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झारखंड स्टेट पी.सी.एस.

  • 21 Apr 2026
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कांकरिया भारत का पहला वाटर-न्यूट्रल रेलवे डिपो बना

चर्चा में क्यों? 

अहमदाबाद स्थित कांकरिया कोचिंग डिपो को भारत का पहला’वाटर-न्यूट्रल रेलवे डिपो’ घोषित किया गया है, जो सतत जल प्रबंधन की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है।

मुख्य बिंदु:

  • भारत में पहला: अहमदाबाद (गुजरात) का कांकरिया कोचिंग डिपो वाटर-न्यूट्रैलिटी हासिल करने वाला भारत का पहला रेलवे डिपो बन गया है।
    • यह डिपो प्रतिदिन लगभग 1.6 लाख लीटर पानी बचाता है, जो 300 से अधिक घरेलू पानी की टंकियों के बराबर है।
    • इससे सालाना लगभग 5.84 करोड़ लीटर पानी की बचत होने का अनुमान है।
  • पुनर्चक्रण: डिपो कोचों की धुलाई और रखरखाव कार्यों से उत्पन्न अपशिष्ट जल को उपचारित कर पुन: उपयोग में लाता है, जिससे शून्य बर्बादी सुनिश्चित होती है।
    • पानी एक वैज्ञानिक बहु-चरणीय प्रक्रिया से गुजरता है, जिसमें वेटलैंड-आधारित उपचार, रेत निस्पंदन, कार्बन निस्पंदन और UV कीटाणुशोधन शामिल है।
    • इस प्रणाली की एक प्रमुख विशेषता 'फाइटोरेमेडिएशन' (Phytoremediation) है, जहाँ अपशिष्ट जल से प्रदूषकों को प्राकृतिक रूप से सोखने और हटाने के लिये पौधों का उपयोग किया जाता है।
  • भारतीय रेलवे के लिये मॉडल: इस डिपो को पूरे देश के अन्य रेलवे डिपो और स्टेशनों के लिये एक अनुकरणीय मॉडल के रूप में देखा जा रहा है।

और पढ़ें: अपशिष्ट जल उपचार


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मेघालय ने खासी और गारो को आधिकारिक भाषाओं के रूप में मान्यता दी

चर्चा में क्यों? 

भाषाई संरक्षण और प्रशासनिक समावेशिता के उद्देश्य से किये गए एक ऐतिहासिक सुधार के तहत, मेघालय कैबिनेट ने 'मेघालय राजभाषा अध्यादेश 2026' को स्वीकृति दे दी है। यह निर्णय खासी और गारो भाषाओं को अंग्रेज़ी के साथ पूर्ण आधिकारिक दर्जा प्रदान करता है, जो राज्य की भाषा नीति में एक ऐतिहासिक बदलाव का प्रतीक है।

मुख्य बिंदु:

  • 2005 के अधिनियम का निरसन: यह नया अध्यादेश 'मेघालय राज्य भाषा अधिनियम, 2005' को निरस्त करता है, जिसमें पहले अंग्रेज़ी को एकमात्र आधिकारिक भाषा नामित किया गया था, जबकि खासी और गारो केवल ‘सहयोगी’ भाषाओं के रूप में कार्य करती थीं।
  • चरणबद्ध कार्यान्वयन: आधिकारिक दर्जा तत्काल दे दिया गया है, लेकिन इसका पूर्ण कार्यान्वयन धीरे-धीरे होगा।
    • राज्य को पहले अनुवाद प्रणाली स्थापित करनी होगी, कर्मियों की भर्ती करनी होगी और आवश्यक प्रशासनिक ढाँचा तैयार करना होगा।
  • प्रशासनिक उपयोग: आधिकारिक सरकारी अधिसूचनाएँ, आदेश और संचार अंततः तीनों भाषाओं—अंग्रेज़ी, खासी एवं गारो में जारी किये जाएंगे।
  • विधायी परिवर्तन: राज्य 'मेघालय राज्य विधानमंडल (अंग्रेजी भाषा का बने रहना) अधिनियम, 1980' में संशोधन करने की योजना बना रहा है।
    • इससे विधायकों को विधानसभा सत्रों के दौरान अपनी मातृभाषा खासी और गारो में बोलने तथा बहस करने की अनुमति मिलेगी।
  • संवैधानिक महत्त्व: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए, राज्य सरकार ने प्रशासनिक उद्देश्यों के लिये स्वदेशी भाषाओं के उपयोग को आधिकारिक रूप से औपचारिक रूप दिया है।
  • आठवीं अनुसूची की मांग: मुख्यमंत्री कॉनराड के. संगमा ने कहा कि राज्य स्तर पर आधिकारिक दर्जा देना खासी और गारो को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की लंबे समय से चली आ रही मांग को मज़बूत करने के लिये एक रणनीतिक कदम है।
  • लिंक लैंग्वेज (संपर्क भाषा): स्वदेशी भाषाओं को नया दर्जा मिलने के बावजूद, प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के लिये अंतर-ज़िला संचार और औपचारिक फाइल-नोटिंग में अंग्रेज़ी ‘साझा माध्यम’ या संपर्क भाषा के रूप में बनी रहेगी।

और पढ़ें: संविधान की आठवीं अनुसूची 


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डॉ. सी.एच. श्रीनिवास राव को 9वें प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन पुरस्कार से सम्मानित किया गया

चर्चा में क्यों? 

ICAR-राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी (NAARM) के निदेशक डॉ. सी.एच. श्रीनिवास राव को वर्ष 2024-2025 के लिये प्रतिष्ठित 9वें प्रो. एम.एस. स्वामीनाथन पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार भारत में जलवायु-अनुकूल कृषि (CRA) और संधारणीय शुष्क भूमि खेती के क्षेत्र में उनके अग्रणी योगदान को मान्यता देता है।

मुख्य बिंदु:

  • जलवायु अनुकूलन: डॉ. राव ने भारत के वर्षा-आधारित क्षेत्रों में मृदा स्वास्थ्य तथा 'कार्बन प्रच्छादन' पर ध्यान केंद्रित करते हुए, जलवायु-अनुकूल प्रौद्योगिकियों को विकसित करने और उन्हें बड़े पैमाने पर लागू करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • नीति नियोजन: उन्होंने 'नेशनल इनोवेशन इन क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर' (NICRA) परियोजना को डिज़ाइन करने में अहम योगदान दिया, जो किसानों को सूखे और हीटवेव जैसी चरम मौसम की घटनाओं के अनुकूल बनने में सहायता करती है।
  • आकस्मिक योजना मानचित्रण: उनके कार्यों में भारत के 650 से अधिक ज़िलों के लिये ज़िला-स्तरीय कृषि आकस्मिक योजनाएँ विकसित करना शामिल है, जो राज्य सरकारों को मानसून की अनिश्चितता से निपटने के लिये एक रूपरेखा प्रदान करती हैं।
  • मृदा प्रबंधन: मृदा कार्बन संचयन और 'जलवायु-अनुकूल' ग्रामों पर केंद्रित उनके शोध ने लघु किसानों को कृषि के पर्यावरणीय प्रभावों को सीमित करने के साथ-साथ पैदावार में वृद्धि करने में सशक्त बनाया है।
  • महत्त्व: 'ग्लोबल बॉइलिंग' और अप्रत्याशित मानसून के इस युग में डॉ. राव को मिली यह मान्यता भारतीय कृषि के ‘उत्पादन-केंद्रित’ से ‘अनुकूलन-केंद्रित’ दृष्टिकोण की ओर बदलाव को रेखांकित करती है।
  • जलवायु लक्ष्यों के साथ तालमेल: उनके प्रयास भारत के 'जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना' (NAPCC) और जलवायु चुनौतियों के सामने भारतीय कृषि को आत्मनिर्भर बनाने के लक्ष्य के अनुरूप हैं।

और पढ़ें: एम.एस. स्वामीनाथन पुरस्कार


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