दृष्टि के NCERT कोर्स के साथ करें UPSC की तैयारी और जानें
ध्यान दें:

मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. पूर्वी यूरोप तथा पश्चिम एशिया में जारी संघर्षों ने वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा संरचनाओं की सीमाओं को उजागर किया है। समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये कि ये घटनाक्रम वैश्विक स्थिरता तथा भारत के रणनीतिक हितों को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। (250 शब्द)

    30 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की भूमिका हालिया संघर्षों को रेखांकित करते हुए प्रस्तुत कीजिये।
    • मुख्य भाग में मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना की सीमाओं और उनके प्रभावों पर चर्चा कीजिये।
    • भारत के रणनीतिक हितों पर पड़ने वाले प्रभावों का उल्लेख कीजिये तथा भारत के हितों की सुरक्षा हेतु उपाय सुझाइये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    पूर्वी यूरोप (रूस–यूक्रेन युद्ध) और पश्चिम एशिया (जैसे इज़रायल–हमास संघर्ष तथा व्यापक क्षेत्रीय तनाव) में लंबे समय से जारी संघर्षों ने संयुक्त राष्ट्र तथा सामूहिक सुरक्षा तंत्र जैसी वैश्विक सुरक्षा संरचनाओं की गंभीर कमज़ोरियों को उजागर किया है।

    कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद इन संघर्षों का जारी रहना यह दर्शाता है कि बड़े युद्धों को रोकने या उनका समाधान करने में मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय प्रणालियाँ सीमित हैं। इनके वैश्विक प्रभाव आर्थिक, रणनीतिक और सुरक्षा क्षेत्रों तक व्यापक रूप से फैल रहे हैं।

    मुख्य भाग:

    मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा संरचना की सीमाएँ – वैश्विक स्थिरता पर प्रभाव

    • पारंपरिक सुरक्षा ढाँचों का क्षरण: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अन्य बहुपक्षीय संस्थाओं की बड़े पैमाने के संघर्षों को प्रभावी ढंग से रोकने या समाप्त करने में असमर्थता उनकी सीमित प्रवर्तन क्षमता को दर्शाती है। 
      • प्रमुख शक्तियों के बीच बढ़ता तनाव इन ढाँचों पर विश्वास को और कमज़ोर करता है।
      • क्षेत्रीय अखंडता’ और ‘संप्रभुता’ (संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2) जैसे सिद्धांतों का चयनात्मक रूप से अनुप्रयोग किया जा रहा है।
        • इसके अतिरिक्त, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) के निर्णयों को लागू कराने में असमर्थता वैश्विक स्तर पर किसी प्रभावी ‘प्रवर्तन तंत्र’ के अभाव को और अधिक उजागर करती है।
    • रणनीतिक ध्रुवीकरण और प्रतिस्पर्द्धा: यूक्रेन संकट ने नाटो और रूस के बीच विभाजन को और गहरा कर दिया है, जबकि पश्चिम एशिया में तनावों में प्रायः बाह्य शक्तियाँ (अमेरिका, रूस, यूरोपीय संघ, ईरान और खाड़ी देश) शामिल रहती हैं। इससे परस्पर अतिव्यापी संघर्ष क्षेत्र बनते हैं और सुरक्षा वातावरण अधिक खंडित हो जाता है।
    • आर्थिक व्यवधान और वैश्विक जोखिम: संघर्षों के कारण ऊर्जा तथा खाद्य आपूर्ति शृंखलाएँ बाधित हुई हैं, जिससे मुद्रास्फीतिक दबाव बढ़े हैं और वैश्विक स्तर पर आर्थिक वृद्धि धीमी हुई है। भू-राजनीतिक जोखिम बाज़ारों और आपूर्ति शृंखलाओं में अनिश्चितता के प्रमुख कारक बने हुए हैं।
      • उदाहरण के लिये, विश्व व्यापार संगठन (WTO) अपने कमज़ोर विवाद निपटान तंत्र के कारण निर्यात प्रतिबंधों को रोकने या व्यापार नियमों को प्रभावी ढंग से लागू करने में असमर्थ रहा है, जबकि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की वित्तीय सहायता, यद्यपि स्थिरीकरण प्रदान करती है, ऊर्जा और खाद्य आपूर्ति में व्यवधान जैसे आपूर्ति-पक्षीय आघातों का समाधान नहीं कर पाती। इससे मुद्रास्फीति और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता को नियंत्रित करने की उसकी क्षमता सीमित हो जाती है।
    • क्षेत्रीय प्रसार प्रभाव और अस्थिरता: किसी एक क्षेत्र में होने वाला सशस्त्र संघर्ष दूरगामी और संक्रामक प्रभाव उत्पन्न करता है, जिससे पड़ोसी देश तथा गठबंधन प्रभावित होते हैं, हथियारों की प्रतिस्पर्द्धा तीव्र होती है तथा विभिन्न महाद्वीपों में कूटनीतिक प्रयास अधिक जटिल हो जाते हैं।
      • रूस–यूक्रेन संघर्ष ने पूर्वी यूरोप से बाहर भी महत्त्वपूर्ण प्रसार प्रभाव उत्पन्न किये हैं।
      • इससे नाटो के विस्तार को बल मिला है, जहाँ फिनलैंड (और स्वीडन) ने सदस्यता की मांग की है, जिससे पूरे यूरोप में हथियारों के संग्रह और सैन्य सुदृढ़ीकरण में वृद्धि हुई है।
    • परमाणु खतरे की राजनीति: परमाणु वाक्यांशों का सामान्यीकरण (विशेष रूप से पूर्वी यूरोप में) ने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) व्यवस्था को कमज़ोर कर दिया है, जिससे अन्य क्षेत्रीय शक्तियों को परमाणु निरोधक की खोज करने के लिये प्रोत्साहित किया जा सकता है।

