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प्रश्न :
प्रश्न. क्षेत्रीय समूहों की प्रभावशीलता केवल उनके संस्थागत ढाँचे पर ही नहीं, बल्कि सदस्य देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर भी निर्भर करती है। उपयुक्त उदाहरणों सहित इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)
13 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 अंतर्राष्ट्रीय संबंधउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत क्षेत्रीय समूहों की परिभाषा देकर कीजिये।
- मुख्य भाग में स्पष्ट कीजिये कि इनकी प्रभावशीलता संस्थागत ढाँचे पर कैसे निर्भर करती है।
- इसके बाद यह समझाइये कि सदस्यों के बीच राजनीतिक इच्छाशक्ति क्यों आवश्यक है।
- समालोचनात्मक विश्लेषण में डिज़ाइन और राजनीतिक इच्छाशक्ति के परस्पर प्रभाव को उजागर कीजिये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
क्षेत्रीय समूह (जैसे EU, ASEAN, SAARC, BIMSTEC) ऐसे तंत्र हैं जहाँ भौगोलिक रूप से निकट देशों के बीच आपसी लाभ के लिये सहयोग किया जाता है।
- जहाँ संस्थागत डिज़ाइन ढाँचे, नियमों और तंत्रों के माध्यम से ढाँचा प्रदान करता है, वहीं राजनीतिक इच्छाशक्ति गति एवं भरोसा प्रदान करते हुए इसे जीवंत बनाती है।
मुख्य भाग:
प्रभावशीलता में संस्थागत तंत्रों की भूमिका
- स्पष्ट जनादेश और कानूनी ढाँचा: स्पष्ट रूप से परिभाषित उद्देश्य, नियम और कानूनी दायित्व पूर्वानुमानित सहयोग को सक्षम बनाते हैं तथा अस्पष्टता को कम करते हैं। बाध्यकारी संधियाँ और लागू करने योग्य नियम अनुपालन एवं निरंतरता को मज़बूती प्रदान करते हैं।
- उदाहरण के लिये, यूरोपीय संघ (EU) की संधियाँ और कानूनी व्यवस्था सदस्य राज्यों में एकल बाज़ार के नियमों के समानान्तर क्रियान्वयन को सक्षम बनाती हैं।
- निर्णय-निर्माण और प्रवर्तन तंत्र: प्रभावी क्षेत्रीय समूहों के लिये कुशल निर्णय-निर्माण प्रक्रिया और प्रवर्तन क्षमता आवश्यक है।
- ऐसे संस्थान जो बहुमत मतदान और न्यायिक निगरानी की अनुमति देते हैं, वे केवल सहमति-आधारित मॉडल की तुलना में अधिक प्रभावी होते हैं।
- उदाहरण के लिये, आसियान (ASEAN) का विवाद निपटान तंत्र, हालाँकि सीमित है, फिर भी एक व्यवस्थित कानूनी विकल्प प्रदान करता है। यह केवल अनौपचारिक आम सहमति की तुलना में अधिक पूर्वानुमान प्रदान करता है और सदस्य देशों के बीच नियमों के अनुपालन को मामूली रूप से मज़बूत करता है।
- विवाद समाधान और संघर्ष प्रबंधन: विवाद निपटान के लिये औपचारिक तंत्र आंतरिक मतभेदों को प्रबंधित करने और उनकी तीव्रता को बढ़ने से रोकने में सहायता करते हैं। संस्थागत संघर्ष समाधान दीर्घकालिक सहयोग को बनाए रखता है।
- उदाहरण के लिये, MERCOSUR अपने सदस्य राज्यों के बीच व्यापारिक विवादों को हल करने के लिये स्थायी समीक्षा न्यायाधिकरण का उपयोग करता है, जो नियम-आधारित मध्यस्थता प्रदान करता है, जिससे विवादों का तेज़ी से बढ़ना रोका जाता है और क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण को समर्थन मिलता है।
- संसाधन जुटाना: BRICS का न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) प्रभावी है क्योंकि इसका डिज़ाइन स्पष्ट रूप से पूंजी योगदान और शासन संरचनाओं को निर्धारित करता है, जो पश्चिमी प्रभुत्व को दरकिनार करता है तथा ठोस अवसंरचना परियोजनाओं को सक्षम बनाता है।
- संस्थागत क्षमता और सचिवालय की क्षमता एवं प्रभावशीलता: एक सक्षम और स्वायत्त सचिवालय निर्णयों की निरंतरता, निगरानी और कार्यान्वयन सुनिश्चित करता है। कमज़ोर सचिवालय सहमति पर आधारित प्रतिबद्धताओं के पालन को सीमित करता है।
- अफ्रीकन यूनियन आयोग शांति स्थापना और शासन पहलों का समर्थन करता है, हालाँकि क्षमता की सीमाएँ बनी हुई हैं।
