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प्रश्न :
प्रश्न. "विकसित हो रहे बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के प्रति भारत का दृष्टिकोण बहु-संरेखण तथा रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है। चीन के उदय से उत्पन्न चुनौतियों से निपटते हुए भारत के मूल राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा में इस दृष्टिकोण की प्रभावशीलता का विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)
09 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 2 अंतर्राष्ट्रीय संबंधउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- विकसित हो रही बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
- मुख्य भाग में इस दृष्टिकोण की प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिये।
- इस दृष्टिकोण की कुछ सीमाओं का उल्लेख कीजिये।
- तदनुसार निष्कर्ष लिखिये।
परिचय:
बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था उस वैश्विक प्रणाली को कहते हैं जिसमें शक्ति एक या दो देशों के बजाय कई प्रमुख देशों में वितरित होती है। इसके मुख्य लक्षणों में आर्थिक और तकनीकी शक्ति का वितरण, मुद्दा-आधारित गठबंधन और सख्त गुटों का कम होना शामिल है, जिससे देशों को साझेदारियों में अधिक लचीलापन प्राप्त होता है।
उदाहरण के लिये भारत, जापान, यूरोपीय संघ (EU) और आसियान (ASEAN) जैसी मध्यम शक्तियों का उदय, जो चीन तथा अमेरिका के बीच संतुलन बनाती हैं एवं इसके लिये क्वाड (Quad) व मिनी-लेटरल (Mini-lateral) जैसे मंचों का उपयोग करती हैं, इस लचीले, बहु-केंद्रित शक्ति ढाँचे को दर्शाता है।
मुख्य भाग:
भारत के मुख्य राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित करने में इस दृष्टिकोण की प्रभावशीलता:
- चीन की सैन्य असमानता को संतुलित करने के लिये रक्षा साझेदारियाँ: भारत के सैन्य आधुनिकीकरण और निवारक क्षमता को विविध रणनीतिक साझेदारियों से महत्त्वपूर्ण लाभ प्राप्त हुआ है।
- उदाहरण के लिये 2020 के गलवान संघर्ष के बाद अमेरिका ने भारत को ठंडे मौसम के उपकरण और खुफिया जानकारी की आपूर्ति तेज़ कर दी, जो संकट के समय बहु-संरेखण की व्यावहारिक उपयोगिता को दर्शाता है।
- भारत द्वारा फ्राँस से राफेल जेट, अमेरिका से MH-60R हेलीकॉप्टर और इज़राइल से UAV का अधिग्रहण चीन के सैन्य आधुनिकीकरण के संतुलन में योगदान देता है।
- भारतीय महासागर की सुरक्षा के लिये समुद्री साझेदारियाँ: चीन की बढ़ती नौसैनिक पहुँच, जो भारतीय महासागर में PLAN पनडुब्बियों की उपस्थिति और जिबूती में द्वि-उपयोग सुविधाओं से स्पष्ट है, ने समुद्री संतुलन बनाए रखना आवश्यक बना दिया है।
- भारत के जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्राँस, अमेरिका और सिंगापुर के साथ लॉजिस्टिक्स समझौते नौसैनिक अड्डों तक पारस्परिक पहुँच की अनुमति देते हैं, जिससे संचालनात्मक पहुँच बढ़ती है।
- उदाहरण के लिये भारत ने इंडोनेशिया और थाईलैंड के साथ अंडमान सागर में संयुक्त गश्त की है, ताकि अवैध गतिविधियों को रोका जा सके और चीन के बढ़ते जहाज़ों के शोध की गतिविधियों को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच क्षेत्रीय स्थिति के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके।
