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मेन्स प्रैक्टिस प्रश्न

  • प्रश्न :

    प्रश्न. यद्यपि डिजिटल शासन पहलों का उद्देश्य उत्तरदायी तथा पारदर्शी शासन व्यवस्था का निर्माण करना है, परंतु इनसे अनेक बार विद्यमान सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को बढ़ाने का जोखिम भी उत्पन्न होता है। भारत द्वारा प्रवर्तित डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) की पृष्ठभूमि में इस विरोधाभास का विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)

    09 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • DPI के तीव्र विस्तार और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं में निहित इसके विरोधाभास का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
    • मुख्य भाग में डिजिटल पहल के सकारात्मक पहलुओं के साथ-साथ विरोधाभासों और कारणों का विवरण दीजिये।
    • विरोधाभासों को दूर करने के उपाय सुझाइये।
    • तदनुसार निष्कर्ष लिखिये।

    परिचय: 

    भारत की तेज़ी से बढ़ती डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI)—जो आधार, UPI, CoWIN, DigiLocker जैसे प्लेटफॉर्मों पर आधारित है—को पारदर्शिता बढ़ाने और सेवा वितरण में सुधार के लिये सराहा गया है। ओपन और इंटरऑपरेबल डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से राज्य का उद्देश्य कल्याणकारी सेवाओं तक पहुँच को लोकतांत्रिक बनाना है।

    • हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने आधिकारिक रूप से UPI को लेन-देन की मात्रा के आधार पर रीयल-टाइम डिजिटल भुगतान में विश्व का अग्रणी सिस्टम घोषित किया है।

    मुख्य भाग:

     भारत में DPI का विरोधाभास

    • डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) को डिजिटल-डिफॉल्ट शासन के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाने, लीकेज कम करने और सेवा वितरण में सुधार करने के उद्देश्य से डिज़ाइन किया गया है।
    • हालाँकि भारत की गहरी सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ - आय, जाति, लिंग, शिक्षा और क्षेत्र के मामले में - डिजिटल टूल्स और अवसरों तक असमान पहुँच बनाती हैं।
    • इसके परिणामस्वरूप, सशक्तीकरण और समावेशन के उद्देश्य से विकसित डिजिटल प्लेटफॉर्म कभी-कभी अनपेक्षित रूप से उन व्यक्तियों को हाशिये पर धकेल देते हैं या वंचित कर देते हैं जिनके पास आवश्यक उपकरण, इंटरनेट कनेक्टिविटी या पर्याप्त डिजिटल साक्षरता नहीं होती।

    डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) शासन को कैसे बेहतर बनाता है -सकारात्मक पक्ष

    • लीकेज और भ्रष्टाचार में कमी: आधार-आधारित डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) यह सुनिश्चित करता है कि LPG (पहल/PAHAL) और पेंशन जैसी सब्सिडी सीधे लाभार्थियों तक पहुँचे, जिससे मध्यस्थों की भूमिका समाप्त होती है और फर्जी/डुप्लिकेट खातों पर अंकुश लगती है।
    • सेवा वितरण की दक्षता और गति में सुधार: कोविन (CoWIN) जैसे प्लेटफॉर्म ने COVID-19 के दौरान रीयल-टाइम वैक्सीन पंजीकरण, स्लॉट आवंटन और प्रमाणन की सुविधा प्रदान की, जिससे बड़े पैमाने पर डिजिटल समन्वय की क्षमता प्रदर्शित हुई।
    • वित्तीय समावेशन और औपचारिकीकरण को बढ़ावा: UPI, जन धन योजना और ई-केवाईसी के संयोजन ने करोड़ों लोगों को डिजिटल भुगतान प्रणाली में शामिल किया है, जिससे छोटे विक्रेता और कामगार सस्ती और त्वरित लेन-देन का लाभ उठा सकते हैं।
    • प्रशासनिक पारदर्शिता और रिकॉर्ड-कीपिंग को सुदृढ़ बनाना: डिजीलॉकर (DigiLocker) स्कूल प्रमाणपत्र, लाइसेंस तथा सरकारी दस्तावेज़ों को डिजिटल रूप में सुरक्षित करता है, जिससे कागज-पत्र की आवश्यकता कम होती है और दस्तावेज़ों में छेड़छाड़ की संभावना घटती है।
    • गतिशीलता और नागरिक सुविधा में सुधार: FASTag जैसे सिस्टम टोल भुगतान को स्वचालित बनाते हैं और इंतजार के समय को कम करते हैं, जिससे यह दिखाया जाता है कि DPI दैनिक प्रशासनिक सेवाओं और नागरिक अनुभव को बेहतर बनाने में कैसे मदद करता है।

    डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) असमानताओं को कैसे बढ़ा सकता है — नकारात्मक पक्ष

