हिंदी साहित्य: पेन ड्राइव कोर्स
ध्यान दें:

डेली अपडेट्स

सामाजिक न्याय

नशे के खिलाफ अभियान

  • 04 Jan 2021
  • 12 min read

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में राजस्थान राज्य के जोधपुर ज़िले में बिलारा ब्लॉक के कुछ गाँवों के लोगों ने युवाओं में मादक/नशीले पदार्थों की बढ़ती लत को रोकने हेतु एकजुट होकर पहल की हैं।

प्रमुख बिंदु: 

ग्रामीणों द्वारा उठाए गए कदम:

  • शराब, तंबाकू और नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले व्यक्तियों का बहिष्कार।
  • इन पदार्थों के विक्रेताओं और खरीदारों पर जुर्माना आरोपित करना।

मादक पदार्थों की लत:

  • यह विशेष रूप से मादक दवाओं (Narcotic Drugs) के आदी होने की स्थिति को संदर्भित करती है।
  • ये आम तौर पर अवैध दवाएँ हैं जो किसी व्यक्ति की मनोदशा और व्यवहार को प्रभावित करती हैं।
  • मादक द्रव्यों का सेवन मस्तिष्क पर आनंददायक प्रभाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से कुछ रसायनों के उपयोग को संदर्भित करता है।
  • विश्व में 190 मिलियन से अधिक लोग ड्रग उपयोगकर्त्ता हैं और यह समस्या खतरनाक स्तर पर बढ़ रही है, विशेष रूप से 30 वर्ष से कम आयु के वयस्कों में।

भारत में नशीली दवाओं का खतरा:

Golden-Triangle

  • मादक पदार्थों की लत का खतरा भारत के युवाओं में तेज़ी से फैल रहा है।
  • भारत विश्व के दो सबसे बड़े अफीम उत्पादक क्षेत्रों के मध्य में स्थित है जिसके एक तरफ स्वर्ण त्रिभुज (Golden triangle) क्षेत्र और दूसरी तरफ स्वर्ण अर्धचंद्र (Golden crescent ) क्षेत्र स्थित है।
    • स्वर्ण त्रिभुज क्षेत्र में थाईलैंड, म्यांँमार, वियतनाम और लाओस शामिल हैं।
    • स्वर्ण अर्द्धचंद्र क्षेत्र में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान शामिल हैं।
  •  भारत में मादक पदार्थ के उपयोग से संबंधित वर्ष 2019 में जारी अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) रिपोर्ट के अनुसार:
    • अल्कोहल, भारत में नशे हेतु सर्वाधिक उपयोग किया जाने वाला पदार्थ है।
    •  वर्ष 2018 में आयोजित सर्वेक्षण के अनुसार लगभग 5 करोड़ भारतीयों द्वारा भांँग और अफीम का उपयोग किया गया ।
    • अनुमान के अनुसार, लगभग 8.5 लाख लोग ड्रग्स इंजेक्शन का प्रयोग करते हैं।
    • रिपोर्ट में नशे के कुल अनुमानित मामलों में आधे से अधिक पंजाब, असम, दिल्ली, हरियाणा, मणिपुर, मिज़ोरम, सिक्किम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से हैं।
    • लगभग 60 लाख लोगों को अफीम के सेवन की समस्या से मुक्त होने की आवश्यकता है।
  • बच्चों में सर्वाधिक शराब के सेवन का प्रतिशत पंजाब में पाया गया तथा इसके बाद क्रमशः पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश का स्थान है।

मादक पदार्थों के उपयोग के प्रमुख कारण :

  • कुलीन/अमीर लोगों द्वारा इसके सेवन को स्वीकार करना 
  • आर्थिक तनाव में वृद्धि।
  • सांस्कृतिक मूल्यों में बदलाव।
  • नशे के लिये सेवन करना।
  • न्यूरोटिक सुख।
  • अप्रभावी पुलिसिंग व्यवस्था ।

मादक पदार्थों का प्रभाव:

  • दुर्घटना, घरेलू हिंसा की घटनाएँ, चिकित्सा समस्याएँ तथा मृत्यु का उच्च जोखिम।
  • यह आर्थिक नुकसान को बढ़ाता है। 
  • परिवार एवं  दोस्तों के साथ संबंधों को प्रभावित कर भावनात्मक और सामाजिक समस्याओं को उत्पन्न करता है।
  • मादक पदार्थों का उपयोग हमारे स्वास्थ्य, सुरक्षा, शांति और विकास को गंभीर रूप से प्रभावित करता है।
    • इसके कारण हेपेटाइटिस बी और सी ( Hepatitis B and C ), तपेदिक (Tuberculosis)  जैसे रोगों में वृद्धि होती है। 
  • मादक पदार्थों पर निर्भरता के कारण आत्मसम्मान में कमी, निराशा, आपराधिक कार्रवाई और यहांँ तक कि आत्मघाती प्रवृत्ति उत्पन्न हो सकती है।

मादक पदार्थों के सेवन को रोकने में चुनौतियाँ :

  • कानूनी रूप से उपलब्ध मादक पदार्थ
    • इसमें तंबाकू जैसे मादक पदार्थों को शामिल किया जाता जो एक बहुत बड़ी समस्या है। इसे आमतौर पर गेटवे ड्रग (Gateway Drug)  के रूप में देखा जाता है, अर्थात् ऐसे मादक पदार्थ जिनका सेवन बच्चे द्वारा प्रारंभिक नशे के रूप में किया जाता हैं।
  • पुनर्वास/नशा मुक्ति केंद्रों की कमी: 
    • देश में पुनर्वास केंद्रों की कमी है। इसके अलावा, देश में नशामुक्ति केंद्रों का संचालन करने वाले एनजीओ आवश्यक उपचार और चिकित्सा सेवा प्रदान करने में विफल रहे हैं।
  • मादक पदार्थों की तस्करी:
    • पंजाब, असम और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य उन पड़ोसी देशों के साथ सीमा साझा करते हैं जहाँ से मादक पदार्थों की तस्करी की जाती है।

