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प्रश्न :
प्रश्न: नरमपंथियों और गरमपंथियों के बीच वैचारिक अंतर केवल रणनीतिक नहीं थे, बल्कि राष्ट्रवाद की भिन्न दृष्टियों को दर्शाते थे।” विवेचना कीजिये। (150 शब्द)
06 Apr, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहासउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत नरमपंथियों और गरमपंथियों के संक्षिप्त परिचय से कीजिये
- उनके राष्ट्रवाद की भिन्न अवधारणाओं और वैचारिक आधारों पर विस्तार से चर्चा कीजिये।
- साथ ही यह भी रेखांकित कीजिये कि उनकी कार्यनीतिक भिन्नताएँ उनके वैचारिक दृष्टिकोण का ही परिणाम थीं।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
वर्ष 1885 से 1919 के बीच का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का काल उसकी राजनीतिक विचारधारा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का साक्षी रहा। जहाँ नरमपंथियों (Moderates) ने संगठित प्रतिरोध की नींव रखी, वहीं गरमपंथियों (Extremists) ने इसे जन-आधारित संघर्ष में परिवर्तित कर दिया।
- इन दोनों धाराओं के बीच का विभाजन, जो वर्ष 1907 के सूरत विभाजन में चरम पर पहुँचा, केवल उनके विरोध के तरीकों तक सीमित नहीं था, बल्कि राष्ट्रवाद की उनकी गहराई से भिन्न अवधारणाओं में निहित था।
मुख्य भाग:
राष्ट्रवाद की भिन्न अवधारणाएँ
नरमपंथी और गरमपंथी इस बात पर मूल रूप से भिन्न थे कि वे ब्रिटिश शासन एवं भारत के भविष्य को किस दृष्टि से देखते थे।
विशेषता
नरमपंथी (प्रारंभिक राष्ट्रवादी)
गरमपंथी (आक्रामक राष्ट्रवादी)
ब्रिटिश शासन के प्रति दृष्टिकोण
मानते थे कि ब्रिटिश शासन ‘ईश्वर-प्रदत्त’ है और भारत के आधुनिकीकरण के लिये लाभकारी है।
ब्रिटिश शासन को भारत की आर्थिक और नैतिक पतन का मुख्य कारण मानते थे।
प्रेरणा का स्रोत
पश्चिमी उदारवाद, ब्रिटिश इतिहास और प्रबोधन के मूल्यों से प्रभावित।
भारतीय इतिहास, पारंपरिक प्रतीकों (गणपति/शिवाजी उत्सव) और सांस्कृतिक गौरव से प्रेरित।
सामाजिक आधार
मुख्यतः शहरी अभिजात वर्ग, वकील और शिक्षित मध्यवर्ग तक सीमित।
छात्रों, निम्न-मध्यवर्ग और श्रमिकों सहित जनसाधारण को शामिल करने का प्रयास।
अंतिम लक्ष्य
ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ‘स्वशासन’।
‘स्वराज’ या पूर्ण स्वतंत्रता।
प्रमुख नेता
दादाभाई नौरोजी, फिरोज़शाह मेहता, गोपाल कृष्ण गोखले।
लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल (लाल-बाल-पाल) और अरविंदो घोष।
वैचारिक आधार
- ‘धन के निकास’ बनाम सांस्कृतिक आत्मविश्वास
- नरमपंथी: उनका राष्ट्रवाद राजनीतिक अर्थव्यवस्था की आलोचना पर आधारित था। दादाभाई नौरोजी जैसे नेताओं ने ‘ड्रेन थ्योरी’ का उपयोग यह सिद्ध करने के लिये किया कि ब्रिटेन भारत को आर्थिक रूप से कमज़ोर कर रहा है। वे तर्क और आँकड़ों के माध्यम से व्यवस्था के भीतर रहकर सुधार करना चाहते थे।
- गरमपंथी: उनका राष्ट्रवाद अधिक आध्यात्मिक और भावनात्मक था। उनका मानना था कि राजनीतिक अधिकार ‘मांगे’ नहीं जाते, बल्कि त्याग और संघर्ष के माध्यम से ‘प्राप्त’ किये जाते हैं।
- राजनीतिक कार्यवाही की अवधारणा
- नरमपंथी (PPP मॉडल): वे प्रार्थना, निवेदन और विरोध पर निर्भर थे। वे संवैधानिक तरीकों में विश्वास रखते थे और मानते थे कि भारत अभी जन-आधारित प्रत्यक्ष आंदोलन के लिये तैयार नहीं है।
- गरमपंथी (निष्क्रिय प्रतिरोध): वे बहिष्कार, स्वदेशी और राष्ट्रीय शिक्षा का समर्थन करते थे। उनका विश्वास जनशक्ति में था और वे ब्रिटिश प्रशासन के साथ असहयोग के माध्यम से शासन को असंभव बनाना चाहते थे।
वैचारिक परिणाम के रूप में रणनीतिक भिन्नता
ये रणनीतिक भिन्नताएँ ब्रिटिश ‘न्यायपूर्ण व्यवहार’ में विश्वास के स्तर में अंतर का प्रत्यक्ष परिणाम थीं:
- निष्ठा बनाम विरोध: नरमपंथी ब्रिटिश क्राउन के प्रति एक प्रकार की निष्ठा बनाए रखते थे, क्योंकि उन्हें आशंका थी कि ब्रिटिशों की समय से पहले वापसी से देश में अराजकता फैल सकती है।
- इसके विपरीत, गरमपंथी ब्रिटिशों को एक विदेशी शक्ति मानते थे, जिनका भारत पर शासन करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं था।
- संस्थागत सुधार बनाम संरचनात्मक परिवर्तन: नरमपंथी भारतीय परिषद अधिनियम 1892 जैसे विधायी निकायों में अधिक प्रतिनिधित्व प्राप्त करने का प्रयास करते थे।
- गरमपंथी इन परिषदों को ‘दिखावा’ मानते थे और स्वदेशी संस्थानों के निर्माण पर ज़ोर देते थे।
निष्कर्ष
नरमपंथी राजनीति से गरमपंथी राजनीति की ओर हुआ परिवर्तन भारतीय राष्ट्रवाद के परिपक्व होने का प्रतीक था। जहाँ नरमपंथियों ने ब्रिटिश शासन को ‘अवास्तवीकृत’ कर एक अखिल भारतीय राजनीतिक मंच का निर्माण किया, वहीं गरमपंथियों ने इस आंदोलन में आवश्यक उत्साह और जन-आधारित स्वरूप का संचार किया।
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