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प्रश्न :
प्रश्न: राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की मान्यता के संदर्भ में चर्चा कीजिये कि मौखिक परंपराएँ, प्रदर्शन कलाएँ और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियाँ सांस्कृतिक निरंतरता तथा पहचान निर्माण में कैसे योगदान देती हैं। (250 शब्द)
23 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 संस्कृतिउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की मान्यता को रेखांकित करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में यह स्पष्ट कीजिये कि मौखिक परंपराएँ, प्रदर्शन कलाएँ और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियाँ सांस्कृतिक निरंतरता तथा पहचान निर्माण में कैसे योगदान देती हैं।
- इसके बाद समकालीन समय में उपस्थित चुनौतियों का उल्लेख कीजिये।
- अंत में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को और अधिक प्रोत्साहित करने के उपाय सुझाएँ।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय
अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की मान्यता ‘स्मारक-केंद्रित’ इतिहास से ‘जीवंत इतिहास’ की ओर एक परिवर्तन को दर्शाती है, जहाँ किसी सभ्यता का सार उसके लोगों की परंपराओं और प्रथाओं में निहित होता है।
- भारतीय संदर्भ में, जहाँ UNESCO की प्रतिनिधि सूची (जिसमें हाल के समावेश जैसे गुजरात का गरबा और कोलकाता की दुर्गा पूजा शामिल हैं) विविध सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को उजागर करती है, वहाँ अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सांस्कृतिक निरंतरता और पहचान निर्माण का प्रमुख माध्यम बनती है।
मुख्य भाग:
मौखिक परंपराएँ: ज्ञान का जीवंत भंडार
- भाषाई निरंतरता और बोलियों का संरक्षण: मौखिक परंपराएँ, जैसे लोकगीत (उदाहरण: बंगाल के बाउल) और महाकाव्य, प्राचीन भाषाई संरचनाओं और शब्दावली को संरक्षित करती हैं, जिन्हें औपचारिक शिक्षा अक्सर नजरअंदाज कर देती है।
- यह सुनिश्चित करता है कि ‘मातृभाषा’ जटिल भावनाओं और सामाजिक मूल्यों को व्यक्त करने का एक प्रभावी माध्यम बनी रहे।
- पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज्ञान का हस्तांतरण: जिन समुदायों में लिखित लिपि नहीं होती, वहाँ मौखिक कथाएँ इतिहास, वंशावली और नैतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने का एकमात्र माध्यम होती हैं।
- गुरु-शिष्य परंपरा यह सुनिश्चित करती है कि ज्ञान की सूक्ष्मता समय के साथ नष्ट न हो।
- वैकल्पिक इतिहास लेखन: मौखिक इतिहास प्राय: हाशिये पर मौजूद समूहों के दृष्टिकोण को सामने लाते हैं, जो ‘मुख्यधारा के इतिहास’ के विपरीत एक वैकल्पिक कथा प्रस्तुत करते हैं।
- यह उपेक्षित वर्गों में एक विशिष्ट पहचान की भावना को बढ़ावा देता है, जहाँ वे अपने स्थानीय संघर्षों और उपलब्धियों पर गर्व महसूस करते हैं।
प्रदर्शन कलाएँ: सामाजिक मूल्यों का साकार रूप
- सामाजिक-धार्मिक एकता: अनुष्ठानिक प्रदर्शन कलाएँ, जैसे कूडियाट्टम (संस्कृत रंगमंच) या रामलीला, ‘सामाजिक बंधन’ के रूप में कार्य करती हैं।
- ये समाज के विभिन्न वर्गों को एक साझा सौंदर्य अनुभव में जोड़ती हैं, जिससे सामूहिक जुड़ाव की भावना सुदृढ़ होती है।
- गतिशील अनुकूलन (विकास बनाम ठहराव): भौतिक स्मारकों के विपरीत, प्रदर्शन कलाएँ अनुकूल होती हैं।
- वे समकालीन विषयों (जैसे लोक नाटक द्वारा आधुनिक स्वास्थ्य मुद्दों को उठाना) के अनुसार स्वयं को ढालती हैं, जिससे संस्कृति प्रासंगिक और सशक्त बनी रहती है, न कि अतीत की एक निष्क्रिय धरोहर बनती है।
- सौंदर्यात्मक पहचान और सॉफ्ट पावर: पारंपरिक नृत्य और संगीत रूप किसी समुदाय की ‘वैश्विक पहचान’ को परिभाषित करते हैं।
