दृष्टि के NCERT कोर्स के साथ करें UPSC की तैयारी और जानें
ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न: भूमि संसाधनों पर बढ़ते दबाव और पारिस्थितिक तनाव की पृष्ठभूमि में स्पष्ट कीजिये कि भौगोलिक कारक भारत में भूमि क्षरण एवं मरुस्थलीकरण के स्वरूप तथा प्रक्रियाओं को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। (250 शब्द)

    23 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भूगोल

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत भारत में मरुस्थलीकरण की चिंता को रेखांकित करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में यह स्पष्ट कीजिये कि भौगोलिक कारक भूमि क्षरण को कैसे प्रभावित करते हैं।
    • इसके बाद भूमि क्षरण की प्रक्रिया का वर्णन कीजिये।
    • आगे हालिया चुनौतियों और पारिस्थितिक दबावों की व्याख्या कीजिये।
    • अंत में उपयुक्त उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    भूमि संसाधनों पर बढ़ते दबाव और पारिस्थितिक तनाव के सम्मिलन ने भारत में भूमि क्षरण तथा मरुस्थलीकरण को एक गंभीर चुनौती बना दिया है।

    ISRO के मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण एटलस (2021) के अनुसार, 2018-19 के दौरान भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 29.7% हिस्सा क्षरण से गुजर रहा है और हाल के आँकड़े इन प्रक्रियाओं में बढ़ती प्रवृत्ति का संकेत दे रहे हैं।

    मुख्य भाग:

    क्षरण के स्वरूप को प्रभावित करने वाले भौगोलिक कारक

    • जलवायु संबंधी विविधताएँ (शुष्कता और वर्षा):
      • शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्र: पश्चिमी राजस्थान और कच्छ जैसे क्षेत्रों में कम वर्षा तथा उच्च वाष्पोत्सर्जन के कारण पवन अपरदन की समस्या अधिक होती है।
        • गर्मियों की तेज़ हवाएँ रेतीली ऊपरी मिट्टी को विस्थापित कर देती हैं, जिससे रेत के टीलों का विस्तार होता है।
      • अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्र: पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर भारत में, ढलानों पर होने वाली भारी मानसूनी बारिश जल अपरदन को बढ़ावा देती है।
        • यह पोषक तत्त्वों से भरपूर ऊपरी मिट्टी को बहा ले जाती है, जिसके परिणामस्वरूप अक्सर "लैटेरिटाइजेशन" (मिट्टी का सख्त होना) हो जाता है।
    • स्थलाकृति और भू-आकृति विज्ञान:
      • पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्र: हिमालयी क्षेत्र 'मास वेस्टिंग' (द्रव्यमान क्षय) और भूस्खलन के प्रति संवेदनशील हैं। विवर्तनिक अस्थिरता और हालिया अत्यधिक वर्षा (जैसे हिमाचल और उत्तराखंड 2023-25) के कारण बढ़ती ढलान अस्थिरता, गंभीर ‘अवनलिका अपरदन’ (Gully Erosion) का कारण बनती है।
      • तटीय भू-आकृति: समुद्र के बढ़ते जलस्तर और चक्रवाती लहरों के कारण सुंदरवन तथा तटीय ओडिशा में लवणता अंतःक्षेपण बढ़ रहा है, जिससे उपजाऊ धान के खेत बंजर खारी भूमि में बदल रहे हैं।
    • मृदा की बनावट और संरचना:
      • उत्तर-पश्चिम की रेतीली मिट्टी में जल धारण क्षमता कम होती है, जिससे वे मरुस्थलीकरण की चपेट में जल्दी आ जाती हैं।
        • इसके विपरीत, दक्कन के पठार की मिट्टी वाली "काली कपासी मिट्टी" में अत्यधिक सिंचाई होने पर जलभराव की समस्या हो जाती है, जिससे द्वितीयक लवणीकरण पैदा होता है।

    भारत में भूमि क्षरण की प्रक्रियाएँ

    भूमि क्षरण की प्रक्रिया अक्सर भौगोलिक संवेदनशीलता और मानवजनित दबाव का एक ‘सहक्रियात्मक’ परिणाम होती है।

    • जल अपरदन: यह भारत में सबसे प्रमुख प्रक्रिया है, विशेष रूप से भारत-गंगा के मैदानों और मध्य उच्च भूमि में। इसमें परत, क्षुद्र सरिता और अवनलिका अपरदन शामिल हैं। इसके परिणामस्वरूप ‘बिहड़ स्थलाकृति’ (Badland Topography) का निर्माण होता है (उदाहरण के लिये: चंबल के बीहड़)।
    • वनस्पति क्षरण: लॉगिंग (लकड़ी कटान), वनाग्नि या पूर्वोत्तर में झूम कृषि (Shifting Cultivation) के कारण वन आवरण का नुकसान होता है। इससे मिट्टी की पकड़ कमज़ोर हो जाती है, जो क्षरण के चक्र को और तीव्र कर देता है।
    • पवन अपरदन: यह मुख्य रूप से थार मरुस्थल को प्रभावित करता है। जलवायु परिवर्तन के कारण हवा के पैटर्न में हालिया बदलावों ने ‘धूल भरी आंधियों’ की आवृत्ति बढ़ा दी है, जिससे मरुस्थलीय स्थितियाँ हरियाणा और पंजाब के सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुँच रही हैं।
    • लवणीकरण और क्षारीकरण: यह मुख्य रूप से हरित क्रांति बेल्ट (पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश) में ‘सिंचाई-प्रेरित’ प्रक्रिया है। अत्यधिक भूजल उपयोग और खराब जल निकासी के कारण मिट्टी में लवणों का जमाव हो जाता है (इसे स्थानीय स्तर पर रेह (Reh) या कलर (Kallar) कहा जाता है)

