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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न: संवैधानिक प्रावधानों, कल्याण नीतियों और संस्थागत तंत्रों के संदर्भ में, स्थायी संरचनात्मक असमानताओं के बीच सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने में राज्य हस्तक्षेप की प्रभावशीलता का आकलन कीजिये। (250 शब्द)

    28 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 सामाजिक न्याय

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत राज्य के डिजिटल कल्याणकारी राज्य स्थापित करने की ज़िम्मेदारी को रेखांकित करते हुए कीजिये।
    • सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने में राज्य के हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता पर विस्तार से चर्चा कीजिये।
    • इसके बाद इसमें निहित सीमाओं का उल्लेख कीजिये।
    • राज्य के हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता को सुदृढ़ करने के उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय

    राज्य संविधान के तहत सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्ध एक कल्याणकारी राज्य स्थापित करने के लिये बाध्य है, जैसा कि राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांतों में परिलक्षित होता है—विशेष रूप से अनुच्छेद 38 (असमानताओं को कम करना), अनुच्छेद 39 (संसाधनों का न्यायसंगत वितरण), अनुच्छेद 46 (अनुसूचित जातियों, जनजातियों और कमज़ोर वर्गों का संरक्षण) तथा अनुच्छेद 47 (पोषण और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार)।

    • इसी के अनुरूप राज्य जाति, लैंगिक, वर्ग और क्षेत्र से जुड़ी संरचनात्मक असमानताओं को दूर करने हेतु कल्याणकारी नीतियों तथा संस्थागत तंत्रों को आगे बढ़ाता है। हालाँकि उनकी प्रभावशीलता समान रूप से नहीं दिखाई देती।

    मुख्य भाग: 

    सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने में राज्य के हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता:

    • संवैधानिक प्रावधान: समानता की आधारशिला
      • संविधान संरचनात्मक पदानुक्रमों को समाप्त करने के लिये एक परिवर्तनकारी ढाँचा प्रदान करता है।
      • मौलिक अधिकार: अनुच्छेद 14, 15 और 16 विधि के समक्ष समानता सुनिश्चित करते हैं तथा भेदभाव को निषिद्ध करते हैं, जबकि अनुच्छेद 17 (अस्पृश्यता का उन्मूलन) सीधे तौर पर जाति-आधारित असमानता के आधार पर प्रहार करता है।
      • राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत (DPSP): अनुच्छेद 38 राज्य को न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश देता है और अनुच्छेद 39A कमज़ोर वर्गों के लिये समान न्याय तथा निःशुल्क विधिक सहायता की गारंटी देता है।
      • सकारात्मक कार्रवाई (आरक्षण): अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को शिक्षा एवं सार्वजनिक रोज़गार में आरक्षण प्रदान करने का अधिकार देते हैं, ताकि ऐतिहासिक वंचना की भरपाई की जा सके और पिछड़े वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो।
        • प्रभावशीलता: इन प्रावधानों ने हाशिये पर पड़े समूहों को ‘राजनीतिक और कानूनी दृश्यता’ प्रदान करने में सफल भूमिका निभाई है।
    • कल्याणकारी नीतियाँ: ‘संतृप्ति’ और ‘सशक्तीकरण’ की ओर संक्रमण
      • हालिया राज्य हस्तक्षेप ‘ट्रिकल-डाउन’ मॉडल से हटकर ‘डायरेक्ट-डिलीवरी’ प्रणालियों की ओर बढ़े हैं, ताकि संरचनात्मक रिसाव को रोका जा सके:
      • डिजिटल-प्रथम समावेशन: JAM त्रयी (जन धन-आधार-मोबाइल) ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) को संभव बनाया है, जिससे ₹3.5 लाख करोड़ से अधिक की राशि रिसाव से बचाई गई।
      • आजीविका एवं स्वास्थ्य सुरक्षा: PM-JANMAN (PVTG) और AB-PMJAY (प्रति परिवार प्रतिवर्ष ₹5 लाख तक की द्वितीयक और तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं की कवरेज प्रदान करने वाली योजना) जैसी योजनाएँ उस ‘छूटते हुए मध्यम वर्ग’ (Missing middle) को लक्षित करती हैं, जिनके गरीबी के जाल में फॅंसने की संभावना सबसे अधिक होती है।
      • संतृप्ति दृष्टिकोण: विकसित भारत संकल्प यात्रा यह सुनिश्चित कर रही है कि सामाजिक न्याय केवल एक नीति न रहकर, स्थानीय स्तर पर लागू होती वास्तविकता बने।
        • प्रभावशीलता: पिछले 9 वर्षों में 24.82 करोड़ भारतीय बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले हैं, जो लक्षित हस्तक्षेपों की सफलता को दर्शाता है। हालाँकि कई योजनाओं के क्रियान्वयन में अभी भी महत्त्वपूर्ण अंतराल बने हुए हैं।
    • संस्थागत तंत्र: न्याय के प्रहरी
      • राज्य ने हाशिये पर पड़े वर्गों के हितों की निगरानी और संरक्षण के लिये विशेष निकायों का गठन किया है:
      • संवैधानिक निकाय: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) (अनुच्छेद 338), राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) (अनुच्छेद 338A) एवं राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (NCBC) (अनुच्छेद 338B) नीतियों के क्रियान्वयन के लिये जाँच और परामर्श केंद्रों के रूप में कार्य करते हैं।
      • कानूनी साधन: अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 तथा DPDP अधिनियम, 2023 क्रमशः सामाजिक शोषण और डेटा-आधारित भेदभाव को रोकने के लिये कानूनी मज़बूती प्रदान करते हैं।
      • संस्थागत बदलाव: ONDC एक उभरता हुआ तंत्र है, जिसे डिजिटल अर्थव्यवस्था का ‘लोकतंत्रीकरण’ करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है, ताकि छोटे MSME वैश्विक दिग्गजों के साथ प्रतिस्पर्द्धा कर सकें।
        • प्रभावशीलता: यद्यपि संस्थागत तंत्रों ने प्रणालीगत कमियों को उजागर किया है और सुधारों को आगे बढ़ाया है, फिर भी उन्हें प्राय: ‘अधिकार-क्षेत्रों के अतिव्यापन’ जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

    सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने में सीमाएँ

    • असमान क्रियान्वयन और अंतिम छोर (लास्ट-माइल) की कमियाँ: प्रशासनिक क्षमता की कमी और कमज़ोर स्थानीय संस्थाएँ कल्याणकारी योजनाओं की प्रभावी आपूर्ति को बाधित करती हैं। डिजिटलीकरण के बावजूद सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) और आवास योजनाओं में रिसाव तथा अपवर्जन त्रुटियाँ बनी हुई हैं।
      • उदाहरण के लिये, गरीबों के लिये निर्धारित भारत के लगभग 28% रियायती अनाज रिसाव में नष्ट हो जाते हैं।
    • संरचनात्मक और सामाजिक भेदभाव की निरंतरता: कानूनी सुरक्षा उपाय गहराई से जमे सामाजिक पदानुक्रमों और अनौपचारिक भेदभाव को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाते। 
      • कड़े कानूनों के बावजूद अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के विरुद्ध अत्याचार जारी हैं, जो सामाजिक बदलाव के प्रति प्रतिरोध को दर्शाते हैं।
        • उदाहरण के लिये, वर्ष 2022 में अनुसूचित जातियों के विरुद्ध दर्ज मामलों में 13% की वृद्धि हुई (NCRB)।
    • खंडित और अतिव्यापी योजनाएँ: अनेक योजनाओं की मौजूदगी से दोहराव, अक्षमता और प्रभाव में कमी आती है। पोषण और आजीविका से जुड़ी कई योजनाएँ प्राय: सीमित समन्वय के साथ अलग-अलग ढंग से संचालित होती हैं।
      • उदाहरण के लिये, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अंतर्गत एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS), शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत PM-POSHAN (मिड-डे मील) तथा स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) तीनों ही बाल कुपोषण (स्टंटिंग) और एनीमिया को लक्षित करते हैं।
    • वित्तीय बाधाएँ और सततता संबंधी चिंताएँ: बढ़ते सब्सिडी व्यय और सीमित राजकोषीय क्षमता (फिस्कल स्पेस) हस्तक्षेपों के पैमाने और गुणवत्ता को सीमित करते हैं।
      • सार्वजनिक वित्त पर प्रतिस्पर्द्धी मांगें शिक्षा और स्वास्थ्य में दीर्घकालिक निवेश को बाधित करती हैं।
      • उदाहरण के लिये, केंद्रीय बजट 2025-26 में ब्याज भुगतान का अनुमान ₹12.76 लाख करोड़ लगाया गया है।
    • संस्थानों की सीमित जवाबदेही: वैधानिक निकायों के पास प्राय: प्रवर्तन शक्तियों, संसाधनों और स्वायत्तता का अभाव होता है। आयोगों की सिफारिशें प्रायः परामर्शात्मक होती हैं और सरकारों पर बाध्यकारी नहीं होतीं।
      • उदाहरण के लिये, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) शिकायतों की जाँच तो कर सकता है, लेकिन अपनी सिफारिशों को लागू कराने की शक्ति उसके पास नहीं है।
        • सरकार को संसद/विधानसभाओं में केवल ‘की गई कार्रवाई का ज्ञापन’ या ‘अस्वीकृति का औचित्य’ प्रस्तुत करना होता है, जिसके परिणामस्वरूप कई बार सिफारिशें वर्षों तक कागज़ों तक ही सीमित रह जाती हैं।

