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प्रश्न :
प्रश्न. “भारत की शासन व्यवस्था की चुनौती सुधारों के अभाव में नहीं, बल्कि उनके कार्यान्वयन में लगातार बनी हुई कमियों में निहित है।” समालोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (250 शब्द)
06 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्थाउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत हाल की सुधार पहलों को उजागर करके कीजिये।
- मुख्य भाग में इन सुधारों के बारे में विस्तार से समझाएँ।
- इसके बाद मौजूदा स्थायी अंतराल और कमियों को स्पष्ट कीजिये।
- अंत में इन कमियों को दूर करने के लिये उपाय प्रस्तुत कीजिये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
हाल के वर्षों में भारत ने कल्याण वितरण, डिजिटल प्रशासन, आर्थिक नियमन और संस्थागत पुनर्गठन सहित शासन के व्यापक सुधार किये हैं।
- GST, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, श्रम संहिता और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसी पहलों में मज़बूत सुधारात्मक इरादे दिखाई देते हैं।
- हालाँकि, वास्तविक परिस्थितियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि सबसे बड़ी चुनौती सुधार की योजना और उसके कुशल क्रियान्वयन के बीच अंतराल को कम करना है।
मुख्य भाग:
भारतीय शासन संरचना में किये गए सुधार:
- अधिकार-आधारित और कल्याण सुधारों का विस्तार: भारत ने सामाजिक समावेशन और राज्य की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये अधिकार-आधारित शासन की दिशा में निर्णायक कदम उठाए हैं।
- सूचना का अधिकार अधिनियम जैसी विधानसभाएँ नागरिकों को पारदर्शिता की मांग करने का अधिकार देती है, जबकि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा ढाँचा और आयुष्मान भारत जैसे कल्याण सुधार न्यूनतम जीवन स्तर की गारंटी सुनिश्चित करने का प्रयास करते हैं।
- ये सुधार यह दर्शाते हैं कि अब कल्याण केवल विवेकाधिकार पर आधारित नहीं रह गया है, बल्कि कानूनी और कार्यक्रमगत रूप से सुनिश्चित अधिकारों में बदल गया है।
- डिजिटल शासन और प्रक्रिया सुधार: आधार आधारित डिजिटल सेवा वितरण (जैसे, डिजी यात्रा), ऑनलाइन पोर्टल्स (जैसे, PRAGATI पोर्टल) और रीयल-टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम (जैसे, POSHAN ट्रैकर) जैसी पहलों ने प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आधुनिक बनाया है।
- उदाहरण के लिये, JAM त्रिवेणी ने सब्सिडी का प्रत्यक्ष अंतरण सक्षम किया, जिससे LPG सब्सिडी और पेंशन जैसी योजनाओं में गबन तथा रिसाव कम हुआ।
- आर्थिक और नियामक सुधार: मुख्य सुधार जैसे GST, दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता तथा श्रम कानूनों के एकीकरण लागू किये गए ताकि अनुपालन को सरल बनाया जा सके, अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाया जा सके तथा व्यवसाय करने की आसानी में सुधार हो सके।
- ये सुधार जटिल संरचनात्मक सुधारों को लागू करने की सरकार की इच्छाशक्ति को दर्शाते हैं।
- संस्थागत और संघीय सुधार: सहकारी संघवाद, वित्तीय विकेंद्रीकरण और नियामक संस्थाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में उठाए गए कदम यह दर्शाते हैं कि बहु-स्तरीय शासन तथा नीति समन्वय में सुधार के प्रयास किये जा रहे हैं।
