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प्रश्न :
प्रश्न. जहाँ एक ओर नागरिक समाज संगठन लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में कार्य करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी पारदर्शिता तथा जवाबदेही को लेकर भी चिंताएँ उभरकर सामने आई हैं। भारतीय संदर्भ में इस विरोधाभास का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)
30 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्थाउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत CSOs की परिभाषा से कीजिये।
- मुख्य भाग में CSOs की भूमिका का संक्षेप में उल्लेख कीजिये।
- इसके बाद, CSOs के शासन से संबंधित चिंताओं पर चर्चा कीजिये।
- संतुलन कैसे प्राप्त किया जा सकता है, इस पर सुझाव दीजिये।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
नागरिक समाज संगठन वे गैर-सरकारी, गैर-लाभकारी एवं स्वैच्छिक समूह होते हैं—जिनमें NGOs, परोपकारी संस्थाएँ, अधिकार समर्थक समूह तथा समुदाय-आधारित संगठन शामिल हैं जो राज्य और नागरिकों के बीच सेतु की भूमिका निभाते हैं। भारत में लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और जवाबदेही को बढ़ावा देने में नागरिक समाज संगठनों की ऐतिहासिक रूप से महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
- हालाँकि प्रहरी की भूमिका निभाने के साथ-साथ उनकी पारदर्शिता, वित्तपोषण और जवाबदेही को लेकर चिंताएँ भी बढ़ती जा रही हैं, जिससे एक जटिल विरोधाभास उत्पन्न होता है।
मुख्य भाग:
लोकतंत्र के प्रहरी के रूप में नागरिक समाज की भूमिका
- जवाबदेही और अधिकार संरक्षण को मज़बूत करना: नागरिक समाज संगठन भ्रष्टाचार, मानवाधिकार हननों और शासन में विफलताओं को उजागर करने में महत्त्वपूर्ण रहे हैं।
- नागरिक समाज द्वारा संचालित RTI आंदोलन ने वर्ष 2005 में RTI अधिनियम के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया, जो देश के प्रमुख पारदर्शिता कानूनों में से एक है।
- नागरिक सहभागिता और समावेशन को बढ़ावा देना: भारत में 3 मिलियन से अधिक पंजीकृत NGOs हैं, जिनमें से कई स्थानीय स्तर पर कार्य करते हुए महिलाओं, दलितों, जनजातीय समुदायों और अनौपचारिक श्रमिकों जैसे हाशिये पर रहने वाले समूहों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- ये संगठन नागरिकों और राज्य के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं, जिससे सहभागी शासन सुनिश्चित होता है।
- लोकतांत्रिक संवाद को सुदृढ़ बनाना: सार्वजनिक हित याचिकाओं (PILs), सामाजिक ऑडिट (जैसे, MGNREGA में) तथा नीति समर्थन के माध्यम से नागरिक समाज संगठन सूचित सार्वजनिक बहस एवं नीति सुधार में योगदान देते हैं और अक्सर स्थानीय स्तर पर शासन में मौजूद कमियों को दूर करते हैं।
- उदाहरण के लिये, नागरिक समाज संगठनों द्वारा दायर PILs ने पर्यावरण संरक्षण (वेल्लोर सिटीज़न्स वेलफेयर फोरम केस) और खाद्य सुरक्षा से संबंधित मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप सुनिश्चित किया, जिससे अधिकार आधारित शासन को मज़बूती मिली।
CSO की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर चिंताएँ:
- ‘लेखा अस्पष्टता’ और अस्पष्ट वित्तीय प्रकटीकरण: कई CSO मानकीकृत वित्तीय रिपोर्टिंग में कठिनाइयों का सामना करते हैं, जिससे ‘पारदर्शिता घाटा’ उत्पन्न होता है, जहाँ जटिल परियोजना चक्रों में निधियों का पता लगाना कठिन हो जाता है।
- हालाँकि FCRA 2023 संशोधन ने विस्तृत संपत्ति प्रकटीकरण अनिवार्य किया है, वर्ष 2025 के एक विश्लेषण के अनुसार कई छोटे CSO के पास डिजिटल ढाँचा नहीं है जिससे वे अनुपालन कर सकें और यह वित्तीय अनियमितताओं को छिपाने का अवसर प्रदान कर सकता है।
- अस्थिर आंतरिक शासन और निरीक्षण: कई CSO आंतरिक ऑडिट तंत्र की कमी और संरचित नेतृत्व जवाबदेही के अभाव से जूझते हैं, जिससे अनजाने में उनकी संचालन क्षमता तथा विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
