्ञानिक और समुदाय-केंद्रित दृष्टिकोण" की आवश्यकता है।
  • बिजली की आवृत्ति, वर्तमान तीव्रता, ऊर्जा सामग्री, उच्च तापमान और अन्य प्रतिकूल प्रभावों के संदर्भ में सटीक जोखिम की पहचान करने में आकाशीय बिजली की मैपिंग एक बड़ी सफलता है।
    • इससे भारत के लिये एक लाइटनिंग रिस्क एटलस मैप बन सकेगा, जो एक लाइटनिंग रिस्क मैनेजमेंट प्रोग्राम का आधार बनेगा।

आकाशीय बिजली

अर्थ

  • आकाशीय बिजली का अभिप्राय वातावरण में बिजली के बहुत तीव्र और व्यापक पैमाने पर निर्वहन से है। यह बादल और ज़मीन के बीच अथवा कभी-कभी एक बादल के भीतर भी बहुत कम अवधि के लिये और उच्च वोल्टेज के प्राकृतिक विद्युत निर्वहन की प्रक्रिया है।
  • इंटर-क्लाउड और इंट्रा-क्लाउड (IC) आकाशीय बिजली को आसानी से देखा जा सकता है और यह हानिरहित होती है।
  • क्लाउड टू ग्राउंड (CG) आकाशीय बिजली, बादल और भूमि के बीच उत्पन्न होती है और हाई इलेक्ट्रिक वोल्टेज व इलेक्ट्रिक करंट के समान हानिकारक होती है, जिसके संपर्क में आने से किसी व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।

प्रक्रिया

  • यह बादल के ऊपरी हिस्से और निचले हिस्से के बीच विद्युत आवेश के अंतर का परिणाम है।
    • बिजली उत्पन्न करने वाले बादल आमतौर पर लगभग 10-12 किमी. की ऊँचाई पर होते हैं, जिनका आधार पृथ्वी की सतह से लगभग 1-2 किमी. ऊपर होता है। वहाँ तापमान -35 डिग्री सेल्सियस से -45 डिग्री सेल्सियस तक होता है।
  • चूँकि जलवाष्प ऊपर की ओर उठने की प्रवृत्ति रखता है, यह तापमान में कमी के कारण जल में परिवर्तित हो जाता है। इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में ऊष्मा उत्पन्न होती है, जिससे जल के अणु ऊपर की ओर गति करते हैं। जैसे-जैसे वे शून्य से कम तापमान की ओर बढ़ते हैं, जल की बूँदें छोटे बर्फ के क्रिस्टल में बदल जाती हैं। चूँकि वे ऊपर की ओर बढ़ती रहती हैं और तब तक एक बड़े पैमाने पर इकट्ठा होती जाती हैं, जब तक कि इतने भारी न हो जाए कि वे नीचे गिरना शुरू कर दें।
  • इससे एक ऐसी प्रणाली का निर्माण होता है, जहाँ बर्फ के छोटे क्रिस्टल ऊपर की ओर जबकि बड़े क्रिस्टल नीचे की ओर गति करते हैं। इसके चलते इनके मध्य टकराव होता है और इलेक्ट्रॉन मुक्त होते हैं जो एक विद्युत स्पार्क के समान कार्य करता है। गतिमान मुक्त इलेक्ट्रॉनों में और अधिक टकराव होता जाता है तथा ज़्यादा इलेक्ट्रॉन बनते जाते हैं जो एक चेन रिएक्शन का निर्माण करता है।
  • इस प्रक्रिया के कारण एक ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है जिसमें बादल की ऊपरी परत धनात्मक रूप से चार्ज हो जाती है, जबकि मध्य परत नकारात्मक रूप से चार्ज होती है। 
  • इससे थोड़े ही समय में दो परतों के मध्य एक विशाल विद्युतधारा (लाखों एम्पीयर) प्रवाहित होने लगती है।
    • इससे ऊष्मा उत्पन्न होती है जिससे बादल की दोनों परतों के बीच मौजूद वायु गर्म होने लगती है। 
    • इस ऊष्मा के कारण दोनों परतों के बीच वायु का खाका बिजली कड़कने के दौरान लाल रंग का नज़र आता है। 
    • गर्म हवा विस्तारित होती है और आघात उत्पन्न करती है जिसके परिणामस्वरूप गड़गड़ाहट की आवाज़ आती है।

पृथ्वी पर बिजली कैसे गिरती है?

  • पृथ्वी विद्युत की सुचालक है। यह बादलों की मध्य परत की तुलना में अपेक्षाकृत धनात्मक रूप से चार्ज होती है। परिणामस्वरूप बिजली का अनुमानित 20-25 प्रतिशत प्रवाह पृथ्वी की ओर निर्देशित हो जाता है। 
    • यह विद्युत प्रवाह पृथ्वी पर जीवन और संपत्ति को नुकसान पहुँचाता है।
  • आकाशीय बिजली के ज़मीन पर ऊँची वस्तुओं जैसे कि पेड़ों या इमारतों से टकराने की संभावना अधिक रहती है।
    • लाइटनिंग कंडक्टर एक उपकरण है, जिसका उपयोग इमारतों को बिजली के प्रभाव से बचाने के लिये किया जाता है। यह एक धातु की छड़ होती है जिसे इमारत के निर्माण के दौरान ऊँचाई पर लगाया जाता है।
  • माराकाइबो झील (वेनेज़ुएला) के तट पर सबसे अधिक आकाशीय बिजली की गतिविधियाँ देखी जाती हैं।
    • कैटाटुम्बो नदी, जहाँ मराकाइबो झील में मिलती है उस स्थान पर औसतन एक वर्ष में 260 तूफान आते हैं और अक्तूबर माह में इस स्थान पर प्रत्येक मिनट में 28 बार बिजली चमकती है, इस घटना को ‘बीकन ऑफ मैराकाइबो’ या ‘द एवरलास्टिंग स्टॉर्म’ के रूप में जाना जाता है।