    • डिजिटल विभाजन से बहिष्कार में वृद्धि: स्मार्टफोन, इंटरनेट और बिजली जैसी सुविधाओं में असमानता, विशेषकर ग्रामीण, आदिवासी और निम्न-आय वाले परिवारों में, DPI प्लेटफॉर्मों का उपयोग करने की क्षमता को सीमित कर देती है।
    • प्रमाणीकरण और पहुँच की समस्याएँ: आधार बायोमेट्रिक असंगतियाँ, नेटवर्क बाधाएँ या फिंगरप्रिंट संबंधी समस्याओं के कारण अक्सर बुजुर्ग, श्रमिक और दिव्यांग व्यक्ति राशन या पेंशन जैसी सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं।
    • कम डिजिटल साक्षरता व लैंगिक अंतर: महिलाएँ, बुजुर्ग तथा अनौपचारिक श्रमिक अक्सर डिजिटल सिस्टम को इस्तेमाल करने के लिये आवश्यक कौशल से वंचित रहते हैं, जिससे मौजूदा सामाजिक एवं आर्थिक असमानताएँ और गहरी होती हैं।
    • भाषा और इंटरफेस संबंधी चुनौतियाँ: कई DPI प्लेटफॉर्म स्थानीय भाषाओं में पूरी तरह से उपलब्ध नहीं हैं और कम साक्षरता वाले उपयोगकर्त्ताओं के लिये जटिल हैं, जिससे समाज के बड़े वर्ग इन सेवाओं तक पहुँच से वंचित रह जाते है।
    • प्लेटफॉर्म पर निर्भरता से नई बहिष्कृतियाँ: निजी ऐप्स, ई-वॉलेट और OTP आधारित सेवाओं पर निर्भरता उन लोगों को बहिष्कृत कर सकती है जिनके पास स्मार्टफोन, स्थिर नेटवर्क कनेक्शन या डिजिटल पहचान नहीं है।
    • डेटा संरक्षण और निजता संबंधी  चुनौतियाँ: कम जागरूकता और अपर्याप्त सुरक्षा उपायों के चलते वे संवेदनशील नागरिक, जिनके पास अपने डेटा की सुरक्षा या दुरुपयोग के खिलाफ शिकायत करने के साधन नहीं हैं, असमान रूप से प्रभावित हो सकते हैं।

    DPI को समावेशी बनाने और असमानताओं को कम करने के उपाय

    • सर्वसामान्य डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश: ग्रामीण, पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों में भारतनेट और राज्य स्तरीय फाइबर मिशनों के माध्यम से लास्ट-माइल ब्रॉडबैंड, 4G/5G नेटवर्क और स्थिर विद्युत सेवा की सुविधा को विस्तारित करना।
    • सहायक डिजिटल पहुँच मॉडल को बढ़ावा देना: जो नागरिक उपकरण या डिजिटल साक्षरता से वंचित हैं, उनके लिये कॉमन सर्विस सेंटर (CSCs), पंचायत डिजिटल कियोस्क और सामुदायिक स्वयंसेवकों को सशक्त बनाकर डिजिटल सेवाओं का मार्गदर्शन उपलब्ध कराना।
    • लक्षित अभियान के माध्यम से डिजिटल साक्षरता में सुधार: महिलाओं, बुजुर्गों, दलित/आदिवासी समुदायों और प्रवासी श्रमिकों के लिये विशेष कार्यक्रम संचालित करना, जिसमें स्कूल, स्वयं सहायता समूह (SHGs) तथा आँगनवाड़ी नेटवर्क का उपयोग किया जाए।
    • बहुभाषी और सुलभ यूज़र इंटरफेस तैयार करना: ऐप्स तथा पोर्टल्स को क्षेत्रीय भाषाओं में डिजाइन करना, जिसमें वॉइस-नेविगेशन, बड़े आइकॉन और दिव्यांगों के अनुकूल सुविधाएँ शामिल हों।
    • डेटा सुरक्षा और शिकायत निवारण तंत्र को सुदृढ़ बनाना: संवेदनशील समूहों के अधिकारों की रक्षा के लिये मज़बूत गोपनीयता उपाय, पारदर्शी एल्गोरिदम और त्वरित शिकायत निवारण प्रणाली लागू की जानी चाहिये, जिससे वे अनुचित वंचना या लाभ न मिलने की स्थिति में आपत्ति दर्ज कर सकें।
    • वहनीय डिजिटल पहुँच को प्रोत्साहित करना: कम आय वाले लोगों के लिये सब्सिडी वाले स्मार्टफोन, सार्वजनिक वाई-फाई क्षेत्र और सस्ते डेटा पैक प्रदान करके आर्थिक बाधाओं को कम किया जा सकता है।
    • स्थानीय संस्थागत क्षमता को सुदृढ़ करना: फ्रंटलाइन वर्कर्स, पंचायत कर्मचारियों और कल्याण अधिकारियों को डिजिटल उपकरणों और प्लेटफॉर्म का प्रशिक्षण प्रदान करके अंतिम छोर तक सुविधाजनक और प्रभावी सेवा वितरण सुनिश्चित करना।

    निष्कर्ष: 

    भारत का DPI-आधारित शासन मॉडल SDG 9 (उद्योग, नवाचार, बुनियादी सुविधाएँ) और SDG 16 (सशक्त संस्थाएँ) के साथ सुमेलित है, क्योंकि यह पारदर्शिता तथा कुशल सेवा वितरण को बढ़ावा देता है। हालाँकि यदि कनेक्टिविटी, साक्षरता, किफायती पहुँच एवं संस्थागत क्षमता के अंतर को कम नहीं किया गया, तो यह SDG 10 (असमानताओं में कमी) को कमज़ोर कर सकता है। इसलिये वास्तव में समावेशी DPI के लिये मज़बूत डिजिटल सिस्टम के साथ सहायक पहुँच, सुरक्षा उपाय व मानव-केंद्रित डिज़ाइन का संयोजन आवश्यक है।

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