- उदाहरण के लिये, GST परिषद, जिसे संविधान के अनुच्छेद 279A के तहत स्थापित किया गया, संघ और राज्य सरकारों को एक साझा मंच पर लाती है ताकि वे GST दरें, छूट तथा मुआवज़ा तंत्र पर संयुक्त रूप से निर्णय ले सकें। इस तरह यह सहमति-आधारित निर्णय और सहकारी संघवाद को भारत के वित्तीय शासन में संस्थागत रूप देता है।
- प्रशासनिक और प्रदर्शन सुधार: परिणाम-आधारित बजटिंग, मिशन-मोड कार्यक्रम और प्रदर्शन से जुड़े प्रोत्साहन यह संकेत देते हैं कि शासन को इनपुट-आधारित नियंत्रण से परिणाम-केंद्रित प्रशासन की ओर ले जाने का प्रयास किया जा रहा है।
- उदाहरण के लिये, आकांक्षात्मक ज़िला कार्यक्रम स्वास्थ्य, शिक्षा एवं पोषण में रीयल-टाइम डेटा डैशबोर्ड और परिणाम-आधारित रैंकिंग का उपयोग करके प्रशासन को केवल व्यय ट्रैकिंग से आगे बढ़ाकर मापनीय विकास परिणामों की दिशा में ले जाता है।
लगातार बने रहने वाले क्रियान्वयन अंतराल
- अंतिम स्तर पर कमज़ोर क्षमता: ग्राम पंचायतों, शहरी स्थानीय निकायों और ब्लॉक-स्तरीय कार्यालयों जैसी स्थानीय संस्थाएँ प्राय: अपर्याप्त स्टाफ, सीमित कौशल तथा कमज़ोर बुनियादी ढाँचे के साथ कार्य करती हैं।
- उदाहरण के लिये, प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों और आशा कार्यकर्त्ताओं की कमी स्वास्थ्य योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को प्रभावित करती है, जबकि स्टाफ की कमी से जूझ रहे नगर निकाय, स्पष्ट नीतिगत दिशानिर्देशों के बावजूद ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में संघर्ष करते हैं।
- यह क्षमता की कमी परिणामों को कमज़ोर करती है, भले ही योजनाएँ अच्छी तरह से बनाई गई हों।
- उदाहरण के लिये, प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों और आशा कार्यकर्त्ताओं की कमी स्वास्थ्य योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को प्रभावित करती है, जबकि स्टाफ की कमी से जूझ रहे नगर निकाय, स्पष्ट नीतिगत दिशानिर्देशों के बावजूद ठोस अपशिष्ट प्रबंधन में संघर्ष करते हैं।
- संस्थानों के बीच समन्वय की कमी: कई सुधारों के सफल क्रियान्वयन के लिये मंत्रालयों, राज्यों और स्थानीय निकायों के बीच समन्वित कार्रवाई आवश्यक होती है, लेकिन बिखरी हुई ज़िम्मेदारियाँ कार्यान्वयन में देरी का कारण बनती हैं।
- उदाहरण के लिये, शहरी आवास तथा स्वच्छता पहल में आवास विभाग, शहरी स्थानीय निकायों एवं राज्य एजेंसियों के बीच तालमेल की आवश्यकता होती है, लेकिन अधिकारों के ओवरलैप के कारण परियोजनाएँ प्राय: समय से पीछे रह जाती हैं और लागत बढ़ जाती है।
- कल्याण योजनाओं के वित्तपोषण जैसे क्षेत्रों में केंद्र–राज्य तनाव भी जवाबदेही को कमज़ोर कर देता है।
- उदाहरण के लिये, शहरी आवास तथा स्वच्छता पहल में आवास विभाग, शहरी स्थानीय निकायों एवं राज्य एजेंसियों के बीच तालमेल की आवश्यकता होती है, लेकिन अधिकारों के ओवरलैप के कारण परियोजनाएँ प्राय: समय से पीछे रह जाती हैं और लागत बढ़ जाती है।
- जवाबदेही और निगरानी की सीमाएँ: भले ही डिजिटल डैशबोर्ड इनपुट और आउटपुट का ट्रैक रखते हों, लेकिन वास्तविक परिणामों के लिये जवाबदेही अभी भी कमज़ोर है।