कंक्रीटाइज़ेशन (Concretisation)

  • काॅन्क्रीटाइज़ेशन अथवा पक्की या कंक्रीट की सतह में वृद्धि के कारण पेड़-पौधों पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, जिससे शहरों का भू-जल स्तर काफी गिर जाता है और वे एक ‘अर्बन हीट लैंड’ में परिवर्तित हो जाते हैं। 
    • ‘अर्बन हीट लैंड’ वह सघन जनसंख्या वाला नगरीय क्षेत्र होता है, जिसका तापमान उपनगरीय या ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 2°C अधिक होता है।
    • कंक्रीट की सतह, चाहे इमारतें हों, सड़कें या फुटपाथ, शाम के समय ‘हीट वेव’ को रेडिएट करती हैं, जिससे रात का समय भी दिन जैसा ही गर्म होता है और अधिकतम एवं न्यूनतम तापमान के बीच का अंतर कम हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप शहरी क्षेत्र ‘अर्बन हीट लैंड’ में परिवर्तित हो जाते हैं।
  • कंक्रीटाइज़ेशन के दौरान मिट्टी में संग्रहीत कार्बन वायुमंडल में पहुँच जाता है, जो कि ऑक्सीकरण की प्रकिया के बाद कार्बन डाइऑक्साइड में परिवर्तित हो जाता है। कार्बन डाइऑक्साइड एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस है जो कि तापमान में वृद्धि का मुख्य कारण है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


शासन व्यवस्था

ग्रामीण स्कूलों के लिये स्मार्ट क्लासेज़

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में रेलटेल (RailTel) ने शिक्षा मंत्रालय को केंद्र सरकार द्वारा संचालित ग्रामीण स्कूलों को स्मार्ट क्लासेज़ (Smart Classes) से जोड़ने की योजना का प्रस्ताव दिया है।

प्रमुख बिंदु: 

प्रस्ताव के बारे में:

  • यह प्रस्ताव  दूरस्थ सरकारी स्कूलों में उच्च गति वाले ब्रॉडबैंड की पहुंँच, बिजली उपलब्ध कराने और सीखने अर्थात् ‘इंटरनेट आफ  थिंग्स’ (Internet of Things) के वातावरण से संबंधित है।
  • यह  योजना ठोस ऑप्टिकल फाइबर केबल नेटवर्क का उपयोग करते हुए, एंड-टू-एंड ई-लर्निंग (End-to-End e-learning) समाधान प्रस्तुत करती है, जो भारतीय रेलवे दूरसंचार संचालन की रीढ़ है।
    • योजना का मुख्य उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र में ई-लर्निंग के माध्यम से अधिक-से अधिक-लाभ प्राप्त करना है, खासतौर से ऐसे समय में जब महामारी ने शिक्षकों और छात्रों को आभासी प्लेटफाॅर्मों का प्रयोग करने तथा शिक्षण कार्य हेतु आईटी-सक्षम इंटरेक्टिव साधनों को अपनाने के लिये  प्रेरित किया है।
  • केबल नेटवर्क को रेलवे पटरियों के साथ बिछाया गया है और जहांँ तक इसकी पहुंँच का संबंध है तो  इसे कहीं पर भी भारत के ग्रामीण स्कूलों में पहुँचाया जा सकता है, इसमें वे दूरस्थ क्षेत्र भी शामिल हैं जहाँ विश्वसनीय इंटरनेट सुविधा उपलब्ध नहीं है।
    • रेलटेल ने पहले ही केंद्र के राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क कार्यक्रम के तहत  723 उच्च शिक्षण संस्थानों को इस प्रकार की कनेक्टिविटी प्रदान की है, जिसमें प्रति सेकंड 10 गीगाबाइट तक की ब्रॉडबैंड स्पीड है।
  • इसका असर  स्कूलों में नामांकित होने वाले उन लगभग  3.5 लाख छात्रों पर पड़ेगा, जो स्कूल मुख्य रूप से ग्रामीण भारत में मेधावी छात्रों हेतु केंद्र सरकार द्वारा चलाए जाते हैं।

रेलटेल (RailTel):

  • रेलटेल कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड एक “मिनी रत्न (श्रेणी-I)” सार्वजनिक उपक्रम है।
  • यह एक ICT यानी सूचना एवं संचार प्रदाता है तथा देश के सबसे बड़े न्यूट्रल दूरसंचार इंफ्रास्ट्रक्चर प्रदाताओं में से एक है। रेलटेल के पास पूरे भारत में रेलवे ट्रैक के साथ ऑप्टिक फाइबर नेटवर्क है। 
    • रेलटेल का OFC (Optical Fiber Cable) नेटवर्क भारत के सभी महत्त्वपूर्ण शहरों एवं ग्रामीण क्षेत्रो को कवर करता है।
  • मज़बूत राष्ट्रव्यापी उपस्थिति के साथ रेलटेल अत्याधुनिक तकनीक लाने और भारतीय दूरसंचार हेतु नवीन सेवाओं की पेशकश करने के लिये प्रतिबद्ध है।
  • रेलटेल, रेल संचालन और प्रशासन नेटवर्क प्रणाली के आधुनिकीकरण के अलावा देश के सभी भागों में राष्ट्रव्यापी ब्रॉडबैंड दूरसंचार और मल्टीमीडिया नेटवर्क प्रदान करने में भी सबसे आगे है।
  • इसे भारत सरकार की विभिन्न मिशन-मोड परियोजनाओं जैसे- राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क, भारत नेट और उत्तर-पूर्व भारत में USOF (यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन फंड) द्वारा वित्तपोषित ऑप्टिकल फाइबर आधारित कनेक्टिविटी परियोजना के कार्यान्वयन हेतु चुना गया है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

