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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न: बीसवीं शताब्दी के संदर्भ में, यह परीक्षण कीजिये कि औद्योगीकरण, साम्राज्यवाद और वैचारिक संघर्षों ने सामूहिक रूप से वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था को किस प्रकार पुनः आकार दिया। (250 शब्द)

    16 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहास

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत बीसवीं सदी के वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था को रेखांकित करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में औद्योगिकीकरण, साम्राज्यवाद और वैचारिक संघर्षों द्वारा निभाई गई परिवर्तनकारी भूमिकाओं को स्पष्ट कीजिये तथा यह बताएँ कि इनसे वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था कैसे पुनः आकारित हुई।
    • इसके अतिरिक्त, उन अन्य प्रमुख कारकों का भी उल्लेख कीजिये जिन्होंने इस परिवर्तन को गति प्रदान की।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    19वीं सदी के ‘कॉन्सर्ट ऑफ यूरोप’ के पतन ने 20वीं सदी की उस वैश्विक व्यवस्था को जन्म दिया, जो संप्रभुता के लोकतंत्रीकरण और शक्ति के मशीनीकरण से परिभाषित थी।

    औद्योगिकीकरण की आर्थिक आवश्यकताओं, साम्राज्यवाद से उत्पन्न क्षेत्रीय संघर्षों और उदारवाद, साम्यवाद व फासीवाद जैसी विचारधाराओं के टकराव ने संयुक्त रूप से ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित कीं, जिनमें आधुनिक बहुध्रुवीय विश्व का उदय हुआ।

    मुख्य भाग: 

    परिवर्तन का त्रिस्तरीय इंजन: औद्योगिकीकरण, साम्राज्यवाद और विचारधारा — वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था का पुनर्गठन

    • औद्योगिकीकरण: शक्ति का भौतिक आधार
      • मांसपेशी से मशीन तक: द्वितीय औद्योगिक क्रांति (इस्पात, बिजली, रसायन) की ओर संक्रमण ने युद्ध के मशीनीकरण को संभव बनाया। अब विश्व व्यवस्था का निर्धारण सेना के आकार से नहीं, बल्कि राज्य के औद्योगिक उत्पादन से होने लगा।
      • नए प्रभुत्वशाली शक्तियों का उदय: औद्योगिक क्षमता ने शक्ति का केंद्र ब्रिटेन से हटाकर जर्मनी और अमेरिका की ओर स्थानांतरित कर दिया, जिससे संरचनात्मक अस्थिरता उत्पन्न हुई और अंततः दो विश्व युद्धों का कारण बनी।
      • आर्थिक परस्पर निर्भरता: वर्ष 1929 की महान मंदी ने यह सिद्ध किया कि औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएँ वैश्विक रूप से जुड़ी हुई थीं तथा एक क्षेत्र में गिरावट पूरे विश्व में उग्र राजनीतिक व्यवस्थाओं के उदय को प्रेरित कर सकती थी।
    • साम्राज्यवाद: संघर्ष का भौगोलिक विस्तार
      • संसाधन साम्राज्यवाद और टकराव: ‘लेबेन्सराउम’ (जीवित स्थान) और औपनिवेशिक बाज़ारों की खोज ने एक शून्य-योग की स्थिति उत्पन्न की। इस अंतर-साम्राज्यवादी प्रतिद्वंद्विता (जैसे मोरक्को संकट) ने 19वीं सदी के कूटनीतिक गठबंधनों को कमज़ोर कर दिया।
      • युद्ध का वैश्वीकरण: औपनिवेशिक क्षेत्रों के कारण, यूरोप के क्षेत्रीय संघर्ष स्वतः ही विश्व युद्धों में बदल गए, जिनमें एशिया तथा अफ्रीका से लाखों सैनिक शामिल हुए और इससे उनके स्थानीय राजनीतिक चेतना में स्थायी परिवर्तन आया।
      • उपनिवेशवाद के अंत का उत्प्रेरक: विडंबना यह है कि विश्व युद्ध (जो साम्राज्यवाद की उपज थे) ने औपनिवेशिक शक्तियों को कमज़ोर कर दिया, जिससे ‘तीसरे विश्व’ का उदय हुआ। इसने ‘साम्राज्य’ के स्थान पर ‘संप्रभुता’ को एक नए वैश्विक मानक के रूप में स्थापित किया।
    • वैचारिक संघर्ष: नई व्यवस्था का सॉफ्टवेयर
      • नई वैश्विक व्यवस्थाओं के लिये विचारधाराओं ने ‘नैतिक’ और संरचनात्मक ढाँचे प्रदान किये।
      • ‘वादों’ का टकराव: इस सदी में उदार लोकतंत्र, साम्यवाद और फासीवाद के बीच त्रिपक्षीय संघर्ष देखा गया।
      • यूरोकेंद्रितता का अंत: वर्ष 1945 में फासीवाद की हार के बाद वैश्विक स्तर पर शक्ति का एक खालीपन पैदा हुआ, जिसे बाद में द्विध्रुवीय शीत युद्ध ने भर दिया। अब विश्व व्यवस्था का निर्धारण भूगोल से नहीं, बल्कि वैचारिक संरेखण (जैसे आयरन कर्टन) से होने लगा।
      • मूल्यों का संस्थानीकरण: वर्ष 1945 के बाद वैश्विक व्यवस्था को संयुक्त राष्ट्र और ब्रेटन वुड्स प्रणाली के माध्यम से संस्थागत रूप दिया गया, जो पुराने राजतंत्रीय तंत्रों पर उदार-पूंजीवादी विचारधारा की विजय को दर्शाता है।

