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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    सुश्री रिया मल्होत्रा एक उप मंडल अधिकारी (SDM) के रूप में एक पिछड़े, सूखा-प्रवण विकासखंड में कार्यरत हैं, जहाँ जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), पेंशन तथा MGNREGA जैसी सरकारी कल्याणकारी योजनाओं पर निर्भर है।

    एक नियमित निरीक्षण के दौरान, सुश्री मल्होत्रा को स्थानीय PDS प्रणाली में गंभीर अनियमितताओं का पता चलता है। कई उचित मूल्य दुकान संचालक निम्न-स्तरीय राजस्व और आपूर्ति अधिकारियों की कथित मिलीभगत से सब्सिडी वाले खाद्यान्न को खुले बाज़ार में बेच रहे हैं। डिजिटल अभिलेखों में अनुपालन दर्शाया गया है, लेकिन स्थल सत्यापन और लाभार्थियों के बयान वास्तविक पात्र परिवारों के व्यापक बहिष्करण की ओर संकेत करते हैं।

    यदि तुरंत कड़ी कार्रवाई की जाती है, जैसे कि डीलरों और अधिकारियों का निलंबन, तो अल्पावधि में हज़ारों कमज़ोर परिवारों की खाद्यान्न आपूर्ति बाधित होने का जोखिम है। इसके अतिरिक्त, कुछ आरोपी अधिकारी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली माने जाते हैं और सुश्री मल्होत्रा को अनौपचारिक संदेश मिलते हैं कि “विवाद से बचने के लिये मामले को संवेदनशील ढंग से संभालें।”

    इसी बीच, नागरिक समाज संगठन एवं स्थानीय मीडिया इस मुद्दे को उजागर करने लगे हैं और प्रशासन की पारदर्शिता तथा न्याय के प्रति प्रतिबद्धता पर प्रश्न उठा रहे हैं। खेती के मंदी के मौसम में कल्याणकारी सेवाओं के वितरण में रुकावट आने से भुखमरी और सामाजिक संकट बढ़ने की गंभीर आशंका है।

    सुश्री मल्होत्रा को ऐसा निर्णय लेना है जो न्याय सुनिश्चित करे, कमज़ो वर्गों की रक्षा करे और प्रशासनिक ईमानदारी को बनाए रखे।

    प्रश्न

    1. इस मामले में कौन-कौन से नैतिक मुद्दे शामिल हैं?
    2. सुश्री मल्होत्रा के सामने कौन-कौन से विकल्प उपलब्ध हैं? प्रत्येक के गुण-दोष का परीक्षण कीजिये।
    3. सुश्री मल्होत्रा को कौन-सा कदम उठाना चाहिये? अपने उत्तर को नैतिक मूल्यों, लोकहित और प्रशासनिक ज़िम्मेदारी के संदर्भ में उचित ठहराइए।

    13 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़

    उत्तर :

    परिचय: 

    यह मामला तत्काल कल्याण प्रदान करने और दीर्घकालिक संस्थागत अखंडता के बीच टकराव से जुड़ी एक पारंपरिक प्रशासनिक दुविधा को प्रस्तुत करता है। सुश्री रिया मल्होत्रा के सामने चुनौती यह है कि वे भ्रष्ट गठजोड़ को समाप्त करें, लेकिन साथ ही उन वास्तविक लाभार्थियों को नुकसान न पहुँचे, जिनकी सुरक्षा और कल्याण के लिये यह व्यवस्था बनाई गई है।

    हितधारक 

    • सुश्री रिया मल्होत्रा (SDM): निर्णयकर्त्ता, जो अंतरात्मा के संकट और पेशेवर कर्त्तव्य के बीच संतुलन बनाने की चुनौती का सामना कर रही हैं।
    • संवेदनशील लाभार्थी: सूखा-प्रवण क्षेत्र के गरीब परिवार, जिनका खाद्य का अधिकार (अनुच्छेद 21) प्रभावित हो रहा है।
    • भ्रष्ट तत्त्व: FPS (उचित मूल्य दुकान) डीलर और मिलीभगत करने वाले अधिकारी, जो सार्वजनिक कर्त्तव्य के बजाय व्यक्तिगत लालच को प्राथमिकता दे रहे हैं।
    • राजनीतिक कार्यपालिका: वे लोग जो भ्रष्ट यथास्थिति की रक्षा के लिये अनौपचारिक दबाव डाल रहे हैं।
    • नागरिक समाज एवं मीडिया: जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग करने वाले प्रहरी (वॉचडॉग्स)।
    • राज्य प्रशासन: जिसकी विश्वसनीयता और जनता का विश्वास दाँव पर लगा है।

    मुख्य भाग: 