ट्रांस फैटी एसिड

चर्चा में क्यों?

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (Food Safety and Standards Authority of India- FSSAI) ने खाद्य सुरक्षा और मानक (बिक्री पर निषेध और प्रतिबंध) विनियम, 2011 में संशोधन करते हुए तेल और वसा में ट्रांस फैटी एसिड (TFA) की मात्रा वर्तमान अनुमन्य मात्रा 5% से वर्ष 2021 के लिये 3% और 2022 तक 2% बढ़ा दी है।

  • ये विनियमन विभिन्न खाद्य उत्पादों, सामग्रियों और उनके सम्मिश्रणों की बिक्री से जुड़ी निषेधाज्ञाओं एवं प्रतिबंधों से संबंधित हैं।

प्रमुख बिंदु:

  • संशोधित विनियमन खाद्य रिफाइंड तेलों, वनस्पति (आंशिक रूप से हाइड्रोजनीकृत तेलों), मार्ज़रीन (कृत्रिम मक्खन), बेकरी खस्ताकारों (मक्खन आदि जो मैदे वाली खस्ता वस्तुओं के बनाने में प्रयोग किये जाते हैं) तथा भोजन पकाने के अन्य माध्यमों जैसे- वेजिटेबल फैट स्प्रेड एवं मिक्स्ड फैट स्प्रेड आदि पर लागू होते हैं।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, औद्योगिक रूप से उत्पादित ट्रांस फैटी एसिड के सेवन से विश्व स्तर पर प्रत्येक वर्ष लगभग 5.4 लाख मौतें होती हैं।
  • FSSAI के ये नियम महामारी के ऐसे समय में आए हैं जब गैर-संचारी रोगों (NCD) के बोझ में वृद्धि हुई है।
    • ट्रांस-फैट के सेवन से हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
    • NCD के कारण होने वाली अधिकाँश मौतें हृदय रोगों के कारण होती हैं।
  • इससे पहले वर्ष 2011 में भारत ने पहली बार एक विनियमन पारित किया जिसके तहत तेल और वसा में TFA की सीमा 10% निर्धारित की गई थी। वर्ष 2015 में इस सीमा को घटाकर 5% कर दिया गया।

ट्रांस फैट:

  • कृत्रिम TFA तब बनते हैं जब शुद्ध घी/मक्खन के समान फैट/वसा के उत्पादन में तेल के साथ  हाइड्रोजन की प्रतिक्रिया कराई जाती है।
  • ट्रांस फैटी एसिड अथवा ट्रांस फैट, सबसे हानिकारक प्रकार के फैट/वसा हैं जो मानव शरीर पर किसी भी अन्य आहार घटक की तुलना में अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव डाल सकते हैं।
  • यद्यपि इन वसाओं को बड़े पैमाने पर कृत्रिम रूप से उत्पादित किया जाता है, ये बहुत ही कम मात्रा में प्राकृतिक रूप में भी पाए जा सकते हैं। इस प्रकार हमारे आहार में, ये कृत्रिम TFA और/या प्राकृतिक TFA के रूप में मौजूद हो सकते हैं।
  • हमारे आहार में कृत्रिम TFAs के प्रमुख स्रोत आंशिक रूप से हाइड्रोजनीकृत वनस्पति तेल (PHVO)/ वनस्पति/मार्ज़रीन हैं जबकि प्राकृतिक TFAs मीट और डेयरी उत्पादों में (बहुत ही कम मात्रा में) पाए जाते हैं।
  • उपयोग:
    • TFA युक्त तेलों को लंबे समय तक संरक्षित किया जा सकता है ये भोजन को वांछित आकार और स्वरुप प्रदान करते हैं तथा आसानी से 'शुद्ध घी' के विकल्प के रूप में प्रयोग किये जा सकते हैं। तुलनात्मक रूप से इनकी लागत बहुत ही कम होती है एवं इस प्रकार ये लाभ/बचत में वृद्धि करते हैं।
  • हानिकारक प्रभाव:
    • TFAs के सेवन से संतृप्त वसा की तुलना में हृदय रोगों का खतरा अधिक होता है। संतृप्त वसा कुल कोलेस्ट्रॉल के स्तर को बढ़ाती है जबकि TFA न केवल कुल कोलेस्ट्रॉल के स्तर में वृद्धि करते हैं बल्कि ह्रदय रोगों से बचाने में मदद करने वाले अच्छे कोलेस्ट्रॉल (HDL) को भी कम करते हैं।
    • यह मोटापा, टाइप 2 मधुमेह, चयापचय सिंड्रोम, इंसुलिन प्रतिरोध, बांझपन, कुछ विशेष प्रकार के कैंसर आदि की वृद्धि में सहायक है और भ्रूण के विकास को भी प्रभावित करता है जिसके परिणामस्वरूप पैदा होने वाले बच्चे को नुकसान पहुँच सकता है।
    • मेटाबोलिक सिंड्रोम में उच्च रक्तचाप, उच्च रक्त शर्करा, कमर के आस-पास अतिरिक्त फैट/चर्बी और कोलेस्ट्रॉल का  असामान्य स्तर शामिल हैं। सिंड्रोम से व्यक्ति को दिल का दौरा पड़ने और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।

