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प्रश्न :
प्रश्न: परिणाम-आधारित शासन लोक प्रशासन सुधारों में एक केंद्रीय विषय के रूप में उभरा है। इसके महत्त्व, सीमाओं और उन संस्थागत आवश्यकताओं पर चर्चा कीजिये जो बजटीय आवंटनों को मापनीय सामाजिक परिणामों में बदलने के लिये आवश्यक हैं। (250 शब्द)
03 Feb, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्थाउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत हाल के वर्षों में परिणाम-आधारित शासन की ओर हुए बदलाव को रेखांकित करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में इस बदलाव के महत्त्व की व्याख्या कीजिये।
- इस बदलाव की सीमाओं का उल्लेख कीजिये।
- अंत में यह स्पष्ट कीजिये कि बजटीय आवंटनों को मापनीय सामाजिक परिणामों में बदलने के लिये किन संस्थागत पूर्वापेक्षाओं की आवश्यकता है।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय
हाल के वर्षों में भारत की शासन व्यवस्था में ‘व्यय’ से हटकर ‘परिणामों’ पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा है, जिसमें नीतियों के वास्तविक प्रभाव और नागरिकों पर पड़ने वाले असर को केंद्र में रखा गया है। परिणाम-आधारित बजट, प्रदर्शन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएँ तथा रियल-टाइम डैशबोर्ड जैसी सुधार पहलें इस बदलाव को दर्शाती हैं।
मुख्य भाग:
परिणाम-आधारित शासन की ओर बदलाव का महत्त्व
- व्यय को मापनीय परिणामों में बेहतर रूपांतरण: परिणाम-आधारित शासन ने सार्वजनिक नीतियों का ध्यान मात्र वित्तीय व्यय से हटाकर मानव विकास के ठोस और मापनीय सुधारों की दिशा में केंद्रित किया है। अब मंत्रालयों को बजटीय आवंटनों को स्पष्ट रूप से आउटपुट और परिणामों से जोड़ना होता है।
- उदाहरण के लिये, परिणाम बजट 2025–26 तथा उसके बाद के 2026–27 के दस्तावेज़ों में विस्तृत आउटपुट–परिणाम निगरानी ढाँचा प्रस्तुत किया गया है।
- जवाबदेही और प्रदर्शन निगरानी में मज़बूती: स्पष्ट परिणाम संकेतक मंत्रालयों, राज्यों और ज़िलों के प्रदर्शन का आकलन संभव बनाते हैं, जिससे जवाबदेही सुदृढ़ होती है। डैशबोर्ड और रैंकिंग बेहतर कार्यान्वयन के लिये प्रोत्साहन प्रदान करते हैं।
- आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम के तहत, मार्च 2018 से फरवरी 2024 के बीच सभी आकांक्षी ज़िलों का औसत संयुक्त स्कोर 54% तक बढ़ा।
- लगभग 60% ज़िलों ने अपने कुल अंकों में 50% से अधिक का सुधार दर्ज किया।
- आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम के तहत, मार्च 2018 से फरवरी 2024 के बीच सभी आकांक्षी ज़िलों का औसत संयुक्त स्कोर 54% तक बढ़ा।
- कल्याणकारी योजनाओं के लक्षित क्रियान्वयन और दक्षता में सुधार: परिणाम-उन्मुख दृष्टिकोण ने कमज़ोर प्रदर्शन वाली योजनाओं और क्षेत्रों की पहचान करके दोहराव को कम किया है तथा लक्षित लाभ वितरण को बेहतर बनाया है। इससे राजकोषीय दक्षता में वृद्धि होती है।
- JAM आधारित सुधारों से सब्सिडी में होने वाली लीकेज कम हुई है; सरकारी अनुमानों के अनुसार कल्याणकारी योजनाओं में बेहतर लक्ष्य निर्धारण के माध्यम से ₹3.48 लाख करोड़ से अधिक की बचत हुई है।
- व्यावहारिक परिवर्तन और वास्तविक उपयोग पर बढ़ता ज़ोर: अब फोकस केवल परिसंपत्तियों के निर्माण से हटकर उनके वास्तविक उपयोग और लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने पर केंद्रित हो गया है, जिससे सार्वजनिक हस्तक्षेपों की स्थिरता बढ़ती है।