    हालिया चुनौतियाँ और पारिस्थितिक तनाव

    • जलवायु-प्रेरित ‘आकस्मिक सूखा’: तापमान में अचानक वृद्धि के कारण मिट्टी की नमी में तेज़ी से कमी आई है। इसने पूर्वी विदर्भ और झारखंड जैसे पारंपरिक रूप से उप-आद्र क्षेत्रों में भी क्षरण की शुरुआत कर दी है।
    • आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ: क्षरणग्रस्त क्षेत्रों में प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा (विलायती बबूल) और लेंटाना कमारा जैसी आक्रामक प्रजातियों के तेज फैलाव ने स्थानीय जैव विविधता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इन्होंने मिट्टी के रसायन को भी बदल दिया है, जिससे प्राकृतिक बहाली कठिन हो गई है।
    • भूजल की समाप्ति: भारत के लगभग 60% ज़िले अब भूजल की कमी का सामना कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप होने वाली ‘उप-मिट्टी की शुष्कता’ भूमि धंसाव और सूक्ष्मजीवी जीवन के नुकसान का कारण बनती है।
    • शहरी फैलाव और ‘हीट आइलैंड्स’: शहरी क्षेत्रों के आसपास की कृषि भूमि का ‘अभेद्य सतहों’ (कंक्रीट) में तेज़ी से परिवर्तन प्राकृतिक जल निकासी को बाधित करता है। इससे स्थानीय जल बहाव और अपरदन बढ़ जाता है।

    बहाली के लिये रणनीतिक उपाय

    • यांत्रिक/इंजीनियरिंग उपाय
      • कंटूर बंडिंग और ट्रेंचिंग (Contour Bunding & Trenching): समान ऊँचाई वाली रेखाओं (कंटूर) के साथ मेड़ बनाना या खाइयाँ खोदना। इसका उद्देश्य वर्षा के जल को रोकना और उसे ऊपरी मिट्टी को बहा ले जाने से बचाना है।
      • अवनलिका प्लगिंग (Gully Plugging): अवनलिकाओं (गुलियों) में पत्थरों, रेत की थैलियों या वनस्पतियों का उपयोग करके ‘मिनी-डैम’ (छोटे बाँध) बनाना। यह पानी के प्रवाह को धीमा कर देता है और गाद को जमने में सहायता करता है, जिससे धीरे-धीरे अवनलिका भर जाती है।
      • टे्रेसिंग (Terracing): खड़ी ढलानों को समतल प्लेटफार्मों (सीढ़ियों) की एक शृंखला में बदलना। हिमालय और पश्चिमी घाटों में पहाड़ी इलाकों को बिना भारी कटाव के कृषि योग्य बनाने के लिये यह अनिवार्य है।
      • विंडब्रेक्स और शेल्टरबेल्ट्स (Windbreaks and Shelterbelts): प्रचलित हवा की दिशा के लंबवत पेड़ों या झाड़ियों की कतारें लगाना। यह स्थानीय स्तर पर हवा की गति को कम करता है, जिससे राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों में मिट्टी को उड़ने से रोका जा सकता है।
    • जैविक और कृषि संबंधी उपाय
      • वनीकरण और पुनर्वनीकरण: मिट्टी को बाँधने के लिये स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाना। 'ग्रीन इंडिया मिशन' (GIM) के तहत, अब ध्यान केवल ‘वृक्ष लगाने’ से हटकर ‘पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली’ पर केंद्रित हो गया है।
      • कृषि-वानिकी: फसल तथा पशुपालन प्रणालियों में वृक्षों और झाड़ियों को एकीकृत करना। यह मिट्टी को एक ‘बारहमासी आवरण’ प्रदान करता है, जिससे थर्मल तनाव (गर्मी) और कटाव कम होता है।
      • स्टबल मल्चिंग: कटाई के बाद फसल के अवशेषों को खेत में ही छोड़ देना। यह बारिश की बूंदों की मार और हवा के खिलाफ एक सुरक्षात्मक परत के रूप में कार्य करता है, साथ ही सड़ने पर मिट्टी में जैविक कार्बन भी जोड़ता है।
      • फसल चक्र और अंतर-फसल: पोषक तत्त्वों के संतुलन और ज़मीनी आवरण को बनाए रखने के लिये मिट्टी का दोहन करने वाली फसलों (जैसे अनाज) के साथ मिट्टी बनाने वाली फसलों (जैसे दलहन/फलीदार पौधे) को उगाना।

    निष्कर्ष

    भारत में भूमि क्षरण प्राकृतिक शक्तियों और मानवीय दबावों द्वारा बाधित एक नाजुक संतुलन को दर्शाता है। बढ़ते जलवायु जोखिमों और भूजल तनाव के बीच, 'एकीकृत परिदृश्य दृष्टिकोण' के माध्यम से इसका समाधान करना आवश्यक है। वर्ष 2030 तक 'भूमि क्षरण तटस्थता' प्राप्त करना और 26 मिलियन हेक्टेयर भूमि को बहाल करना, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और ग्रामीण अनुकूलन को मज़बूत करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

    To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.

    Print
close
Share Page
images-2
images-2