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प्रश्न :
प्रश्न: तीव्र शहरीकरण की पृष्ठभूमि में भारत के शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) के समक्ष बुनियादी सेवाओं की आपूर्ति में उत्पन्न चुनौतियों का विश्लेषण कीजिये। संस्थागत एवं वित्तीय सुधार किस प्रकार शहरी शासन को सुदृढ़ कर सकते हैं? (250 शब्द)
20 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्थाउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत शहरी स्थानीय स्वशासन में शहरी स्थानीय निकायों (ULB) की भूमिका को रेखांकित करते हुए कीजिये।
- मुख्य भाग में शहरी स्थानीय निकायों के समक्ष विद्यमान विभिन्न चुनौतियों का उल्लेख कीजिये।
- इसके बाद स्पष्ट कीजिये कि ये चुनौतियाँ बुनियादी सेवाओं की आपूर्ति को किस प्रकार बाधित करती हैं।
- अंत में समझाएँ कि संस्थागत और वित्तीय सुधार शहरी शासन को कैसे सुदृढ़ बना सकते हैं।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय
शहरी स्थानीय निकाय (ULB) 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत शहरी स्थानीय स्वशासन की संस्थागत नींव हैं, जिन्हें शहरी सेवाओं की योजना बनाने, विनियमन करने और आपूर्ति करने का दायित्व सौंपा गया है।
- तीव्र शहरीकरण के कारण वर्ष 2036 तक भारत की शहरी आबादी के लगभग 600 मिलियन होने की संभावना है, जिससे जल, स्वच्छता, आवास, परिवहन एवं जनस्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों के प्रबंधन में ULBs की भूमिका और अधिक अग्रणी हो गई है।
- हालाँकि, बढ़ती शहरी ज़िम्मेदारियों और सीमित संस्थागत क्षमता के बीच असंतुलन ने प्रभावी सेवा-प्रदाय को गंभीर रूप से बाधित किया है।
मुख्य भाग:
शहरी स्थानीय निकायों के समक्ष चुनौतियाँ
- अपूर्ण कार्यात्मक हस्तांतरण: हालाँकि बारहवीं अनुसूची के अंतर्गत ULB को 18 कार्य सौंपे गए हैं, लेकिन अधिकांश राज्यों ने अधिकारों के अनुरूप केवल आंशिक ज़िम्मेदारियाँ ही हस्तांतरित की हैं।
- उदाहरण के लिये, कई राज्यों में जल आपूर्ति और सीवरेज का प्रबंधन राज्य बोर्डों द्वारा किया जाता है, जबकि ULBs को केवल बिलिंग तथा रखरखाव की ज़िम्मेदारी दी जाती है तथा योजना-निर्माण से जुड़े अधिकार उनके पास नहीं होते।
- इसके अतिरिक्त, शहरी शासन अब भी विकास प्राधिकरणों, उपयोगिता एजेंसियों और विशेष प्रयोजन वाहनों (SPVs) जैसी कई संस्थाओं में बँटा हुआ है, जिससे कार्यक्षेत्रों का अतिव्यापन, कमज़ोर समन्वय तथा जवाबदेही में कमी उत्पन्न होती है।
- दीर्घकालिक वित्तीय कमज़ोरी: ULB अपने स्वयं के राजस्व स्रोतों की कमी, कर आधार की धीमी वृद्धि (लो टैक्स बुआयेंसी) और अंतर-सरकारी हस्तांतरणों पर अत्यधिक निर्भरता जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
- संपत्ति कर सुधार राजनीतिक रूप से संवेदनशील बने हुए हैं और प्रशासनिक रूप से भी कमज़ोर हैं। भारतीय नगर निगमों की स्वयं की आय GDP के 1% से भी कम है, जो ब्राज़ील के 7% और दक्षिण अफ्रीका के 6% की तुलना में बहुत कम है।
- अपर्याप्त प्रशासनिक और तकनीकी क्षमता: ULB में नगर नियोजकों, अभियंताओं, वित्त प्रबंधकों और पर्यावरण विशेषज्ञों जैसे कुशल कर्मियों की भारी कमी है। छोटी नगरपालिकाएँ सीमित स्थानीय जवाबदेही वाले प्रतिनियुक्त (डिप्यूटेशन) कर्मचारियों पर निर्भर रहती हैं।
- उदाहरण के लिये, गुजरात में शहरी विकास प्राधिकरणों में 49% पद रिक्त हैं।
- राजनीतिक हस्तक्षेप और कमज़ोर जवाबदेही: निर्वाचित नगर परिषदों का बार-बार विघटन, चुनावों में देरी और राज्य का अत्यधिक नियंत्रण शहर स्तर पर लोकतांत्रिक शासन को कमज़ोर करता है।
- कई राज्यों में नगरपालिका चुनावों में विलंब होने के कारण निर्वाचित प्रतिनिधियों के बजाय प्रशासकों का लंबे समय तक प्रशासन चलाने का परिणाम सामने आया है।
इन चुनौतियों के कारण बुनियादी सेवाओं की आपूर्ति कैसे प्रभावित होती है
- जल आपूर्ति और सीवरेज में कमी: कार्यात्मक अधिकारों की कमी और कमज़ोर वित्तीय स्थिति के कारण शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) सतत जल और स्वच्छता अवसंरचना में निवेश नहीं कर पाते। योजना-निर्माण असंगठित रहता है और दीर्घकालिक दृष्टि के बजाय तात्कालिक प्रतिक्रियाओं तक सीमित हो जाता है।
