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प्रश्न :
प्रश्न. "साहस के बिना सत्यनिष्ठा एक निष्क्रिय गुण बनकर रह जाती है और सत्यनिष्ठा के बिना साहस एक खतरनाक महत्त्वाकांक्षा बन जाता है।" लोक प्रशासन के संदर्भ में चर्चा कीजिये। (150 शब्द)
19 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्नउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- सत्यनिष्ठा और साहस का संक्षिप्त परिचय देते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये।
- “साहस के बिना सत्यनिष्ठा निष्क्रिय गुण बनकर रह जाती है”- इसके पक्ष में प्रशासनिक संदर्भों के साथ तर्क प्रस्तुत कीजिये।
- “सत्यनिष्ठा के बिना साहस खतरनाक महत्त्वाकांक्षा बन जाता है”- ऐसी परिस्थितियों को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिये।
- दोनों के समन्वय के रूप में ‘नैतिक साहस’ की आवश्यकता को रेखांकित कीजिये।
- उपयुक्त एवं संतुलित निष्कर्ष लिखिये।
परिचय:
सत्यनिष्ठा वह आंतरिक नैतिक दिशा-सूचक है जो व्यक्ति को सख्त नैतिक आचार-संहिता (प्रोबिटी) के प्रति अटूट रूप से प्रतिबद्ध रखती है। साहस उस दिशा-सूचक की बाह्य अभिव्यक्ति है- भय, खतरे या अत्यधिक दबाव के बावजूद दृढ़ बने रहने और सही कार्य करने की मानसिक शक्ति।
- जैसा कि अरस्तु ने कहा है, “साहस मानवीय गुणों में प्रथम है, क्योंकि वही अन्य सभी गुणों की रक्षा करता है।”
- लोक सेवा के उच्च-दॉंव वाले वातावरण में ये दोनों गुण मूलतः परस्पर निर्भर होते हैं; एक को दूसरे से अलग कर देने पर या तो प्रशासनिक जड़ता उत्पन्न होती है या संस्थागत पतन होता है।
मुख्य भाग:
“साहस के बिना सत्यनिष्ठा एक निष्क्रिय गुण बनकर रह जाती है।”
जब किसी प्रशासक के पास व्यक्तिगत ईमानदारी तो होती है, किंतु व्यवस्थागत गलतियों के विरुद्ध खड़े होने का नैतिक साहस नहीं होता, तब उसकी सत्यनिष्ठा एक व्यक्तिगत और निष्प्रभावी गुण बनकर रह जाती है। यह लोक-कल्याण को अधिकतम करने की उपयोगितावादी कसौटी पर विफल हो जाती है और ‘कर्त्तव्य न निभाने के पाप (Sin of Omission)’ को जन्म देती है।
- मूकदर्शक नौकरशाह (Bystander Bureaucrat): वह ईमानदार अधिकारी जो स्वयं रिश्वत नहीं लेता, परंतु अपने वरिष्ठ या सहकर्मियों की भ्रष्ट गतिविधियों की ओर जानबूझकर आँखें मूँद लेता है।
- दंडात्मक स्थानांतरण, उत्पीड़न या प्रतिकूल गोपनीय आख्या के भय से मूकदर्शक बने रहने पर उसका सद्गुण केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित रह जाता है और संस्था के लिये व्यावहारिक रूप से निष्प्रयोज्य हो जाता है।
- यथास्थितिवाद और नीतिगत जड़ता: प्रशासनिक साहस में लोक-कल्याण के लिये सोच-समझकर जोखिम उठाने की क्षमता शामिल होती है।
- ईमानदार, किंतु संकोची नौकरशाह प्रायः ‘3 Cs’ (CBI, CVC, CAG) या मीडिया ट्रायल के भय से ग्रस्त रहते हैं।
- वे नवोन्मेषी निर्णय लेने से बचते हैं, दायित्व को दूसरों पर टालना पसंद करते हैं और लालफीताशाही के पीछे छिप जाते हैं, जिससे विकासात्मक परियोजनाएँ ठप पड़ जाती हैं।
- ईमानदार, किंतु संकोची नौकरशाह प्रायः ‘3 Cs’ (CBI, CVC, CAG) या मीडिया ट्रायल के भय से ग्रस्त रहते हैं।
