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प्रश्न :
प्रश्न: “क्या लोक प्रशासन में राजनीतिक तटस्थता और प्रतिबद्ध संवैधानिकता सह-अस्तित्व में रह सकती हैं?” उपयुक्त तर्कों के साथ विश्लेषण कीजिये। (150 शब्द)
12 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्नउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- राजनीतिक तटस्थता और प्रतिबद्ध संविधानवाद को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये।
- मुख्य भाग में यह स्पष्ट कीजिये कि राजनीतिक तटस्थता और प्रतिबद्ध संविधानवाद एक साथ कैसे रह सकते हैं।
- उन कमियों या खतरों का उल्लेख कीजिये जिनसे बचा जाना चाहिये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय
राजनीतिक तटस्थता उस सिद्धांत को दर्शाती है, जिसके अंतर्गत सिविल सेवक किसी भी राजनीतिक दल के प्रति पक्षपात किये बिना अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करते हैं और वर्तमान सरकार की समान निष्ठा के साथ सेवा करते हैं। इसके विपरीत, प्रतिबद्ध संवैधानिकता का अर्थ संविधान में निहित मूल्यों - न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के प्रति गहन निष्ठा से है, चाहे राजनीतिक दबाव कुछ भी हों।
- यद्यपि ये दोनों अवधारणाएँ प्रथम दृष्टया परस्पर विरोधी प्रतीत हो सकती हैं (जहाँ तटस्थता ‘विरक्ति’ और प्रतिबद्धता ‘आसक्ति’ का संकेत देती है), परंतु एक परिपक्व लोकतंत्र में ये परस्पर पूरक शक्तियाँ होती हैं।
- अतः एक सिविल सेवक को राजनीतिक रूप से तटस्थ (दलीय निरपेक्ष) होना चाहिये, लेकिन संवैधानिक रूप से प्रतिबद्ध (मूल्य-प्रेरित) भी।
मुख्य भाग:
राजनीतिक तटस्थता और प्रतिबद्ध संवैधानिकता का सह-अस्तित्व:
ये दोनों मूल्य न केवल साथ-साथ मौजूद रहते हैं, बल्कि प्रशासन के एक सशक्त ‘स्टील फ्रेम’ के निर्माण में एक-दूसरे को सुदृढ़ भी करते हैं।
- शासन-आधारित निष्ठा के बजाय राज्य-आधारित निष्ठा: राजनीतिक तटस्थता यह सुनिश्चित करती है कि सिविल सेवक की निष्ठा शासन (अस्थायी इकाई) के बजाय राज्य (स्थायी इकाई) के प्रति हो।
- प्रतिबद्ध संवैधानिकता इस निष्ठा को राज्य के मूल दस्तावेज़ संविधान से जोड़ती है, जिससे सरकारों के बदलने पर ‘तटस्थता’ अवसरवाद में परिवर्तित न हो।
- निष्क्रिय तटस्थता से सक्रिय संवैधानिक पेशेवरता की ओर: तटस्थता को प्राय: उदासीनता समझ लिया जाता है, किंतु संवैधानिक प्रतिबद्धता एक तटस्थ नौकरशाह को ‘सक्रिय पेशेवर’ में रूपांतरित कर देती है।
- उदाहरण के लिये, कोई अधिकारी चुनाव के दौरान सभी दलों के प्रति समान व्यवहार करते हुए तटस्थ रहता है, परंतु ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव’ के संवैधानिक दायित्व के प्रति दृढ़ता से प्रतिबद्ध होता है।
- बहुसंख्यकवादी अतिरेक के विरुद्ध संरक्षण: बहुसंख्यक लोकतंत्र में सत्तारूढ़ दल की कुछ वैचारिक प्रवृत्तियाँ हो सकती हैं।
- जहाँ एक ‘तटस्थ’ अधिकारी आदेशों को निष्क्रिय रूप से लागू कर सकता है, वहीं एक ‘संवैधानिक रूप से प्रतिबद्ध’ अधिकारी यह सुनिश्चित करता है कि क्रियान्वयन के दौरान समुदायों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न हो, इस प्रकार वह बहुसंख्यकवादी अतिरेक पर अंकुश लगाता है।
- निर्भय और निष्पक्ष परामर्श: इन दोनों मूल्यों का सह-अस्तित्व ‘ईमानदार असहमति’ को संभव बनाता है। एक तटस्थ अधिकारी मंत्री को वस्तुनिष्ठ, आँकड़ा-आधारित सलाह देता है, भले ही वह मंत्री के राजनीतिक दृष्टिकोण के विपरीत हो।
