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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. “लोकतांत्रिक संस्थाओं में लोक विश्वास बनाए रखने के लिये शासन में शुचिता अनिवार्य है।” उन संस्थागत तंत्रों का विश्लेषण कीजिये जो शुचिता को बढ़ावा दे सकते हैं। (150 शब्द)

    05 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत शासन में शुचिता की परिभाषा देते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में, लोक विश्वास बनाए रखने में शुचिता की भूमिका को स्पष्ट कीजिये।
    • इसके बाद, यह बताइये कि संस्थागत तंत्र किस प्रकार शुचिता को बढ़ावा देते हैं।
    • संस्थागत तंत्र की सीमाओं का उल्लेख कीजिये।
    • अंत में, इन सीमाओं के समाधान हेतु उपाय सुझाइये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    शासन में शुचिता का अर्थ है सार्वजनिक कर्त्तव्यों के निर्वहन में ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और नैतिकता जैसे उच्च मानकों का दृढ़तापूर्वक पालन करना। यह केवल भ्रष्टाचार की अनुपस्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रक्रियागत शुचिता के प्रति सकारात्मक प्रतिबद्धता और व्यक्तिगत लाभ से ऊपर जनहित को प्राथमिकता देने का प्रतीक है।

    मुख्य भाग:

    लोक विश्वास बनाए रखने में शुचिता की भूमिका

    लोक विश्वास वह ‘सामाजिक पूंजी’ है जो लोकतंत्र को प्रभावी ढंग से संचालित करने में सक्षम बनाती है और शुचिता इस पूंजी को उत्पन्न करने वाला प्रमुख आधार है।

    • राज्य की कार्यवाही की वैधता: जब नागरिक यह अनुभव करते हैं कि अधिकारी ईमानदारी और निष्पक्षता से कार्य कर रहे हैं तो वे कानूनों का पालन करने तथा कर भुगतान करने के प्रति अधिक तत्पर होते हैं। इस प्रकार, राज्य की शक्ति उन्हें दबावपूर्ण नहीं बल्कि नैतिक रूप से उचित प्रतीत होती है।
    • सामाजिक एकता और समावेशिता: शुचिता यह सुनिश्चित करती है कि संसाधनों का वितरण पक्षपात या भाई-भतीजावाद के बजाय योग्यता और आवश्यकता के आधार पर हो, जिससे वंचित वर्गों का अलगाव नहीं होता तथा सामाजिक समरसता बनी रहती है।
    • सेवा प्रदाय में दक्षता: नैतिक शासन रिश्वतखोरी से उत्पन्न ‘लेन-देन लागत’ को कम करता है। उदाहरण के लिये, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) की सफलता ने बिचौलियों की भूमिका समाप्त कर कल्याणकारी योजनाओं में जनता का विश्वास पुनः स्थापित किया है।

    शुचिता को बढ़ावा देने हेतु संस्थागत तंत्र

    • लोकपाल एवं लोकायुक्त (ओम्बड्समैन संस्थाएँ): ये स्वतंत्र संस्थाएँ प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों सहित उच्च पदस्थ लोक सेवकों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच करने के लिये सशक्त होती हैं, जिससे उच्च स्तर पर एक प्रभावी निवारक स्थापित होता है।
    • निगरानी एवं लेखा-परीक्षा संस्थाएँ (CAG और CVC): नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) सार्वजनिक व्यय का कठोर ऑडिट करके वित्तीय शुचिता सुनिश्चित करता है, जबकि केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) प्रशासनिक प्रक्रियाओं की ईमानदारी की निगरानी करता है।
    • पारदर्शिता के उपकरण (RTI और डिजिटल पोर्टल): सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिकों को ‘सामाजिक लेखा परीक्षक’ के रूप में सशक्त बनाता है, जिससे शासन में पारदर्शिता बढ़ती है।
    • तकनीकी-कानूनी ढाँचे (DPI और GeM): डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI), जैसे आधार-आधारित भुगतान प्रणालियाँ तथा गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) खरीद और वितरण प्रक्रियाओं का डिजिटलीकरण कर मानवीय विवेकाधिकार (जो भ्रष्टाचार का प्रमुख स्रोत है) को कम करते हैं।
    • वैधानिक संरक्षण (व्हिसलब्लोअर अधिनियम): व्हिसलब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम, 2014 ईमानदार कर्मचारियों और नागरिकों को बिना प्रतिशोध के भय के गलत कार्यों की सूचना देने के लिये  कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है, जिससे संस्थाओं की ‘आंतरिक नैतिक चेतना’ सुरक्षित रहती है।