- अवैध दबाव के आगे झुकना: अंतरात्मा के संकट की स्थिति में साहस के अभाव वाला ईमानदार लोक सेवक राजनीतिक दबाव के आगे झुक सकता है।
- वे किसी अनियमित निविदा या अवैध स्थानांतरण आदेश पर केवल ‘आदेशों का पालन (Following Orders)’ या पदानुक्रम का अनुसरण करने का तर्क देकर हस्ताक्षर कर सकते हैं और इस प्रकार कुप्रशासन का उपकरण बन जाते हैं।
“सत्यनिष्ठा के बिना साहस खतरनाक महत्त्वाकांक्षा बन जाता है।”
- ‘सिंघम’ मानसिकता और न्यायेतर कार्रवाइयाँ: ईमानदारी के बिना साहस प्रायः प्रशासकों को व्यक्तिगत यश या त्वरित परिणामों के लिये संवैधानिक विधि-शासन को दरकिनार करने की ओर प्रेरित करता है।
- स्थानीय लोकप्रियता प्राप्त करने के लिये पुलिस अधिकारियों द्वारा न्यायेतर मुठभेड़ों का सहारा लेना ऐसी खतरनाक महत्त्वाकांक्षा का उदाहरण है, जो न्याय-व्यवस्था की मूल संरचना को नष्ट कर देता है।
- क्रोनी पूंजीवाद और प्रक्रिया का विघटन: अत्यधिक आत्मविश्वासी, निर्णायक और महत्त्वाकांक्षी नौकरशाह साहसपूर्वक बड़े सार्वजनिक ठेकों में हेरफेर कर सकता है, पर्यावरणीय स्वीकृतियों को मोड़ सकता है या भू-उपयोग के स्वरूप में परिवर्तन कर सकता है।
- वे इन कार्यों को ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ या ‘विकास को तीव्र गति देने’ के नाम पर छिपाते हैं, किंतु वास्तविक उद्देश्य सेवानिवृत्ति के बाद लाभकारी पदों या कमीशन के लिये निगमित गठजोड़ को लाभ पहुँचाना होता है।
- सत्तावाद और बौद्धिक अहंकार: सत्यनिष्ठा की विनम्रता के बिना साहस तानाशाही प्रवृत्तियों को जन्म देता है।
- ऐसे प्रशासक वैध असहमति को कुचल सकते हैं, झूठी प्रगति दिखाने के लिये आधिकारिक आँकड़ों में हेरफेर कर सकते हैं या अवास्तविक लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु अधीनस्थों को धमका सकते हैं (जैसे 1970 के दशक के आपातकाल के दौरान ज़बरन नसबंदी)।
संश्लेषण: ‘नैतिक साहस’ की अनिवार्यता
प्रभावी लोक सेवा के लिये इन दोनों मूल्यों का पूर्ण समन्वय आवश्यक है, जिसे प्रायः ‘नैतिक साहस’ या ‘दृढ़ विश्वास का साहस (Courage of Conviction)’ कहा जाता है।
- यह सही कार्य-पथ की पहचान करने की बौद्धिक ईमानदारी तथा उसे व्यक्तिगत, व्यावसायिक या राजनीतिक लागत की परवाह किये बिना क्रियान्वित करने की भावनात्मक बुद्धिमत्ता और धैर्य का समन्वय है।
- संश्लेषण के उदाहरण: सत्येंद्र दुबे जैसे व्हिसलब्लोअर (जिन्होंने अपने जीवन की कीमत पर NHAI में भ्रष्टाचार का प्रकटीकरण किया) तथा टी. एन. शेषन जैसे प्रशासक (जिन्होंने पूर्ण सत्यनिष्ठा के साथ आदर्श आचार संहिता को साहसपूर्वक लागू किया) इस आदर्श के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि वास्तविक लोक सेवा सक्रिय और साहसपूर्ण सद्गुण की मांग करती है।
निष्कर्ष:
एक लोक सेवक न तो मात्र निष्क्रिय, ईमानदार दर्शक बनकर रह सकता है और न ही निर्दयी, अति-महत्त्वाकांक्षी उपलब्धि-केंद्रित अधिकारी बन सकता है। संवैधानिक नैतिकता का वास्तविक संरक्षक बनने के लिये सत्यनिष्ठा रूपी नैतिक दिशा-सूचक को साहस रूपी प्रेरक शक्ति द्वारा निरंतर गतिशील बनाना आवश्यक है।
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