- चीन-संबंधित संस्थाओं में चयनात्मक लाभ हेतु भागीदारी: भारत BRICS, SCO और AIIB जैसे मंचों के साथ जुड़ा रहता है, जहाँ चीन का प्रभाव है, लेकिन भारत विकास संबंधी लाभ प्राप्त करता है।
- AIIB के माध्यम से भारत ने बुनियादी ढाँचे और ऊर्जा परियोजनाओं के लिये वित्त पोषण सुनिश्चित किया है और यह इसके सबसे बड़े लाभार्थियों में से एक बन गया है।
- BRICS के भीतर भारत ने वित्तीय संरचना में सुधार और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना सहयोग के लिये सफलतापूर्वक प्रयास किये, जिससे समूह के भीतर चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने में मदद मिली।
- उदाहरण के लिये LAC संकट के बाद भी भारत द्वारा कई BRICS मंत्रिस्तरीय बैठकें आयोजित करना यह दर्शाता है कि यह अलगाव नहीं बल्कि संतुलित जुड़ाव है।
- रणनीतिक स्वतंत्रता के लिये कूटनीति: रूस के साथ संबंध बनाए रखना, ताकि चीन-रूस के गठबंधन द्वारा घेरने की स्थिति से बचा जा सके और यह सुनिश्चित करना कि स्पेयर पार्ट्स, ऊर्जा और तकनीक तक पहुँच बनी रहे, विशेष रूप से तब जब रूस चीन की ओर झुक रहा हो।
- S-400 वायु रक्षा प्रणाली, जिसकी वैश्विक प्रतिबंधों के बावजूद भारत को आपूर्ति की गई, भारत की स्वायत्तता-प्रधान खरीद नीति को दर्शाती है।
- यूक्रेन संकट पर संयुक्त राष्ट्र में नई दिल्ली की लगातार तटस्थता ने रूस के साथ संबंध बनाए रखते हुए पश्चिमी साझेदारों के साथ रिश्तों को नुकसान पहुँचाए बिना सफल कूटनीतिक संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत किया।
- जलवायु, तकनीक और स्वास्थ्य कूटनीति: भारत की अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), आपदा-प्रतिरोधी अवसंरचना गठबंधन तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) कूटनीति में भूमिका चीन से स्वतंत्र वैश्विक नेतृत्व को बढ़ावा देती है।
- उदाहरण के लिये G20 नई दिल्ली लीडर्स डिक्लेरेशन (2023), जिसे भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण के बीच भी सर्वसम्मति से अपनाया गया, ने भारत की चीन सहित जटिल शक्ति प्रतिद्वंद्विताओं में कुशल कूटनीतिक संतुलन बनाने की क्षमता को प्रदर्शित किया।
सीमाएँ और संरचनात्मक बाधाएँ
- स्थायी सैन्य असमानता: चीन का रक्षा बजट भारत के रक्षा बजट से तीन गुना से अधिक है।
- नवीन साझेदारियों के बावजूद LAC अस्थिर बना हुआ है, जो वर्ष 2020 के बाद PLA की बार-बार की अतिक्रमण गतिविधियों से स्पष्ट है।
- व्यापार असंतुलन और आपूर्ति शृंखला की संवेदनशीलता: 70% से अधिक फार्मास्यूटिकल API और बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक्स व सौर घटक अभी भी चीन से आयात किये जाते हैं। यह भारत की सौदेबाज़ी की शक्ति को सीमित करता है।
- केवल चीन ही वर्ष 2024-25 में भारत के कुल $283 बिलियन व्यापार घाटे का लगभग 35% के लिये ज़िम्मेदार था।
- भारत के प्रयासों के बावजूद पड़ोसी क्षेत्रों में प्रभाव: चीन चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) और J-35 लड़ाकू जेट जैसे रक्षा समझौतों के माध्यम से पाकिस्तान में मज़बूत स्थिति बनाए हुए है।
