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प्रश्न :
प्रश्न: समकालीन शासन प्रणालियों में, जो बढ़ते हुए नियमों और प्रक्रियाओं द्वारा संचालित हैं, क्या नैतिक मूल्यों के आंतरिकीकरण के बिना नैतिक आचरण को बनाए रखा जा सकता है? (150 शब्द)
19 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्नउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत समकालीन शासन प्रणालियों की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में केवल नियमों और प्रक्रियाओं पर निर्भर रहने की सीमाओं का विश्लेषण कीजिये।
- इसके बाद आंतरिक रूप से आत्मसात किये गए नैतिक मूल्यों की अनिवार्यता को स्पष्ट कीजिये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
समकालीन शासन प्रणालियाँ बढ़ती हुई कानूनी-तर्कसंगत प्राधिकरण द्वारा विशेषित हैं, जहाँ कठोर पदानुक्रम, मानकीकृत कार्यप्रणालियाँ और ‘विधि का शासन’ पूर्वानुमेयता सुनिश्चित करने तथा व्यक्तिगत पक्षपात को समाप्त करने का प्रयास करते हैं।
- हालाँकि, नियम और प्रक्रियाएँ अनुपालन सुनिश्चित कर सकती हैं, लेकिन नैतिक मूल्यों के गहरे आंतरिककरण के बिना नैतिक आचरण को बनाए रखने के लिये वे मूलतः अपर्याप्त हैं।
मुख्य भाग:
केवल नियमों और प्रक्रियाओं पर निर्भर रहने की सीमाएँ:
केवल बाहरी विनियमों द्वारा संचालित शासन प्रणाली वास्तविक नैतिक आचरण को बनाए रखने में अंतर्निहित सीमाओं का सामना करती है—
- कमियों का दुरुपयोग (कानूनी लेकिन अनैतिक): नियम प्राय: कठोर और प्रतिक्रियात्मक होते हैं। नैतिक मूल्यों से रहित अधिकारी प्रक्रियात्मक कमियों का आसानी से दुरुपयोग कर अपने स्वार्थ पूरे कर सकता है, जबकि तकनीकी रूप से वह कानून की सीमाओं के भीतर ही रहता है।
- लक्ष्य-विस्थापन और उदासीनता: जब नियम स्वयं ही उद्देश्य बन जाते हैं, तो यह ‘नौकरशाही संकीर्णता’ और लालफीताशाही को जन्म देता है।
- उदाहरण के लिये, बायोमेट्रिक मिलान में त्रुटि के कारण किसी गरीब व्यक्ति को सब्सिडी वाला राशन देने से मना करना प्रक्रियात्मक रूप से सही हो सकता है, लेकिन नैतिक रूप से पूर्णतः अनुचित है।
- विवेकाधिकार की समस्या: कोई भी नियम-पुस्तिका मानव समाज की असीम जटिलताओं को पूरी तरह समाहित नहीं कर सकती। सिविल सेवकों के पास व्यापक विवेकाधिकार होता है।
- आंतरिक नैतिक मार्गदर्शन के अभाव में यह विवेकाधिकार आसानी से भेदभाव, पक्षपात या भ्रष्टाचार में बदल सकता है।
- अदृश्य कार्यों का संकट: ऑडिट और सतर्कता आयोग जैसे बाहरी तंत्र केवल दिखाई देने वाले कार्यों की निगरानी कर सकते हैं।
- ऐसी स्थितियों में, जहाँ “कोई नहीं देख रहा हो”, केवल दंड के भय के आधार पर नैतिक आचरण को बनाए रखना संभव नहीं है।
आंतरिक रूप से आत्मसात किये गए नैतिक मूल्यों की अनिवार्यता:
ईमानदारी, सहानुभूति, निष्पक्षता और दृढ़ निष्ठा जैसे मूल्यों का आंतरिककरण सतत नैतिक आचरण के लिये आवश्यक ‘आंतरिक शासन’ प्रदान करता है—
- कानून की भावना को बनाए रखना: आंतरिक मूल्यों के कारण लोकसेवक संवैधानिक नैतिकता के अनुरूप कार्य करते हैं।
- वे केवल नियमों के शब्दों का यांत्रिक पालन नहीं करते, बल्कि उनके पीछे की भावना (जैसे सामाजिक न्याय, समानता) को समझते हैं।
- धुंधले क्षेत्रों में मार्गदर्शन: संकट या नीतिगत अस्पष्टता (जैसे आपदा प्रबंधन) के समय मानक प्रक्रियाएँ प्राय: विफल हो जाती हैं।
- ऐसे में अधिकारी को सहानुभूति और जनकल्याण जैसे मूल्यों के आधार पर त्वरित एवं जीवन-रक्षक निर्णय लेने पड़ते हैं, जो सख्त नियमों से अलग होकर भी व्यापक हित में होते हैं।
- आत्म-नियमन और ईमानदारी को बढ़ावा: सच्ची ईमानदारी दबाव की स्थिति में सही कार्य करना है।
- राजनीतिक दबाव या रिश्वत जैसे प्रलोभनों के सामने अधिकारी अपने आंतरिक नैतिक आधार पर दृढ़ रहता है, न कि केवल ऑडिट या दंड के भय से।
- शासन को मानवीय बनाना: सहानुभूति और भावनात्मक बुद्धिमत्ता जैसे मूल्य कानून द्वारा थोपे नहीं जा सकते।
- ये आंतरिक गुण हैं, जो प्रशासकों को वंचित वर्गों से जुड़ने में सक्षम बनाते हैं और उन्हें केवल नियमों के पालनकर्त्ता से आगे बढ़ाकर सामाजिक परिवर्तन (अंत्योदय) के वाहक बनाते हैं।
निष्कर्ष:
नियम एवं प्रक्रियाएँ शासन की आधारभूत संरचना बनाते हैं, जो उसे स्थायित्व और ढाँचा प्रदान करती हैं, जबकि नैतिक मूल्य उसकी आत्मा के रूप में उसे अर्थ, दिशा तथा जीवन प्रदान करते हैं। बाहरी विनियम जहाँ ‘सबसे बुरे’ आचरण को रोक सकते हैं, वहीं केवल मूल्यों का आंतरिककरण ही ‘सर्वश्रेष्ठ’ सेवा के लिये प्रेरित कर सकता है। अंततः, नैतिक शासन दंड के भय का परिणाम नहीं, बल्कि जनहित के प्रति गहराई से निहित प्रतिबद्धता का परिणाम होता है, जो यह सुनिश्चित करता है कि ‘प्रशासक’ वास्तव में ‘लोकसेवक’ बना रहे।
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