- भारत के अधिकांश शहरों में जल आपूर्ति अनियमित है, गैर-राजस्व जल की मात्रा अधिक है और बिना उपचारित सीवेज नदियों में छोड़ा जाता है।
- अकुशल ठोस अपशिष्ट प्रबंधन: सीमित तकनीकी क्षमता और कमज़ोर वित्तीय स्थिति वैज्ञानिक तरीके से अपशिष्ट के पृथक्करण, प्रसंस्करण और निपटान में बाधा डालती है। पर्यावरणीय मानकों का अनुपालन भी कमज़ोर बना रहता है।
- हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारतीय शहरों में उत्पन्न नगरपालिका ठोस अपशिष्ट का आधे से अधिक हिस्सा अब भी खुले डंप स्थलों और अवैज्ञानिक लैंडफिल में चला जाता है। SWM, 2016 के अंतर्गत निर्धारित अपशिष्ट प्रसंस्करण लक्ष्य भी बड़े पैमाने पर पूरे नहीं हो पाए हैं, जो पृथक्करण और निपटान में जारी प्रणालीगत विफलताओं को रेखांकित करता है।
- आवास और झुग्गी-बस्ती सेवाओं में कमी: कमज़ोर योजना-निर्माण अधिकार और भूमि की सीमाएँ शहरी स्थानीय निकायों (ULB) के किफायती आवास उपलब्ध कराने तथा अनौपचारिक बस्तियों के उन्नयन की क्षमता को सीमित कर देती हैं।
- शहर के बाहरी इलाकों में जल निकासी, सड़कों या स्वच्छता सुविधाओं के बिना झुग्गी-बस्तियों का विस्तार शहरी बाढ़ और बीमारियों के प्रकोप का कारण बनता है, जैसा कि दिल्ली में देखा गया है।
- शहरी गतिशीलता और परिवहन विफलताएँ: खंडित शासन व्यवस्था एकीकृत परिवहन योजना को बाधित करती है, जिससे यातायात जाम और सार्वजनिक परिवहन की कमज़ोर पहुँच उत्पन्न होती है।
- मेट्रो प्रणालियाँ अपर्याप्त बस नेटवर्क और कमज़ोर अंतिम-मील संपर्क के साथ सह-अस्तित्व में रहती हैं।
संस्थागत और वित्तीय सुधार शहरी शासन को कैसे सुदृढ़ कर सकते हैं:
- कार्यों, निधियों और कार्मिकों (3F’s) का वास्तविक विकेंद्रीकरण: प्रशासनिक नियंत्रण के साथ अधिकारों का स्पष्ट हस्तांतरण शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को परिणामों के प्रति जवाबदेह बना सकता है। यह विकेंद्रीकरण गतिविधि-मानचित्रण के माध्यम से किया जाना चाहिये और इसे कानूनी रूप से लागू किया जाना आवश्यक है।
- उदाहरण के लिये, जो शहर जल आपूर्ति का संपूर्ण प्रबंधन करते हैं, वहाँ सेवाओं के परिणाम उन शहरों से बेहतर होते हैं जहाँ नियंत्रण बिखरा हुआ होता है।
- नगरपालिका वित्त को सुदृढ़ करना: संपत्ति कर मूल्यांकन, उपयोगकर्त्ता शुल्क, भूमि-आधारित वित्तपोषण और पूर्वानुमेय हस्तांतरणों में सुधार से वित्तीय स्थिरता को बढ़ाया जा सकता है।
- उदाहरण के लिये, अहमदाबाद और पुणे जैसे शहरों द्वारा जारी किये गए नगरपालिका बॉण्ड बाज़ार-आधारित वित्तपोषण की क्षमता को प्रदर्शित करते हैं।
- शहरी प्रशासन का व्यावसायिक एवं पेशेवर रूपांतरण: नगरपालिका कैडरों का सृजन, पेशेवरों की लैटरल एंट्री तथा सतत क्षमता निर्माण से शहरी योजना तथा क्रियान्वयन में सुधार किया जा सकता है।
- AMRUT 2.0 के अंतर्गत समर्पित शहरी योजना इकाइयों का उद्देश्य नगर-स्तरीय तकनीकी क्षमता को मज़बूत करना है।
- एकीकृत महानगरीय शासन: महानगरीय योजना समितियाँ और एकीकृत परिवहन प्राधिकरण बड़े शहरी समूहों में सीमा-पार चुनौतियों से निपट सकते हैं।
- एकीकृत परिवहन प्राधिकरण मेट्रो, बस और गैर-मोटरयुक्त परिवहन की योजना के समन्वय में सहायता करते हैं।
- नागरिक सहभागिता और पारदर्शिता को गहरा करना: वार्ड समितियाँ, सामाजिक अंकेक्षण, सहभागी बजटिंग और डिजिटल शिकायत प्रणालियाँ जवाबदेही तथा सेवा-प्रतिक्रियाशीलता को बढ़ाती हैं।
- सहभागी बजटिंग के प्रयोगों (जैसे, पुणे नगर निगम) ने स्थानीय अवसंरचना की प्राथमिकता तय करने की प्रक्रिया में सुधार किया है।
निष्कर्ष
SDG-11 (सतत शहर और समुदाय) की प्राप्ति तथा समावेशी शहरी विकास के लिये शहरी स्थानीय निकायों को सुदृढ़ करना अनिवार्य है। संस्थागत सशक्तीकरण और वित्तीय स्वायत्तता के बिना तीव्र शहरीकरण सेवा-प्रदान प्रणालियों पर दबाव बनाता रहेगा। ULBs को लोकतांत्रिक और सतत शहरी शासन का सशक्त आधार बनाने के लिये विकेंद्रीकरण, क्षमता विकास और वित्तीय सुधारों में व्यापक परिवर्तन अनिवार्य है।
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