TFA सेवन को कम करने के प्रयास:

    • FSSAI ने TFA मुक्त उत्पादों को बढ़ावा देने हेतु स्वैच्छिक लेबलिंग के लिये "ट्रांस फैट फ्री" लोगो लॉन्च किया। लेबल का उपयोग बेकरी, स्थानीय खाद्य आउटलेट्स एवं दुकानों द्वारा किया जा सकता है जिसमें TFA  0.2 प्रति 100 ग्राम/मिली. से अधिक नहीं होता है।
    • FSSAI ने वर्ष 2022 तक खाद्य आपूर्ति में औद्योगिक रूप से उत्पादित ट्रांस फैट को खत्म करने के लिये एक नया सामूहिक मीडिया अभियान "हार्ट अटैक रिवाइंड" शुरू किया।
    • "हार्ट अटैक रिवाइंड" जुलाई, 2018 में लॉन्च किये गए "ईट राइट" नामक अभियान का अनुवर्ती है।
      • खाद्य तेल उद्योगों ने वर्ष 2022 तक नमक, चीनी, संतृप्त वसा और ट्रांस फैट सामग्री के स्तर को 2% तक कम करने का संकल्प लिया है।
      • 'स्वस्थ भारत यात्रा’ नागरिकों को खाद्य सुरक्षा, खाद्य मिलावट और स्वस्थ आहारों से संबद्ध मुद्दों से जोड़ने के लिये "ईट राईट" अभियान के तहत शुरू किया गया एक पैन-इंडिया साइक्लोथॉन है।राष्ट्रीय स्तर पर:
  • वैश्विक स्तर पर:
    • WHO ने वैश्विक स्तर पर वर्ष 2023 तक औद्योगिक रूप से उत्पादित खाद्य तेलों में ट्रांस-फैट के उन्मूलन हेतु वर्ष 2018 में REPLACE नामक एक अभियान शुरू किया।

स्रोत: द हिंदू


सामाजिक न्याय

नशे के खिलाफ अभियान

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में राजस्थान राज्य के जोधपुर ज़िले में बिलारा ब्लॉक के कुछ गाँवों के लोगों ने युवाओं में मादक/नशीले पदार्थों की बढ़ती लत को रोकने हेतु एकजुट होकर पहल की हैं।

प्रमुख बिंदु: 

ग्रामीणों द्वारा उठाए गए कदम:

  • शराब, तंबाकू और नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्तियों का बहिष्कार।
  • इन पदार्थों के विक्रेताओं और खरीदारों पर जुर्माना आरोपित करना।

मादक पदार्थों की लत:

  • यह विशेष रूप से मादक दवाओं (Narcotic Drugs) के आदी होने की स्थिति को संदर्भित करती है।
  • ये आम तौर पर अवैध दवाएँ हैं जो किसी व्यक्ति की मनोदशा और व्यवहार को प्रभावित करती हैं।
  • मादक द्रव्यों का सेवन मस्तिष्क पर आनंददायक प्रभाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से कुछ रसायनों के उपयोग को संदर्भित करता है।
  • विश्व में 190 मिलियन से अधिक लोग ड्रग उपयोगकर्त्ता हैं और यह समस्या खतरनाक स्तर पर बढ़ रही है, विशेष रूप से 30 वर्ष से कम आयु के वयस्कों में।

भारत में नशीली दवाओं का खतरा:

Golden-Triangle

  • मादक पदार्थों की लत का खतरा भारत के युवाओं में तेज़ी से फैल रहा है।
  • भारत विश्व के दो सबसे बड़े अफीम उत्पादक क्षेत्रों के मध्य में स्थित है जिसके एक तरफ स्वर्ण त्रिभुज (Golden triangle) क्षेत्र और दूसरी तरफ स्वर्ण अर्धचंद्र (Golden crescent ) क्षेत्र स्थित है।
    • स्वर्ण त्रिभुज क्षेत्र में थाईलैंड, म्यांँमार, वियतनाम और लाओस शामिल हैं।
    • स्वर्ण अर्द्धचंद्र क्षेत्र में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान शामिल हैं।
  •  भारत में मादक पदार्थ के उपयोग से संबंधित वर्ष 2019 में जारी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) रिपोर्ट के अनुसार:
    • अल्कोहल, भारत में नशे हेतु सर्वाधिक उपयोग किया जाने वाला पदार्थ है।
    •  वर्ष 2018 में आयोजित सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 5 करोड़ भारतीयों द्वारा भांँग और अफीम का उपयोग किया गया ।
    • अनुमान के अनुसार, लगभग 8.5 लाख लोग ड्रग्स इंजेक्शन का प्रयोग करते हैं।
    • रिपोर्ट में नशे के कुल अनुमानित मामलों में आधे से अधिक पंजाब, असम, दिल्ली, हरियाणा, मणिपुर, मिज़ोरम, सिक्किम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से हैं।
    • लगभग 60 लाख लोगों को अफीम के सेवन की समस्या से मुक्त होने की आवश्यकता है।
  • बच्चों में सर्वाधिक शराब के सेवन का प्रतिशत पंजाब में पाया गया तथा इसके बाद क्रमशः पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश का स्थान है।

