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प्रश्न :
प्रश्न: “भू-राजनीतिक संकटों के दौरान भारत की बहु-संरेखण नीति की वास्तविक परीक्षा होती है।” हालिया पश्चिम एशियाई संघर्ष के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)
10 Mar, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 अंतर्राष्ट्रीय संबंधउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत भारत के बहुपक्षवाद का संक्षिप्त परिचय देकर कीजिये।
- मुख्य भाग में चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भारत के बहु-संरेखण के प्रमुख स्तंभों का विश्लेषण कीजिये।
- इस संकट में बहु-संरेखण के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये।
- अंत में बहु-संरेखण को सुदृढ़ करने के उपाय प्रस्तुत कीजिये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
बहु-संरेखण ‘गुटनिरपेक्षता’ (गुटों से दूरी) से आगे बढ़कर विभिन्न वैश्विक ध्रुवों (जैसे अमेरिका, रूस, इज़राइल, ईरान, अरब विश्व) के साथ मुद्दा-आधारित सामंजस्य के आधार पर सक्रिय सहभागिता की ओर परिवर्तन है। पश्चिम एशिया में भारत ने ‘प्रो-अरब’ झुकाव से आगे बढ़कर ‘लिंक वेस्ट’ नीति अपनाई है, जिसमें ‘तीन स्तंभों’— इज़राइल, खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) और ईरान के बीच संतुलन बनाए रखा जाता है।
मुख्य भाग:
भारत के बहु-संरेखण के स्तंभों की चुनौतीपूर्ण परीक्षा
वर्तमान संघर्ष ने उन तीन स्तंभों के बीच भारत द्वारा बनाए गए नाज़ुक संतुलन को चुनौती दी है:
- इज़राइल–फिलिस्तीन दुविधा (अलगाववादी दृष्टिकोण बनाम वैश्विक दक्षिण नेतृत्व)
- परीक्षा: भारत ने ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीनी मुद्दे का समर्थन किया है, लेकिन साथ ही इज़राइल के साथ ‘गहरा रणनीतिक साझेदारी’ भी रखता है।
- प्रतिक्रिया: भारत ने प्रारंभ में हमलों की निंदा ‘आतंकवाद’ के रूप में की (जो इज़राइल के साथ सामंजस्य दर्शाता है), लेकिन बाद में दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन को दोहराया और गाज़ा को मानवीय सहायता भेजी (जो उसके वैश्विक दक्षिण की पहचान के अनुरूप है)।
- चुनौती: गाज़ा में नागरिक हताहतों की संख्या बढ़ने के साथ इस ‘अलगाववादी दृष्टिकोण’ को बनाए रखना कठिन हो जाता है, जिससे अरब साझेदारों और वैश्विक दक्षिण के बीच जाँच तथा दबाव बढ़ता है।
- ईरान–इज़राइल संघर्ष (ऊर्जा और संपर्कता का आयाम)
- परीक्षा: वर्ष 2026 की शुरुआत में अमेरिका-इज़राइल और ईरान के बीच प्रत्यक्ष हमलों ने क्षेत्रीय संघर्ष के भड़कने का खतरा उत्पन्न किया।
- रणनीतिक हित: इज़राइल से भारत को हथियार निर्यात में वृद्धि हो रही है, जबकि ईरान चाबहार बंदरगाह के माध्यम से मध्य एशिया तक पहुँच का प्रवेश द्वार है।
- प्रतिक्रिया: भारत ने ‘तटस्थ मध्यस्थ’ की भूमिका बनाए रखी और किसी आक्रामक पक्ष का नाम लिये बिना तनाव कम करने की अपील की।
इस संकट में बहु-संरेखण के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
चुनौती
भारत पर प्रभाव
ऊर्जा सुरक्षा
भारत की LPG का 80% से अधिक और कच्चे तेल का एक बड़ा हिस्सा होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। तनाव बढ़ने से महॅंगाई में तीव्र वृद्धि का खतरा है।
समुद्री सुरक्षा
लाल सागर में हूती हमलों के कारण भारतीय नौसेना को ‘ऑपरेशन संकल्प’ शुरू करना पड़ा, जो एक एकपक्षीय मिशन था।
कूटनीतिक विश्वसनीयता
