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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न: परिणाम-उन्मुख दक्षता पर केंद्रित समकालीन शासन व्यवस्थाओं में, क्या लोक प्रशासन में करुणा और निष्पक्षता जैसे नैतिक मूल्यों के उपेक्षित होने का खतरा है? चर्चा कीजिये। (150 शब्द)

    12 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत शासन में दक्षता और परिणामों से जुड़े हालिया रुझानों को उजागर करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में यह स्पष्ट कीजिये कि इससे करुणा और निष्पक्षता जैसे नैतिक पहलुओं के हाशिये पर जाने का जोखिम कैसे उत्पन्न होता है।
    • अंत में, इन नैतिक मूल्यों को बनाए रखने के लिये आवश्यक उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    न्यू पब्लिक मैनेजमेंट के समकालीन युग में, शासन प्रणालियाँ ‘प्रदर्शन और परिणाम’ की संस्कृति की ओर उन्मुख हो गई हैं, जहाँ मापनीय परिणामों, राजकोषीय अनुशासन और डेटा-आधारित दक्षता पर ज़ोर दिया जाता है।

    • हालाँकि PRAGATI (2026) जैसे प्लेटफॉर्म इस परिवर्तन का प्रतीक हैं और इन्होंने प्रशासनिक जड़ता व लागत वृद्धि को काफी हद तक कम किया है, फिर भी यह एक ‘नैतिक विरोधाभास’ को जन्म देता है।
    • मात्रात्मक परिणामों की निरंतर खोज प्राय: ‘बॉटम-लाइन मानसिकता’ को जन्म देती है, जिसमें करुणा और निष्पक्षता जैसे गुणात्मक, मानव-केंद्रित मूल्यों को आधारभूत लक्ष्य के बजाय बाधा के रूप में देखा जाने लगता है।

    मुख्य भाग:

    करुणा और निष्पक्षता के हाशिये पर जाने का जोखिम

    • सार्वजनिक सेवा का ‘अमानवीकरण’
      • एल्गोरिद्मिक दूरी: स्वचालित कल्याण वितरण और AI-आधारित निर्णय-निर्माण (जैसे ऋण स्वीकृति या लाभ पात्रता) की ओर बढ़ने से प्रक्रिया में मानवीय संवेदनाएँ कम हो जाती हैं।
        • यदि किसी विधवा की पेंशन तकनीकी बायोमेट्रिक त्रुटि के कारण रुक जाती है तो ‘प्रणाली’ इसे केवल एक त्रुटि कोड के रूप में देखती है, जबकि एक संवेदनशील प्रशासक इसे जीवन बदल देने वाले संकट के रूप में समझता।
      • लेन-देन बनाम परिवर्तन: लोक सेवकों का मूल्यांकन अब ‘लेन-देन की मात्रा’ (जैसे कितनी फाइलें निपटाई गईं) के आधार पर किया जाता है, न कि ‘परिवर्तनकारी प्रभाव’ के आधार पर।
        • यह प्रवृत्ति गति को बढ़ावा देती है और कमज़ोर वर्गों की जटिल समस्याओं को समझने हेतु आवश्यक ‘सक्रिय सुनवाई (Active Listening)’ को कम करती है।
      • विवेकाधीन करुणा का ह्रास: कठोर प्रदर्शन मानक प्राय: ‘अपवादों’ को दंडित करते हैं।
        • कोई अधिकारी यदि डिजिटल रूप से अशिक्षित जनजातीय नागरिक की सहायता में अधिक समय लगाता है तो डेटा-आधारित मूल्यांकन में उसे ‘अक्षम’ माना जा सकता है, जिससे करुणा को अप्रत्यक्ष रूप से दंडित किया जाता है।
      • नौकरशाही में ‘नैतिक सुन्नता’: कठोर लक्ष्यों को पूरा करने के निरंतर दबाव से ‘मनोवैज्ञानिक दूरी’ उत्पन्न हो सकती है, जिसमें प्रशासक नागरिकों को ‘मामलों’ या ‘संख्याओं’ के रूप में देखने लगते हैं, जिससे लोक सेवा की मूल भावना कमज़ोर होती है।
    • प्रणालीगत अन्याय (Systemic Unfairness) का जोखिम
      • डेटा-आधारित बहिष्करण: दक्षता-आधारित मॉडल ‘औसत नागरिक’ को प्राथमिकता देते हैं। जिन वंचित समूहों के पास पर्याप्त डेटा नहीं होता (जैसे स्थायी पते या इंटरनेट की कमी वाले लोग), उन्हें प्राय: नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, क्योंकि वे वितरण कार्यक्रमों के ‘दक्षता स्कोर’ को कम कर सकते हैं।
      • ‘आसान लक्ष्यों’ पर ध्यान: उच्च प्रदर्शन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये प्रशासन ‘लो-हैंगिंग फ्रूट’ यानी ऐसे क्षेत्र या सामाजिक समूहों पर ध्यान केंद्रित कर सकता है जिन्हें सेवा देना आसान हो। इससे क्षेत्रीय एवं सामाजिक असमानताएँ और अधिक गहरी हो जाती हैं।
      • प्रक्रियात्मक निष्पक्षता बनाम वास्तविक न्याय: कोई प्रणाली नियमों का पालन करते हुए ‘प्रक्रियात्मक रूप से निष्पक्ष’ हो सकती है, लेकिन यदि वे नियम ऐतिहासिक या संरचनात्मक असमानताओं को ध्यान में नहीं रखते तो वह ‘वास्तविक रूप से अन्यायपूर्ण’ हो सकती है (जैसे असमान समाज में केवल ‘मेरिट’ आधारित कठोर भर्ती प्रणाली)।
      • जवाबदेही का अभाव: जटिल और परिणाम-केंद्रित प्रणालियों में नैतिक चूकों की ज़िम्मेदारी प्रायः स्पष्ट रूप से निर्धारित नहीं हो पाती और विभिन्न स्तरों पर फैल जाती है। जब लक्ष्य-आधारित नीतियों से नुकसान होता है तो किसी विशेष ‘मेट्रिक’ या ‘एल्गोरिद्म’ को जवाबदेह ठहराना कठिन हो जाता है।

