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प्रश्न :
प्रश्न. भारत में ब्रिटिश आर्थिक पुनर्संरचना ने किस हद तक स्वदेशी उद्योगों को नष्ट किया और वैश्विक पूंजीवादी हितों की सेवा हेतु अर्थव्यवस्था को पुनः आकार दिया? विवेचना कीजिये। (150 शब्द)
16 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 इतिहासउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत उन ब्रिटिश आर्थिक नीतियों को रेखांकित करते हुए कीजिये, जिन्होंने स्वदेशी उद्योगों को प्रभावित किया।
- मुख्य भाग में स्पष्ट कीजिये कि इन नीतियों ने किस प्रकार स्वदेशी उद्योगों को नष्ट किया।
- इसके बाद बताऍं कि किस प्रकार अर्थव्यवस्था को वैश्विक पूंजीवादी हितों की सेवा हेतु पुनर्गठित किया गया।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत विश्व का एक प्रमुख विनिर्माण केंद्र था, जो वैश्विक उत्पादन में लगभग एक-चौथाई योगदान देता था।
ब्रिटिश आर्थिक पुनर्संरचना वस्तुतः एक सुनियोजित और चरणबद्ध प्रक्रिया थी, जिसमें वाणिज्यवाद से आगे बढ़ते हुए मुक्त व्यापार आधारित पूँजीवाद तथा वित्तीय साम्राज्यवाद की दिशा में परिवर्तन किया गया। इसका उद्देश्य स्वदेशी उद्योगों और ग्राम्य अर्थव्यवस्थाओं को विघटित करना तथा भारत को ब्रिटेन के औद्योगिक एवं पूंजीवादी विस्तार हेतु एक परिधीय आपूर्तिकर्त्ता में परिवर्तित करना था।
मुख्य भाग:
स्वदेशी उद्योगों का विनाश:
भारतीय पारंपरिक उद्योगों का पतन, जिसे प्रायः ‘विऔद्योगीकरण (Deindustrialization)’ कहा जाता है, कई सुनियोजित और दमनकारी आर्थिक तंत्रों के माध्यम से किया गया:
- ‘एकतरफा मुक्त व्यापार’ और भेदभावपूर्ण शुल्क: वर्ष 1813 के चार्टर अधिनियम के उपरांत चाय और चीन के साथ होने वाले व्यापार को छोड़कर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापारिक एकाधिकार समाप्त कर दिया गया, जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटेन में मशीनों से बने सस्ते माल की बाढ़ भारतीय बाज़ारों में आ गई।
- इसके साथ ही यूरोप में प्रवेश करने वाले भारतीय वस्त्रों पर अत्यधिक ऊँचे शुल्क लगाए गए, जिससे उनकी वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मक क्षमता पूरी तरह नष्ट हो गई।
- अवसंरचना का औपनिवेशिक हथियारीकरण: रेलवे और तार (टेलीग्राफ) की शुरुआत का उद्देश्य भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण नहीं था, बल्कि उसके विस्तृत अंतर्देशीय क्षेत्रों में गहरी पैठ बनाना था।
- रेलमार्गों ने ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं को दूर-दराज़ के गाँवों तक तेज़ी से पहुँचाया, जबकि कच्चे माल को कुशलतापूर्वक बंदरगाहों तक ले जाकर निर्यात किया गया।
- घरेलू बाज़ार का क्षरण: देशी रियासतों के क्रमिक विलय और स्वदेशी दरबारों के पतन से भारतीय हस्तशिल्प, वस्त्र एवं धातुकर्म को मिलने वाला पारंपरिक शाही संरक्षण समाप्त हो गया।
- इसके अलावा, औपनिवेशिक प्रभाव में शिक्षित भारतीय मध्यवर्ग ने अपनी उपभोक्ता प्राथमिकताओं को देशी वस्तुओं से हटाकर यूरोपीय उत्पादों की ओर स्थानांतरित कर लिया।
- ग्रामीणकरण और कौशल-क्षरण: जैसे-जैसे स्वदेशी उद्योग नष्ट हुए, लाखों कारीगर और बुनकर अपनी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही शिल्प परंपराएँ छोड़ने को मज़बूर हुए तथा जीविका के लिये गाँवों की ओर लौटकर निर्वाह-आधारित कृषि अपनाने लगे।
