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प्रश्न :
प्रश्न: डिजिटल संचार और सोशल मीडिया के विस्तार के साथ, विश्लेषण कीजिये कि भारतीय समाज में सार्वजनिक विमर्श तथा सामाजिक दृष्टिकोण किस प्रकार पुनर्गठित हो रहे हैं। (150 शब्द)
16 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भारतीय समाजउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत सार्वजनिक विमर्श में डिजिटल संचार और सोशल मीडिया की भूमिका को रेखांकित करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में यह तर्क प्रस्तुत कीजिये कि ये किस प्रकार सार्वजनिक विमर्श और सामाजिक दृष्टिकोण को परिवर्तित करते हैं।
- डिजिटल परिवर्तन के नकारात्मक पक्ष को उजागर कीजिये।
- एक सशक्त और समावेशी डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा देने के उपाय प्रस्तुत कीजिये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
डिजिटल संचार और सोशल मीडिया के विस्तार ने भारत में सार्वजनिक विमर्श के लिये एक गुणक शक्ति के रूप में कार्य किया है, जिससे यह अभिजात्य-नियंत्रित मंचों से बदलकर एक विकेंद्रीकृत, ‘निरंतर सक्रिय’ डिजिटल अगोरा में परिवर्तित हो गया है।
- सूचना प्रवाह का लोकतंत्रीकरण करते हुए, इन प्लेटफॉर्मों ने शासक एवं शासित के बीच की दूरी को कम किया है। हालाँकि इसके साथ एल्गोरिद्मिक पक्षपात और इको चैंबर जैसी जटिलताएँ भी उत्पन्न हुई हैं।
मुख्य भाग:
सार्वजनिक विमर्श का पुनर्गठन: लोकतंत्रीकरण और वास्तविक-समय सहभागिता
- अभिव्यक्ति का लोकतंत्रीकरण: डिजिटल प्लेटफॉर्मों ने पारंपरिक नियंत्रण तंत्र को कमज़ोर कर दिया है, जिससे हाशिये पर स्थित समूह (जैसे LGBTQ+ समुदाय) पारंपरिक मुख्यधारा मीडिया पर निर्भर हुए बिना अपने संदेश और एजेंडा को स्वयं निर्धारित कर सकते हैं।
- इससे विमर्श ‘ऊपर से नीचे’ मॉडल से बदलकर सहभागी, स्थानीय स्तर आधारित मॉडल में परिवर्तित हो गया है।
- स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक जुड़ाव: सोशल मीडिया एक सेतु के रूप में कार्य करता है, जहाँ स्थानीय समस्याएँ जैसे ग्रामीण जल संकट या क्षेत्रीय भाषायी अस्मिता तुरंत राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन जाती हैं।
- यह स्थानिक संकुचन सुनिश्चित करता है कि ‘दिल्ली-केंद्रित’ दृष्टिकोण को क्षेत्रीय वास्तविकताएँ लगातार चुनौती देती रहें।
- राजनीतिक जवाबदेही और नागरिक निगरानी: ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) जैसे प्लेटफॉर्म पर वास्तविक-समय सहभागिता ने ‘प्राधिकरण को टैग करना’ नागरिक सक्रियता का एक नया रूप बना दिया है।
- इससे शासन अधिक उत्तरदायी बनता है, जहाँ जनप्रतिनिधियों को डिजिटल जनमत के मंच पर जवाबदेह ठहराया जाता है।
- ‘इन्फोमीडियरी’ का उदय: स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर और यूट्यूबर्स नए हितधारक के रूप में उभरे हैं, जो पारंपरिक समाचार माध्यमों के विपरीत वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हैं।
- इससे एक बहुलतावादी सूचना तंत्र विकसित हुआ है, हालाँकि यह अक्सर गहन विश्लेषण और सनसनीखेज प्रस्तुति के बीच झूलता रहता है।
सामाजिक दृष्टिकोण का पुनर्गठन: डिजिटल युग में मूल्य और व्यवहार
- वैश्विक मूल्यों का सामान्यीकरण: वैश्विक आंदोलनों (जैसे #MeToo, जलवायु कार्रवाई) के संपर्क ने भारतीय युवाओं में प्रगतिशील सामाजिक मानदंडों को तेज़ी से अपनाने को बढ़ावा दिया है।
- यह डिजिटल वैश्विक नागरिकता लैंगिक भूमिकाओं, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत अधिकारों के प्रति दृष्टिकोण को पुनः आकार दे रही है।
- ‘सेलिब्रिटी-नागरिक’ अंतःक्रिया: सार्वजनिक हस्तियों और आम नागरिकों के बीच की सीमाओं का धुंधलापन आकांक्षी उपभोक्तावाद की मानसिकता को बढ़ावा दे रहा है।
- सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स जीवनशैली के चुनावों को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे मितव्ययिता और सामुदायिक पहचान की पारंपरिक धारणाओं पर असर पड़ रहा है।
- डिजिटल परोपकार और एकजुटता: संकट के समय, जैसे कि COVID-19 महामारी या क्षेत्रीय बाढ़, डिजिटल नेटवर्क ने सामूहिक सहानुभूति की भावना को मज़बूत किया है।
- ‘क्राउडफंडिंग कल्चर’ सामाजिक व्यवहार में एक बदलाव को दर्शाती है, जहाँ अजनबी भी सामूहिक भलाई के लिये सहयोग करते हैं।
डिजिटल परिवर्तन का अंधकारमय पक्ष
- एल्गोरिदमिक इको चैंबर्स: दृष्टिकोण को व्यापक बनाने के बजाय, एल्गोरिदम प्राय: उपयोगकर्त्ताओं को वही सामग्री दिखाते हैं जो उनकी पहले से मौजूद धारणाओं के अनुरूप होती है, जिससे ‘सूचना के कोकून’ (Information Cocoons) बनते हैं और निष्पक्ष तर्कशक्ति बाधित होती है।
- ‘पोस्ट-ट्रुथ’ युग: डीपफेक्स और गलत सूचनाओं के तेज़ी से फैलने ने सार्वजनिक विमर्श में ‘सत्य’ के महत्त्व को कमज़ोर कर दिया है, जिससे समाज अधिक संशयग्रस्त और सामूहिक उन्माद की ओर झुकाव वाला बनता जा रहा है।
- डिजिटल विभाजन और बहिष्करण: यद्यपि संवाद का दायरा बढ़ा है, यह अभी भी अंग्रेज़ी भाषी या शहरी अभिजात वर्ग की ओर झुका हुआ है। स्थिर इंटरनेट की सुविधा से वंचित ‘मौन बहुमत’ इस ‘नए’ सार्वजनिक क्षेत्र से बाहर रह जाता है।
- निर्मित सहमति और बॉट्स: सार्वजनिक विमर्श को प्राय ‘IT सेल्स’ और बॉट नेटवर्क द्वारा प्रभावित किया जाता है, जो एक कृत्रिम सहमति या ‘एस्ट्रोटर्फिंग’ का माहौल बनाते हैं तथा वास्तविक नागरिक चिंताओं को दबा देते हैं।
- निगरानी और आत्म-सेंसरशिप: ‘कैंसल कल्चर’ या सरकारी निगरानी के डर ने डिजिटल पैनऑप्टिसिज़्म (Digital Panopticism) को जन्म दिया है, जहाँ व्यक्ति अपने विचारों को स्वयं ही सीमित करने लगते हैं, जिससे विडंबना यह है कि जिन डिजिटल साधनों से संवाद को बढ़ाना था, वही उसे संकुचित कर देते हैं।
एक सुदृढ़ और समावेशी डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा देने के उपाय
- ‘एक्सप्लेनेबल AI’ को अनिवार्य बनाना: प्लेटफॉर्म को यह स्पष्ट और गैर-तकनीकी रूप में बताना चाहिये कि उपयोगकर्त्ता को कोई विशेष सामग्री क्यों दिखाई जा रही है, ताकि ‘सूचना के कोकून’ को समाप्त किया जा सके।
- प्रोफाइलिंग से बाहर निकलने का विकल्प (Opt-out): कानून के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि उपयोगकर्त्ता ‘एंगेजमेंट-आधारित फीड’ के बजाय ‘न्यूट्रल फीड’ (कालानुक्रमिक) चुन सकें, जिससे राजनीतिक ध्रुवीकरण कम हो सके।
- ‘बॉट’ गतिविधि की पहचान और लेबलिंग: ‘IT सेल’ या स्वचालित खातों की पहचान और उन्हें चिह्नित करने के लिये सख्त प्रोटोकॉल स्थापित किये जाने चाहिये, ताकि निर्मित सहमति एवं ‘एस्ट्रोटर्फिंग’ को रोका जा सके।
- त्वरित हटाने की व्यवस्था: गैर-सहमति वाले डीपफेक या सामूहिक उन्माद भड़काने वाली सामग्री को तुरंत हटाने के लिये विशेष शिकायत निवारण तंत्र बनाए जाने चाहिये।
- भाषायी लोकतंत्रीकरण: जनजातीय और क्षेत्रीय बोलियों के लिये वॉयस-टू-टेक्स्ट तथा AI अनुवाद उपकरण विकसित किये जाएँ, ताकि डिजिटल विभाजन को कम किया जा सके।
- सुदृढ़ डेटा संरक्षण: राज्य और कॉर्पोरेट निगरानी को नियंत्रित करने के लिये DPDP अधिनियम को सख्ती से लागू किया जाए, जिससे डिजिटल पैनऑप्टिसिज़्म को कम किया जा सके।
निष्कर्ष
भारत में डिजिटल क्रांति एक दोधारी तलवार की तरह है, जिसने एक ओर नागरिकों को सशक्त बनाया है, वहीं दूसरी ओर वस्तुनिष्ठ सत्य की खोज को जटिल भी कर दिया है। यद्यपि इसने अधिक समावेशी और सहभागी सामाजिक ताने-बाने को बढ़ावा दिया है, लेकिन ध्रुवीकरण एवं गलत सूचना जैसी चुनौतियाँ डिजिटल साक्षरता तथा नैतिक तकनीकी विनियमन की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता को अनिवार्य बनाती हैं।
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