    त्रिस्तरीय इंजन से परे के अतिरिक्त एवं व्यापक कारक

    • व्यक्तिगत भूमिका का प्रभाव: यद्यपि संरचनात्मक शक्तियाँ अत्यंत प्रभावशाली थीं, फिर भी महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला जैसे नेताओं की विशिष्ट भूमिकाएँ यह दर्शाती हैं कि सांस्कृतिक एवं नैतिक नेतृत्व प्राय: औद्योगिक या साम्राज्यवादी तर्कों को चुनौती देता रहा।
    • पर्यावरणीय और जैविक कारक: वर्ष 1918 का स्पेनिश फ्लू और तीव्र औद्योगिकीकरण से उत्पन्न पर्यावरणीय क्षरण ऐसे गैर-राजनीतिक व्यवधान थे, जिन्होंने विचारधारा से स्वतंत्र होकर राजनीतिक परिवर्तनों (जैसे सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधार) को प्रेरित किया।
    • पारंपरिक पहचान की दृढ़ता: साम्यवाद या उदारवाद जैसी ‘सार्वभौमिक’ विचारधाराओं के बावजूद, राष्ट्रवाद और धर्म सबसे शक्तिशाली राजनीतिक प्रेरक बने रहे, जो प्राय: सोवियत औद्योगिक तंत्र या पश्चिमी साम्राज्यवादी संरचनाओं से भी अधिक स्थाई सिद्ध हुए।
    • वैज्ञानिक और सूचना क्रांति: 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ‘स्मोकस्टैक औद्योगिकीकरण’ से सिलिकॉन-आधारित सूचना युग की ओर बदलाव ने राजनीति को पुनः आकार देना शुरू किया, जहाँ केवल क्षेत्रीय या औद्योगिक शक्ति के बजाय सॉफ्ट पावर और डेटा का महत्त्व बढ़ गया।
    • गुटनिरपेक्ष पहल: गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM) ने यह प्रदर्शित किया कि वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था केवल महाशक्तियों के संघर्ष का निष्क्रिय परिणाम नहीं थी, बल्कि तीसरे विश्व के देशों ने वैचारिक द्विध्रुवीयता से स्वतंत्र रहने के लिये सक्रिय रूप से अपना स्थान निर्मित किया।

    निष्कर्ष

    बीसवीं सदी ने यह सिद्ध किया कि जहाँ औद्योगिकीकरण ने साधन उपलब्ध कराए और साम्राज्यवाद ने मंच प्रदान किया, वहीं वैचारिक संघर्षों ने वैश्विक पदानुक्रम के पूर्ण पुनर्निर्माण के लिये प्रेरणा दी। इस युग ने विश्व को संसाधन-शोषण आधारित साम्राज्यों के समूह से निकालकर अंतर्राष्ट्रीय कानून द्वारा संचालित परस्पर निर्भर राष्ट्र-राज्यों के एक जटिल जाल में परिवर्तित कर दिया।

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