आलोचकों का मानना है कि इज़राइल के प्रति भारत का ‘अत्यधिक झुकाव’ ईरान और कुवैत या कतर जैसे पारंपरिक अरब सहयोगियों के साथ उसकी विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है।
बहु-संरेखण को सुदृढ़ करने के उपाय
- रणनीतिक एवं कूटनीतिक उपाय
- सक्रिय मध्यस्थता ( ‘विश्व मित्र’ की भूमिका ): ‘तटस्थता’ से आगे बढ़कर ‘सक्रिय मध्यस्थता’ की ओर संक्रमण करना चाहिये।
- भारत को BRICS जैसे समूहों में अपनी अध्यक्षता का उपयोग करते हुए संघर्ष समाधान के लिये ‘कोर समूह’ बनाने चाहिये, विशेषकर पश्चिम एशिया में मानवीय गलियारों पर ध्यान केंद्रित करते हुए।
- लघु-बहुपक्षीय सहयोग को सुदृढ़ करना: I2U2 (भारत, इज़राइल, UAE, USA) जैसे ढाँचों का विस्तार कर सऊदी अरब या मिस्र जैसे अन्य क्षेत्रीय देशों को शामिल किया जाना चाहिये।
- इससे इज़राइल और ईरान के बीच ‘द्विआधारी विकल्प’ की स्थिति कमज़ोर होगी और उन्हें एक व्यापक आर्थिक ढाँचे में समाहित किया जा सकेगा।
- रक्षा क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन (Strategic Hedging): ‘रक्षा–सुरक्षा विरोधाभास’ को कम करने के लिये आत्मनिर्भर भारत पर बल देना चाहिये।
- आयात में विविधता (जैसे फ्राँस के राफेल, अमेरिका के GE इंजन) और स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देकर भारत रूस या इज़राइल जैसे देशों के प्रभाव को अपनी सीमा सुरक्षा पर कम कर सकता है।
- सक्रिय मध्यस्थता ( ‘विश्व मित्र’ की भूमिका ): ‘तटस्थता’ से आगे बढ़कर ‘सक्रिय मध्यस्थता’ की ओर संक्रमण करना चाहिये।
- आर्थिक एवं संपर्कता संबंधी उपाय
- वैकल्पिक गलियारों का क्रियान्वयन: हालाँकि इज़राइल–हमास संघर्ष के कारण IMEC में देरी हो रही है, भारत को ईरान के माध्यम से INSTC (अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा) को तेज़ी से लागू करना चाहिये।
- इससे रूस और मध्य एशिया के साथ संपर्क पश्चिम-समर्थित मार्गों में व्यवधान के बावजूद सुरक्षित बना रहेगा।
- रुपया-आधारित व्यापार निपटान: ‘वित्त के हथियारीकरण’ (प्रतिबंधों) से बचने के लिये भारत को रूस से आगे बढ़कर विशेष रूप से GCC देशों के साथ वोस्त्रो खाता तंत्र का विस्तार करना चाहिये, ताकि ऊर्जा आयात को मुद्रा अस्थिरता से सुरक्षित रखा जा सके।
- ऊर्जा विविधीकरण: होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिये भारत को सुदूर पूर्व (रूस) में ऊर्जा निवेश बढ़ाना चाहिये तथा अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के साथ हरित हाइड्रोजन साझेदारी का अन्वेषण करना चाहिये, जिससे ‘होर्मुज़ चोकपॉइंट’ के जोखिम को कम किया जा सके।
- वैकल्पिक गलियारों का क्रियान्वयन: हालाँकि इज़राइल–हमास संघर्ष के कारण IMEC में देरी हो रही है, भारत को ईरान के माध्यम से INSTC (अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा) को तेज़ी से लागू करना चाहिये।
निष्कर्ष
भारत की बहु-संरेखण की नीति एक रक्षात्मक दृष्टिकोण से विकसित होकर एक सक्रिय और व्यावहारिक रणनीति बन गई है। यद्यपि पश्चिम एशिया के संकट ने IMEC जैसे परियोजनाओं की गति को धीमा कर दिया है और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना कठिन बना दिया है, फिर भी भारत अब तक ‘द्विआधारी विकल्पों’ से सफलतापूर्वक बचा है। हालाँकि, इस नीति की स्थिरता इस तर्क पर निर्भर करती है कि भारत स्वयं को ‘संतुलनकारी शक्ति’ से आगे बढ़ाकर ‘स्थिरीकरणकारी शक्ति’ में रूपांतरित कर सके, जो अपने प्रभाव का उपयोग क्षेत्रीय शांति के मार्गों को बढ़ावा देने के लिये करे।
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