    1. सम्मिलित नैतिक मुद्दे

    • सत्यनिष्ठा बनाम राजनीतिक अवसरवाद: मुख्य द्वंद्व शासन में शुचिता सुनिश्चित करने और विवादों से बचने हेतु 'अप्रत्यक्ष' राजनीतिक दबाव के सम्मुख समर्पण करने के मध्य है।
    • दंडात्मक न्याय बनाम वितरणात्मक न्याय: दोषियों को दंडित करना (दंडात्मक न्याय) और भूखे लोगों तक खाद्यान्न की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना (वितरणात्मक न्याय) दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है।
      • डीलरों का तत्काल निलंबन आपूर्ति शृंखला को बाधित कर सकता है, जिससे अल्पकाल में गरीबों को नुकसान हो सकता है।
    • सार्वजनिक विश्वास बनाम प्रशासनिक मिलीभगत: राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत विश्वस्तीय विश्वास का उल्लंघन दर्शाती है।
      • कार्रवाई न करना प्रशासन के प्रति जनता की नकारात्मक धारणा को और पुष्ट करेगा।
    • करुणा बनाम प्रक्रियागत कठोरता: डिजिटल स्तर पर दिखने वाला अनुपालन, प्राय: क्षेत्रीय वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं करता।
      • केवल आँकड़ों (बहिष्करण त्रुटियों) पर निर्भर रहना बनाम लाभार्थियों की गवाही सुनना, प्रशासन में करुणा और सहानुभूति की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
    • जवाबदेही: SDM केवल अपने वरिष्ठों के प्रति ही नहीं, बल्कि संविधान और जनता के प्रति भी जवाबदेह हैं। अनियमितताओं की अनदेखी करना प्रशासनिक मिलीभगत के समान होगा।

    2. सुश्री मल्होत्रा के सामने उपलब्ध विकल्प

    विकल्प 1: त्वरित एवं कठोर कार्रवाई (सभी आरोपित डीलरों और अधिकारियों का तत्काल निलंबन)

    • गुण:
      • विधि के शासन और भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता को सुदृढ़ करता है।
      • सार्वजनिक विश्वास की पुनर्स्थापना करता है तथा नागरिक समाज/मीडिया को संतुष्ट करता है।
      • अन्य भ्रष्ट तत्त्वों के लिये कड़ा निवारक संदेश देता है।
    • दोष:
      • मानवीय संकट: दुकानों के तत्काल बंद होने से संकटकालीन अवधि के दौरान खाद्यान्न आपूर्ति में व्यवधान आ सकता है, जिससे भूख की समस्या उत्पन्न होने की आशंका रहती है।
      • राजनीतिक प्रतिशोध: जाँच पूर्ण होने से पहले स्थानांतरण या उत्पीड़न की आशंका।

    विकल्प 2: ‘संवेदनशील ढंग से निपटना’/निष्क्रियता (अनौपचारिक चेतावनी देकर यथास्थिति बनाए रखना)

    • गुण:
      • खाद्य आपूर्ति निर्बाध बनी रहती है।
      • राजनीतिक प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ टकराव से बचता है।
      • प्रशासनिक ‘शांति’ बनाए रखता है।
    • दोष:
      • नैतिक जोखिम: परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार को बढ़त मिलती है और संबंधित ‘गठजोड़’ और अधिक सुदृढ़ हो जाता है।
      • कर्त्तव्य में चूक: आचरण संहिता और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम का उल्लंघन।
      • विश्वसनीयता में ह्रास: अंततः मीडिया में खुलासा होने पर जन-असंतोष और अधिकारी की प्रतिष्ठा को क्षति।

    विकल्प 3: रणनीतिक कार्रवाई (पहले आपूर्ति-शृंखला को सुरक्षित करना, फिर जवाबदेही सुनिश्चित करना)

    • गुण:
      • संवेदनशील वर्गों की सुरक्षा: खाद्य सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होता।
      • प्रक्रियात्मक न्याय: सुदृढ़ एवं न्यायालय में टिकने योग्य मामला तैयार होता है, जिससे राजनीतिक हस्तक्षेप कठिन हो जाता है।
      • सतत सुधार: केवल व्यक्तियों को दंडित करने के बजाय प्रणालीगत कमियों को दूर करता है।
    • दोष:
      • समय-साध्य प्रक्रिया, जिसे प्रारंभ में मीडिया द्वारा ‘धीमी कार्रवाई’ के रूप में देखा जा सकता है।

    3. कार्यवाही का मार्ग

    सुश्री मल्होत्रा को विकल्प 3 (रणनीतिक कार्रवाई) अपनानी चाहिये। उनका दृष्टिकोण गांधीजी के ताबीज़ (सबसे गरीब पर केंद्रित दृष्टि) और ‘अंत्योदय’ के सिद्धांत से प्रेरित होना चाहिये।

    चरणबद्ध कार्ययोजना:

    • चरण 1: त्वरित सुधारात्मक उपाय (‘नागरिक-प्रथम’ दृष्टिकोण)
      • वैकल्पिक आपूर्ति-शृंखला की व्यवस्था: भ्रष्ट डीलरों को निलंबित करने से पहले, उन्हें निकटवर्ती उचित मूल्य दुकानों (FPS) या सरकारी गोदामों की पहचान कर प्रभावित लाभार्थियों को निकटतम कार्यशील दुकान से ‘टैग’ करना चाहिये।
      • बफर स्टॉक का निर्गमन: ज़िला मजिस्ट्रेट के साथ समन्वय कर 15 दिनों के लिये मोबाइल वैनों या अस्थायी वितरण केंद्रों के माध्यम से आपातकालीन बफर स्टॉक जारी किया जाए, जिनका संचालन सीधे राजस्व विभाग (तहसीलदार/नायब तहसीलदार) द्वारा किया जाए।
    • चरण 2: प्रवर्तन एवं जवाबदेही
      • निलंबन और FIR: वैकल्पिक आपूर्ति स्थिर होने के बाद (48–72 घंटों के भीतर), दोषी डीलरों और संलिप्त ‘निम्न-स्तरीय अधिकारियों’ को निलंबित किया जाए।
      • कारण बताओ नोटिस: आपूर्ति विभाग के अधिकारियों को औपचारिक नोटिस जारी किये जाएँ, ताकि उचित प्रक्रिया (Due Process) सुनिश्चित हो और वे बाद में न्यायालय से स्थगन आदेश न प्राप्त कर सकें।
      • डिजिटल ऑडिट: तृतीय-पक्ष सामाजिक अंकेक्षण कराया जाए, जिससे ‘अनुपालनयुक्त’ डिजिटल अभिलेखों का वास्तविक स्थानीय स्थिति से मिलान हो सके और ठोस साक्ष्य एकत्र किये जा सकें।
    • चरण 3: प्रणालीगत सुधार एवं पारदर्शिता
      • शिकायत निवारण: प्रखंड स्तर पर समर्पित हेल्पलाइन या ‘जन सुनवाई’ की व्यवस्था की जाए, ताकि बहिष्कृत परिवार तुरंत अपना पंजीकरण करा सकें।
      • सामुदायिक निगरानी: भविष्य के वितरण की निगरानी हेतु स्थानीय स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और सेवानिवृत्त शिक्षकों को शामिल कर ‘सतर्कता समितियाँ’ गठित की जाएँ।

    कार्यवाही का औचित्य

    • नैतिक मूल्यों के संदर्भ में
      • करुणा और सहानुभूति: ‘दंडात्मक/पुलिस कार्रवाई’ से पहले वैकल्पिक आपूर्ति सुनिश्चित कर वह सूखा-प्रवण आबादी के जीवन और आजीविका को प्राथमिकता देती हैं।
      • धैर्य एवं साहस (Fortitude): ‘अनौपचारिक संदेशों’ और राजनीतिक दबावों का प्रतिरोध करना, एक लोक सेवक में अपेक्षित चरित्र-बल को दर्शाता है।
      • शुचिता (Probity): ईमानदारी के उच्चतम मानकों को बनाए रखना और 'मामले को संवेदनशीलता से सॅंभालने' (जो कि मामले को रफा-दफा करने का एक आडंबर है) से इनकार करना।
    • लोकहित के संदर्भ में
      • अधिकतम लोगों का अधिकतम कल्याण (उपयोगितावाद): कुछ भ्रष्ट अधिकारियों पर कार्रवाई होती है, जबकि हज़ारों परिवारों को उनका वैध हक मिलता है।
      • राज्य तंत्र (सरकारी मशीनरी) में जनता का विश्वास बहाल करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, विशेषकर तब जब मीडिया और नागरिक समाज संशय में हों।
    • प्रशासनिक दायित्व के संदर्भ में
      • संवैधानिक नैतिकता: एक SDM के रूप में उनकी प्राथमिक निष्ठा संविधान की प्रस्तावना में निहित ‘सामाजिक और आर्थिक न्याय’ के वचन के प्रति है।
      • जवाबदेही: आवश्यक वस्तु अधिनियम और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के अंतर्गत रिसाव (लीकेज) रोकना उनका कानूनी दायित्व है।
      • निष्पक्षता: निर्णय ‘स्थानीय सत्यापन और लाभार्थियों की गवाही’ (तथ्यों) पर आधारित हैं, न कि ‘अनौपचारिक सलाह’ (मत) पर।

    निष्कर्ष

    सुश्री मल्होत्रा का दायित्व केवल यथास्थिति का प्रबंधन करना नहीं, बल्कि लोकहित की सेवा करना है। भ्रष्ट गठजोड़ पर कार्रवाई करने से पहले खाद्य आपूर्ति को सुरक्षित कर, वे ‘न्यूनतम क्षति’ के नैतिक सिद्धांत का पालन करते हुए ‘दंडात्मक न्याय’ को भी सुनिश्चित करती हैं। यह दृष्टिकोण इस बात की गारंटी देता है कि गरीबों का पेट भरा रहे, जबकि भ्रष्टों की जेबें खाली हों।

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