मादक पदार्थों के उपयोग के प्रमुख कारण :

  • कुलीन/अमीर लोगों द्वारा इसके सेवन को स्वीकार करना 
  • आर्थिक तनाव में वृद्धि।
  • सांस्कृतिक मूल्यों में बदलाव।
  • नशे के लिये सेवन करना।
  • न्यूरोटिक सुख।
  • अप्रभावी पुलिसिंग व्यवस्था ।

मादक पदार्थों का प्रभाव:

  • दुर्घटना, घरेलू हिंसा की घटनाएँ, चिकित्सा समस्याएँ तथा मृत्यु का उच्च जोखिम।
  • यह आर्थिक नुकसान को बढ़ाता है। 
  • परिवार एवं  दोस्तों के साथ संबंधों को प्रभावित कर भावनात्मक और सामाजिक समस्याओं को उत्पन्न करता है।
  • मादक पदार्थों का उपयोग हमारे स्वास्थ्य, सुरक्षा, शांति और विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
    • इसके कारण हेपेटाइटिस बी और सी ( Hepatitis B and C ), तपेदिक (Tuberculosis)  जैसे रोगों में वृद्धि होती है। 
  • मादक पदार्थों पर निर्भरता के कारण आत्मसम्मान में कमी, निराशा, आपराधिक कार्रवाई और यहांँ तक कि आत्मघाती प्रवृत्ति उत्पन्न हो सकती है।

मादक पदार्थों के सेवन को रोकने में चुनौतियाँ :

  • कानूनी रूप से उपलब्ध मादक पदार्थ
    • इसमें तंबाकू जैसे मादक पदार्थों को शामिल किया जाता जो एक बहुत बड़ी समस्या है। इसे आमतौर पर गेटवे ड्रग (Gateway Drug)  के रूप में देखा जाता है, अर्थात् ऐसे मादक पदार्थ जिनका सेवन बच्चे द्वारा प्रारंभिक नशे के रूप में किया जाता हैं।
  • पुनर्वास/नशा मुक्ति केंद्रों की कमी: 
    • देश में पुनर्वास केंद्रों की कमी है। इसके अलावा, देश में नशामुक्ति केंद्रों का संचालन करने वाले एनजीओ आवश्यक उपचार और चिकित्सा सेवा प्रदान करने में विफल रहे हैं।
  • मादक पदार्थों की तस्करी:
    • पंजाब, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य उन पड़ोसी देशों के साथ सीमा साझा करते हैं जहाँ से मादक पदार्थों की तस्करी की जाती है।

मादक पदार्थों की लत से निपटने हेतु सरकारी पहल

  • नवंबर 2016 में नार्को-कोऑर्डिनेशन सेंटर (Narco-Coordination Centre- NCORD) का गठन किया गया और राज्य में ‘नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो’ की मदद के लिये ‘वित्तीय सहायता योजना’ को पुनर्जीवित किया गया।
  • नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो को एक नया सॉफ्टवेयर विकसित करने हेतु धनराशि उपलब्ध कराई गई है, अर्थात् ज़ब्ती सूचना प्रबंधन प्रणाली (Seizure Information Management System - SIMS) ड्रग अपराधों और अपराधियों का पूरा ऑनलाइन डेटाबेस तैयार करेगी।
  • सरकार द्वारा नारकोटिक ड्रग्स की अवैध ट्रैफिक से निपटने में आने वाले खर्च को पूरा करने हेतु ‘मादक पदार्थों  के नियंत्रण के लिये राष्ट्रीय कोष’ (National Fund for Control of Drug Abuse) नामक फंड की स्थापना की गई जिसका उपयोग नशेड़ियों का पुनर्वास और नशीली दवाओं के दुरुपयोग के खिलाफ जनता को शिक्षित आदि करने में किया जाता है।
  • सरकार एम्स के नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर (National Drug Dependence Treatment Centre) की मदद से सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के माध्यम से भारत में मादक पदार्थों के दुरुपयोग को मापने हेतु एक राष्ट्रीय ड्रग सर्वेक्षण (National Drug Abuse Survey ) भी कर रही है।
  • स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा वर्ष 2016 में उत्तर-पूर्वी राज्यों में बढ़ते एचआईवी के प्रसार से निपटने हेतु, विशेष रूप से ड्रग्स इंजेक्शन का प्रयोग करने वाले लोगों में इसके प्रयोग को रोकने हेतु  'प्रोजेक्ट सनराइज़' (Project Sunrise )को शुरू किया गया था।
  • द नार्कोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, (NDPS) 1985: यह किसी भी व्यक्ति द्वारा मादक पदार्थ या साइकोट्रॉपिक पदार्थ के उत्पादन, बिक्री, क्रय, परिवहन, भंडारण, और / या उपभोगको प्रतिबंधित करता है।
    • NDPS अधिनियम में वर्ष 1985 से तीन बार (1988, 2001 और 2014 में ) संशोधन किया गया है।
    • यह अधिनियम संपूर्ण भारत में लागू  है तथा  भारत के बाहर सभी भारतीय नागरिकों और भारत में पंजीकृत जहाजों और विमानों पर भी समान रूप से लागू होता है।
  • सरकार द्वारा ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ (Nasha Mukt Bharat Abhiyan) को शुरू करने की घोषणा की गई है जो सामुदायिक आउटरीच कार्यक्रमों पर केंद्रित है।

