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ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न: “अभिवृत्ति प्रशासनिक व्यवहार की अदृश्य प्रेरक होती है।” चर्चा कीजिये कि लोक अधिकारियों की अभिवृत्ति किस प्रकार नीतिगत परिणामों को प्रभावित करती है। (150 शब्द)

    12 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • अभिवृत्ति को परिभाषित करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये।
    • मुख्य भाग में यह स्पष्ट करें कि अभिवृत्ति किस प्रकार प्रशासनिक व्यवहार को संचालित करती है।
    • अगले चरण में यह समझाएँ कि नकारात्मक अभिवृत्ति किस प्रकार एक बाधा है।
    • सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित करने के उपायों का सुझाव दीजिये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय 

    अभिवृत्ति (Attitude) एक मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति है, जो किसी विशेष वस्तु, व्यक्ति या स्थिति का कुछ हद तक अनुकूल या प्रतिकूल मूल्यांकन करने के रूप में अभिव्यक्त होती है। लोक प्रशासन में यह नौकरशाही संरचना के ‘हार्डवेयर’ को संचालित करने वाले ‘सॉफ्टवेयर’ की तरह कार्य करता है।

    • अभिवृत्ति के तीन घटक होते हैं: संज्ञानात्मक (विश्वास/विचार), भावात्मक (भावनाएँ/संवेग) और व्यवहारात्मक (कार्य करने की प्रवृत्ति)। एक सार्वजनिक अधिकारी का व्यवहार अक्सर इन आंतरिक घटकों का ही सीधा प्रतिबिंब होता है।

    मुख्य भाग:

    प्रशासनिक व्यवहार के प्रेरक तत्त्व के रूप में अभिवृत्ति

    अभिवृत्ति वह फिल्टर है, जिसके माध्यम से प्रशासक वास्तविकता को देखते हैं। यह उनके विवेक, व्याख्या और निर्णय-निर्माण को गहराई से प्रभावित करता है।

    • कल्याणकारी प्रशासन में मानवीय संवेदनशीलता: करुणा की अभिवृत्ति (भावात्मक घटक) रखने वाला एक अधिकारी, विशिष्ट दस्तावेज़ न होने पर भीअत्यंत निर्धन एवं भूख से जूझ रहे लाभार्थी की सहायता करने के लिये अपने कर्त्तव्य की सीमाओं से आगे बढ़कर कार्य करेगा।
      • इसके विपरीत, उदासीन अभिवृत्ति वाला अधिकारी नियमों का हवाला देकर सहायता से इनकार कर देगा (इसे ‘रूल-बुक’ अभिवृत्ति कहा जाता है)।
      • उदाहरण: केरल में ‘कम्पैशनेट कोझिकोड’ पहल ज़िला प्रशासन के सहानुभूतिपूर्ण अभिवृत्ति से प्रेरित थी, जिसका उद्देश्य भूखों को भोजन उपलब्ध कराना था।
    • लोक पद पर शुचिता-केंद्रित नैतिकता को प्रोत्साहन: भौतिक लाभ के प्रति अभिवृत्ति ही भ्रष्टाचार की दिशा तय करता है।
      • शुचिता-उन्मुख’ अभिवृत्ति वाला अधिकारी तब भी रिश्वत लेने से इंकार करता है, जब कोई देखने वाला न हो; जबकि ‘भौतिकवादी’ अभिवृत्ति भ्रष्टाचार को ‘नौकरी का लाभ’ बताकर उचित ठहराता है।
    • लोक सेवा प्रतिबद्धता में वृद्धि: सेवा-उन्मुख अभिवृत्ति सत्ता को जनहित की सेवा की ज़िम्मेदारी के रूप में देखती है, जिससे विनम्रता, संवेदनशीलता और शक्ति का नैतिक उपयोग सुनिश्चित होता है।
      • ऐसे अधिकारी अधिक सुलभ और नागरिक-केंद्रित होते हैं।
      • इसके विपरीत, सत्ता-उन्मुख अभिवृत्ति प्रतिष्ठा और नियंत्रण की चाह रखती है, जिसके परिणामस्वरूप प्राय: अहंकार, अधिकारों का दुरुपयोग तथा नागरिकों के प्रति असंवेदनशीलता देखी जाती है। यह अभिवृत्तिगत अंतर सीधे-सीधे राज्य के प्रति जनता की धारणा को आकार देता है।
    • साक्ष्य-आधारित निर्णय-निर्माण को बढ़ावा देता है: वैज्ञानिक और तर्कसंगत अभिवृत्ति से निर्देशित प्रशासक निर्णय-निर्माण में साक्ष्यों, आँकड़ों तथा वस्तुनिष्ठता पर निर्भर करते हैं, जिससे निष्पक्षता एवं कार्यकुशलता सुनिश्चित होती है।
      • इसके विपरीत, जाति, लैंगिक, क्षेत्र या विचारधारा पर आधारित पूर्वाग्रही अभिवृत्ति विवेक को विकृत कर देते हैं और बहिष्करणकारी प्रथाओं को जन्म देते हैं। ऐसे पक्षपात विधि के समक्ष समानता के सिद्धांत को कमज़ोर करते हैं तथा शासन की नैतिक बुनियाद से समझौता करते हैं।

    नकारात्मक अभिवृत्ति: सुशासन में एक बाधा

    नकारात्मक या विकृत अभिवृत्ति भारत की नौकरशाही के ‘स्टील फ्रेम’ को एक ‘स्टील केज’ में बदल देता है, जिससे विकास अवरुद्ध होता है और नागरिकों में निराशा उत्पन्न होती है।