    भारत के रणनीतिक हितों पर प्रभाव:

    • रणनीतिक स्वायत्तता का संतुलन: भारत की पारंपरिक गुटनिरपेक्षता और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति की परीक्षा तब होती है, जब वह पश्चिमी तथा गैर-पश्चिमी शक्तियों दोनों के साथ संबंध बनाए रखने का प्रयास करता है।
      • उदाहरण के लिये, रूस–यूक्रेन घटनाक्रम पर भारत की संतुलित प्रतिक्रिया को कई बार अन्य पक्षों की आलोचना का सामना करना पड़ा है, जिससे कूटनीतिक संतुलन और अधिक जटिल हो गया है।
    •  ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा: भारत की ऊर्जा सुरक्षा काफी हद तक पश्चिम एशिया से स्थिर आपूर्ति पर निर्भर करती है।
      • इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का व्यवधान आयात लागत बढ़ा सकता है, मुद्रास्फीति को प्रभावित कर सकता है और प्रतिद्वंद्वी पक्षों के बीच भारत के कूटनीतिक संतुलन को तनावपूर्ण बना सकता है।
    • प्रवासी भारतीय और सुरक्षा संबंधी पहलू: पश्चिम एशियाई देशों में बड़ी संख्या में भारतीय प्रवासी रहते हैं, जिससे क्षेत्रीय स्थिरता भारत के सामाजिक-आर्थिक हितों, विशेषकर विप्रेषण के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है।
      • संघर्ष की स्थिति में उनकी संवेदनशीलता बढ़ जाती है और निकासी व कल्याण संबंधी उपायों की आवश्यकता पड़ती है।
      • उदाहरणस्वरूप, इज़रायल–हमास संघर्ष (2023) के दौरान भारत ने भारतीय नागरिकों की निकासी के लिये  ऑपरेशन अजय शुरू किया, जो यह दर्शाता है कि क्षेत्रीय संघर्ष किस प्रकार तुरंत भारतीय प्रवासियों की संवेदनशीलता बढ़ा देते हैं।
    • व्यापार और संपर्क पहल: क्षेत्रीय अस्थिरता के चलते भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC) जैसी संपर्क एवं आर्थिक गलियारों से जुड़ी भारत की पहल प्रभावित हो सकती है, जिसका प्रतिकूल प्रभाव व्यापार प्रवाह और निवेशकों के विश्वास पर पड़ता है।
    • आतंकवाद-रोधी और सुरक्षा सहयोग: निरंतर बनी रहने वाली अस्थिरता पश्चिम एशियाई देशों के साथ आतंकवाद-रोधी सहयोग को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता को रेखांकित करती है। इस क्षेत्र में भारत खुफिया जानकारी साझा करने तथा  संयुक्त प्रयासों को बढ़ाने पर विशेष ज़ोर देता रहा है।

     वैश्विक संघर्षों के बीच भारत अपने हितों को कैसे सुरक्षित कर सकता है:

    • रणनीतिक स्वायत्तता और मुद्दा-आधारित गठबंधनों का अनुसरण: भारत को बहुध्रुवीय विश्व में अनुकूलन बनाए रखने के लिये कठोर गठबंधनों से बचते हुए विभिन्न शक्ति केंद्रों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने चाहिये।
    • ऊर्जा और आपूर्ति शृंखला की अनुकूलन क्षमता को सुदृढ़ करना: ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना बाह्य आघातों के प्रति संवेदनशीलता को कम करता है।
    • कूटनीतिक और बहुपक्षीय सहभागिता को सशक्त बनाना: G20, क्वाड, शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और ब्रिक्स जैसे मंचों में सक्रिय भागीदारी से भारत वैश्विक मानदंडों को आकार दे सकता है तथा संघर्ष के बजाय संवाद को प्रोत्साहित कर सकता है।
    • प्रवासी भारतीयों और समुद्री हितों की सुरक्षा: समुद्री सुरक्षा, निकासी क्षमताओं और कूटनीतिक संपर्क को मज़बूत करना विदेशों में भारतीय नागरिकों तथा व्यापार मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
    • वैश्विक शासन संस्थाओं में सुधार को बढ़ावा देना: भारत को संयुक्त राष्ट्र सुधारों का समर्थन जारी रखना चाहिये, ताकि वैश्विक संस्थाएँ अधिक प्रतिनिधिक, विश्वसनीय और संघर्ष समाधान में सक्षम बन सकें।

     निष्कर्ष:

    पूर्वी यूरोप और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष वर्तमान वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था की नाज़ुकता को उजागर करते हैं। भारत के लिये अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा हेतु रणनीतिक स्वायत्तता, विविधीकृत साझेदारियाँ और सक्रिय कूटनीति अपनाना आवश्यक है, ताकि वह निरंतर अधिक अस्थिर होते अंतर्राष्ट्रीय परिवेश में प्रभावी रूप से मार्गदर्शन कर सके।

    To get PDF version, Please click on "Print PDF" button.

    Print
close
Share Page
images-2
images-2