मादक पदार्थों के खतरे पर नियंत्रण हेतु अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ और सम्मेलन:

  • भारत मादक पदार्थों के खतरे से निपटने हेतु निम्नलिखित अंतर्राष्ट्रीय संँधियों और अभिसमयों का हस्ताक्षरकर्त्ता देश है:
    • नारकोटिक ड्रग्स पर संयुक्त राष्ट्र (यूएन) कन्वेंशन (1961)
    • साइकोट्रोपिक पदार्थों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (1971)।
    • नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रॉपिक पदार्थों के अवैध यातायात के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (1988)।
    • ट्रांसनेशनल क्राइम (UNTOC), 2000 के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन।

आगे की राह

  • मादक/नशीले पदार्थों की लत को किसी भी व्यक्ति के चरित्र दोष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये, बल्कि इसे एक बीमारी के रूप में देखा जाना चाहिये, जिससे कोई व्यक्ति संघर्ष कर रहा है। ऐसे में मादक/नशीले पदार्थों से जुड़े कलंक को समाप्त करने की आवश्यकता है। समाज को यह समझने की ज़रूरत है कि नशा करने वाले पीड़ित हैं, अपराधी नहीं। 
  • कुछ विशिष्ट मादक पदार्थों में 50 प्रतिशत तक अल्कोहॉल और नशीली चीज़े होती है, ऐसे पदार्थों के उत्पादन और खेती पर कड़ाई से रोक लगाने की आवश्यकता है। देश में मादक/नशीले पदार्थों की समस्या पर अंकुश लगाने के लिये पुलिस अधिकारियों और आबकारी विभाग तथा नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की और से सख्त कार्रवाई किये जाने की आवश्यकता है। नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस एक्ट 1985 को और अधिक सख्ती से लागू किया जाना चाहिये। 
  • बिहार में शराबबंदी जैसे निर्णय इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण समाधान हो सकते हैं। जब लोग आत्म-संयम नहीं रखते हैं, तो सरकार को ‘राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों’ (अनुच्छेद 47) के हिस्से के रूप में महत्त्वपूर्ण कदम उठान पड़ता हैं।
  • शैक्षिक पाठ्यक्रम में नशा मुक्ति, इसके प्रभाव और इससे संबंधित विषय शामिल किये जाने चाहिये। इसके अलावा उचित परामर्श भी एक विकल्प हो सकता है।

स्रोत: द हिंदू 


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

लिथियम-आयन प्रौद्योगिकी

चर्चा में क्यों?

हाल ही में भारत द्वारा अर्जेंटीना में लीथियम भंडारों की खोज करने के लिये सार्वजनिक क्षेत्र की नव-स्थापित कंपनी ‘खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड’ (Khanij Bidesh India Ltd-KBIL) के माध्यम से अर्जेंटीना की  कंपनी के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किये गए हैं।

  • गौरतलब है कि अर्जेंटीना विश्व के सबसे बड़े लिथियम भंडार वाले देशों में से एक है।   

प्रमुख बिंदु:

  • खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड (KBIL): KBIL की स्थापना सार्वजनिक क्षेत्र की तीन कंपनियों- नालको (NALCO), हिंदुस्तान कॉपर और मिनरल एक्सप्लोरेशन कार्पोरेशन लिमिटेड द्वारा विदेशों में लिथियम एवं कोबाल्ट जैसे रणनीतिक खनिज संसाधनों को प्राप्त करने के लिये विशिष्ट जनादेश के साथ अगस्त 2019 में की गई थी।  
    • KBIL द्वारा चिली और बोलिविया में भी महत्त्वपूर्ण खनिजों की खोज के लिये ऐसे ही संभावित विकल्पों पर कार्य किया जा रहा है। ध्यातव्य है कि  चिली और बोलिविया भी विश्व के शीर्ष लिथियम उत्पादक देशों की सूची में शामिल हैं।  
  • इलेक्ट्रिक वाहन (EV), लैपटॉप और मोबाइल आदि में ऊर्जा प्रदान करने के लिये उपयोग की जाने वाली लिथियम-आयन (Li-ion) बैटरियों के निर्माण में लिथियम एक महत्त्वपूर्ण घटक का कार्य करता है। 
  • वर्तमान में भारत अपनी ज़रूरत के लिये बड़े पैमाने पर इन बैटरियों के आयात पर निर्भर है, ऐसे में सरकार द्वारा लिथियम अन्वेषण के इस समझौते को चीन पर निर्भरता को कम करने के कदम के रूप में देखा जा रहा है, जो कि देश के लिये सेल और कच्चे माल का प्रमुख स्रोत है।   
  • लिथियम आपूर्ति शृंखला में प्रवेश के प्रयास के साथ ही भारत को इस क्षेत्र में ‘देरी से उपस्थिति दर्ज कराने वाला’ या एक ‘लेट मूवर’ (Late Mover) के रूप में देखा जा रहा है, जो ऐसे समय में इस क्षेत्र में कदम रख रहा है जब इलेक्ट्रिक वाहनों को परिवहन बाज़ार में एक बड़ा बदलाव लाने वाले परिपक्व सेक्टर के रूप में देखा जा रहा है। 
    • व्यावसायीकरण के उन्नत चरणों के तहत कई संभावित सुधार और पूर्व के उपायों के उन्नत विकल्पों के साथ लिथियम-आयन प्रौद्योगिकी द्वारा वर्ष 2021 में बैटरी प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण बदलाव लाए जाने की संभावना है।

