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मेघालय ने खासी और गारो को आधिकारिक भाषाओं के रूप में मान्यता दी

  • 21 Apr 2026
  • 16 min read

चर्चा में क्यों? 

भाषाई संरक्षण और प्रशासनिक समावेशिता के उद्देश्य से किये गए एक ऐतिहासिक सुधार के तहत, मेघालय कैबिनेट ने 'मेघालय राजभाषा अध्यादेश 2026' को स्वीकृति दे दी है। यह निर्णय खासी और गारो भाषाओं को अंग्रेज़ी के साथ पूर्ण आधिकारिक दर्जा प्रदान करता है, जो राज्य की भाषा नीति में एक ऐतिहासिक बदलाव का प्रतीक है।

मुख्य बिंदु:

  • 2005 के अधिनियम का निरसन: यह नया अध्यादेश 'मेघालय राज्य भाषा अधिनियम, 2005' को निरस्त करता है, जिसमें पहले अंग्रेज़ी को एकमात्र आधिकारिक भाषा नामित किया गया था, जबकि खासी और गारो केवल ‘सहयोगी’ भाषाओं के रूप में कार्य करती थीं।
  • चरणबद्ध कार्यान्वयन: आधिकारिक दर्जा तत्काल दे दिया गया है, लेकिन इसका पूर्ण कार्यान्वयन धीरे-धीरे होगा।
    • राज्य को पहले अनुवाद प्रणाली स्थापित करनी होगी, कर्मियों की भर्ती करनी होगी और आवश्यक प्रशासनिक ढाँचा तैयार करना होगा।
  • प्रशासनिक उपयोग: आधिकारिक सरकारी अधिसूचनाएँ, आदेश और संचार अंततः तीनों भाषाओं—अंग्रेज़ी, खासी एवं गारो में जारी किये जाएंगे।
  • विधायी परिवर्तन: राज्य 'मेघालय राज्य विधानमंडल (अंग्रेजी भाषा का बने रहना) अधिनियम, 1980' में संशोधन करने की योजना बना रहा है।
    • इससे विधायकों को विधानसभा सत्रों के दौरान अपनी मातृभाषा खासी और गारो में बोलने तथा बहस करने की अनुमति मिलेगी।
  • संवैधानिक महत्त्व: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 345 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए, राज्य सरकार ने प्रशासनिक उद्देश्यों के लिये स्वदेशी भाषाओं के उपयोग को आधिकारिक रूप से औपचारिक रूप दिया है।
  • आठवीं अनुसूची की मांग: मुख्यमंत्री कॉनराड के. संगमा ने कहा कि राज्य स्तर पर आधिकारिक दर्जा देना खासी और गारो को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की लंबे समय से चली आ रही मांग को मज़बूत करने के लिये एक रणनीतिक कदम है।
  • लिंक लैंग्वेज (संपर्क भाषा): स्वदेशी भाषाओं को नया दर्जा मिलने के बावजूद, प्रशासनिक निरंतरता बनाए रखने के लिये अंतर-ज़िला संचार और औपचारिक फाइल-नोटिंग में अंग्रेज़ी ‘साझा माध्यम’ या संपर्क भाषा के रूप में बनी रहेगी।

और पढ़ें: संविधान की आठवीं अनुसूची 

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