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प्रश्न :
प्रश्न: संवैधानिक गारंटियों और नीतिगत हस्तक्षेपों के बावजूद, लैंगिक असमानताएँ कई क्षेत्रों में बनी हुई हैं। विश्लेषण कीजिये कि भारत में संरचनात्मक, सांस्कृतिक और संस्थागत कारक किस प्रकार परस्पर अंतःक्रिया करते हुए लैंगिक असमानता को आकार देते हैं। (250 शब्द)
30 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भारतीय समाजउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत लैंगिक समानता सूचकांक में भारत की रैंकिंग को उजागर करते हुए कीजिये।
- इसके बाद विश्लेषण को संरचनात्मक, सांस्कृतिक और संस्थागत कारकों में वर्गीकृत कीजिये तथा स्पष्ट रूप से प्रदर्शित कीजिये कि ये कारक आपस में किस प्रकार परस्पर जुड़े हुए हैं।
- प्रदत्त सामग्री के आधार पर लक्षित और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत कीजिये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
विश्व आर्थिक मंच की वैश्विक लैंगिक अंतर रिपोर्ट 2025 के अनुसार, भारत 148 देशों में से 131वें स्थान पर है, जो पिछले वर्ष की तुलना में दो स्थान नीचे है।
जहाँ भारत ने शैक्षिक उपलब्धि और स्वास्थ्य में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है, वहीं इसका समानता स्कोर 64.1% वैश्विक औसत से नीचे है, जो इस तर्क को उजागर करता है कि एक लगातार मौजूद ‘लैंगिक जाल’ है, जहाँ कानूनी प्रगति प्राय: सामाजिक वास्तविकता से आगे निकल जाती है।मुख्य भाग:
सांस्कृतिक कारक: पितृसत्ता और रूढ़िवादिता की निरंतरता
सांस्कृतिक मानदंड महिलाओं के सशक्तीकरण के लिये मूलभूत बाधा के रूप में कार्य करते हैं, वे व्यवहार संबंधी अपेक्षाओं को निर्धारित करते हैं और महिलाओं की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं।
- हानिकारक प्रथाओं का सामान्यीकरण: कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद, बाल विवाह जैसी प्रथाएँ (20–24 वर्ष की आयु की महिलाओं में 23.3% की शादी 18 वर्ष से पहले) और दहेज प्रथा जारी हैं, जो महिलाओं की स्वतंत्रता तथा निर्णय क्षमता को कम आँकती हैं।
- लैंगिक आधारित हिंसा: वर्ष 2022 में महिलाओं के खिलाफ 4,45,000 से अधिक अपराध दर्ज किये गए, घरेलू हिंसा और यौन उत्पीड़न का व्यापक खतरा महिलाओं में डर उत्पन्न करता है तथा उनकी सार्वजनिक भागीदारी को बाधित करता है।
संरचनात्मक कारक: आर्थिक, अवसंरचनात्मक और स्वास्थ्य असमानताएँ
- अनौपचारिकता और श्रम बहिष्कार: महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी बढ़ रही है, लेकिन वर्ष 2025 में कामकाजी महिलाओं का 90% से अधिक हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र या कम वेतन वाली कृषि श्रम में फॅंसा हुआ है (महिलाएँ कृषि कार्यबल का >42% हिस्सा बनाती हैं, जो एक दशक में 135% वृद्धि दर्शाता है)।
- यह उन्हें सामाजिक सुरक्षा और कैरियर गतिशीलता से वंचित करता है।
- डिजिटल और अवसंरचना अंतर: ग्रामीण महिलाओं में से 51.6% से अधिक (15 वर्ष और उससे अधिक आयु की) के पास मोबाइल फोन नहीं है। यह विशाल डिजिटल बहिष्कार उन्हें ई-गवर्नेंस, आधुनिक वित्तीय सेवाओं और डिजिटल शिक्षा से वंचित करता है।
- इसके अलावा, साइबर-बुलिंग और डॉक्सिंग की बढ़ती घटनाएँ ऑनलाइन वातावरण को शत्रुतापूर्ण बनाती हैं।
- स्वास्थ्य और पोषण की कमी: संरचनात्मक गरीबी का सबसे अधिक असर महिलाओं के स्वास्थ्य पर पड़ता है।
- NFHS-5 के अनुसार, 15–49 वर्ष की 57% महिलाएँ एनीमिक हैं। मातृ कुपोषण कार्यबल उत्पादकता को सीमित करता है और अंतरपीढ़ी स्वास्थ्य समस्याओं को बढ़ावा देता है।
संस्थागत कारक: शासन, कानूनी कमी और प्रतिनिधित्व की कमी
- राजनीतिक टोकनिज़्म: 18वीं लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल लगभग 14% है। जहाँ प्रतिनिधित्व मज़बूत है (पंचायती राज संस्थाओं में 46%), वहाँ भी ‘सरपंच-पति’ जैसी संस्थागत कमियाँ पुरुष संबंधियों को निर्वाचित महिला की शक्ति हथियाने की अनुमति देती हैं।