लिथियम-आयन बैटरी: 

  • ‘लिथियम-आयन बैटरी’ या ‘ली-आयन’ बैटरी एक प्रकार की रिचार्जेबल (पुनः चार्ज की जा सकने वाली) बैटरी है।
  • ली-आयन बैटरी में इलेक्ट्रोड पदार्थ के रूप में अंतर्वेशित लिथियम यौगिक का उपयोग किया जाता है, जबकि एक नॉन-रिचार्जेबल लिथियम बैटरी में धातु सदृश लिथियम का उपयोग किया जाता है।
    • अंतर्वेशन (Intercalation) का तात्पर्य परतदार संरचना वाले पदार्थों में किसी अणु के प्रतिवर्ती समावेशन या सम्मिलन से है।
  • बैटरी में वैद्युत अपघट्य (Electrolyte) दो इलेक्ट्रोड होते हैं।
    • वैद्युत अपघट्य के कारण आयनों का संचार होता है, जबकि इलेक्ट्रोड लिथियम-आयन बैटरी सेल के संघटक होते हैं।
  • बैटरी के डिस्चार्ज होने के दौरान लिथियम आयन नेगेटिव इलेक्ट्रोड से पॉज़िटिव इलेक्ट्रोड की ओर गति करते हैं , जबकि चार्ज होते समय विपरीत दिशा में।

लिथियम-आयन बैटरी का उपयोग:

  •  इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, टेली-कम्युनिकेशन, एयरोस्पेस, औद्योगिक अनुप्रयोग।
  • लिथियम-आयन बैटरी प्रौद्योगिकी इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड इलेक्ट्रिक वाहनों के लिये पसंदीदा ऊर्जा स्रोत बन गई है।

लिथियम-आयन बैटरी की कमियाँ:

  • लंबी चार्जिंग अवधि।
  • कमज़ोर ऊर्जा घनत्व।
  • कई बार इन बैटरियों में आग लगने की घटनाएँ सामने आने से इसे लेकर सुरक्षा चिंताएँ भी बनी रहती हैं।
  • खर्चीली निर्माण प्रक्रिया।
  • यद्यपि लिथियम-आयन बैटरी को फोन और लैपटॉप जैसे अनुप्रयोगों के लिये पर्याप्त रूप से कुशल माना जाता है, परंतु इलेक्ट्रिक वाहनों के मामले में इसकी बैटरी की रेंज (एक चार्जिंग में अधिकतम दूरी तय करने की क्षमता) के संदर्भ में प्रौद्योगिकी में इतना सुधार नहीं हुआ है जो इन्हें आतंरिक दहन इंजन वाले वाहनों की तुलना में एक वहनीय विकल्प बना सके। 

 लिथियम-आयन प्रौद्योगिकी के संभावित विकल्प:  

  • ग्रैफीन बैटरी:
    • लिथियम बैटरियों को बार-बार चार्ज करने की आवश्यकता इसकी वहनीयता को सीमित करती है, ऐसे में ग्रैफीन बैटरियाँ इसका एक महत्त्वपूर्ण विकल्प हो सकती हैं।  ग्रैफीन हाल ही में स्थिर और पृथक किया गया पदार्थ है।  
    • फ्लोराइड बैटरी:
    • फ्लोराइड बैटरियों में लिथियम बैटरी की तुलना में आठ गुना अधिक समय तक चलने की क्षमता है।
  • सैंड बैटरी (Sand Battery):
    • लिथियम-आयन बैटरी के इस वैकल्पिक प्रकार में वर्तमान ग्रेफाइट लि-आयन बैटरी की तुलना में तीन गुना बेहतर प्रदर्शन प्राप्त करने के लिये सिलिकॉन का उपयोग किया जाता है। यह भी स्मार्टफोन में प्रयोग की जाने वाले लिथियम-आयन बैटरी के समान होती है परंतु इसमें एनोड के रूप में में ग्रेफाइट के बजाय सिलिकॉन का उपयोग किया जाता है।
  • अमोनिया संचालित बैटरी:
    • अमोनिया से चलने वाली बैटरी का शायद बाज़ार में शीघ्र उपलब्ध होना संभव न हो परंतु आमतौर पर घरेलू क्लीनर के रूप में ज्ञात यह रसायन लिथियम का एक विकल्प हो सकता है, क्योंकि यह वाहनों और अन्य उपकरणों में लगे फ्यूल सेल को ऊर्जा प्रदान कर सकता है।
    • यदि वैज्ञानिकों द्वारा अमोनिया उत्पादन के एक ऐसे तरीके को खोज कर ली जाती है जिसमें उपोत्पाद के रूप में ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन न होता हो, तो इसे फ्यूल सेल को ऊर्जा प्रदान करने के लिये वहनीय विकल्प के रूप में प्रयोग किया जा सकता है ।
  • लिथियम सल्फर बैटरी:
    • ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्त्ताओं के अनुसार, उन्होंने लिथियम-सल्फर का उपयोग करके विश्व की सबसे शक्तिशाली रिचार्जेबल बैटरी विकसित की है, जो वर्तमान में उपलब्ध सबसे मज़बूत बैटरी से चार गुना बेहतर प्रदर्शन कर सकती है।
  • ऊर्ध्वाधर रूप से संरेखित कार्बन नैनोट्यूब इलेक्ट्रोड:
    • यह लिथियम आयन बैटरी इलेक्ट्रोड के लिये अच्छा विकल्प हो सकती है जिसमें उच्च दर की क्षमता और योग्यता की आवश्यकता होती है।
  • सॉलिड-स्टेट बैटरी: 
    • इसमें जलीय इलेक्ट्रोलाइट सॉल्यूशन के विकल्पों का उपयोग किया जाता है, यह एक ऐसा नवाचार है जो आग के जोखिम को कम करने के साथ ऊर्जा घनत्व में तीव्र वृद्धि करते हुए चार्जिंग समय को दो-तिहाई से कम कर सकता है।
    • ये सेल बगैर अतिरिक्त स्थान घेरे ही कॉम्पैक्ट इलेक्ट्रिक वाहन की परिवहन क्षमता में वृद्धि कर सकते हैं ,  जो बैटरी प्रौद्योगिकी में एक महत्त्वपूर्ण बढ़त होगी।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