    राज्य के हस्तक्षेपों की प्रभावशीलता बढ़ाने के उपाय:

    • परिणाम-आधारित बजटिंग: केवल ‘परिव्यय’ की निगरानी करने के बजाय एक निगरानी योग्य ‘परिणाम-ढाँचे’ ‘की ओर संक्रमण, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वित्तीय आवंटन के परिणामस्वरूप मापने योग्य सामाजिक प्रभाव प्राप्त हों।
    • विकेंद्रीकृत क्रियान्वयन: पंचायती राज संस्थाओं (PRIs) और शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को सशक्त बनाया जाए, ताकि वे स्थानीय संरचनात्मक बाधाओं के अनुसार कल्याणकारी सेवाओं को अनुकूलित कर सकें।
    • मिशन कर्मयोगी (क्षमता निर्माण) को गति देना: सिविल सेवकों को सहानुभूति और डिजिटल शासन में प्रशिक्षित किया जाए, जिससे प्रशासनिक संस्कृति ‘नियम-आधारित’ से ‘भूमिका-आधारित’ तथा ‘नागरिक-केंद्रित’ बन सके।
    • प्रौद्योगिकीय अंतर्संचालनीयता: खुली एवं प्रतिस्पर्द्धी डिजिटल पारिस्थितिकी प्रणाली बनाने के लिये ONDC और JAM त्रयी का लाभ उठाना, जो छोटे स्तर के उत्पादकों को प्रमुख ई-कॉमर्स 'गेटकीपर्स' (बड़े मंचों के एकाधिकार) से बचकर सीधे व्यापार करने की अनुमति देता है।
    • सामाजिक अंकेक्षण और पारदर्शिता: सभी प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं के लिये समुदाय-नेतृत्व वाले सामाजिक ऑडिट अनिवार्य किये जाएँ, ताकि स्थानीय अधिकारियों को जवाबदेह ठहराया जा सके और स्थानीय स्तर पर होने वाले रिसाव को कम किया जा सके।
    • शिकायत निवारण का आधुनिकीकरण: CPGRAMS जैसे मंचों में बहुभाषी, रियल-टाइम समाधान के लिये AI-आधारित बॉट्स को एकीकृत किया जाए, ताकि कल्याणकारी लाभों से वंचित नागरिकों की शिकायतों का त्वरित निपटारा हो सके।
    • योजनाओं का अभिसरण: विभिन्न मंत्रालयों में बिखरे लाभों को रोकने के लिये एक ‘एकीकृत सामाजिक सुरक्षा ढाँचा’ लागू किया जाए (जैसे—स्वास्थ्य, पोषण और पेंशन पोर्टलों का एकीकरण)।
    • समावेशी डिज़ाइन: केवल उपभोग राहत तक सीमित न रहते हुए, ‘क्षमता दृष्टिकोण’ अपनाया जाए और नीति-निर्माण के प्रारंभिक चरण में हाशिये पर पड़े समूहों को शामिल किया जाए, ताकि योजनाएँ गरिमा को भी संबोधित कर सकें।

    निष्कर्ष

     राज्य के हस्तक्षेपों ने लगातार बनी संरचनात्मक असमानताओं के बीच सामाजिक न्याय को आगे बढ़ाने में सार्थक किंतु असमान प्रगति की है। समावेशी और सतत सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिये  सुदृढ़ शासन व्यवस्था तथा दीर्घकालिक निवेश आवश्यक हैं, जो SDG-1 (गरीबी उन्मूलन), SDG-5 (लैंगिक समानता), SDG-10 (असमानताओं में कमी) और SDG-16 (मजबूत संस्थान) के अनुरूप हों।

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