- इसी प्रकार शंघाई सहयोग संगठन (SCO) सचिवालय समन्वय और प्रशासनिक समर्थन प्रदान करता है, लेकिन इसकी सीमित ज़िम्मेदारी तथा संसाधन सदस्य राज्यों के बीच नीति के गहन कार्यान्वयन को प्रतिबंधित करते हैं।
सदस्य राज्यों में राजनीतिक इच्छाशक्ति का महत्त्व
- साझा हितों के प्रति प्रतिबद्धता: राजनीतिक इच्छाशक्ति यह तय करती है कि राज्य क्षेत्रीय लक्ष्यों को संकुचित राष्ट्रीय हितों से ऊपर प्राथमिकता देंगे या नहीं। यदि प्रतिबद्धता नहीं है तो संस्थागत निर्णय केवल प्रतीकात्मक बने रहते हैं।
- उदाहरण के लिये, SAARC की स्थिरता में कमी प्रमुख सदस्यों के बीच राजनीतिक सहमति की कमी को दर्शाती है, भले ही औपचारिक संस्थागत ढाँचे मौजूद हों।
- सहमति बनाने और समझौता करने की तत्परता: क्षेत्रीय सहयोग के लिये संवेदनशील मुद्दों जैसे व्यापार, संप्रभुता या सुरक्षा पर समझौता करना आवश्यक होता है। राजनीतिक भरोसा ऐसी रियायतों को संभव बनाता है।
- उदाहरण के लिये, COVID-19 के दौरान EU रिकवरी फंड केवल राजनीतिक संकल्प और सहयोग के कारण सफल हुआ, भले ही इसमें राजकोषीय संप्रभुता से संबंधित चिंताएँ थीं।
- सहमति के निर्णयों का कार्यान्वयन: राजनीतिक इच्छाशक्ति महत्त्वपूर्ण है ताकि सहमति से लिये गए निर्णय घरेलू नीतियों और कार्यवाही में बदले जा सकें। सदस्य राज्यों के समर्थन के बिना संस्थान अनुपालन लागू नहीं कर सकते।
- उदाहरण के लिये, ASEAN की दक्षिण चीन सागर मामले पर सीमित प्रतिक्रिया कमज़ोर राजनीतिक एकता को दर्शाती है, संस्थागत अभाव को नहीं।
- संकट के दौरान सहयोग बनाए रखना: जब राष्ट्रीय हित भिन्न होते हैं, तब क्षेत्रीय समूहों की परीक्षा होती है। राजनीतिक एकजुटता अनुकूलन और प्रासंगिकता तय करती है।
- उदाहरण के लिये, NATO की सुरक्षा चुनौतियों के प्रति सामूहिक प्रतिक्रिया मज़बूत राजनीतिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
- हालाँकि, हाल के भार-वितरण विवाद और यूक्रेन संघर्ष एवं रक्षा व्यय पर सदस्यों के अलग-अलग रुख यह दर्शाते हैं कि जब घरेलू प्राथमिकताएँ गठबंधन प्रतिबद्धताओं से ऊपर होती हैं तो राज्य पीछे हट सकते हैं।
- उदाहरण के लिये, NATO की सुरक्षा चुनौतियों के प्रति सामूहिक प्रतिक्रिया मज़बूत राजनीतिक प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
समालोचनात्मक विश्लेषण: डिज़ाइन और राजनीतिक इच्छाशक्ति का आपसी प्रभाव
संस्थागत डिज़ाइन
राजनीतिक इच्छाशक्ति
परिणाम उदाहरण
मज़बूत
Weak
ठहराव/गतिरोध
SAARC: औपचारिक चार्टर और संस्थागत तंत्रों के बावजूद, सदस्यों के बीच गहरी राजनीतिक वैमनस्यता ने सहयोग को अवरुद्ध कर दिया है।
कमज़ोर
मज़बूत
अस्थायी प्रभावशीलता
G20/G7: सीमित संस्थागत ढाँचे वाले अनौपचारिक समूह, फिर भी संकट के समय निर्णायक समन्वय करने में सक्षम हैं (जैसे वर्ष 2008 की वैश्विक वित्तीय संकट) क्योंकि राजनीतिक संगति मज़बूत है।
मज़बूत
मज़बूत
गहन एकीकरण
यूरोपीय संघ (EU): यूरो और शेंगेन क्षेत्र जैसे उच्च स्तर के एकीकरण को मज़बूत संस्थानों तथा सतत राजनीतिक प्रतिबद्धता द्वारा सक्षम बनाया गया है।
कमज़ोर
कमज़ोर
निष्क्रियता
अरब मगरीब यूनियन (AMU): न तो मज़बूत प्रवर्तन संरचना है और न ही राजनीतिक सहमति (मोरक्को-अल्जीरिया तनाव के कारण), जिससे यह समूह अधिकांशतः निष्क्रिय हैं।
निष्कर्ष
संस्थागत डिज़ाइन किसी क्षेत्रीय समूह की स्थिरता के लिये आवश्यक है, लेकिन इसका अस्तित्व बनाए रखने के लिये राजनीतिक इच्छाशक्ति अनिवार्य है। भारत की विदेश नीति में यह अनुभव ‘एक्ट ईस्ट’ संलग्नता में स्पष्ट दिखाई देता है: भारत बिम्सटेक (BIMSTEC) के संस्थागत सशक्तीकरण को आगे बढ़ा रहा है, जबकि साथ ही बहुपक्षीय संस्थाओं को सुधारने के लिये ग्लोबल साउथ भागीदारों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर भी निर्भर है।
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