- चीन ने श्रीलंका में हंबनटोटा पोर्ट का अधिग्रहण किया। इसके अलावा म्याँमार के रखाइन राज्य में क्यौकफ्यु डीप-सी पोर्ट बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के तहत चीन-म्याँमार आर्थिक गलियारे (CMEC) का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
- इस "स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स" रणनीति का मकसद भारत को घेरना है, जिसमें कम राजनीतिक शर्तों के साथ आर्थिक मदद दी जाती है, जिससे बीजिंग क्षेत्रीय देशों के लिये एक आकर्षक पार्टनर बन जाता है।
- रूस–चीन संबंध भारत के विकल्पों को सीमित करता है: रूस और चीन के गहरे जुड़ाव से भारत की रूस को स्वतंत्र शक्ति केंद्र के रूप में उपयोग करने की क्षमता कम हो जाती है।
सीमाओं और संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने के उपाय
- सैन्य विषमता को संबोधित करना
- केंद्रित रक्षा आधुनिकीकरण: उच्च-प्रभाव वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता देना, ISR क्षमता, ड्रोन, वायु रक्षा, साइबर युद्ध और सटीक लंबी दूरी के स्ट्राइक सिस्टम को सशक्त बनाना ।
- 3–5 वर्ष के “महत्वपूर्ण क्षमता तेज़ी योजना” के माध्यम से रुकी हुई खरीद को तेज़ करना।
- घरेलू रक्षा उत्पादन बढ़ाना: iDEX और मेक-इन-इंडिया ईकोसिस्टम का विस्तार करके तोपखाना, UAVs, रोबोटिक्स और अंतरिक्ष-आधारित निगरानी उपकरण का उत्पादन करना।
- रक्षा अनुसंधान और विकास में निजी क्षेत्र और स्टार्टअप्स को शामिल करने हेतु प्रोत्साहन देना, साथ ही उनके लिये सुनिश्चित खरीद अनुबंध प्रदान करना।
- पड़ोसी देशों में चीन के प्रभाव का मुकाबला करना
- उच्च-दृश्यता और त्वरित प्रभाव वाले प्रोजेक्ट को समय पर पूरा करना।
- नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में ऊर्जा ग्रिड, डिजिटल पेमेंट, सीमा-पार रेल और स्वास्थ्य अवसंरचना पर ध्यान केंद्रित करना।
- समय पर परियोजना पूरा करने के लिये Gati-Shakti और PM-DevINE फ्रेमवर्क का उपयोग करना।
- सांस्कृतिक और लोगों के बीच कूटनीति को मज़बूत करना
- छात्रवृत्ति, बौद्ध सर्किट प्रचार और मेडिकल टूरिज़्म पैकेज बढ़ाना।
- भारतीय तकनीक (UPI, CoWIN, आधार जैसे समाधान) को चीन के डिजिटल ईकोसिस्टम के विकल्प के रूप में सॉफ्ट पावर के रूप में बढ़ावा देना।
- रूस-चीन अभिसरण का प्रबंधन
- रक्षा के अलावा रूस के साथ जुड़ाव को विविध बनाना: आर्कटिक ऊर्जा, न्यूक्लियर पावर, कोकिंग कोयला और फार्मास्यूटिकल्स में सहयोग बढ़ाना, जो भारत की ताकत है।
- घरेलू रक्षा स्पेयर उत्पादन बढ़ाना: “मेक-इन-इंडिया” और लाइसेंसिंग समझौतों के तहत स्पेयर का सह-उत्पादन करके रूस पर निर्भरता कम करना।
निष्कर्ष:
भारत की बहु-संरेखण और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अभी भी व्यवहार्य है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता संरचनात्मक अंतराल को सुधारने पर निर्भर करती है। घरेलू क्षमताओं को मज़बूत करना, विश्वसनीय क्षेत्रीय साझेदारियाँ बनाना, सैन्य आधुनिकीकरण तेज़ करना तथा चीन पर आर्थिक निर्भरता कम करना दीर्घकालीन रणनीतिक प्रतिस्पर्द्धा बनाए रखने के मुख्य स्तंभ हैं।
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