- उदाहरण के लिये, एमनेस्टी इंटरनेशनल के भारत संचालन को FCRA अनुपालन और वित्तीय प्रकटीकरण मार्गों पर जटिल कानूनी विवादों के बाद निलंबित किया गया।
- यह बेहतर शासन की प्रणालीगत आवश्यकता को उजागर करता है, क्योंकि हाल के आँकड़े दिखाते हैं कि वर्ष 2011 से अब तक लगभग 20,000 NGOs प्रशासनिक और रिपोर्टिंग त्रुटियों के कारण अपने लाइसेंस खो चुके हैं।
- वैचारिक पक्षपात और चयनात्मक समर्थन की धारणा: CSO के हस्तक्षेप में तटस्थता की कथित कमी प्राय: चयनात्मक सक्रियता के आरोप उत्पन्न करती है, जो सार्वजनिक राय को ध्रुवीकृत कर सकती है और संस्थागत विश्वास को कमज़ोर कर सकती है।
- इस तरह के तनाव नागरिक समाज में ‘विश्वसनीयता अंतर’ को उजागर करते हैं।
हालाँकि नियमन आवश्यक है, अत्यधिक प्रतिबंध और लाइसेंस का बार-बार निलंबन लोकतांत्रिक क्षेत्र को संकुचित कर सकता है, जिससे समर्थन कार्य, असहमति तथा जन-आधारित सक्रियता प्रभावित होती है।
- जहाँ सरकार ने इस कार्रवाई को अनुपालन कारणों से उचित ठहराया, वहीं कई नागरिक समाज के सदस्यों ने इसे नागरिक क्षेत्र के संकुचन का संकेत माना।
लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के साथ जवाबदेही का संतुलन
- स्व-नियमन और नैतिक शासन को सुदृढ़ बनाना: नागरिक समाज संगठन (CSOs) को पारदर्शी वित्तीय रिपोर्टिंग, समय-समय पर स्वतंत्र ऑडिट और फंडिंग स्रोतों का स्पष्ट प्रकटीकरण संस्थागत रूप से अपनाना चाहिये।
- आंतरिक आचार संहिता, हित संघर्ष नीतियाँ और शिकायत निवारण तंत्र अपनाने से बाह्य दबाव के बिना उनकी विश्वसनीयता तथा सार्वजनिक विश्वास बढ़ाया जा सकता है।
- अनुपातिक और मनमाने नियमन से बचना: FCRA को नियमबद्ध और पारदर्शी तरीके से लागू किया जाना चाहिये, ताकि इसकी अनुपालन आवश्यकताएँ असहमति को दबाने या चयनात्मक कार्रवाई के साधन न बनें।
- नियमन का उद्देश्य नियंत्रण नहीं बल्कि जवाबदेही होना चाहिये, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(c) में प्रदत्त अधिकारों में निहित है।
- सहयोगी शासन मॉडल को बढ़ावा देना: सरकारी संस्थाओं और CSOs के बीच रचनात्मक सहभागिता नीति निर्माण तथा कार्यान्वयन में सुधार कर सकती है।
- स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण और सामाजिक कल्याण जैसे क्षेत्रों में साझेदारी राज्य को स्थानीय स्तर की विशेषज्ञता का लाभ उठाने के साथ-साथ निरीक्षण तथा जवाबदेही सुनिश्चित करने में सहायता करती है।
- संवाद और परामर्श को संस्थागत बनाना: नीति परामर्श, हितधारक मंच तथा सामाजिक ऑडिट जैसे नियमित परामर्श तंत्र अविश्वास को कम कर सकते हैं और नागरिक समाज के सुझावों को शासन में शामिल कर सकते हैं, बिना राज्य के अधिकार को कमज़ोर किये।
- CSOs की क्षमता निर्माण और पेशेवर विशेषज्ञता बढ़ाना: प्रशिक्षण और मान्यता के माध्यम से CSO की प्रबंधकीय, वित्तीय तथा कानूनी क्षमताओं को बढ़ाना उनकी प्रभावशीलता को सुधार सकता है, शासन संबंधी त्रुटियों को कम कर सकता है और सार्वजनिक विश्वास को मज़बूत कर सकता है।
- नागरिक क्षेत्र तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संरक्षण: एक स्वस्थ लोकतंत्र में असहमति, बहस और समर्थन के लिये स्थान होना आवश्यक है। शांतिपूर्ण आलोचना और समर्थन को अपराध मानने से रोकना लोकतांत्रिक मज़बूती तथा सामाजिक नवाचार के लिये अनिवार्य है।
- न्यायिक निगरानी को सुदृढ़ बनाना: एक स्वतंत्र न्यायपालिका राज्य के नियमन और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है, कार्यकारी कार्रवाइयों की समीक्षा करती है तथा संवैधानिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करती है।
निष्कर्ष:
नागरिक समाज भारत के लोकतांत्रिक ढाँचे की एक आधारशिला बना हुआ है, जो सुधार के लिये न केवल चेतना बल्कि उत्प्रेरक का भी कार्य करता है। इसकी वैधता बनाए रखने और लोकतांत्रिक शासन को मज़बूत करने के लिये स्वायत्तता को कमज़ोर किये बिना पारदर्शिता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
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