बर्ड फ्लू का खतरा

चर्चा में क्यों?

हाल ही में राजस्थान राज्य में बर्ड फ्लू की चपेट में आने के कारण सैकड़ों कौवों (Crows) की मृत्यु हो गई, इसकी वजह से अधिकारियों द्वारा राज्य में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है।

प्रमुख बिंदु:

बर्ड फ्लू के बारे में:

  • बर्ड फ्लू जिसे एवियन इंफ्लूएंज़ा (Avian Influenza- AI) के रूप में भी जाना जाता है, एक अत्यधिक संक्रामक विषाणु/वायरस जनित बीमारी है जो भोजन के रूप में उपयोग होने वाले कई प्रकार की पक्षी प्रजातियों (मुर्गियों, टर्की, बटेर, गिनी मुर्गी आदि) के साथ-साथ पालतू और जंगली पक्षियों को भी प्रभावित करती है।
  • मनुष्यों के साथ-साथ कभी-कभी स्तनधारी भी एवियन इंफ्लूएंज़ा के संपर्क में आ जाते हैं।

प्रकार:

  • इंफ्लूएंज़ा वायरस (Influenza Viruses) को तीन प्रकारों में बाँटा गया है; A, B C और केवल A प्रकार का इंफ्लूएंज़ा वायरस ही जानवरों को संक्रमित करता है जो कि एक जूनोटिक वायरस है अर्थात् इसमें जानवरों और मनुष्यों दोनों को संक्रमित करने की क्षमता होती है। टाइप B और C ज़्यादातर मनुष्यों को संक्रमित करते हैं तथा ये केवल हल्के संक्रामक रोगों के कारक हैं।
  • एवियन इंफ्लूएंज़ा वायरस (Avian Influenza Virus ) के प्रकारों में A (H5N1), A (H7N9) और A (H9N2) वायरस शामिल हैं।

वर्गीकरण:

  • इंफ्लूएंज़ा वायरस को इसमें पाई जाने वाली दोहरी प्रोटीन सतह, हेमग्लगुटिनिन (Hemagglutinin-HA) और न्यूरोमिनिडेस (Neuraminidase- NA) के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। उदाहरण के लिए एक वायरस जिसमें HA7 प्रोटीन और NA9 प्रोटीन होता है, उसे H7N9 के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।.
  • अत्यधिक रोगजनक एवियन इंफ्लूएंज़ा (Highly Pathogenic Avian Influenza- HPAI) ए (H5N1) वायरस मुख्य रूप से पक्षियों में पाया जाता है जो उनके लिये अत्यधिक संक्रामक होता है।
  • HPAI एशियन H5N1 विशेष रूप से मुर्गी पालन उद्योग हेतु एक घातक वायरस है।

प्रभाव:

  • एवियन इंफ्लूएंज़ा के प्रकोप से देश में विशेष रूप से मुर्गी पालन उद्योग में विनाशकारी परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं।
  • इसकी वजह से किसानों को मुर्गी पालन उद्योग में मुर्गियों की उच्च मृत्यु दर (लगभग 50%) का सामना करना पड़ सकता है।

निवारण

  • बीमारी या संक्रमण के प्रकोप से बचने हेतु उच्च स्तर के जैव सुरक्षा उपाय एवं साफ-सफाई का ध्यान रखना आवश्यक है।

रोग का उन्मूलन:

  • यदि जानवरों में संक्रमण का पता चला है, तो रोग के नियंत्रण तथा उन्मूलन हेतु संक्रमित जानवर एवं उसके संपर्क में आए जानवरों को पकड़कर स्थिति को शीघ्रता से नियंत्रित किया जा सकता है।

भारत की स्थिति:

  • वर्ष 2019 में भारत को एवियन इंफ्लूएंज़ा (H5N1) वायरस के संक्रमण से मुक्त घोषित किया गया था, एस संबंध में विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (World Organization for Animal Health) को भी अधिसूचित किया गया था।
  • यह अवस्था एक अन्य नए प्रकोप की सूचना मिलने तक बनी रहेगी।

विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन

  • OIE एक अंतर-सरकारी संगठन है जो विश्व में पशु स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार लाने हेतु उत्तरदायी है।
  • इसे विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization) द्वारा एक संदर्भ संगठन (Reference Organisation) के रूप में मान्यता दी गई है।
  • वर्ष 2018 तक इस संगठन में कुल 182 सदस्य देश शामिल थे। भारत इसका सदस्य है।
  • इस संगठन का मुख्यालय पेरिस (फ्राँस) में स्थित है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस


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