- स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत ग्रामीण स्वच्छता कवरेज वर्ष 2014 में 39% से बढ़कर वर्ष 2019 तक लगभग 100% हो गया और सर्वेक्षणों से यह संकेत मिला कि केवल शौचालय निर्माण ही नहीं बल्कि उनके उपयोग में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
- साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को बढ़ावा: परिणाम-आधारित शासन सर्वेक्षणों, तृतीय-पक्ष मूल्यांकन और रियल-टाइम आँकड़ों के उपयोग को प्रोत्साहित करता है ताकि नीतिगत निर्णय अधिक तथ्यपरक बन सकें।
- NFHS-5 जैसे राष्ट्रीय सर्वेक्षणों का अब पोषण, स्वास्थ्य और महिला-केंद्रित कार्यक्रमों में परिणामों की कमियों के आधार पर पुनर्संयोजन के लिये स्पष्ट रूप से उपयोग किया जा रहा है, न कि केवल व्यय के आधार पर।
परिणाम-आधारित शासन की ओर बदलाव की सीमाएँ
- जटिल सामाजिक परिणामों का अत्यधिक मात्रात्मककरण: सीखने की गुणवत्ता, गरिमा, सशक्तीकरण और समग्र कल्याण जैसे कई सामाजिक परिणामों को संख्यात्मक संकेतकों में पूरी तरह मापना कठिन होता है। केवल मापनीय मानकों पर अत्यधिक निर्भरता विकास की जटिलताओं को सरल रूप में प्रस्तुत करने का जोखिम उत्पन्न करती है।
- उदाहरण के लिये, नामांकन और अवसंरचना पर खर्च बढ़ने के बावजूद, ASER 2022 की रिपोर्ट के अनुसार कक्षा 5 के केवल 42% विद्यार्थी ही कक्षा 2 स्तर का पाठ पढ़ पाने में सक्षम थे, जो मापे गए इनपुट तथा वास्तविक शैक्षणिक परिणामों के बीच अंतर को दर्शाता है।
- आँकड़ों की गुणवत्ता, समयबद्धता और विश्वसनीयता से जुड़ी समस्याएँ: परिणाम-आधारित शासन मुख्यतः प्रशासनिक आँकड़ों पर आधारित होता है, जिनमें प्राय: समय पर उपलब्ध न होना, असंगति तथा रिपोर्टिंग में पक्षपात जैसी समस्याएँ दिखाई देती हैं विशेषकर राज्यों और ज़िलों के स्तर पर।
- NFHS-5 के सर्वेक्षण आँकड़ों और नियमित प्रशासनिक स्वास्थ्य आँकड़ों के बीच पाए गए अंतर ने टीकाकरण तथा पोषण संबंधी परिणामों को लेकर विसंगतियाँ उजागर की हैं, जिससे डैशबोर्ड-आधारित आकलनों की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठते हैं।
- अल्पकालिक सोच और प्रतीकात्मक अनुपालन को बढ़ावा: त्वरित परिणाम दिखाने का दबाव कई बार स्थाई सुधारों के बजाय सतही अनुपालन की ओर ले जाता है, जहाँ लक्ष्य पूरे करने पर अधिक ध्यान दिया जाता है, न कि संस्थागत प्रणालियाँ विकसित करने पर।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2024 में दिल्ली की सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना पर CAG की प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट में पाया गया कि बेहतर सेवाओं के लिये बनाए गए ऑपरेशन थिएटर और बिस्तरों जैसी अस्पताल सुविधाओं का बड़ा हिस्सा, पर्याप्त व्यय के बावजूद, मानव संसाधनों की कमी तथा कमज़ोर योजना के कारण या तो अत्यंत कम उपयोग में था या पूरी तरह निष्क्रिय पड़ा था।
- संस्थागत और प्रशासनिक क्षमताओं में असमानता: राज्यों और ज़िलों के बीच तकनीकी, वित्तीय तथा मानव संसाधन क्षमताओं में भारी अंतर है, जिससे परिणाम-आधारित ढाँचों को तैयार करने, उनकी निगरानी करने और उन पर कार्रवाई करने की क्षमता भी अलग-अलग होती है।
- आकांक्षी ज़िला कार्यक्रम के अंतर्गत, बेहतर प्रशासनिक क्षमता वाले ज़िलों ने अपेक्षाकृत तीव्र प्रगति की, जबकि समान बजटीय आवंटन के बावजूद कमज़ोर ज़िलों का प्रदर्शन पीछे रहा।