    नैतिक विचारों को बनाए रखने के उपाय

    शासन को ‘निर्जीव मशीन’ बनने से रोकने के लिये प्रशासनिक ढाँचों में दक्षता मॉडल के साथ ‘डिज़ाइन के स्तर पर नैतिकता’ को समाहित करना आवश्यक है।

    • ‘ह्यूमन-इन-द-लूप’ (HITL) प्रोटोकॉल अपनाना: ऐसे महत्त्वपूर्ण निर्णय, जो मानव गरिमा (जैसे स्वास्थ्य सेवा, सामाजिक सुरक्षा, न्याय) को प्रभावित करते हैं, उनमें अंतिम स्तर पर मानव समीक्षा अनिवार्य होनी चाहिये, ताकि एल्गोरिद्म से परे मानवीय संवेदनशीलता का प्रयोग किया जा सके।
    • सामाजिक अंकेक्षण और शिकायत निवारण: वित्तीय ऑडिट के साथ सामाजिक अंकेक्षण (समुदाय-आधारित समीक्षा) को शामिल करने से यह सुनिश्चित होता है कि ‘परिणाम’ केवल व्यय के आँकड़ों से नहीं, बल्कि मानव संतुष्टि और निष्पक्षता के आधार पर भी मापे जाएँ।
    • ‘नैतिक प्रदर्शन’ को प्रोत्साहन: नागरिक सेवा मूल्यांकन प्रणाली (जैसे मिशन कर्मयोगी) में ‘सहानुभूति स्कोर’ और ‘समावेशन सूचकांक’ को प्रमुख प्रदर्शन संकेतक (KPI) के रूप में शामिल किया जाए, ताकि पदोन्नति और मान्यता में इनका महत्त्व बढ़े।
    • करुणा-केंद्रित प्रशिक्षण: लोक सेवकों के लिये भावनात्मक बुद्धिमत्ता और ‘गरीबी अनुभव’ जैसे प्रशिक्षण अनिवार्य किये जाएँ, जिससे वे ‘अंत्योदय’ (समाज के अंतिम व्यक्ति) की वास्तविक परिस्थितियों से जुड़े रहें।
    • टेक्नो-एथिक्स और बायस ऑडिट: स्वतंत्र नैतिकता बोर्ड स्थापित किये जाएँ, जो प्रशासनिक AI का नियमित बायस ऑडिट करें, ताकि दक्षता-आधारित एल्गोरिद्म अल्पसंख्यकों के विरुद्ध संरचनात्मक भेदभाव को बढ़ावा न दें।

    निष्कर्ष:

    आधुनिक शासन को यह समझना होगा कि करुणा के बिना दक्षता अत्याचार बन जाती है और दक्षता के बिना करुणा केवल भावुकता रह जाती है। यद्यपि वैधता के लिये परिणाम आवश्यक हैं, लेकिन निष्पक्षता और करुणा वह ‘नैतिक आधार’ हैं जो सामाजिक अनुबंध को बनाए रखते हैं।

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