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प्रश्न :
प्रश्न. ब्रिटेन में संसदीय सर्वोच्चता के सिद्धांत की भारत में संवैधानिक सर्वोच्चता की अवधारणा से तुलना कीजिये। (150 शब्द)
25 Nov, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 2 राजव्यवस्थाउत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- ब्रिटिश और भारतीय संवैधानिक प्रणालियों का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
- दोनों प्रणालियों की प्रमुख आयामों के आधार पर तुलना और अंतर स्पष्ट कीजिये।
- उचित निष्कर्ष दीजिये।
परिचय:
ब्रिटिश और भारतीय संवैधानिक व्यवस्थाएँ लोकतांत्रिक शासन के दो परस्पर भिन्न दृष्टिकोणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। जहाँ यूनाइटेड किंगडम (UK) संसदीय सर्वोच्चता के पारंपरिक वेस्टमिंस्टर सिद्धांत का पालन करता है, जो शताब्दियों के संवैधानिक विकास पर आधारित है, वहीं भारत संवैधानिक सर्वोच्चता के सिद्धांत को अपनाता है, जिसमें लिखित संविधान सर्वोच्च प्राधिकरण होता है। ये भिन्नताएँ दोनों देशों में सत्ता के वितरण, न्यायपालिका की भूमिका, अधिकारों के संरक्षण तथा संघवाद की प्रकृति के स्वरूप को निर्धारित करती हैं।
मुख्य भाग:
प्रमुख आयामों में तुलना:
आयाम
संसदीय सर्वोच्चता (UK)
संवैधानिक सर्वोच्चता (भारत)
1. मूल दर्शन
पूर्ण संप्रभुता: संसद सर्वोच्च कानूनी प्राधिकरण है। यह किसी भी कानून को बना या रद्द कर सकती है। कानून द्वारा किसी भी व्यक्ति या संस्था को संसद के विधान को रद्द करने या निरस्त करने का अधिकार नहीं दिया गया है।
सीमित सरकार: संविधान सर्वोच्च कानून है। राज्य के सभी अंग (विधानमंडल, कार्यपालिका, न्यायपालिका) अपनी शक्तियाँ इससे प्राप्त करते हैं तथा उन्हें इसकी सीमाओं में रहकर ही कार्य करना चाहिये।
2. संविधान की प्रकृति
अलिखित/लचीला: यह परंपराओं, कानूनों (जैसे: अधिकार विधेयक, 1689) और सामान्य कानून पर आधारित है। कोई एक ‘पवित्र’ दस्तावेज नहीं है।
लिखित/अटल: एक संहिताबद्ध दस्तावेज़। यह सर्वोपरि अधिकार का स्रोत है। इसमें संशोधन के लिये प्रायः विशेष बहुमत (अनुच्छेद 368) की आवश्यकता होती है, जिससे इसे बदलना सामान्य कानून की तुलना में अधिक कठिन हो जाता है।
3. न्यायिक समीक्षा
कमज़ोर/प्रक्रियात्मक: न्यायालय विधि की व्याख्या तो कर सकते हैं, लेकिन संसद के किसी अधिनियम को असंवैधानिक घोषित नहीं कर सकते। वे केवल असंगतता की घोषणा (मानवाधिकार अधिनियम 1998 के तहत) जारी कर संसद से पुनर्विचार करने का अनुरोध कर सकते हैं।
सशक्त/सारगर्भित: सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को संविधान (विशेषकर मौलिक अधिकारों) का उल्लंघन करने वाले कानूनों को अमान्य घोषित करने का अधिकार है (अनुच्छेद 13)। न्यायपालिका ही अंतिम व्याख्याकार है।
4. संशोधन शक्ति पर सीमाएँ
कोई सीमा नहीं: संसद साधारण बहुमत से संविधान (जैसे: उत्तराधिकार नियम, हाउस ऑफ लॉर्ड्स की शक्तियाँ) में परिवर्तन कर सकती है, ठीक वैसे ही जैसे कोई सामान्य कानून पारित किया जाता है।
मूल संरचना सिद्धांत: संसद के पास व्यापक संशोधन शक्तियाँ हैं, लेकिन यह संविधान की 'मूल संरचना' (जैसे: पंथनिरपेक्षता, संघवाद, विधि का शासन आदि) को नष्ट नहीं कर सकती, जैसा कि केशवानंद भारती (1973) मामले में स्थापित किया गया है।
5. अधिकारों का स्रोत
अवशिष्ट अधिकार: परंपरागत रूप से नागरिकों को वह सब कार्य करने की स्वतंत्रता थी, जो विधि द्वारा निषिद्ध न हो। वर्तमान में अधिकार विधिक (मानवाधिकार अधिनियम) हैं। सैद्धांतिक रूप से संसद इन अधिकारों को निरस्त कर सकती है।
मौलिक अधिकार: अधिकार संविधान (भाग III) द्वारा प्रत्याभूत हैं। ये न्यायालयों में प्रवर्तनीय हैं और सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) तथा उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद 226) द्वारा संरक्षित हैं।
6. संघीय बनाम एकात्मक संरचना
विकेंद्रीकरण सहित एकात्मक: शक्ति केंद्रीकृत है। स्कॉटिश या वेल्श संसदें UK संसद की अनुमति से अस्तित्व में हैं। सैद्धांतिक रूप से यह शक्ति वापस ली जा सकती है।
संघीय संरचना: राज्य केंद्र के प्रतिनिधि मात्र नहीं हैं। वे अपनी विधायी और कार्यकारी शक्तियाँ सीधे संविधान (अनुसूची 7) से प्राप्त करते हैं, न कि संसद से।
7. कार्यकारी जवाबदेही
शक्तियों का संलयन: कार्यपालिका विधायिका के भीतर ही स्थित होती है। प्रधानमंत्री प्रभावी रूप से संसद को नियंत्रित करते हैं (यदि उनके पास बहुमत है), जिसके परिणामस्वरूप लॉर्ड हेल्शम द्वारा वर्णित चुनावी तानाशाही की स्थिति उत्पन्न होती है।
नियंत्रण के साथ पृथक्करण: यद्यपि भारत में भी शक्तियों का एकीकरण है (मंत्री और सांसद दोनों पद ग्रहण करते हैं), फिर भी संविधान विशिष्ट नियंत्रण स्थापित करता है। राष्ट्रपति संविधान की रक्षा की शपथ (अनुच्छेद 60) के माध्यम से प्रधानमंत्री से भिन्न भूमिका निभाते हैं।
निष्कर्ष:
ब्रिटेन (UK) में सदियों से चली आ रही पूर्ण संप्रभुता संसद में निहित है, जो दीर्घकालिक संवैधानिक विकास को प्रतिबिंबित करती है, वहीं भारत में संविधान को सर्वोच्च माना गया है, जो नियंत्रण एवं संतुलन, न्यायिक समीक्षा और मूल अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है। दोनों मॉडल लोकतांत्रिक शासन को अभिव्यक्त करते हैं, परंतु वे मूलतः अंतिम अधिकार के स्रोत के रूप में भिन्न हैं— जहाँ ब्रिटेन में संसद में, और भारत में संविधान (और इस प्रकार जनता) में निहित हैं।
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