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प्रश्न :
श्री आदित्य शर्मा एक तेज़ी से विकसित हो रहे ज़िले के ज़िला मजिस्ट्रेट के रूप में कार्यरत हैं, जहाँ राज्य सरकार ने हाल ही में आवास सब्सिडी, छात्रवृत्ति और पेंशन लाभ जैसी कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों की पहचान करने के लिये AI आधारित प्रणाली शुरू की है। यह प्रणाली कई प्रकार के डेटासेट जैसे आय के अभिलेख, संपत्ति स्वामित्व, बिजली की खपत और बैंक लेन-देन का उपयोग करके स्वचालित रूप से पात्र लाभार्थियों की सूची तैयार करती है।
सरकार इस प्रणाली को दक्षता बढ़ाने, भ्रष्टाचार कम करने और कल्याणकारी लाभों के वस्तुनिष्ठ लक्षित वितरण को सुनिश्चित करने के लिये एक बड़े सुधार के रूप में प्रस्तुत करती है। प्रारंभिक चरण में यह नई प्रणाली मैनुअल प्रक्रियाओं को काफी कम कर देती है और लाभों के वितरण की गति बढ़ा देती है।
हालाँकि, सार्वजनिक शिकायत सुनवाई के दौरान श्री शर्मा को कई ऐसे वास्तविक रूप से गरीब परिवारों की शिकायतें मिलने लगती हैं, जिन्हें लाभार्थियों की सूची से बाहर कर दिया गया है। जाँच करने पर उन्हें पता चलता है कि एल्गोरिदम मुख्यतः डिजिटल और वित्तीय डेटा पर अत्यधिक निर्भर है। इसके परिणामस्वरूप अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिक, प्रवासी परिवार और वे लोग जिनकी नियमित डिजिटल उपस्थिति नहीं है, उन्हें गलत तरीके से ‘अयोग्य’ के रूप में वर्गीकृत किया जा रहा है।
उसी समय, कुछ अपेक्षाकृत समृद्ध परिवार, जिनके अभिलेख अधूरे या पुराने हैं, लाभार्थियों की सूची में शामिल हो गए हैं। नागरिक समाज संगठनों ने प्रशासन पर ‘डिजिटल बहिष्करण’ उत्पन्न करने का आरोप लगाया है और तर्क दिया है कि स्वचालित निर्णय-प्रक्रिया पर अत्यधिक निर्भरता स्थानीय वास्तविकताओं की अनदेखी करती है।
जब श्री शर्मा इन चिंताओं को उच्च अधिकारियों के समक्ष उठाते हैं, तो उन्हें सलाह दी जाती है कि वे इस प्रणाली का उपयोग जारी रखें, क्योंकि यह शासन सुधार का एक प्रमुख कदम है, जो पारदर्शिता और प्रौद्योगिकी-आधारित प्रशासन के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। अधिकारियों का तर्क है कि इस प्रणाली पर प्रश्न उठाने से डिजिटल शासन में जनता का विश्वास कमज़ोर पड़ सकता है।
इस बीच, मीडिया रिपोर्टें और सामाजिक कार्यकर्त्ता लगातार बहिष्करण के मामलों को उजागर कर रहे हैं और प्रशासन को कमज़ोर एवं संवेदनशील वर्गों की आवश्यकताओं के प्रति असंवेदनशील के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।
अब श्री शर्मा को यह निर्णय लेना है कि कल्याणकारी लाभों के वितरण में तकनीकी दक्षता, निष्पक्षता और जवाबदेही के बीच संतुलन बनाए रखते हुए इन चिंताओं का समाधान कैसे किया जाए।
प्रश्न
13 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़
1. उपर्युक्त मामले में शामिल नैतिक मुद्दों की पहचान कीजिये।
2. श्री शर्मा के सामने कौन-कौन से विकल्प उपलब्ध हैं? प्रत्येक विकल्प के गुण और दोष का मूल्यांकन कीजिये।
3. प्रशासनिक दक्षता और नैतिक शासन दोनों को सुनिश्चित करने के लिये श्री शर्मा को कौन-सा कार्य-पथ अपनाना चाहिये? अपने उत्तर का औचित्य स्पष्ट कीजिये।उत्तर :
परिचय:
यह मामला कल्याणकारी सेवाओं के वितरण में AI-आधारित शासन के उपयोग से उत्पन्न नैतिक दुविधा को उजागर करता है, जहाँ दक्षता और पारदर्शिता का टकराव समावेशन एवं निष्पक्षता से होता है। ज़िला मजिस्ट्रेट के रूप में श्री आदित्य शर्मा को न्याय और जन-विश्वास के सिद्धांतों को बनाए रखते हुए एल्गोरिदमिक पक्षपात, डिजिटल बहिष्करण तथा प्रशासनिक जवाबदेही जैसी चुनौतियों का सामना करना होगा।
संबंधित हितधारक
- प्राथमिक लाभार्थी: हाशिये पर रहने वाले, असंगठित क्षेत्र के श्रमिक और प्रवासी परिवार (जो बहिष्करण के प्रति अधिक संवेदनशील हैं)।
- राज्य सरकार: पारदर्शिता के लिये इस AI प्रणाली को एक प्रमुख सुधार के रूप में बढ़ावा देने वाली।
- श्री आदित्य शर्मा (ज़िला मजिस्ट्रेट): कार्यान्वयन प्राधिकारी, जो प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक न्याय दोनों के लिये ज़िम्मेदार हैं।
- नागरिक समाज एवं मीडिया: ‘डिजिटल विभाजन’ और नैतिक त्रुटियों को उजागर करने वाले निगरानीकर्त्ता (वॉचडॉग)।
- अयोग्य लेकिन ‘शामिल’ परिवार: डेटा की कमियों (लीकेज) के कारण लाभ प्राप्त करने वाले संपन्न परिवार।
- प्रौद्योगिकी प्रदाता/डेवलपर्स: वे लोग जिन्होंने पर्याप्त ‘एज-केस’ परीक्षण के बिना एल्गोरिदम विकसित किया।
1. संलग्न नैतिक मुद्दे
- डिजिटल बहिष्करण बनाम सार्वभौमिक पहुँच: ‘डिजिटल फुटप्रिंट’ की आवश्यकता असंगठित अर्थव्यवस्था से जुड़े लोगों के लिये बाधा बनती है, जो सामाजिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन करती है।
- एल्गोरिदमिक पक्षपात एवं अपारदर्शिता: AI की ‘ब्लैक बॉक्स’ प्रकृति गरीबी के सामाजिक-आर्थिक सूक्ष्म पहलुओं की अनदेखी करती है, जिससे ‘टाइप I’ (जरूरतमंदों का बहिष्करण) और ‘टाइप II’ (गैर-ज़रूरतमंदों का समावेशन) त्रुटियाँ उत्पन्न होती हैं।
- कर्त्तव्यनिष्ठा बनाम कठोर अनुपालन: श्री शर्मा का गरीबों के प्रति दायित्व (करुणा) राज्य के निर्देशों का पालन करने के कर्त्तव्य (पदानुक्रम/जवाबदेही) से टकराता है।
- उपयोगितावाद बनाम अधिकार-आधारित दृष्टिकोण: सरकार ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम हित’ (दक्षता) पर ध्यान दे रही है, जबकि सबसे कमज़ोर व्यक्ति के अधिकारों की अनदेखी कर रही है।
- विश्वसनीयता बनाम पारदर्शिता: ‘जन-विश्वास’ बनाए रखने के लिये प्रणाली की कमियों को छिपाना प्रशासनिक ईमानदारी का उल्लंघन है।
2. उपलब्ध विकल्पों का मूल्यांकन
विकल्प 1: यथास्थिति बनाए रखना (AI सूची का सख्ती से पालन)
- लाभ:
- उच्च अधिकारियों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखता है।
- ‘तकनीकी रूप से दक्ष’ होने का प्रदर्शन करता है।
- तत्काल प्रशासनिक टकराव से बचाता है।
- हानियाँ:
- सामाजिक अन्याय उत्पन्न करता है।
- जन-असंतोष और मीडिया प्रतिक्रिया को बढ़ावा देता है।
- राज्य पर लोगों के विश्वास को कमज़ोर करता है।
विकल्प 2: AI प्रणाली का पूर्ण निलंबन
- लाभ:
- बहिष्कृत लोगों को तत्काल राहत प्राप्त होती है।
- पारंपरिक मैनुअल सत्यापन प्रणाली की वापसी होती है।
- हानियाँ:
- ‘सुधार-विरोधी’ के रूप में देखा जाता है।
- मैनुअल भ्रष्टाचार/लीकेज की पुनः संभावना बढ़ती है।
- राज्य नीति की अवहेलना करने पर श्री शर्मा के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की संभावना रहती है।
विकल्प 3: हाइब्रिड मॉडल (तकनीक + मानवीय हस्तक्षेप)
- लाभ:
- AI की गति को मानवीय सत्यापन की संवेदनशीलता के साथ जोड़ता है।
- नैतिक शासन के अनुरूप है।
- हानियाँ:
- अतिरिक्त मानव संसाधन और समय की आवश्यकता होती है।
- प्रारंभिक वितरण की गति थोड़ी धीमी हो सकती है।
विकल्पों का तुलनात्मक मूल्यांकन:
विकल्प
नैतिक स्तर
प्रशासनिक दक्षता
व्यवहार्यता
यथास्थिति
निम्न
उच्च
उच्च
निलंबन
मध्यम
निम्न
निम्न
हाइब्रिड
उच्च
मध्यम-उच्च
उच्च
3. अनुशंसित कार्यवाही
श्री शर्मा को ‘मानव-केंद्रित डिजिटल शासन’ दृष्टिकोण अपनाना चाहिये। उद्देश्य तकनीक का विरोध करना नहीं, बल्कि उसे अधिक परिष्कृत बनाना है।
चरण A: त्वरित समाधान (The ‘Safety Net’)
- ‘शिकायत निवारण केंद्र’ स्थापित करना: ब्लॉक स्तर पर उन लोगों के लिये भौतिक हेल्प डेस्क स्थापित किये जाएँ, जिन्हें सूची से बाहर कर दिया गया है।
- मैनुअल ओवरराइड प्रोटोकॉल: अपने विवेकाधिकार का उपयोग करते हुए ऐसे परिवारों के लिये मैनुअल सत्यापन (ग्राम सभाओं या स्थानीय राजस्व अधिकारियों के माध्यम से) की अनुमति दें, जिनकी डिजिटल उपस्थिति नहीं है, लेकिन वे स्पष्ट रूप से पात्र हैं।
चरण B: डेटा समृद्धि एवं फीडबैक तंत्र
- ग्राउंड-ट्रुथिंग: बाहर किये गए परिवारों के डेटा को एकत्रित कर ‘बहिष्करण के पैटर्न’ की पहचान करें (जैसे—क्या सभी प्रवासी बाहर हो रहे हैं?)।
- एल्गोरिद्म में सुधार: इस ‘ग्राउंड-ट्रुथ’ डेटा को IT विभाग को वापस भेजकर AI के मानकों को समायोजित करें (जैसे—बैंक लेन-देन के अलावा गरीबी के अन्य संकेतकों को शामिल करना)।
चरण C: रणनीतिक संचार
- उच्च स्तर पर जवाबदेही: डेटा-आधारित साक्ष्यों के साथ उच्च अधिकारियों को औपचारिक रिपोर्ट प्रस्तुत करें। यह तर्क दें कि ‘जन विश्वास’ केवल आधुनिकता के दिखावे से नहीं, बल्कि सटीकता से बनता है।
- पारदर्शी संचार: एक सार्वजनिक वक्तव्य जारी किया जाएँ, जिसमें त्रुटियों को स्वीकार करते हुए यह स्पष्ट किया जाएँ कि यह सुनिश्चित करने के लिये कौन-कौन से कदम उठाए जा रहे हैं, ताकि कोई भी पात्र व्यक्ति वंचित न रह जाएँ।
चरण D: समावेशन का संस्थानीकरण
- सामाजिक लेखा परीक्षा: AI द्वारा तैयार सूची का सामुदायिक स्तर पर सत्यापन सुनिश्चित करने के लिये सामाजिक लेखा परीक्षा कराई जाए।
- ‘फिजिटल’ मॉडल: आगे के लिये ऐसी नीति की सिफारिश करें, जिसमें AI प्रारंभिक सूची प्रदान करे, लेकिन अंतिम सूची को स्थानीय निकायों द्वारा अनुमोदित किया जाए।
औचित्य
यह कार्यवाही अंत्योदय सिद्धांत (सबसे अंतिम व्यक्ति के उत्थान) का अनुसरण करती है। यह प्रणाली की कमियों के प्रति ईमानदार रहते हुए प्रशासनिक ईमानदारी को बनाए रखती है और सुनिश्चित करती है कि ‘नवाचार’, ‘अन्याय’ का साधन न बन जाए। प्रणाली को अस्वीकार करने के बजाय उसमें सुधार करके, श्री शर्मा एक सक्रिय परिवर्तनकर्त्ता के रूप में अपनी भूमिका निभाते हैं।
निष्कर्ष:
शासन का अंतिम उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तकनीक मानवता की सेवा करे, न कि इसके विपरीत। श्री शर्मा को ‘हाई-टेक, हाई-टच’ दृष्टिकोण को बढ़ावा देना चाहिये, जहाँ एल्गोरिद्मिक दक्षता को संवेदनशीलता और सामाजिक समानता के साथ संतुलित किया जाए। मज़बूत शिकायत निवारण तंत्र को डेटा परिष्करण के साथ एकीकृत करके, वे एक कठोर स्वचालित प्रक्रिया को अंत्योदय के लिये एक समावेशी साधन में परिवर्तित कर सकते हैं, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि डिजिटल परिवर्तन में कोई भी नागरिक पीछे न रह जाए।
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