- भारत के लिये, ये कलाएँ सांस्कृतिक कूटनीति का एक महत्त्वपूर्ण साधन हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘विविधता में एकता’ की छवि को प्रस्तुत करती हैं।
स्वदेशी ज्ञान प्रणालियाँ: स्थिरता और अस्तित्व
- एथ्नो-चिकित्सा और समग्र स्वास्थ्य: सोवा-रिग्पा या स्थानीय जनजातीय हर्बल चिकित्सा जैसी प्रणालियाँ सदियों के अनुभव एवं अवलोकन पर आधारित हैं।
- ये प्रणालियाँ एक जैव-सांस्कृतिक पहचान का निर्माण करती हैं, जहाँ समुदाय का स्वास्थ्य उसकी स्थानीय वनस्पतियों और जीव-जंतुओं से गहराई से जुड़ा होता है।
- पारिस्थितिक संरक्षण: जल संचयन की स्वदेशी पद्धतियाँ (जैसे नागालैंड की ज़ाबो प्रणाली) या पवित्र उपवन (केरल के कावु) प्रकृति के साथ ‘सहजीवी संबंध’ को दर्शाते हैं।
- आज यह ज्ञान जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन के लिये एक महत्त्वपूर्ण साधन के रूप में मान्यता प्राप्त कर रहा है।
- शिल्प परंपरा और आजीविका: पारंपरिक हस्तशिल्प और कृषि तकनीकें (जैसे पोक्कली धान की खेती) आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रदान करती हैं।
- यह ‘व्यावसायिक पहचान’ सुनिश्चित करती है कि समुदाय आत्मनिर्भर बना रहे और वैश्वीकरण एवं औद्योगीकरण की एकरूप प्रवृत्तियों का सामना कर सके।
आधुनिक युग में चुनौतियाँ:
- समानिकीकरण (‘वैश्विक गाँव’ का खतरा): जनसंचार के डिजिटल माध्यमों का प्रभुत्व अक्सर विशिष्ट मौखिक परंपराओं को हाशिये पर डाल देता है, जिससे छोटी बोलियों के लुप्त होने का खतरा बढ़ जाता है।
- व्यावसायीकरण बनाम प्रामाणिकता: पर्यटन के लिये पवित्र अनुष्ठानों का ‘मंचीकरण’ उनकी मूल आध्यात्मिक भावना को कमज़ोर कर देता है, जिससे सांस्कृतिक विरासत केवल एक वस्तु बनकर रह जाती है।
- प्रलेखन में डिजिटल विभाजन: यद्यपि डिजिटल अभिलेखन बढ़ रहा है, फिर भी कई स्वदेशी ज्ञान प्रणालियाँ अभी भी दर्ज नहीं की गई हैं, जिससे वे ‘बायोपायरेसी’ या ‘कल्चरल एप्रोप्रिएशन’ के प्रति संवेदनशील बन जाती हैं।
- पीढ़ीगत अंतर: तेज़ी से हो रहे शहरीकरण और औपचारिक, मानकीकृत शिक्षा की ओर झुकाव के कारण युवा पीढ़ी पारंपरिक ज्ञान को अक्सर ‘पुराना’ या ‘अंधविश्वासी’ मानने लगती है।
अमूर्त सांस्कृतिक विरासत को और अधिक प्रोत्साहित करने के उपाय:
- डिजिटल ICH भंडार: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और ब्लॉकचेन का उपयोग करके स्वदेशी समुदायों के बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) का दस्तावेज़ीकरण तथा संरक्षण किया जाएँ।
- शिक्षा में ICH (NEP 2020): विद्यालयी पाठ्यक्रम में स्थानीय लोक कलाओं और स्वदेशी ज्ञान को शामिल किया जाएँ, ताकि बचपन से ही सांस्कृतिक साक्षरता विकसित हो सके।
- समुदाय-आधारित संरक्षण: ‘सरकार-नेतृत्व’ वाले संरक्षण से हटकर ‘समुदाय-स्वामित्व’ वाले मॉडल को बढ़ावा दिया जाएँ, जहाँ परंपरा के धारक स्वयं तय करें कि उनकी विरासत को कैसे संरक्षित और साझा किया जाएँ।
- सतत पर्यटन मॉडल: ‘अनुभवात्मक पर्यटन’ को विकसित किया जाएँ, जो अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की पवित्रता का सम्मान करे और आर्थिक लाभ सीधे ज्ञान-धारकों तक पहुँचे।
निष्कर्ष:
अमूर्त सांस्कृतिक विरासत किसी सभ्यता की ‘आत्मा’ है, जो बाहरी संरचनाओं के निर्माण के लिये आंतरिक आधार प्रदान करती है। मौखिक परंपराओं, प्रदर्शन कलाओं और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के संरक्षण के माध्यम से समाज यह सुनिश्चित करता है कि उसकी प्रगति प्रामाणिकता पर आधारित हो। तेज़ी से विभाजित होते वैश्विक परिदृश्य में, ये ‘जीवंत परंपराएँ’ सतत जीवन-शैली के लिये मार्गदर्शन प्रदान करती हैं और ऐसी सशक्त पहचान निर्मित करती हैं, जो वैश्वीकरण के दबावों का सामना कर सके।
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