मादक पदार्थों की लत से निपटने हेतु सरकारी पहल

  • नवंबर 2016 में नार्को-कोऑर्डिनेशन सेंटर (Narco-Coordination Centre- NCORD) का गठन किया गया और राज्य में ‘नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो’ की मदद के लिये ‘वित्तीय सहायता योजना’ को पुनर्जीवित किया गया।
  • नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो को एक नया सॉफ्टवेयर विकसित करने हेतु धनराशि उपलब्ध कराई गई है, अर्थात् ज़ब्ती सूचना प्रबंधन प्रणाली (Seizure Information Management System - SIMS) ड्रग अपराधों और अपराधियों का पूरा ऑनलाइन डेटाबेस तैयार करेगी।
  • सरकार द्वारा नारकोटिक ड्रग्स की अवैध ट्रैफिक से निपटने में आने वाले खर्च को पूरा करने हेतु ‘मादक पदार्थों  के नियंत्रण के लिये राष्ट्रीय कोष’ (National Fund for Control of Drug Abuse) नामक फंड की स्थापना की गई जिसका उपयोग नशेड़ियों का पुनर्वास और नशीली दवाओं के दुरुपयोग के खिलाफ जनता को शिक्षित आदि करने में किया जाता है।
  • सरकार एम्स के नेशनल ड्रग डिपेंडेंस ट्रीटमेंट सेंटर (National Drug Dependence Treatment Centre) की मदद से सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के माध्यम से भारत में मादक पदार्थों के दुरुपयोग को मापने हेतु एक राष्ट्रीय ड्रग सर्वेक्षण (National Drug Abuse Survey ) भी कर रही है।
  • स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा वर्ष 2016 में उत्तर-पूर्वी राज्यों में बढ़ते एचआईवी के प्रसार से निपटने हेतु, विशेष रूप से ड्रग्स इंजेक्शन का प्रयोग करने वाले लोगों में इसके प्रयोग को रोकने हेतु  'प्रोजेक्ट सनराइज़' (Project Sunrise )को शुरू किया गया था।
  • द नार्कोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट, (NDPS) 1985: यह किसी भी व्यक्ति द्वारा मादक पदार्थ या साइकोट्रॉपिक पदार्थ के उत्पादन, बिक्री, क्रय, परिवहन, भंडारण, और / या उपभोगको प्रतिबंधित करता है।
    • NDPS अधिनियम में वर्ष 1985 से तीन बार (1988, 2001 और 2014 में ) संशोधन किया गया है।
    • यह अधिनियम संपूर्ण भारत में लागू  है तथा  भारत के बाहर सभी भारतीय नागरिकों और भारत में पंजीकृत जहाजों और विमानों पर भी समान रूप से लागू होता है।
  • सरकार द्वारा ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ (Nasha Mukt Bharat Abhiyan) को शुरू करने की घोषणा की गई है जो सामुदायिक आउटरीच कार्यक्रमों पर केंद्रित है।

मादक पदार्थों के खतरे पर नियंत्रण हेतु अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ और सम्मेलन:

  • भारत मादक पदार्थों के खतरे से निपटने हेतु निम्नलिखित अंतर्राष्ट्रीय संँधियों और अभिसमयों का हस्ताक्षरकर्त्ता देश है:
    • नारकोटिक ड्रग्स पर संयुक्त राष्ट्र (यूएन) कन्वेंशन (1961)
    • साइकोट्रोपिक पदार्थों पर संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (1971)।
    • नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रॉपिक पदार्थों के अवैध यातायात के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (1988)।
    • ट्रांसनेशनल क्राइम (UNTOC), 2000 के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन।

आगे की राह

  • मादक/नशीले पदार्थों की लत को किसी भी व्यक्ति के चरित्र दोष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिये, बल्कि इसे एक बीमारी के रूप में देखा जाना चाहिये, जिससे कोई व्यक्ति संघर्ष कर रहा है। ऐसे में मादक/नशीले पदार्थों से जुड़े कलंक को समाप्त करने की आवश्यकता है। समाज को यह समझने की ज़रूरत है कि नशा करने वाले पीड़ित हैं, अपराधी नहीं। 
  • कुछ विशिष्ट मादक पदार्थों में 50 प्रतिशत तक अल्कोहॉल और नशीली चीज़े होती है, ऐसे पदार्थों के उत्पादन और खेती पर कड़ाई से रोक लगाने की आवश्यकता है। देश में मादक/नशीले पदार्थों की समस्या पर अंकुश लगाने के लिये पुलिस अधिकारियों और आबकारी विभाग तथा नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की और से सख्त कार्रवाई किये जाने की आवश्यकता है। नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस एक्ट 1985 को और अधिक सख्ती से लागू किया जाना चाहिये। 
  • बिहार में शराबबंदी जैसे निर्णय इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण समाधान हो सकते हैं। जब लोग आत्म-संयम नहीं रखते हैं, तो सरकार को ‘राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों’ (अनुच्छेद 47) के हिस्से के रूप में महत्त्वपूर्ण कदम उठान पड़ता हैं।
  • शैक्षिक पाठ्यक्रम में नशा मुक्ति, इसके प्रभाव और इससे संबंधित विषय शामिल किये जाने चाहिये। इसके अलावा उचित परामर्श भी एक विकल्प हो सकता है।

स्रोत: द हिंदू 

एसएमएस अलर्ट
Share Page