    संस्थागत तंत्र की सीमाएँ

    • प्रक्रियात्मक देरी और कानूनी कमियाँ: ‘पूर्व स्वीकृति की ढाल’ (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17A) प्राय: वरिष्ठ नौकरशाहों के विरुद्ध जाँच में देरी करती है, जिससे साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ या राजनीतिक दबाव की संभावना बढ़ जाती है।
    • रिक्तियाँ और संसाधनों की कमी: राज्य लोकायुक्तों और सूचना आयोगों सहित कई निगरानी संस्थाएँ लगातार रिक्त पदों तथा स्वतंत्र जाँच कर्मियों की कमी से जूझती हैं, जिससे वे ‘निष्प्रभावी निकाय’ बन जाते हैं।
    • नियुक्तियों का राजनीतिकरण: ईमानदारी से संबंधित संस्थाओं के प्रमुखों की नियुक्ति प्रक्रिया में अक्सर द्विदलीय सहमति का अभाव होता है, जिससे ‘कार्यपालिका पक्षपात’ की धारणा बनती है और संस्थाओं की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं।
    • स्थानीय स्तर के कार्यकर्त्ताओं की सुरक्षा का अभाव: यद्यपि व्हिसलब्लोअर अधिनियम कागज़ पर मौजूद है, फिर भी RTI  कार्यकर्त्ताओं को अक्सर शारीरिक खतरे और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, जिससे आम नागरिक स्थानीय भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज़ उठाने से हिचकते हैं।
    • सांस्कृतिक प्रतिरोध और ‘सामान्यीकरण’: प्रशासन के विभिन्न स्तरों पर लघु स्तर का भ्रष्टाचार अक्सर कार्यों को शीघ्र करवाने के साधन के रूप में देखा जाता है। संस्थागत नियमों के बावजूद, संगठनों में रची-बसी 'उपहार' और 'सुविधा शुल्क' जैसी कार्यसंस्कृति को जड़ से मिटाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

    चुनौतियों का समाधान और शुचिता को सुदृढ़ करने के उपाय

    • कार्यात्मक स्वायत्तता को मजबूत करना: CBI और केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) जैसी संस्थाओं में नियुक्तियाँ व्यापक-आधारित समिति (जिसमें विपक्ष शामिल हो) के माध्यम से की जानी चाहिये, ताकि अंतर-दलीय विश्वास और कार्यात्मक स्वतंत्रता सुनिश्चित हो सके।
    • ‘प्रोबिटी इन्फॉर्मेटिक्स’ को अपनाना: AI और बिग डेटा एनालिटिक्स का उपयोग करके वास्तविक समय में ‘रेड-लाइन’ लेन-देन की पहचान करना, जिससे पश्चात्ताप ऑडिट के बजाय पूर्व-सावधानीपूर्ण निगरानी संभव हो।
    • अनिवार्य नैतिकता ऑडिट: जैसे वित्तीय ऑडिट अनिवार्य हैं, वैसे ही सरकारी विभागों को वार्षिक ‘नैतिकता और ईमानदारी ऑडिट’ से गुजरना चाहिये, जिसे तृतीय-पक्ष विशेषज्ञों द्वारा उनके संस्थागत स्वास्थ्य का मूल्यांकन करने के लिये आयोजित किया जाएँ।
    • सूचना माँगने वालों की सुरक्षा: RTI कार्यकर्त्ताओं की सुरक्षा को स्थानीय सुरक्षा कोशिकाओं के माध्यम से सुदृढ़ किया जाए और व्हिसलब्लोअर पर हमले करने वालों के खिलाफ त्वरित अभियोजन सुनिश्चित किया जाए।
    • मूल्य-आधारित नेतृत्व को बढ़ावा देना: नैतिकता को केवल एक ‘प्रशिक्षण मॉड्यूल’ (जैसे मिशन कर्मयोगी) के रूप में नहीं बल्कि लोक सेवकों के प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट (PAR) में एक मुख्य मानदंड के रूप में शामिल किया जाए, ताकि ईमानदारी को प्रोत्साहन मिले।

    निष्कर्ष:

    शासन में शुचिता लोकतांत्रिक वैधता का आधार है। संस्थागत तंत्र, कानूनी ढाँचे, स्वतंत्र निगरानी संस्थाएँ, पारदर्शी प्रक्रियाएँ तथा नैतिक नेतृत्व को सुदृढ़ करके यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि सार्वजनिक संस्थाएँ ईमानदारी के साथ कार्य करें और नागरिकों का विश्वास बनाए रखें।

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