    • रेड-टेपिज़्म (परिणाम के बजाय प्रक्रिया-प्रधानता):
      • अभिवृत्ति: “परिणाम चाहे जो भी हों, मुझे केवल प्रक्रिया का पालन करना है।”
      • परिणाम: महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं में अनावश्यक विलंब। उदाहरण के तौर पर, अनेक महत्त्वपूर्ण अवसंरचना परियोजनाएँ अंतर-विभागीय फाइलों में अटक जाती हैं, क्योंकि अधिकारी समस्या-समाधान के बजाय ‘सुरक्षित खेल’ (सेफ़-प्लेइंग) को प्राथमिकता देते हैं।
    • परिवर्तन के प्रति प्रतिरोध (यथास्थितिवाद):
      • अभिवृत्ति: “हम हमेशा से यही करते आए हैं।”
      • परिणाम: प्रौद्योगिकी को अपनाने में धीमापन। सरकारी कार्यालयों में कंप्यूटरीकरण के प्रति प्रारंभिक प्रतिरोध या शिकायत निवारण में AI अपनाने की हिचकिचाहट, नियंत्रण या प्रासंगिकता खोने के भय से उत्पन्न होती है।
    • अभिजात्य पक्षपात (गरीबों के प्रति उदासीनता):
      • अभिवृत्ति: “ये लोग तो हमेशा शिकायत ही करते रहते हैं।”
      • परिणाम: कल्याणकारी योजनाओं (जैसे PDS या MGNREGA) में बहिष्करण त्रुटियाँ, जहाँ वास्तविक लाभार्थियों को उनकी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के प्रति सहानुभूति के अभाव में निचले स्तर की नौकरशाही द्वारा नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।

    सकारात्मक अभिवृत्ति विकसित करने के उपाय:

    • नैतिकता-केंद्रित भर्ती एवं चयन: भर्ती प्रक्रियाओं में केवल संज्ञानात्मक क्षमता ही नहीं, बल्कि नैतिक अभिविन्यास, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और मूल्य-प्रणाली का भी आकलन किया जाना चाहिये। परिस्थितिजन्य निर्णय परीक्षण, नैतिक दुविधाओं पर आधारित प्रश्न और व्यवहारात्मक साक्षात्कारों को शामिल करने से सेवा-उन्मुखता तथा सत्यनिष्‍ठा वाले अभ्यर्थियों की पहचान में सहायता मिलती है।
      • प्रारंभिक स्तर पर यह सूक्ष्म मूल्यांकन यह सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक है कि भावी लोक सेवक सत्ता के प्रति नहीं, अपितु संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी निष्ठा रखें।
    • निरंतर नैतिक प्रशिक्षण एवं मूल्य-पुनर्संरेखण: नैतिक प्रशिक्षण को केवल प्रारंभिक प्रशिक्षण तक सीमित न रखकर, पूरे प्रशासनिक करियर में समाहित किया जाना चाहिये। सहानुभूति, संवैधानिक नैतिकता, लोक सेवा मूल्यों और नैतिक निर्णय-निर्माण पर नियमित कार्यशालाएँ सकारात्मक अभिवृत्ति को सुदृढ़ करती हैं।
      • वास्तविक जीवन से जुड़ी नैतिक दुविधाओं का अनुभव कराना तथा चिंतनशील अधिगम को प्रोत्साहित करना अधिकारियों में नैतिक निष्क्रियता को रोकता है और उन्हें स्थानीय परिस्थितियों व सामाजिक वास्तविकताओं के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है।
    • नैतिक नेतृत्व एवं आदर्श प्रस्तुति: वरिष्ठ नेतृत्व प्रशासनिक अभिवृत्ति को आकार देने में निर्णायक भूमिका निभाता है। जब नेता सत्यनिष्‍ठा, पारदर्शिता और सहानुभूति का व्यावहारिक प्रदर्शन करते हैं तो ये मूल्य संस्थागत संस्कृति में व्याप्त हो जाते हैं।
      • इसके विपरीत, उच्च स्तर पर अनैतिक आचरण के प्रति सहिष्णुता नकारात्मक अभिवृत्ति को सामान्य बना देती है। इसलिये नैतिक नेतृत्व एक प्रभावशाली अनौपचारिक प्रशिक्षण तंत्र के रूप में कार्य करता है।
    • नैतिक आचरण से जुड़ा प्रदर्शन मूल्यांकन: मूल्यांकन प्रणालियों में केवल लक्ष्य-पूर्ति या वरिष्ठता के बजाय नैतिक व्यवहार, उत्तरदायित्व और नागरिक संतुष्टि को पुरस्कृत किया जाना चाहिये।
      • सत्यनिष्‍ठा और नवाचार का प्रदर्शन करने वाले अधिकारियों को मान्यता देना सकारात्मक अभिवृत्ति को सुदृढ़ करता है, जबकि अनैतिक आचरण को दंडित करना नैतिक समझौते को हतोत्साहित करता है। वास्तव में संस्थाएँ जिन बातों को मापती हैं, वही अंततः दृष्टिकोण को आकार देती हैं।

    निष्कर्ष:

    प्रशासन केवल ‘क्षमता’ का विषय नहीं, बल्कि ‘प्रतिबद्धता’ का भी प्रश्न है। कानून और नियम शासन की संरचनात्मक रूपरेखा तय करते हैं, लेकिन लोक सेवक की सकारात्मक अभिवृत्ति ही उसमें जीवंतता, संवेदना और प्रभावशीलता भरती है। भारत को वर्ष 2047 तक एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिये  प्रशासनिक अभिवृत्ति को संसाधनों के ‘नियंत्रक’ से बदलकर जनता के ‘सेवक’ की दिशा में उन्मुख करना होगा।

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