प्रश्न: नरमपंथियों और गरमपंथियों के बीच वैचारिक अंतर केवल रणनीतिक नहीं थे, बल्कि राष्ट्रवाद की भिन्न दृष्टियों को दर्शाते थे।” विवेचना कीजिये। (150 शब्द)
06 Apr, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहास
हल करने का दृष्टिकोण:
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वर्ष 1885 से 1919 के बीच का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का काल उसकी राजनीतिक विचारधारा में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन का साक्षी रहा। जहाँ नरमपंथियों (Moderates) ने संगठित प्रतिरोध की नींव रखी, वहीं गरमपंथियों (Extremists) ने इसे जन-आधारित संघर्ष में परिवर्तित कर दिया।
राष्ट्रवाद की भिन्न अवधारणाएँ
नरमपंथी और गरमपंथी इस बात पर मूल रूप से भिन्न थे कि वे ब्रिटिश शासन एवं भारत के भविष्य को किस दृष्टि से देखते थे।
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विशेषता |
नरमपंथी (प्रारंभिक राष्ट्रवादी) |
गरमपंथी (आक्रामक राष्ट्रवादी) |
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ब्रिटिश शासन के प्रति दृष्टिकोण |
मानते थे कि ब्रिटिश शासन ‘ईश्वर-प्रदत्त’ है और भारत के आधुनिकीकरण के लिये लाभकारी है। |
ब्रिटिश शासन को भारत की आर्थिक और नैतिक पतन का मुख्य कारण मानते थे। |
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प्रेरणा का स्रोत |
पश्चिमी उदारवाद, ब्रिटिश इतिहास और प्रबोधन के मूल्यों से प्रभावित। |
भारतीय इतिहास, पारंपरिक प्रतीकों (गणपति/शिवाजी उत्सव) और सांस्कृतिक गौरव से प्रेरित। |
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सामाजिक आधार |
मुख्यतः शहरी अभिजात वर्ग, वकील और शिक्षित मध्यवर्ग तक सीमित। |
छात्रों, निम्न-मध्यवर्ग और श्रमिकों सहित जनसाधारण को शामिल करने का प्रयास। |
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अंतिम लक्ष्य |
ब्रिटिश साम्राज्य के भीतर ‘स्वशासन’। |
‘स्वराज’ या पूर्ण स्वतंत्रता। |
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प्रमुख नेता |
दादाभाई नौरोजी, फिरोज़शाह मेहता, गोपाल कृष्ण गोखले। |
लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल (लाल-बाल-पाल) और अरविंदो घोष। |
वैचारिक आधार
वैचारिक परिणाम के रूप में रणनीतिक भिन्नता
ये रणनीतिक भिन्नताएँ ब्रिटिश ‘न्यायपूर्ण व्यवहार’ में विश्वास के स्तर में अंतर का प्रत्यक्ष परिणाम थीं:
नरमपंथी राजनीति से गरमपंथी राजनीति की ओर हुआ परिवर्तन भारतीय राष्ट्रवाद के परिपक्व होने का प्रतीक था। जहाँ नरमपंथियों ने ब्रिटिश शासन को ‘अवास्तवीकृत’ कर एक अखिल भारतीय राजनीतिक मंच का निर्माण किया, वहीं गरमपंथियों ने इस आंदोलन में आवश्यक उत्साह और जन-आधारित स्वरूप का संचार किया।