- यह साहस संविधान प्रदत्त लोक-कल्याणकारी मूल्यों के प्रति उनकी अटूट निष्ठा का परिणाम है, जो उन्हें एक 'आज्ञाकारी अनुगामी' (Yes-man) बनने से रोकता है।
- स्टील फ्रेम सिद्धांत: सरदार पटेल ने सिविल सेवा की परिकल्पना ऐसी संस्था के रूप में की थी, जो सत्ता के सामने ‘सत्य बोलने’ का साहस रखे।
- यह तभी संभव है, जब अधिकारी राजनीतिक रूप से निर्लिप्त हो (ताकि उसे विरोधी न समझा जाए) और संवैधानिक रूप से प्रतिबद्ध हो (ताकि उसके पास सच कहने का नैतिक अधिकार हो)।
बचने योग्य खतरें (The ‘Fine Balance’):
यदि तटस्थता और प्रतिबद्धता के बीच संतुलन बिगड़ जाए तो प्रशासन गंभीर विकृतियों का शिकार हो जाता है।
- ‘प्रतिबद्ध नौकरशाही’ का जाल: भारत में 1970 के दशक के आपातकाल के दौरान जैसा देखा गया, ‘प्रतिबद्धता’ का अर्थ संविधान के प्रति न होकर सत्तारूढ़ दल की विचारधारा के प्रति निष्ठा मान लिया गया।
- इससे नौकरशाही का राजनीतिकरण होता है, जहाँ अधिकारी दलगत कार्यकर्त्ताओं की तरह व्यवहार करने लगते हैं और जनता का विश्वास क्षीण हो जाता है।
- तटस्थता का ‘यथास्थितिवाद’ में बदलना: तटस्थता पर अत्यधिक ज़ोर ‘रूल-बुक नौकरशाही’ या रेड-टेपिज़्म को जन्म देता है।
- अधिकारी कठिन निर्णय लेने से बचने के लिये नियमों की आड़ ले लेते हैं और अन्याय के सामने निष्क्रियता को ‘तटस्थता’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिससे नीतिगत जड़ता उत्पन्न होती है।
- ‘ट्रांसफर इंडस्ट्री’: जब संवैधानिक प्रतिबद्धता का स्थान 'व्यक्तिगत निष्ठा' ले लेती है, तब प्रतिशोधपूर्ण स्थानांतरण की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है।
- ईमानदार और तटस्थ अधिकारियों को हाशिये पर डाल दिया जाता है, जबकि ‘अनुकूल’ अधिकारियों को पुरस्कृत किया जाता है, जिससे योग्यता तथा करियर प्रगति के बीच का संबंध टूट जाता है।
- मूल्य-अज्ञेयता: एक बड़ी भूल यह मान लेना है कि तटस्थता का अर्थ मूल्यहीनता है। सिविल सेवक ‘कानून एवं अराजकता’ या ‘न्याय और अन्याय’ के बीच तटस्थ नहीं रह सकता।
- नैतिक परिस्थितियों में पूर्ण तटस्थता ‘नौकरशाही साधारणता’ को जन्म देती है, जहाँ अधिकारी बिना अंतरात्मा के अन्यायपूर्ण आदेशों का पालन करने लगते हैं।
- अभिजात्यवाद और जन-विच्छेद: अत्यधिक ‘तटस्थ’ नौकरशाही प्राय: ‘आइवरी टॉवर’ नौकरशाही बन जाती है, जो जनसामान्य से कट जाती है।
- संवैधानिकता में निहित करुणा (जैसे—गांधीजी का ताबीज़) के अभाव में तटस्थता, अभिजात्य उदासीनता की ढाल बन जाती है।
- लेटरल एंट्री की चुनौतियाँ: लेटरल एंट्री को बढ़ावा देने से ऐसे विशेषज्ञ आते हैं, जो संभवतः ‘तटस्थता’ की प्रशासनिक परंपरा में सामाजिकीकृत नहीं होते।
- यदि इसे सावधानी से प्रबंधित न किया गया तो निजी क्षेत्र के पूर्वाग्रह या वैचारिक झुकाव स्थायी कार्यपालिका में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे संवैधानिक संतुलन बाधित होने का खतरा उत्पन्न होता है।
निष्कर्ष:
भारत को ऐसी सिविल सेवा की आवश्यकता है, जो राजनीतिक रूप से तटस्थ, पेशेवर रूप से सक्षम और सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध हो। आदर्श प्रशासक न तो बिना विवेक के आदेशों का यांत्रिक पालन करने वाला ‘रोबोट’ होता है और न ही शासन की वैध नीतियों में अनावश्यक बाधा उत्पन्न करने वाला कोई ‘विद्रोही’। आंबेडकर की परिकल्पना में संवैधानिक नैतिकता नैतिक मार्गदर्शक और रक्षक कवच है, जिसके आधार पर सिविल सेवक संवैधानिक मूल्यों की ‘तलवार’ को साधन बनाकर अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन कर सकते हैं।
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