- उदाहरण के लिये, CAG की आयुष्मान भारत–PMJAY से संबंधित ऑडिट रिपोर्टों ने अयोग्य लाभार्थियों की पहचान, दावों में देरी या अस्वीकृति, धोखाधड़ी नियंत्रण की कमज़ोरी और विभिन्न राज्यों में असमान अस्पताल सूचीकरण जैसी समस्याओं को उजागर किया है। यह दर्शाता है कि प्रक्रियात्मक अनुपालन और धन उपयोगिता प्राय: सेवा गुणवत्ता, समानता तथा वास्तविक स्वास्थ्य परिणामों में मौजूद कमियों को छिपा देते हैं।
- क्षेत्रीय और सामाजिक असमानताएँ: समान नीतिगत प्रारूप अक्सर क्षेत्रीय विविधता और स्थानीय बाधाओं की अनदेखी कर देते हैं।
- आकांक्षी ज़िले, जनजातीय क्षेत्र और दूरस्थ इलाके भू-भाग संबंधी कठिनाइयों, कमज़ोर कनेक्टिविटी तथा प्रशासनिक सीमाओं के कारण योजनाओं के क्रियान्वयन में पीछे रह जाते हैं।
- परिणामस्वरूप, विकसित क्षेत्रों तक लाभ तेज़ी से पहुँचते हैं, जिससे अंतर-राज्यीय और राज्य के भीतर असमानताएँ बढ़ती हैं।
- राजनीतिक और नौकरशाही प्रोत्साहन का असंतुलन: अधिकारियों के लगातार स्थानांतरण और जोखिम से बचने वाली प्रशासनिक मानसिकता के चलते दीर्घकालिक सुधारों के प्रति ज़िम्मेदारी तथा प्रतिबद्धता कमज़ोर पड़ जाती है।
- शहरी बुनियादी ढाँचा या सिंचाई सुधार जैसी परियोजनाएँ अक्सर नेतृत्व के बीच में बदल जाने पर अपनी गति खो देती हैं।
- कम अवधि वाले राजनीतिक चक्र त्वरित, दिखने वाले परिणामों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे दीर्घकालिक संस्थागत सुधार, निरंतरता और क्रियान्वयन की प्रभावशीलता प्रभावित होती है।
कार्यान्वयन अंतराल को कम करने के उपाय
- राज्य और स्थानीय क्षमता को मज़बूत करना: मानव संसाधन, प्रशिक्षण और स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक अवसंरचना में निवेश नीति-आशय को वास्तविक परिणामों में बदलने के लिये अनिवार्य है।
- परिणाम-आधारित जवाबदेही तंत्र: प्रक्रिया-आधारित अनुपालन से आगे बढ़ते हुए सामाजिक अंकेक्षण, स्वतंत्र मूल्यांकन और नागरिक फीडबैक के माध्यम से मापनीय परिणामों पर ध्यान केंद्रित करने से प्रभावशीलता बढ़ सकती है।
- सहकारी संघवाद को प्रोत्साहित करना: अधिक वित्तीय अनुकूलन, विश्वास-आधारित केंद्र-राज्य संबंध और योजनाओं के डिज़ाइन में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अनुकूलन से सुधारों को स्थानीय वास्तविकताओं के साथ बेहतर जोड़ा जा सकता है।
- नीति डिज़ाइन को सरल बनाना और सुधार बोझ को कम करना: योजनाओं का विवेकीकरण, चरणबद्ध क्रियान्वयन की अनुमति और अत्यधिक अनुपालन आवश्यकताओं में कमी से प्रशासनिक बोझ घटता है तथा कार्यकुशलता बढ़ती है।
- मानवीय निरीक्षण के साथ तकनीक का उपयोग: डिजिटल साधन प्रशासनिक निर्णय को प्रतिस्थापित नहीं, बल्कि उसका समर्थन और सशक्तीकरण करें। तकनीक को शिकायत निवारण और मानव जवाबदेही के साथ जोड़ने से सेवा वितरण अधिक मज़बूत तथा विश्वसनीय बनता है।
निष्कर्ष
भारत में शासन संबंधी कमी का कारण सुधारों की कमी नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन में निरंतर बनी रहने वाली कमियाँ हैं। सुधार का उद्देश्य स्पष्ट है, लेकिन कमज़ोर क्षमता, समन्वय की विफलताएँ और जवाबदेही की कमी अपेक्षित परिणामों को कमज़ोर कर देती हैं। इस अंतर को कम करने के लिये निरंतर क्रियान्वयन पर ध्यान, संस्थागत सुदृढ़ीकरण और अनुकूलनीय शासन की आवश्यकता है, ताकि सुधारों को वास्तविक जन-कल्याण में बदला जा सके।
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