- इससे तीव्र ‘ग्रामीणकरण’ हुआ, जिसने कृषि और हस्तशिल्प के पारंपरिक संतुलन को तोड़ दिया तथा कृषि भूमि पर असहनीय दबाव डाल दिया।
वैश्विक पूंजीवादी हितों की सेवा हेतु अर्थव्यवस्था का पुनर्गठन:
- पूंजीवादी अति-उत्पादन के लिये एक बंदी बाज़ार: औद्योगिक क्रांति के विस्तार के साथ ब्रिटिश कारखानों को अपने अधिशेष माल की खपत के लिये एक विशाल और सुनिश्चित (बंदी) बाज़ार की आवश्यकता थी।
- भारत ब्रिटिश वस्त्र, लोहा और इस्पात के लिये अंतिम ‘डंपिंग ग्राउंड’ बन गया, जिससे पूंजीवाद के अति-उत्पादन संकट का समाधान हुआ तथा ब्रिटिश निर्माताओं को निरंतर मुनाफा सुनिश्चित हुआ।
- औद्योगिक कच्चे माल का आपूर्तिकर्त्ता: भारतीय कृषि क्षेत्र का जबरन व्यवसायीकरण यूरोपीय औद्योगिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये किया गया।
- नील की कृषि में तिनकठिया (Tinkathia) प्रथा जैसी दमनकारी व्यवस्थाओं के माध्यम से भारतीय किसानों को खाद्यान्नों के स्थान पर कपास, जूट, चाय और अफीम जैसी नकदी फसलों की कृषि के लिये मज़बूर किया गया।
- इससे ब्रिटिश कारखानों और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को लाभ मिला, जबकि भारत में लगातार खाद्य संकट तथा विनाशकारी अकाल उत्पन्न हुए।
- ‘धन-निकासी’ (Drain of Wealth) और पूंजी संचय: जैसा कि दादाभाई नौरोजी ने प्रख्यात रूप से प्रतिपादित किया था, भारत में उत्पन्न अधिशेष को यहाँ पुनर्निवेशित नहीं किया गया, बल्कि उसे ब्रिटेन भेजकर वहाँ की औद्योगिक क्रांति को वित्तीय सहायता प्रदान की गई।
- भारतीय कर-राजस्व का उपयोग ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में उत्पादित वस्तुओं को खरीदकर उन्हें ब्रिटेन निर्यात करने में किया जाता था। इसका अर्थ यह था कि ब्रिटेन को भारतीय वस्तुएँ लगभग निशुल्क प्राप्त होती थीं — इसे ही ‘अप्रतिदत्त निर्यात’ कहा गया।
- हाल की आर्थिक इतिहासलेखन, विशेषकर अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक के शोध के अनुसार, यह औपनिवेशिक धन-निकासी आज के मूल्यों में लगभग 45 ट्रिलियन डॉलर के बराबर आँकी गई है।
- यह विशाल धन-हस्तांतरण ब्रिटेन के वैश्विक पूंजीवादी विस्तार तथा उत्तरी अमेरिका और यूरोप में उसके निवेशों के वित्तपोषण का प्रमुख आधार बना।
- वित्तीय साम्राज्यवाद और एकाधिकार नियंत्रण: औपनिवेशिक शासन के उत्तरार्द्ध (1860 के बाद) में ब्रिटेन की अधिशेष पूंजी का भारी निवेश भारत में रेलमार्गों, बागानों और बैंकिंग क्षेत्र में किया गया।
- इन निवेशों पर सरकार द्वारा उच्च प्रतिफल की गारंटी दी जाती थी, जिसका भुगतान सीधे भारतीय करों से किया जाता था। इस प्रकार वैश्विक वित्तीय पूंजीवाद के मुनाफे निर्धन भारतीय करदाताओं की कीमत पर सुनिश्चित किये गए।
निष्कर्ष
ब्रिटिश आर्थिक पुनर्गठन ने बड़े पैमाने पर भारत को वैश्विक पूंजीवादी केंद्र के लिये केवल कच्चे माल का आपूर्तिकर्त्ता बना दिया। इसके विपरीत, आज की अर्थव्यवस्था पुनः-औद्योगीकरण (Re-industrialization) की रणनीति पर अग्रसर है। मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया जैसी पहलों के माध्यम से भारत ऐतिहासिक ‘धन-निकासी’ की प्रवृत्ति को पलटने का प्रयास कर रहा है तथा एक निष्क्रिय उपभोक्ता बाज़ार से आगे बढ़कर वैश्विक मूल्य शृंखला का नेतृत्वकर्त्ता बनने की दिशा में अग्रसर है, ताकि 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था में समानता और संप्रभुता के आधार पर समावेशन सुनिश्चित किया जा सके।
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