- बहिष्करण और संकेतकों से छेड़छाड़ का जोखिम: कठोर परिणाम-लक्ष्य अनजाने में ही कठिन पहुँच वाले वर्गों को बाहर रखने या बेहतर प्रदर्शन दिखाने के लिये संकेतकों में हेरफेर को प्रोत्साहित कर सकते हैं।
- उदाहरण के लिये, वर्ष 2024 में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (ISI) की एक रिपोर्ट में पाया गया कि लक्ष्य निर्धारण में हुई त्रुटियों के कारण PMAY और NFSA जैसी प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं से 34% से अधिक गरीब परिवार बाहर रह गए, जो यह दर्शाता है कि कठोर लक्ष्य तथा संकेतक-आधारित क्रियान्वयन कई बार सबसे ज़रूरतमंद वर्गों तक नहीं पहुँच पाता।
बजट को मापनीय सामाजिक परिणामों में बदलने के लिये आवश्यक संस्थागत पूर्वापेक्षाएँ
- स्पष्ट परिणाम ढाँचे और संकेतक: परिणामों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिये, वे यथार्थवादी हों तथा दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों के अनुरूप हों। संकेतकों में मात्रा के साथ-साथ गुणवत्ता को भी प्रतिबिंबित करना चाहिये।
- इससे अस्पष्टता दूर होती है और सभी कार्यान्वयन एजेंसियों के बीच समान समझ विकसित होती है।
- मज़बूत आँकड़ा और निगरानी प्रणालियाँ: विश्वसनीय डेटा प्रणालियाँ, आपस में जुड़ने योग्य प्लेटफॉर्म तथा स्वतंत्र सत्यापन विश्वसनीय परिणाम-निगरानी के लिये अनिवार्य हैं।
- रियल-टाइम डैशबोर्ड को आवधिक सर्वेक्षणों और ऑडिट के साथ पूरक किया जाना चाहिये।
- अंतिम स्तर पर क्षमता निर्माण: स्थानीय स्तर की संस्थाओं को परिणाम-उन्मुख कार्यक्रमों को लागू करने और उनकी निगरानी के लिये आवश्यक कौशल, मानव संसाधन तथा तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिये।
- स्थानीय स्तर पर पर्याप्त क्षमता न होने की स्थिति में परिणाम-आधारित ढाँचे केवल शीर्ष-स्तरीय निर्देश बनकर रह जाते हैं और व्यवहार में प्रभावी सिद्ध नहीं हो पाते।
- केंद्र–राज्य तथा अंतर-विभागीय समन्वय: परिणाम प्रायः कई विभागों और सरकार के विभिन्न स्तरों से जुड़े होते हैं, जिसके लिये अभिसरण तथा सहकारी संघवाद की आवश्यकता होती है।
- स्पष्ट भूमिका-निर्धारण और समन्वय तंत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
- प्रतिक्रिया-चक्र और अनुकूलनीय शासन: परिणाम-आधारित शासन में प्राप्त अनुभवों और फीडबैक के आधार पर सुधार की गुंजाइश होनी चाहिये।
- नियमित मूल्यांकन नीति के पुनर्रचना में सहायक हों, न कि केवल दंडात्मक उपकरण के रूप में प्रयुक्त किये जाएँ।
- पारदर्शिता और नागरिक भागीदारी: परिणामों का सार्वजनिक प्रकटीकरण और नागरिकों से प्राप्त प्रतिक्रिया शासन की वैधता तथा जवाबदेही को सुदृढ़ करती है।
- सामाजिक लेखा-परीक्षा और शिकायत निवारण तंत्र स्थानीय स्तर पर परिणामों के सत्यापन में सहायता करते हैं।
निष्कर्ष
परिणाम-आधारित शासन भारत के सार्वजनिक प्रशासन में एक महत्त्वपूर्ण सुधार का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि यह राज्य की दिशा को मात्र व्यय से हटाकर ठोस परिणामों और वास्तविक प्रभावों पर केंद्रित करता है। हालाँकि, सुदृढ़ संस्थानों, विश्वसनीय आँकड़ों और स्थानीय क्षमता के अभाव में परिणाम केवल प्रतीकात्मक लक्ष्यों तक सीमित रह जाने का खतरा रखते हैं। इसलिये इन पूर्वापेक्षाओं को सुदृढ़ करना अनिवार्य है, ताकि सार्वजनिक बजट वास्तव में सार्थक और समावेशी सामाजिक परिवर्तन में परिवर्तित हो सकें।
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