- परिवर्तनकारी नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 (33% आरक्षण) अभी भी सीमांकन के बाद लागू होने का इंतजार कर रहा है।
- कानून प्रवर्तन में कमियाँ: यद्यपि सशक्त कानून उपलब्ध हैं (जैसे घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा अधिनियम, निर्भया अधिनियम), फिर भी पुलिस की संवेदनशीलता का अभाव, न्यायिक प्रक्रिया में विलंब तथा कम दंड दरें महिलाओं को अपराध दर्ज कराने से हतोत्साहित करती हैं।
- शैक्षिक असंगति: स्कूल नामांकन में सुधार हुआ है (युवा महिलाओं की साक्षरता 96% है), लेकिन संस्थान उच्च शिक्षा (GER केवल 28.5%) और तकनीकी क्षेत्रों (STEM अंतर) में महिलाओं को बनाए रखने में असफल रहते हैं, जिससे आधुनिक नौकरी बाज़ार में कौशल का अंतर उत्पन्न होता है।
अंतरविभाजन:
ये क्षेत्र अलग-थलग कार्य नहीं करते। उदाहरण के लिये, सांस्कृतिक मानदंड (लड़कियों की शिक्षा को कम महत्त्व देना) संरचनात्मक परिणाम उत्पन्न करते हैं (कम वेतन वाली, अनौपचारिक कृषि में महिलाओं की अधिकता), जिसे संस्थागत उदासीनता (सुरक्षित शहरी परिवहन, होस्टल या किफायती क्रेच की कमी) और भी मज़बूत करती है। यह अंतरविभाजन महिलाओं को निर्भरता और संवेदनशीलता के चक्र में फँसा देता है।
समग्र सशक्तीकरण के लिये रणनीतियाँ
- संस्थागत ढाँचे और शासन को मज़बूत करना:
- तेज़ी से न्याय: महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिये विशेष फास्ट-ट्रैक न्यायालय स्थापित करें और मिशन शक्ति के तहत वन स्टॉप सेंटर (OSCs) का विस्तार करें, जो कानूनी, चिकित्सीय एवं मानसिक समर्थन एकीकृत रूप में प्रदान करें।
- राजनीतिक सशक्तीकरण: नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 को शीघ्र लागू करें। मॉडल महिला-हितैषी ग्राम पंचायत जैसी पहल को बढ़ावा दें ताकि स्थानीय स्तर पर वास्तविक नेतृत्व क्षमता विकसित हो।
- आर्थिक और डिजिटल समावेशन के लिये संरचनात्मक सुधार:
- अनौपचारिक को औपचारिक बनाना: राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा संहिता को गिग और अनौपचारिक श्रमिकों तक बढ़ाना, ताकि मातृत्व लाभ एवं स्वास्थ्य बीमा सुनिश्चित की जा सके।
- डिजिटल और वित्तीय स्वतंत्रता: ग्रामीण डिजिटल उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिये लखपति दीदियों और ड्रोन दीदियों जैसे कार्यक्रमों का विस्तार करें। पीएम मुद्रा योजना और स्टैंड-अप इंडिया का उपयोग महिलाओं द्वारा संचालित MSME को भारी वित्तीय सहायता देने के लिये करें।
- महिला-केंद्रित शहरी अवसंरचना: अधिक ‘सखी निवास’ कार्यरत महिला हॉस्टल बनाना, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन वास्तविक समय निगरानी के साथ लागू करें और राष्ट्रीय क्रेच योजना का विस्तार करके महिलाओं की ‘समय गरीबी’ को कम करें।
- शिक्षा और स्वास्थ्य के माध्यम से सांस्कृतिक बदलाव को बढ़ावा देना:
- लैंगिक-संवेदनशील शिक्षा: पूरे देश में लैंगिक संवेदनशीलता मॉड्यूल लागू करें ताकि रूढ़िवादिता को शुरुआती स्तर पर तोड़ा जा सके। लड़कियों के लिये STEM छात्रवृत्तियों का विस्तार करें ताकि तकनीकी अंतर को कम किया जा सके।
- लक्षित स्वास्थ्य देखभाल: मातृत्व सहायता के लिये मध्य प्रदेश के सुमन सखी चैटबोट जैसे उपकरणों का उपयोग करें और किशोरी लड़कियों व गर्भवती महिलाओं में एनीमिया की उच्च दर को लक्षित करने के लिये POSHAN अभियान को मज़बूत करें।
निष्कर्ष:
'महिला विकास' से 'महिला-नेतृत्व वाली विकास' की ओर संक्रमण के लिये पितृसत्तात्मक ढाँचे को समाप्त करना आवश्यक है, जो महिलाओं के विकल्पों को सीमित करता है। जहाँ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसी पहल और बढ़ती महिला उद्यमिता एक सकारात्मक दिशा की ओर संकेत करती हैं, वहीं सच्ची लैंगिक समानता प्राप्त करने के लिये एक समन्वित प्रयास अनिवार्य है।
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